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मंगलवार, 15 नवंबर 2016

2016 अवलोकन माह नए वर्ष के स्वागत में - 1


प्रतिभाओं की कमी न कभी थी, न कभी होगी। साल गुजरते हैं, और मैं अपनी नज़र से अवलोकन करती हूँ, पता ही है आपको - एक रचना, जिसे चाहती हूँ दुहराना आपकी नज़र में  ... तो रखते हैं पाँव 2016 के अवलोकन माह में   -

मेरी पढ़ने की जिजीविषा मुझे दर्द की रजाई से निकालकर खुली हवा में ले आती है, अलाव सी भावनाएँ मुझसे घण्टों बातें करती हैं, और मैं मुट्ठी मुट्ठी चिंगारी आप तक ले आती हूँ। 

अवलोकन के पहले पादान पे हैं, लवली गोस्वामी 

 

The Three Graces


दावा है मेरा कुछ ख़ास है, जलती लकड़ियों के चटकने सी कोई बात है - 



नींद के बारे में


वह मुझसे पहले सोने जाता और मुझसे पहले जागता था
मैं अक्सर लिखते - लिखते सर उठा कर कहती तुम सो जाओ
मैं बाद में आकर तुम्हारे पास सो जाउंगी

मैं उसके साथ सोती थी
जैसे दरारों में देह को दरार का ही आकार दिए जोंक सोती है
संकीर्ण दुछत्तियों में थककर चंचल बिल्लियाँ सोती है 
धरती की देह पर शिराओं का - सा आकार लिए नदियाँ सोती है
नाल काटे जाने के ठीक बाद नाक से साँस लेने का अभ्यास करता शिशु सोता है
जैसे धरती आकाश के बीच लटके मायालोक में त्रिशंकु सोता होगा

सोने की क्रिया
हमेशा मेरे लिए एक प्रकार की निरीहता रही
पराजय रही
जागना एक सक्रियता
एक आरोहण

वह ताउम्र मुझसे कहता रहा
"कभी सोया भी करो बुरी बात नहीं "
 मैं इस अच्छी बात को रोज उसके चेहरे पर होता देखने के लिए जागती रही
मैं कहती रही किसी को सोते देखना सुख देता है
वह समझदार मेरी इस समझ को नासमझी कहकर
मुझे सुलाने की कोशिश करता रहा

वैसे तो सोया हुआ आप रात को तालाब के जल को भी कह सकते हैं
पर उसके भीतर आसमान गतिमान रहता है
सब तारे उस पर झुक - झुक कर अपना चेहरा देखते हैं
मैं भी उसे सोते हुए मुस्कुराते देखकर
उसकी आत्मा में अपनी उपस्थिति देखती थी

मेरे अंतस में वह ऊर्जा के केंद्र के जैसा ही था
पृथ्वी के कोर में पिघले खनिज की तरह
महावराह की तरह जब वह जल के सीमाहीन विस्तार पर
मुझे हर जगह तलाश रहा था
मैं उसके अंतस में जलप्लावित पृथ्वी सी समाधिस्थ थी
आप कह सकते हैं वह दिपदिपाता गतिमान मेरे अंदर सो रहा था
मैं अनवरत घूमती दिन -रात के चक्कर काटती उसके अंदर जाग रही थी

अगर देह ब्रह्माण्ड है तो प्रत्येक नींद प्रलय है
जो स्वप्न अगली सुबह स्मृति में शेष रह जाते हैं
वे नूह की नौका में बचे जीवित पशु - पक्षी हैं
यही स्मृतियाँ हमें आने वाले कल्प से दिन में
जीने के लिए माकूल कोलाहल बख़्शती है

पलकें नियामत हैं
(आप पर्दे भी पढ़े तो चलेगा )
वरना जरा सोचिये कैसा लगता होगा
जब नींद में मगरमच्छ को आते देखकर भी मछलियों की नींद नहीं टूटती होगी
वह अंतिम भयानक सपना तो याद होगा आपको
जिसने आपको न जाग पाने की विवशता का परिचय दिया होगा
वही आपके मन के सबसे अँधेरे कोने में छिपे डर का सपना
जो नुकीले दातों से आपको कुतर देता है पर आपकी नींद नही खुलती
नींद आश्वस्ति है
जागना अविश्वास है
तो बताइये आप मछलियों को क्या देना चाहेंगे
आश्वस्ति या अविश्वाश ?

मछलियाँ खुली आँखों से सच्ची निरीह नींद सोती हैं 
बगुले सोने का अभिनय करके झपट कर शिकार पकड़ते हैं
दुनिया के तमाम घोड़े खड़े – खड़े सोते हैं
जबकि उल्लू दिन की रौशनी को अनदेखा करके सोते हैं
सोना कतई सामान्य प्रक्रिया भर नहीं है
एक चुनी हुई आदत है 
उससे भी बढ़कर एक साधा हुआ अभ्यास है

8 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बढ़िया ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

रश्मी दीदी का यह भागीरथ प्रयास, हमारे लिये ब्लॉग गंगा की सहस्र धारा को उतारने और ब्लॉग बुलेटिन के गागर में समा देने का, हमेशा मुग्ध करता है. चाहे वो भूले बिसरे ब्लोग्स को याद करने का हो, नयी प्रतिभाओं को उचित मंच प्रदान करने का हो या वर्ष भर का अवलोकन हो.
आपके इस प्रयास को हमारा सलाम!!

vibha rani Shrivastava ने कहा…

मेरे लेखन की पैदाइश उन्हीं के बदौलत है
ना तो जनम ही नहीं होता

vibha rani Shrivastava ने कहा…

उम्दा

प्रियंका गुप्ता ने कहा…

बहुत सुन्दर...

sadhana vaid ने कहा…

वाह रश्मि जी ! बहुत ही खूबसूरत रचना पढ़वाई आपने ! इस चिंगारी की आँच कितना कुछ रौशन कर गयी ! आभार !

mridula pradhan ने कहा…

बहुत सुन्दर रचना ..रश्मि प्रभा जी का प्रयास निश्चय ही प्रशंनीय है ..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आपके इस प्रयास को हमारा सलाम!!

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