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शनिवार, 3 सितंबर 2016

प्रेम से पूर्वाग्रह तक

प्रेम के कई रूप होते हैं, यह किसी स्थान से, व्यक्ति से, किसी अभिव्यक्ति से, किसी पुस्तक से या किसी अन्य भौतिक वस्तु से या फिर किसी राजनीतिक विचारधारा से या फिर किसी राजनैतिक स्थिति से या फिर किसी वैचारिक स्थिति से। जब यह प्रेम की सीमाओं से पार कर पूर्वाग्रह बन जाता है तब यह कठिन हो जाता है। प्रेम के पूर्वाग्रह में बदलते ही व्यवहार में पाखण्ड आ जाता है यह पाखण्ड फिर अपने सामने हर किसी को छोटा साबित करने पर लग जाता है। मित्रों हर किसी को अपने अपने पूर्वाग्रह पसंद होते हैं और सभी अपने अपने पूर्वाग्रहों को ही सही मत समझने लगते हैं। असली दिक्कत तब होती है जब किसी का पूर्वाग्रह बर्दाश्त की सीमाओं को पार करने लगता है, उदाहरण के लिए यदि किसी को पाकिस्तान परस्ती का पूर्वाग्रह हो, किसी को भारतीय सेना के विरोध का पूर्वाग्रह हो, किसी को सेकुलरिज़्म के नाम पर सिर्फ एक वर्ग विशेष का पूर्वाग्रह हो तब फिर आप उसे क्या कहियेगा? 

कई बार यह पूर्वाग्रह किसी स्वार्थवश होता है तो कई बार यह मोहवश होता है लेकिन राजनैतिक विचारधाराओं का पूर्वाग्रह मुझे इन दोनों ही वर्गों से इतर लगता है और कई बार समझ ही नहीं आता कि राजनैतिक विचारधाराओं के नाम पर हो रही इस उठापटक के बीच आखिर आम आदमी की सोच में आ रहे बदलाव का क्या किया जाए। अब तटस्थता ख़त्म हो रही है, पत्रकार अब खबर गढने, बनाने और झूठ फैलाने का स्रोत बन रहे हैं। देश का आम आदमी भी राजनीतिक दल की तरह सोचने और आरोप गढ़ने लग गया है। देश का मीडिया तो खैर देशद्रोह की सीमाओं को पार करने लगा है और विघटनकारी और अलगाववादी शक्तियों के साथ गठजोड़ करके एक नई ही राह पर निकल चुका है। 

आज के समय में सोशल मीडिया के कारण कोई भी झूठ छुपाना मुश्किल हो गया है, और विरोध के स्वरों को स्थान मिल रहा है लेकिन फिर भी यह शोर शराबे से ज्यादा कुछ नहीं है और इसका कोई सकारात्मक परिणाम नहीं निकल रहा। यदि भारत ने आरक्षण और वोट बैंक की राजनीति को समाप्त नहीं किया तो परिणाम भयंकर होंगे। शायद विश्व के किसी भी देश में जनता के और सरकारों के जातिवादी और आरक्षणवादी होने सरीखी स्थिति नहीं होगी। यह भारत के लिए सबसे गंभीर समस्या है....

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अब चलते हैं आज की बुलेटिन की ओर ...

दिल ही तो है

सियासत है काजर की कोठरी

...उसको जल जाना होता है !

आदमी बना रहा है एक आदमी को मिसाइल अपने ही किसी आदमी को करने के लिये नेस्तनाबूत

संजू शब्दिता के कुछ शेर

आज फिर अखबार नहीं!

भैंसों पर विज्ञापन का नवोन्मेषी विचार

जियो - अंततः उपभोक्ता ही ठगा जाना है

इतिहास अपने को दोहराता है ....

चिट्ठी में है मन का प्यार

अब किसी केजरीवाल पे देश जाने कब और क्यों विश्वास करेगा..

4 टिप्पणियाँ:

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

देश के सामने और सोशल मीडिया के माध्यम से हर भारतवासी के सामने यह सच आना चाहिए कि क्या प्रेम है और क्या पूर्वाग्रह. किस प्रकार राजनेता अपने स्वार्थ के कारण लोगों को आपस में लड़ा रहे हैं. एक बुलेटिन को एक नयी सोच की ओर इशारा करती है! सोचो आखिर कब सोचोगे!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

प्रेम पूर्वाग्रह और पाखण्ड बहुत सुन्दर चुनाव सुन्दर बुलेटिन पेशकश।

झूठ इतने हैं
जो छूपाये जाते हैं
गिन नहीं सकते
संगणक तक
फेल हो जाते हैं
रोज देखिये
अपने आसपास ही
कई कई कबरों में
दबाये जाते हैं
बस वही और
उतना ही सच
फैलाया जाता है
जितने में से दूध
फेंट कर अपने
मतलब का मक्खन
निकाला जाता है ।

आभार देव जी 'उलूक' के सूत्र 'मिसाइल' को आज के बुलेटिन में स्थान देने के लिये ।

Gopesh Jaswal ने कहा…

इस खोटे ज़माने में सबको खरी-खरी सुनाने के लिए 'ब्लॉग बुलेटिन' की प्रशंसा की जानी चाहिए. आज पत्रकारिता में और चाटुकारिता में, ब्लैक मेलिंग में, लौबीइंग में, बहुत कम अंतर रह गया है और जो पत्र इनमें 'ब्लॉग बुलेटिन' की भांति दूरी बनाए रखते हैं वो बधाई के पात्र हैं.

Kavita Rawat ने कहा…

सुन्दर सार्थक बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

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