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गुरुवार, 15 सितंबर 2016

ख्वाहिश



सपनों के कमरे मेरी आखिरी सांस तक बनते रहें - यही ख्वाहिश है ! 

तब ही समझ तुम पाओगे..... - गीत मेरे

अभियन्ता दिवस की बहुत शुभकामनाये सभी होनहार अभियंताओं को...
अगर वे न होते 
फेसबुक का संसार न होता
बड़ी बड़ी अट्टालिकाएं न होतीं
सड़क पर गाड़ियों की लम्बी कतारें न होती
नदियों को पाटने वाले पुल न होते
रौशनी से जगमग मॉल न होते
खेतों में ट्रैक्टर न होते
....ज्यादा नहीं गिनवाना...
तकनीक का विकास हो और निरंतर होता रहे 💐💐


अंतिम विदा के वक्त बस में हिचकियाँ लेकर रोती लड़की की आँखें लड़के ने अपने रूमाल से पोंछीं थीं ।इतने में बस स्टार्ट हुई और लड़का लड़की की हथेलियों में रूमाल रखकर नीचे उतर गया ।
बस .. इतना ही हुआ था जब आखिरी बार लड़की ने लड़के को देखा था ।लड़का लड़की को प्रेम नहीं करता था ।
लड़की भी कहती थी कि उसे प्रेम वगेरह नहीं था उस लड़के से ।लेकिन जब बस चलने के बाद भी लड़की की सिसकियाँ बंद न हुईं तो बगल में बैठी महिला ने कंधे पर हाथ रखकर बड़े कोमल स्वर में पूछा था 
" कौन था वो तुम्हारा "
लड़की ने रोते रोते ही कहा था " सबकुछ " और उसी महिला की गोद में सर छुपाकर बिलख पड़ी थी। महिला ने फिर कुछ नहीं पूछा। बस एक ठंडी सांस ली और लड़की को अपनी गोद में जीभर कर रोने दिया।
लड़की को आज याद नहीं कि उसने उस महिला को क्या जवाब दिया था।
लड़का आज भी प्रेम नहीं करता लड़की को ।लड़की भी कहती है कि उसे उस लड़के से प्रेम नहीं था ।दोनों की जिंदगियां कितना आगे भी तो बढ़ गयीं थीं !
मैं भी मान लेती कि ये प्रेमकथा नहीं थी अगर एक दिन एक पुराने संदूक में सबसे नीचे तह किया रखा मैला सा रूमाल मुझे न मिलता !
प्रेम को नकारने से प्रेम नहीं मरता !वो तो जाने किस कोने में अपनी इत्तू सी जगह बनाकर मुस्कुराता हुआ बैठा रहता है चुपचाप ! कभी खतों में , कभी चाबी के छल्लों में, कभी किसी सूखे फूल में तो कभी संदूक में बीस बरस से रखे एक मुचड़े हुए रूमाल में !

तुम्हारे होने से
रात की बाँह का सिरहाना लिए
मैं निश्चिन्त सोती हूँ
अँधेरे नही डराते मुझे
मैं अगली सुबह को तुम्हारी हथेलियियों में जोर से फंसा कर रखती हूँ
तुम हाथ की पकड़ ढीली करते हो
और पर्दे रौशनी से चमक उठते हैं
तुम रहना हमेशा
धूप को सिंदूर में रखूंगी
हवा में फटक आउंगीँ रात की मदहोश चादर
चूड़ियों में रोक लुंगी पृथ्वी के चक्कर
नमक को मीठी मुस्कराहट के साथ तुम्हारे होठो पर रखूंगी
मैं प्यार में झील झरना जमीन और जंगल हो जाउंगी
तुम मुझमें खो जाओ
फिर मिल जाना मुझे
दूसरे करवट बैठा दुःख मुझपर मुस्कराता है यार
कहता है बदल तो जायेगी सुबह की खिड़की
आँख में उतर आएगा नमक
जिंदगी ढलान से बिना ब्रेक की साइकिल भी हो सकती है
अँधेरी रात झिंगरों की टोली
एक रुदन से और काला कर सकती है अँधेरे का चेहरा
समय तुम्हारे यकीन के ताले में नही बन्द रहेगा पागल
नशे सी उन्नत सपनों की बेल खुरदुरे दिवार से चोट भी खायेगी
हाँ
तुम्हारे होने में धरती का रंग हरा और हहराती नदी को गहरा देखूंगी मैं
जिंदगी के स्याह भाग को देखने की खातिर तुमसे दूर होना होगा
तुम्हारे होने नही होने के मध्य
मैं दुनियां के सभी रंग से रंगूँगी जीवन
मेरे सिंदूर के चटक सूरज को कोई बादल भी घेरेगा
समय की सभी रंगों से भींगती रहना
हाँ जरूर
मैं प्यार में तुमसे बहुत दूर
फिर बहुत बहुत पास होना चाहती हूँ....
(ये कौन डायरेक्टर है ?प्यार वाले सीन भी दो यार )

4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

ऋता शेखर मधु ने कहा…

सभी लिंक देखे, वुमनिया,गीत मेरे, डायरी ,भक्त ...प्रेम कहानी , और छंदमुक्त सभी सुन्दर| आभार मधुर गुंजन शामिल करने के लिए दी|

वाणी गीत ने कहा…

बहुत समय बाद ब्लॉग हलचल में शामिल हुए.
पढ़ देखती हूँ.
आभार!

Kavita Rawat ने कहा…

सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति
आभार!

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