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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

सम्मान खोते उच्च न्यायालय

जिला न्यायालय अभियुक्त को दोषी ठहराता है, उच्च न्यायालय बरी कर देता है और फिर अंत में सर्वोच्च न्यायालय दोषी ठहरा कर उच्च न्यायालय को साक्ष्यों को न देखने के लिए फटकार लगा देता है। सलमान खान के दोनों मामले देखिये, ऐसे ही कई और मामले हैं जहाँ उच्च न्यायालय सिर्फ खानापूर्ति करने के लिए हैं और अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली। उन्हें मालूम है कि कोई भी फैसला दें, मामला ऊपरी अदालत में ही हल होना है सो क्या देखें, क्या सुनें और क्या ही बोलें सो बस काम ख़त्म किया जाए। मेरे विचार से इस मामले में भयंकर भ्रष्टाचार हुआ है और इसकी सीबीआई जांच होना चाहिए। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और वकील और खुद सलमान खान के खिलाफ लाई डिटेक्टर टेस्ट कराया जाना चाहिए था, वैसे कुछ होगा नहीं क्योंकि भ्रष्ट हो चुकी न्यायपालिका के इस अंग में भयंकर कोढ़ फ़ैल गया है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों है?
अपने यहाँ की न्याय प्रणाली को ओवरहालिंग की ज़रूरत है, जजों की नियुक्ति की पुरानी और बेकार हो चुकी अंग्रेजों की प्रणाली को निकालकर एक बेहतर प्रणाली की ज़रूरत है। समस्या यह है कि भ्रष्ट हो चुके न्यायतंत्र में इस बदलाव की वकालत करने वाले बहुत कम लोग हैं और न्यायप्रणाली भी स्वयं को बदलना नहीं चाहती।
मित्रों वकालती पढ़ने वाले कितने व्यक्ति वाकई में वकालत को अपना कैरियर बनाना चाहते हैं? टीचरी के बाद यह दूसरा ऐसा पेशा है जिसे लोग मजबूरी में चुनते हैं। टीचरी लाइन में वह जाते हैं जो कहीं किसी और क्षेत्र में जा नहीं पाते और टीचरी लाइन में जाकर अपनी कुंठा बच्चो में धकेलते रहते हैं। ठीक वैसे ही वकालती लाइन भी है जिसमे बड़ी संख्या में लोग कुछ और नहीं कर पा सकने के कारण मजबूरी में इस लाइन में आ जाता है और फिर धीरे धीरे थोड़ा बहुत सीखकर इसी भ्रष्ट तंत्र का हिस्सा बन जाता है।
वकालती लाइन में ज़बरदस्त धांधलेबाजी है, घूसखोरी है, चोरी और मक्कारी है। दिक्कत यह है कि इसकी कोई खुलकर निंदा नहीं करता, सब डिप्लोमैटिक उत्तर देकर निकल लेते हैं... न्यायालय का सम्मान करने जैसी भाषा अजीब लगती है कभी कभी, उसपर भी उच्च न्यायालय का तो कहना ही क्या है?
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एक चिंकारे की आत्महत्या

बेटियों के लिए जागना होगा

यह राज ज़माने से छुपाती चली गई

खामोश हो गयी शोषित. वंचित समाज के हित में उठनेवाली आवाज

सम्‍मान और गौरव से सात हाथ की दूरी..

गढवाल में बाइक यात्रा

पापा का ८० वां जन्मदिन

लाडली १ 

मौसम की मार , डेंगू बुखार :

मेरी आस यही अरदास यही

Goodbye VCR - अलविदा वीसीआर

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4 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सुन्दर मुझे पता था चिंकारे ने आत्महत्या की है । सुन्दर प्रस्तुति देवजी ।

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

अच्छी पडताल. उचित प्रश्न... लेकिन जवाब किसी के पास नहीं.

Abhimanyu Bhardwaj ने कहा…

पोस्‍ट को बुलेटिन में शामिल करने के लिये धन्‍यवाद

Kavita Rawat ने कहा…

अपने यहाँ की न्याय प्रणाली को ओवरहालिंग की ज़रूरत है, जजों की नियुक्ति की पुरानी और बेकार हो चुकी अंग्रेजों की प्रणाली को निकालकर एक बेहतर प्रणाली की ज़रूरत है
न्यायालय का सम्मान करने जैसी भाषा अजीब लगती है कभी कभी, उसपर भी उच्च न्यायालय का तो कहना ही क्या है? ..सटीक , गंभीर चिंतनीय .
बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति .

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