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रविवार, 17 अप्रैल 2016

गुज़रा ज़माना बचपन का - ब्लॉग-बुलेटिन के बहाने

“भाई! तुमने मुझे यहाँ क्यों बुलाया है?”
”मेरे यहाँ आना तुम्हारी शान के ख़िलाफ़ है और तुम्हारे यहाँ जाना मेरे उसूल के ख़िलाफ़. हम दोनों कहीं और ही मिल सकते थे.”
”हम दोनों कहीं और नहीं, सिर्फ़ यहीं मिल सकते थे. हमारे रास्ते एक दूसरे से चाहे कितने भी अलग क्यों न हो जाएँ, हमारे बचपन एक दूसरे से कभी अलग नहीं हो सकते!” – (फ़िल्म दीवार)

ई बचपन चीजे अइसा है कि जिसके बारे में सायर कहता है कि ...
"ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो,
भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी,
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन,
वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी."

ई एतवार का दिन हमरे लिये अपने बचपन से मिलने का दिन होता है. सिरीमती जी मॉर्निंग वॉक के बाद सुबह आठ बजे हमरा चाय बनाकर हमको उठाती हैं, “उठिये रंगोली शुरू होने वाली है!”
रंगोली माने दूरदर्शन पर फिल्मी गाना का प्रोग्राम. बचपन से रंगोली अऊर चित्रहार पूरा परिबार का पसन्दीदा प्रोग्राम हुआ करता था. चित्रहार तो नहीं, मगर रंगोली सायदे छूटता है हमलोग से.

एगो टाइम आया जब लोग दूरदर्सन देखने का मतलब अपना इस्टैंडर गिरा हुआ समझने लगा था. मगर आज भी दूरदर्सन का सिग्नेचर ट्यून जब बजता है त बूढा मन भी बचपन के ओही टाइम में चला जाता है, अऊर लगता है कि जमीन में बैठे हैं हम लोग अऊर कुर्सी, पलंग, खटिया अऊर सोफा पर घर का ऊ सब बुजुर्ग बैठे हुये हैं जो आज हमारे बीच नहीं हैं.

ऊ दूरदर्सन का जमाना भी गजब जमाना था. काला उजला टीवी अऊर छत पर लगा हुआ अंटीना. एगो आदमी घुमा रहा है छत पर चढकर अऊर दोसरका आदमी नीचे से चिल्लाकर उसको फीडबैक दे रहा है, “साफ हो गया... आ रहा है.. ओफ्फोह, केतना घुमा दिये, फिर से पहिलका जगह पर लाओ... अब छोड़ दो, एकदम साफ हो गया है.” आ ऊ बेचारा जइसे अंटीना छोड़कर हटा कि फोटो फिर गायब. तब तक उधर से कोनो का एक्स्पर्ट कमेण्ट आता, “काहे माथा खराब किये हो, ओहीं से खराब आ रहा होगा! तनी अस्थिर से बइठो, अपने ठीक हो जाएगा!”

सिनेमा देखने के लिये एतना जोगाड़ लगाने के बाद सिनेमा का असली मजा आता था.

धीरे-धीरे दूरदर्सन बदला. हम लोग, खानदान, नुक्कड़, फौजी, सर्कस, बुनियाद, रामायण अऊर महाभारत... पूरा परिवार को एक साथ बइठकर देखने पर मजबूर कर देता था. साथ में देखना अऊर बीच-बीच में रिऐक्सन भी देना अऊर सुनना. परिबार में त आस-पास का भी परिबार सामिल होता था.

दूरदर्सन के समाचार का अपना एगो अलगे पहचान था. आज के जइसा स्टार ऐंकर नहीं था, लेकिन आझो जे.वी.रामन, सरला ज़रीवाला, सलमा सुलतान, मीनू, नीति रविन्द्रन, रामू दामोदरन, रिनी साइमन खन्ना और शम्मी नारंग. ई आखिर वाला दुन्नो लोग का आवाज त दिल्ली मेट्रो में अभियो सुनाई देता है. केतना एतमिनान से ऊ लोग नियूज पढते थे. 

आज भी दूरदर्सन के समाचार पर बहुत सांति मिलता है. बाकी चैनेल पर लोग जहाँ परिचर्चा में एक दूसरा का मूड़ी काट लेने पर उतारू रहता है, ऐंकर चिल्ला-चिल्लाकर मजमा लगाता रहता है अऊर समाचार चैनेल भी राजनैतिक पार्टी का ऑफिस बन गया बुझाता है, दूरदर्सन में एतना सांति से बिमर्स होता है कि लगता है सच्चो कोनो समस्या के बारे में लोग सीरियसली बिचार  कर रहा है.

समाचार अऊर सीरियल को भुलाइयो जाएँ त भला ऊ भारत दर्सन कऊन भुला सकता है. हमारे भारत देस के अलग-अलग प्रदेस का सेलेब्रिटी लोग जब मिलकर गाता था - मिले सुर मेरा तुम्हारा - त अपना देस का बिसालता के साथ-साथ बिबिधता का भी अलगे आनन्द आता था. भासा का कोनो बैरियर लगबे नहीं करता था. अभी भी कोई सुने तो मन पुलकित हो उठता है.
  
आप ताजा लिंक देखिये अऊर हम तनी गुनगुना लेते हैं...

"आया है मुझे फिर याद वो ज़ालिम,
गुज़रा ज़माना बचपन का!"

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मनुष्यजाति और प्राकृतिक पर्यावरण - १

मैं भूंखा हू

सत्ता आने के साथ समाज की समझ घटती जाती है

गजल

एक चतुष्पदी

सेंसेक्स और मानसून

एक दिन की Prayer उन बच्चियों के नाम करें जो ….

मैं हूँ कहां ....कहाँ नहीं हूँ

पता है के तू यूँ हर गाम मुझको आज़माएगा

धर्म का आदिम स्वरूप और साम्यवाद –

सितारों के बायोपिक का दौर

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18 टिप्पणियाँ:

DrPratibha Sowaty ने कहा…

मैं हूँ कहाँ .... को शामिल करने के लिए आभार

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बहुत बढ़िया।

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

बहुत बढ़िया।

parmeshwari choudhary ने कहा…

बहुत बढ़िया. कथा सरित सागर भी ..और भास्कर घोष का जमाना

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

भइया ,दूरदर्शन के जिक्र के साथ बहुत कुछ याद आ गया 😊 हम सब भाई बहन जब मैच देखते तो घर में काम करने वाले भैया की ड्यूटी तो ओ दिन छते पर रहती थी और ऊ भी एंटीना घुमाते रहते थे पूछते हुए ,"बहिनी अब आया ... " 😊
बाकी आपकी पसन्द अभी पढ़ते हैं .... सादर प्रणाम

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

भइया ,दूरदर्शन के जिक्र के साथ बहुत कुछ याद आ गया 😊 हम सब भाई बहन जब मैच देखते तो घर में काम करने वाले भैया की ड्यूटी तो ओ दिन छते पर रहती थी और ऊ भी एंटीना घुमाते रहते थे पूछते हुए ,"बहिनी अब आया ... " 😊
बाकी आपकी पसन्द अभी पढ़ते हैं .... सादर प्रणाम

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ ने कहा…

बहुत खूब आभार आपका

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

वाह बहुत सही लिखे हैं पुराने हो जाने के बाद सारा पुराना लौट लौट कर आना शुरु हो जाता है । हम सोचे थे हमी को हो रहा है चलो एक से दो भले । इसका मतबल होता है तीसरा भी जरूर होयेगा कोई :) सुन्दर इतवारीय बुलेटिन ।

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जैसे जैसे हम बड़े होने लगते हैं, हमारा बचपन हम पर हाबी होने लगता है. ऐसा हम सबके साथ होता है. और दूर दर्शन!! वे दिन भी भूलने लायक हैं?? न जी न :) हमने भी एक पोस्ट लिखी थी- दूरदर्शन के दिन" पढना हमारे ब्लॉग पर खोज के :)

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

आज ये पढ़कर फिर तीस साल पुराने समय में जाकर जी लिए । हमारे यहाँ रामायण के लिए ही टी वी खरीदा गया था । लेकिन आज भी उन धारावाहिकों का कोई जोड़ नहीं ।

डॉ. कौशलेन्द्रम ने कहा…

दूरदर्शन के कार्यक्रमों आज भी अपना अलग ही स्तर है । हमें कभी-कभी डर लगता है ...क्या यह स्तर आगे भी बना रहेगा ...कहीं इस पर अन्य चैनल्स की काली छाया तो नहीं आ जायेगी ?

Suman ने कहा…

हम सब भाई बहन एक साथ ही रहते थे यहाँ हैदराबाद में तब , फेसबुक पर जो मेरा छोटा भाई उसे तब LG में पहली नौकरी लगी थी उसकी पहली सैलरी से हमने ब्लैक एंड व्हाईट टी वी ख़रीदा था ! दूरदर्शन के सभी कार्यक्रम कुछ इसी तरह से हम सब एन्जॉय करते थे,सलमा सुलतान जी का खुले केशों में कान के पीछे गुलाब का फूल लगाने का वो अंदाज मुझे काफी अच्छा लगता था :) ! आपकी इस पोस्ट ने मेरी भी वे सभी आपने जिक्र की हुई पुरानी यादें फिर से ताजा कर दी आभार !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

कोई लौटा दे मेरे बीते हुये दिन ... :(

Kavita Rawat ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

Asha Joglekar ने कहा…

बीते दिनों की याद ताजा कर दी। तब बच्चे तो नही थे हम पर बूढे बी नही थे। लारे पुराने समाचार वाचकों के नाम भी गिनवा दिये आभार।

Akhil ने कहा…

सराहनीय प्रयास ! मेरी पंक्तियां सम्मिलित करने के लिए ह्रदय से आभार !

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

मैंने इसीलिये कहा था कि हम चाहे कितना भी अलग क्यों न हों हमारे बचपन कभी अलग नहीं हो सकते हैं! आप सभी का बहुत बहुत आभार! भाई शिवम ने इस पोस्ट की सज्जा से चार चाँद लगा दिये बुलेटिन में. उन्हें आभार कहकर उनकी तौहीन नहीं करूँगा!
सभी पाठकों का धन्यवाद!

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

... पर, अब "साप्ताहिक" रंगोली से अपना "नित्य" का काम नहीं बनता तो यूट्यूब पर पुराने गानों का चैनल जब तब, अकसर सुबह और देर रात लगा लिया जाता है :)

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