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सोमवार, 21 मार्च 2016

बंजारा

सभी ब्लॉगर मित्रों को राम राम....

आज के दिन का आगाज़ करती हूँ सीमा दी के एक गीत के साथ जो सभी रचनाकारों को समर्पित है......
चूल्हा और किसी के घर का 
किसी और का है भंडारा 
और किसी का पत्तल-दोना
किसी और का है चटकारा
यहां वहां से मांग-तांग कर 
हल्ला-गुल्ला,गर्जन-तर्जन
बहरे कानो ने लिख डाले 
जाने कितने क्रंदन-कूजन
राम राम जप धरा जेब में 
माल पराया मीठा-खारा
फुटपाथों की भोर-निशाएं
'
पाँच सितारा' ने रच डाली 
भरे हुए पेटों ने परखी 
भूख-प्यास की रीती थाली
पनही गाये फटी बिवाई
ले सिसकारी का इकतारा
खुले व्योम ने लिखी कथाएं 
पिंजरे वालों के पाँखों की 
नदियों ने खींची तस्वीरें 
तृषा भरी जलती आँखों की
कुल-कुनबे के गीत रच रहा 
गलियों में फिरता बंजारा.......सीमा अग्रवाल
एक नज़र आज के बुलेटिन पर
आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

11 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

प्रियदर्शिनी तिवारी ने कहा…

होली की शुभकामनाओं सहित बहुत बहुत शुक्रिया

ई. प्रदीप कुमार साहनी ने कहा…

बहुत बढ़िया बुलेटिन ।

Barthwal ने कहा…

किरण बहुत खूब ... सीमा जी की सुंदर रचना. 'बात इतनी से कहने आया हूँ' को स्थान देने हेतू आभार ... शुभम

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

सन्तुलित चयन ...
"झरोखा" को सम्मिलित करने के लिए आभार !

निवेदिता श्रीवास्तव ने कहा…

सन्तुलित चयन ...
"झरोखा" को सम्मिलित करने के लिए आभार !

Amrita Tanmay ने कहा…

हार्दिक आभार ।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति ...
बुलेटिन परिवार को होली की हार्दिक शुभकामनाएं!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन किरण जी ... आभार |

vibha rani Shrivastava ने कहा…

आभारी हूँ

Anurag Choudhary ने कहा…

बहुत ही सार्थक बहुत बहुत सुन्दर प्रस्तुति ।

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