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सोमवार, 11 जनवरी 2016

"मन की बात के साथ नया आगाज"

सभी ब्लॉगर मित्रों को सादर वन्दे

मैं किरण आर्य गत कुछ वर्षो से लेखन के क्षेत्र में सक्रिय, सन्निधि संगोष्ठी से संयोजक और मंच संचालक के तौर पर जुडी हूँ ! साथ ही कई पत्रिकाओं में रचनाओं के प्रकाशन के साथ कई टीवी चैनलों पर काव्य पाठ ! सामाजिक संस्थाओ से भी जुड़ाव ! वर्ष २०१३ में हिंदी दिवस के अवसर पर महाखबर और निदान फाउंडेशन की और से हिंदी सेवी सम्मान ! 

आज यहाँ ये मेरी प्रथम पोस्ट है, अपने खरे से तेवर में स्त्रियों की सहनशीलता और महान होने के भ्रम को झकझोरती

एक स्त्री कर्तव्यनिष्ठ सी बचपन से ही समझदारी का लबादा ओढ़े फूंक फूंक के कदम रखती संस्कारों और इज्ज़त को थामे कर्तव्यों की गठरी कंधे पर टांग चलती निरंतर मुस्कुराती हारना कब सीखा उसने ? नदी सा बहना मान अपनी नियति राह की मुश्किलों से लड़ती बढती आगे, कर्तव्य बस कर्तव्य ये करो ये करो ये करो और वो करती करती बस करती बिना कोई सवाल किये बिना अपनी पीड़ा दर्शाए बिना कुछ कहे सुने, जहाँ जरा चूक या कमी हुई कर दी जाती कटघरे में खड़ा अरे इतना सा काम नहीं होता तुमसे ? अक्सर गलत को भी कर लेती आत्मसात, सहन......सुख शांति की कामना को पोषित जो करना उसे, ये भी उसकी ही कर्तव्य की परिधि में आता......हाँ सहना उसकी नियति हो जाता है इन सबमे जाने कब ?

ये वो भी नहीं जान पाती है.....जब कभी वो करती अपने अधिकारों की बात तो हर तरफ से स्वर मुखर हो शोर करते और वो अधिकारों की बात करने को अपनी गलती समझने लगती.....उसके मुस्कुराने चुप रहने सहने को मान लिया जाता उसकी दुर्बलता और उसपर हावी होने वाली शक्ति करती अट्टहास....कर्तव्यनिष्ठ हर कठिनाई को मुस्कुराकर वहन करने वाली वो बन जाती पल भर में अबला, बेचारी....मुझे समझ नहीं आती बस इतनी सी बात, दुर्गा की प्रतिमूर्ति घर बाहर के हर कर्तव्य को अच्छे से निर्वाह करने वाली हर क्षेत्र में अपना लोहा मनवाने वाली स्त्री कैसे अबला या दुर्बल हो सकती है? वो चाहे तो पल भर में अपने ऊपर हावी होने वाली शक्ति को बना भी सकती है और मिटा भी सकती है, बस उसे अपनी शक्ति का भान हो.....जहाँ इतना कुछ वो करती बच्चो, पति परिवार के लिए वहां अपने लिए एक जहां या अपने लिए कुछ सपने बुने तो अपराध क्या ? जब वो पति की सहयोगिनी बन उसके हर कृत्य की साक्षी बन देती साथ तो गर वो भी चाहे पति बने सहयोगी तो क्या गलत

मुझे अलग अलग विचारों से जूझना उन्हें समझना पसंद है और इसी कड़ी में यहाँ भी मैंने देखा कई महिलाओं को अपनी उम्मीदों अपने सपनो का गला घोंटते हुए....पति को पसंद नहीं या परिवारवाले नहीं चाहते उनकी बहु लेखिका बने रचे कुछ ऐसा जिसमे विद्रोह की गंध आवे, कुछ ऐसा जिसमे सच हो जावे नग्न और करे नर्तन....उसका कर्तव्य है घर परिवार को देखना उनकी जरूरतों को पूरा करना बस वो वहीँ करे और इसमें ही अपने जीवन की सार्थकता पा जीवन को धन्य समझ ले.......बड़ी हास्यपद सी स्थिति होती है जब औरत कुछ सही बात कहे और सामने से पति का जवाब हो ज्यादा उड़ों मत पर काटके रख दूंगा दो मिनट में या मूह तोड़ दूंगा गर जुबान खोली तो.....स्त्री क्या बंधुआ मजदूर है या गुलाम

ऐसे में अक्सर उसकी साँसे घुटने लगती है वो छटपटाती है निकलना चाहती है इस भंवर से लेकिन उसके पैरो में पड़ी बेड़ियाँ उसे कर देती है बेबस......प्रेम की कर्तव्य की ममता की और संस्कारों की......वो चीखना चाहती है लेकिन चीख उसकी गले में ही रह जाती है घुटकर और आसूं नेमत से रहते सजे उसकी आँखों में बह निकलने को लालयित से.....लेकिन अपनी मुस्कान में छिपा लेने की कला में माहिर वो समझती महान स्वयं को, और इसी महानता के भ्रमों से बंधी वो करती जीवन पूरा......बावरी जो है......नहीं जानती कि अपनी मुक्ति का मार्ग उसे स्वयं करना होगा प्रशस्त अपने सपनो को उड़ान देने के लिए लड़नी होगी अपनी लड़ाई उसे खुद ही.........दिल्ली से अपने खरे से तेवर में खुराफाती किरण आर्य

एक नज़र आज के बुलेटिन पर 

आज की बुलेटिन में बस इतना ही मिलते है फिर इत्तू से ब्रेक के बाद । तब तक के लिए शुभं।

10 टिप्पणियाँ:

Barthwal ने कहा…

किरण जी नई पारी के लिए शुभकामनाएं ...खरी खरी कहते रहे .. आभार मेरी रचना का लिंक देने हेतू .... शुभम

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

स्वागत है । सुंदर प्रस्तुति ।

HARSHVARDHAN ने कहा…

सुन्दर और पठनीय बुलेटिन प्रस्तुति के लिए आभार किरण जी।
पहली बुलेटिन और ब्लॉग बुलेटिन टीम में आपका हार्दिक स्वागत है। सादर ... अभिनन्दन।।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

पहली पारी खरी खरी , अच्छा लगा यह खरा अंदाज और लिंक्स

parmeshwari choudhary ने कहा…

स्वागत आपका. मनुष्य साधारण तया स्त्री या पुरुष ही होता है. यह देह की पहचान है और उसीसे कृत-अकृत तय होता है . मस्तिष्क और आत्मा लिंग की सीमा में ना तो कैद होती है और ना की जा सकती है . अच्छे-बुरे स्त्री-पुरुष दोनों ही हो सकते हैं . पर स्त्री होने के लाभ सब चाहिए और जब जिम्मेदारी का वक्त आये तो महानता और त्याग-मूर्ति का राग अलापा जाये, यह तो उचित नहीं है .

Alpana Verma अल्पना वर्मा ने कहा…

किरण आर्य जी को इस प्रथम सफल प्रयास हेतु बधाई!
मेरी पोस्ट को इस में शामिल करने हेतु तहे दिल से आभार.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सुस्वागतम्! पहली पोस्ट बहुत अच्छी है! ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आभार!!

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सुस्वागतम्! पहली पोस्ट बहुत अच्छी है! ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आभार!!

Kavita Rawat ने कहा…

किरण आर्य जी आपके बारे में जानकार बहुत ख़ुशी हुयी ... प्रथम बुलेटिन प्रस्तुति बहुत अच्छी लगी ...आभार!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अगर क्रिकेट की जुबान मे कहूँ तो, पहली ही गेंद को फ्रंट फूट पर आ कर आपने बाउंडरी के बाहर कर दिया है ... इस शानदार आगाज के लिए ढेरों बधाइयाँ !! बुलेटिन टीम मे आपका स्वागत है !

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