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रविवार, 20 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (२०)



सपने खरीदते 
सपने बेचते 
एक सपना मैंने तुम्हारे लिए भी खरीदा 
स्नेहिल खनखनाती हँसी के झालर लगाये 
पर तुम्हें ठोस हकीकत खरीदने में 
सपनों की गहराई का
उसे हकीकत बनाने के सुकून का पता ही नहीं चला !

 .... कविता रावत  


हर मनुष्य की अपनी-अपनी जगह होती है


हरेक पैर में एक ही जूता नहीं पहनाया जा सकता है।
हरेक  पैर  के  लिए  अपना  ही जूता ठीक रहता है।।

सभी लकड़ी तीर बनाने के लिए उपयुक्त नहीं रहती है। 
सब   चीजें  सब  लोगों  पर  नहीं  जँचती   है।।

कोई जगह नहीं मनुष्य ही उसकी शोभा बढ़ाता  है। 
बढ़िया कुत्ता बढ़िया हड्डी का हकदार बनता है ।।

एक मनुष्य का भोजन दूसरे के लिए विष हो सकता है ।
सबसे  बढ़िया  सेब को  सूअर  उठा ले  भागता  है।।

शहद गधे को खिलाने की चीज नहीं होती है ।
सोना नहीं गधे को तो घास पसंद आती है ।।

हरेक चाबी हरेक ताले में नहीं लग पाती है ।
हर मनुष्य की अपनी-अपनी जगह होती है ।। 
                    

8 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

कविता रावत जी का अनवरत ब्लॉग लेखन भी प्रभावित करता है।

mridula pradhan ने कहा…

सुन्दर कविता..कविता जी..

JEEWANTIPS ने कहा…

सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार..
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका इंतजार....

Ananya Singh ने कहा…

यथार्थ वर्णन करती रचना !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

सत्य का बोध करवाती रचना |

Kavita Rawat ने कहा…

आभार दीदी जी!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना । कविता जी निरंतरता बनाये रखती हैं ।

संजय भास्‍कर ने कहा…

वाह बहुत सुंदर !

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