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बुधवार, 30 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (३०)

ज़िन्दगी है तो मौत भी है 
मौत से आगे ज़िन्दगी है 
है चक्र यही जीने-मरने का 
ईश भी है, शैतान भी है 
मानव है 
दानव भी है  ... 

अनीता निहलानी 


है ब्रह्म जहाँ होगी माया !


खिलते काँटों संग पुष्प यहाँ
है धूप जहाँ होगी छाया,
हत्यारा गर तो संत भी है
है ब्रह्म जहाँ होगी माया !
हो तिमिर सघन, घनघोर घटा
रवि किरणें कहीं संवरती हैं,
जो आज चुनौती बन आयी
कल बदली बनी बरसती है !
जीवन दो का है खेल सदा
हर क्षण में दूजा मरण छिपा,
इक श्वास जो भीतर भर जाती
बाहर जाती ले रही विदा !
जो पार हुआ तकता दो को
वह खेल समझता है जग का,
इस ऊंच-नीच के झूले से
वह कूद उतरता खा झटका !
है शुभ के भीतर छिपा अशुभ
शत्रु बन जाते मित्र घने,
न स्वीकारा जिसने सच यह
विपदा के बादल रहे तने !
सुख की जो बेल उगाई थी
कटु फल दुःख के लगते उस पर,
जीवन में छिपा मरण पल-पल
मन करता गर्व यहाँ किस पर !

4 टिप्पणियाँ:

Kavita Rawat ने कहा…

अनीता जी की बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति हेतु आभार!

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर रचना ।

सदा ने कहा…

Behatreeeen

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत खूब ... :)

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