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मंगलवार, 29 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (२९)


चाँदनी का पर्दा है 
फर्श सितारों का है 
हवाएँ शोखी करती  हैं 
कुछ इशारे करती  हैं 
मैं बहक रहा हूँ 
तुझे सोच रहा हूँ 
नशे में झूम रहा हूँ .....


तुम्हारे जूतों की थाप से कुचल जाती है मेरी नींद
अंतरिक्ष की खिड़की से झाँकता होगा कोई सितारा अभी
पृथ्वी का आधा पलंग ढँका है आधा उघाड़
छोटी है सूरज की चादर
पाली बदल-बदल के सोती है दुनिया
यहाँ रात का तीजा पहर है
आधी दुनिया के सोने का समय यह
इसी सोने वाली दुनिया का हिस्सा हूँ अभी
और जाग रही हूँ
मैं जाग रही हूँ
इस तरह इस समय सोने वाली दुनिया में जागते हुए
जागने वाली दुनिया का प्रतिनिधित्व कर रही हूँ
अभी तो महज़ तीन बजे हैं घड़ी में
और मैं हूँ पूरी दुनिया अभी
प्रेम में होता है इतना बल
कि ज़माने भर की घड़ियों को धता बता कर
समय को एक कर दे
तकिये पर बाल चिपका है मेरी पलक से टूट कर
मुट्ठी पर रख फूँक मारने से पहले
चूमती हूँ तुम्हारा माथा हवा में
कई बार एक सादा-सा चुम्बन सुलझा देता है जीवन की कितनी ही गुत्थियाँ
कभी- कभी कोई चुम्बन मस्तिष्क की जटिल कोशिकाओं में उलझ जाता है
कितने ही थरथराते होठों से अपना नाम सुना होगा तुमने
कभी देखा है अपना नाम उल्टी मुट्ठी पर काँपते हुए
रखना ही है तो मुझे हृदय में रखो
अपनी जेब में नहीं
वक़्त बड़ा ही शातिर जेबकतरा है
बिन जूते उतारे
जाने कब से कर रहे हो पृथ्वी की परिक्रमा
कहीं पहुँचते भी नहीं
मैं कंपकंपाती मुट्ठी पर फूँक मार देती हूँ
पता नहीं धरती के किस कोने में उड़ कर गिरी है मेरी इच्छा
ठीक ही तो है
कि तुम प्रेम में फूँक-फूँक कर कदम रखते हो

4 टिप्पणियाँ:

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar ने कहा…

भावपूर्ण रचना... :)
आभार आपका

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बिखरे हुऐ हैं रत्न हर जगह एक पारखी नजर चाहिये ।

Kavita Rawat ने कहा…

बाबुषा कोहली जी बहुत सुन्दर कविता प्रस्तुति हेतु आभार!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बहुत बढ़िया ... :)

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