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सोमवार, 28 दिसंबर 2015

प्रतिभाओं की कमी नहीं - एक अवलोकन 2015 (२८)



कहानियाँ लिखी जाती हैं जिए गए क्षण क्षण की, पृष्ठ पलटते इतिहास बन जाती हैं 
लेकिन कहानियाँ वर्तमान के परदे पर निरंतर होती हैं  ... 

मेरा फोटो

बाबूजी का चश्मा
                                                
     सुबह के नौ बजे थे। आलोक ऑफ़िस चले गए थे और आशू कॉलेज...। मैं खाली होकर सोच रही थी कि आज घर के कुछ एक्स्ट्रा काम निपटाऊँगी। कई महीनों से टाँड़ पर रखे बर्तनों को नहीं देखा। उनकी साफ़-सफ़ाई करके जो पुराने और बेकार होंगे, उन्हें बेचने के लिए अलग रख दूँगी। बेकार सामान घर में रख कर काम का बोझ बढ़ाना ही होता है। नवीन मार्केट का कुमार बर्तनवाला पुराने बर्तनों के भी अच्छे दाम लगा देता है...। इसके अलावा बरामदे के एक कोने में रद्दी अख़बारों का भी ढेर लग गया है...। इसे भी आज ही निपटा देती हूँ...। एक दिन बस इतना ही...।
     पर शुरू कहाँ से करूँ? टाँड़ की सफ़ाई से या रद्दी को इकठ्ठा करने से...सोच ही रही थी कि तभी फोन की घण्टी घनघनाई।
     मन झल्ला गया। जब भी घर की कुछ एक्स्ट्रा सफ़ाई का सोचती हूँ, कहीं-न-कहीं बाधा पद ही जाती है। रोज़मर्रा के काम के अलावा महीने-दो महीने में में पूरे घर के रेशे-रेशे की साफ़-सफ़ाई न करो तो घर कबाड़खाना लगने लगता है। अकेले अपने लोगों के बीच तो चल जाता है, पर अचानक किसी खास के आ जाने पर जो शर्मिन्दगी उठानी पड़ती है, उससे तो भागते भी नहीं बनता।
     फोन की घण्टी अब भी टिनटिना रही थी। कौन हो सकता है? अभी कल ही अम्मा के घर से होकर आई हूँ...वहाँ तो सब कुछ ठीक-ठाक ही था, फिर कौन...?
     बेमन से रिसीवर उठा कर जैसे ही कहा,"हैल्लोऽऽऽ...कौन...?" वैसे ही उधर से अम्मा की रुँधी हुई आवाज़ थी,"बिट्टीऽऽऽ...अभी ही घर आ जा...बाबूजी फिर सनक गए हैं। खाना-पीना छोड़ कर धूनी रमाए बैठे हैं...किसी से सम्हल नहीं रहे हैं...।"
     जब बाबूजी नौकरी में थे तब ज़िन्दगी कितनी खुशहाल थी पर उनके रिटायरमेण्ट के बाद? सब कुछ किस तरह उलट-पुलट गया...। कोई समझ नहीं पा रहा था या यूँ कहें कि समझना नहीं चाहता था और अब...?
     सुनते ही मैने रिसीवर रखा और फिर जल्दी से थोड़ा बहुत समेट कर अम्मा के यहाँ पहुँच गई। गेट के बायीं तरफ़ बाबूजी का कमरा था पर उस समय वह खाली था। रिटयरमेण्ट के बाद बाबूजी उस कमरे में कम ही बैठते थे। उनके कमरे के सामने ही बड़ा सा हॉल था, जिसमें बाबूजी ने डाइनिंग टेबिल के सामने ही एक तख़्त डलवा ली थी। जब सब लोग टेबल पर खाना खाते तब बाबूजी भी इसी तख़्त पर बैठ कर आराम से खाते। मेरे अन्दर घुसने के दौरान भी बाबूजी इसी तख़्त पर पालथी मार के बैठे थे। मुझे देखते ही वे ताली बजा कर हँसे,"बिट्टो आ गई...। लो देखोऽऽऽ...बिट्टो आ गई...।"
     मैं सन्न...अवाक...। बाबूजी तो अच्छे-भले दिख रहे थे पर डाइनिंग टेबल का सत्यानाश हो गया था। टेबल क्या था, उसे पूरी तरह से एक बगीचे का रूप दे दिया गया था। बाहर लॉन में जितने भी गमले थे, सब लाकर टेबल के किनारों पर लगा दिए गए थे...। बीच में भगवान की चार-पाँच मूर्तियाँ थी, जिन पर गेंदे की माला और फूल चढ़े थे। उसके एक किनारे पिछली जन्माष्टमी पर लाया गया भगवान का झूला था, जिसमें बालगोपाल विराजमान थे और झूले की डोरी बाबूजी के हाथ में थी।
     मेरी नज़र अम्मा की ओर गई तो भीतर कुछ चटक-सा गया। अपने समय में अम्मा बेहद दबंग किस्म की स्त्री मानी जाती थी। नौकर-चाकर से लेकर हम सब बच्चे तक उनसे काँपते थे...। वे कोई जल्लाद नहीं थी। उनका यह बाना सिर्फ़ घर व बच्चों को चुस्त-दुरुस्त रखने तक ही सीमित था, वरना उनके अन्दर ममता का एक ऐसा समन्दर था जिसकी थाह पाना मुश्किल था। यह मैने तब नहीं जाना था पर बाद में आशू के होने पर महसूस किया था, माँ को अपने भीतर की गहराइयों तक...पर आज...? यह माँ का कौन सा रूप था? अशक्त हथेलियों पर अपनी ठोडी टिकाए असहाय-सी दिखती अम्मा गहरी चिन्ता में थी। किसी वजह से आज सब घर पर थे और रह-रह कर अपनी हँसी रोक नहीं पा रहे थे। मुझे देख कर अम्मा ने बाबूजी की ओर इशारा किया तो उन्हें देख कर मेरी अजीब सी हालत हो गई। बाबूजी ने माथे पर चन्दन का एक बड़ा-सा तिलक लगा रखा था और जाने कब अपने ही हाथों से अपने बालों को काट कर महीन रेशों की शक्ल दे दी थी।
     बाबूजी का यह रूप देख कर मुझे भी हल्की-सी हँसी आने को हुई कि तभी उनकी कातर आवाज़ मुझे अन्दर तक भिगो गई,"बिट्टोऽऽऽ...ये लोग मेरा चश्मा नहीं दे रहे हैं...। मुझे भगवान का बगीचा ठीक से दिखाई नहीं दे रहा है...। मैं वहाँ जाऊँ तो कैसे...?"
     फिर दूसरे ही क्षण वे ठहाका मार कर हँसे,"यह देखो...कैसा लग रहा है...? सुन्दर है न...? मैने बनाया है...खुद अपने हाथों से...। तुम लोग बेकार में माली को बुलाते हो...पैसा लगता है न...। वो पैसा मुझे दे दो...।"
     मुझसे कुछ कहते नहीं बन रहा था। आँखों से सहसा ही चलक पड़ने को आतुर कुछ बूँदों को मैने अपनी हथेलियों में ही समेटा और फिर बाबुजी की बगल में बैठ कर उनकी आँखों पर चढ़े सुनहरे फ़्रेमवाले चश्मे को हाथ लगा कर कहा,"बाबूजी, चश्मा तो आप पहने हैं...। ये देखिए...।"
     "नहीं, यह नहीं...इससे मुझे भगवान का घर नहीं दिखता। मुझे तो वो वाला चाहिए जो तुमने दिया था...। यह गन्दा है। भगवान के घर कितने फूल खिले हैं...। भगवान कहाँ खड़े हैं, ये तो इससे दिखता ही नहीं...।" फिर अचानक ही चश्मा प्रकरण को भूल कर बोले,"सुनो बिट्टोऽऽऽ...तुम्हारे पास ढेर सारे बर्तन हैं न...और छुरी-काँटा भी...। मुझे दे देना...विष्णु भगवान काँटे-चम्मच से खाते हैं न...।"
     सारे भाई-बहन ठहाका मार कर हँस पड़े और साथ में बाबूजी भी...पर जाने क्यों मेरी आँखें भर आई,"बाबूजी, पहले आप खाना खा लीजिए। कल हम भगवान जी के लिए नए बर्तन ले आएँगे...।"
     "और मेरा चश्मा...?"
     "हाँ-हाँ...आपका चश्मा मैं ढूँढ दूँगी। आप परेशान मत होइए...ठीक...?"
     "ठीक...।" बच्चों की तरह सिर हिला कर बाबूजी ने कहा तो मैने अम्मा को इशारा किया। वे तुरन्त दौड़ कर उनकी थाली ले आई। मैने अपने हाथों से कौर लगा कर उन्हें पूरा खाना खिलाया। इस दौरान वे एक मासूम बच्चे की तरह कौर निगलते हुए भगवान को झूला झुलाते रहे। खाने के बाद मैने पानी में घोल कर बाबूजी को नींद की गोली भी खिला दी। नींद में भी बाबूजी के हाथ में झूले की डोरी थी और गहरी नींद में सोते हुए वे खुद भी किसी फ़रिश्ते से कम नहीं लग रहे थे।
     अब बाबूजी के पास सिर्फ़ मैं और अम्मा थे, बाकी सब अपने अपने कमरों में चले गए थे, ऊबे हुए से...। भीतर जाते समय निखिल बड़बड़ाना नहीं भूला,"इनका तो रोज़ का नाटक है। जीना हराम हो गया है...। अरे, दिमाग़ खराब है तो अस्पताल में भर्ती करो...पर मेरी कोई सुनता भी है क्या...उफ़्फ़...!"
      अम्मा रो रही थी,"क्या करूँ बिट्टो, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। कभी बेवजह रोने लगते हैं तो कभी किसी से बतियाते हुए हँसने लगते हैं...। अब इधर ही देखो, उस चश्मे के पीछे ही पड़ गए हैं जो ऑपरेशन के बाद तूने इन्हें दिया था।"
      "पर वह चश्मा गया कहाँ?"
     "मुझे क्या पता...कहीं खुद ही रख कर भूल गए हैं। हर जगह ढूँढ लिया है...मिल ही नहीं रहा है...। एक ये वाला चश्मा है, पर नहीं...बच्चों की तरह ज़िदियाए हैं...वही चश्मा ही चाहिए...।"
     "और यह भगवान की क्या बात है? एक दो महीनों से देख रही हूँ, बाबूजी भगवान के बारे में ढेर सारी बातें करते हैं...।"
     "अम्मा खुद चकित थी। जवानी के दिनो में पूजा-पाठ को कभी तवज़्ज़ो न देने वाले बाबूजी अचानक भगवान के बारे में इतनी बातें कैसे करने लगे? अम्मा बताते हुए थोड़ा मुस्कराई भी,"इनसे बात करने बैठो तो बस वही भगवान की बातें...। कभी गणेश भगवान की बातें तो कभी विष्णु भगवान की...। और तो और...मथुरा-वृन्दावन की भी सब बातें इन्हें याद हैं...। कौन-कौन साथ गया...क्या-क्या खाया-पिया...कहाँ-कहाँ घूमे...। एक-एक मन्दिर का नाम बताते हैं...। अब तू ही बता, इन्हें पागल कहूँ भी तो कैसे...?"
     मैं चुपचाप सोते हुए बाबूजी को ताक रही थी। डाइनिंग टेबल पर बना बगीचा ज्यों-का-त्यों था। कोई हटाता भी तो न हटाने देती। बाबूजी अपने आपे में थे भी या नहीं, नहीं जानती थी पर इतना सच था कि यह घर उनका था...वे जैसे चाहें, रहें...किसी को बोलने का हक़ नहीं था। वे अब भी किसी की कमाई पर नहीं पल रहे थे बल्कि पूरा घर अब भी बहुत हद तक उनकी पेन्शन के बल पर आराम से रह रहा था।
     मैने अम्मा को समझा कर चुप कराया। दूसरे दिन बाबूजी को किसी मनोचिकित्सक को दिखाने की बात कह कर घर आ गई थी। घर में भी ढेरों काम थे, पर किसी में मन नहीं लग रहा था। रह-रह कर बाबूजी का मासूम चेहरा आँखों के आगे घूम जाता। अभी सोता हुआ छोड़ कर आई हूँ, पर अगर बीच में जाग कर सनक गए तो...?
     बाबूजी का यह रूप मेरी समझ से भी परे था। अचानक उन्हें यह क्या हो गया है? दो-दो हॉर्ट अटैक झेल चुके बाबूजी कभी काफ़ी दबंग और ईमानदार लेबर कमिश्नर हुआ करते थे। उनकी नौकरी के दौरान हम भाई-बहनों ने न जाने कितने शहरों को देखा, खूब घूमे-फिरे, नौकर-चाकर का सुख देखा...और तो और, उनका भरपूर प्यार-दुलार पाया। बाबूजी ने कभी बेटा-बेटी में कोई फ़र्क नहीं समझा। हम जो चाहते, हमें मिलता। हम लोगों की सुख की ही खातिर बाबूजी ने रिटायर होने के बाद भी काम करना बन्द नहीं किया। उन्होंने लेबर-लॉ की प्रैक्टिस शुरू कर दी और कुछ ही सालों में शहर के जाने-माने लेबर लॉ एडवाइज़र में उनका नाम शुमार हो गया। इसी दौरान मेरी और दो भाइयों की शादी भी हो चुकी थी। दोनो भाई इसी शहर में अपने परिवार के साथ रहते हैं और सुख-दुख में अपनी उपस्थिति दर्ज़ करवा देते हैं।
     सत्तर के करीब पहुँचते ही बाबूजी को दिल का दौरा न पड़ता तो वे अपनी प्रैक्टिस कभी नहीं छोड़ते, पर एक के बाद जल्दी ही दुबारा दौरा पड़ने पर डॉक्टर ने सख़्ती से उन्हें पूरा आराम करने की सलाह दी।
     डॉक्टर ने सलाह क्या दी, बाबूजी का तो जैसे सब कुछ ख़त्म हो गया। जो कमरा हमेशा उनके क्लाइण्ट्स से भरा रहता था, वह धीरे-धीरे खाली होने लगा और उसके साथ ही शायद बाबूजी के अन्दर भी एक खालीपन भरने लगा था, जिसे हम लोग समझ नहीं पाए थे। बाबूजी एकाकी पड़ गए थे। घर में अम्मा और छुटकी उनके ज़्यादा क़रीब थे। मैं उनकी दुलारी बेटी होने के बावजूद अपने घर में थी। कभी-कभार जाती तो बाबूजी से ढेर सारी बातें होती। उस दिन बाबूजी अपने मन की ढेरों बातें करते जिसमें भाई-बहनों की शिकायतें भी शामिल होती। किसने कब बाबूजी को क्या कहा, भूले-भटके किसी के आने पर किसने उन्हें टरका दिया, उनकी फ़ाइलों को उनसे बिना पूछे किस तरह चादर में बाँध कर टाँड़ पर फेंक दिया गया, आदि-आदि...।
     यह सब शिकायतें करते वक़्त बाबूजी का चेहरा देखते ही बनता था। ऐसा लगता था जैसे मैं उस घर की बड़ी-बूढ़ी हूँ और उनकी शिकायत पर सबको डाँट लगाऊँगी। मैं अक्सर ऐसा करती भी...। कई बार उनकी फ़ाइलों पर से गर्द झाड़ कर उनके पलंग के पास वाली अलमारी में रख देती थी और तब बाबूजी रात-रात भर जाग कर उनका इस तरह अध्ययन करते थे, मानो दूसरे दिन किसी केस के सिलसिले में उन्हें कोर्ट ही तो जाना है...।
     मैं वहाँ चार फ़ाइलें झाड़ कर रखती तो कुछ दिनों में उनमें से दो-तीन गायब हो जाती। उनके गायब होते ही बाबूजी के चेहरे पर एक अजीब सी बेचैनी पसर जाती। पनीली आँखों से वे मेरे या अम्मा की ओर देखते। अम्मा बेचारी क्या करती, पर मुझसे ज़्यादा बर्दाश्त नहीं होता था। भाई-बहनों की ऐसी हिमाकत...। वे रात भर जाग कर पढ़ें या दिन भर सोएँ, किसी से मतलब...? मैं पूरी ताकत से सब पर गरज-बरस पड़ी, पर उतनी ही गर्जना से दूसरी ओर से उत्तर आय़ा,"तुम्हें क्या दीदी...तुम तो बड़े आराम से अपने घर रहती हो...। यहाँ सहना तो हमें पड़ता है। सारी रात कमरे की बत्ती जला कर पागलों की तरह ज़ोर-ज़ोर से पढ़ते हैं और फिर खुद ही जिरह करने लगते हैं...। तुम कुछ समझती तो हो नहीं...वह पहले जैसे नहीं हैं...पूरे पागल हो चुके हैं...।"
     यह याशी थी, भाई-बहनों में सबसे तेज़...बेहद लड़ाका...। बाबूजी को ‘पागल’ कह कर जिस तरह उसने उनका अपमान किया था, उससे तो जी चाहा कि एक ज़ोर का थप्पड़ उसके गाल पर धर दूँ, पर सिर्फ़ सोच कर रह गई। थप्पड़ मारने का नतीज़ा एक बार भुगत चुकी हूँ। याशी ने घर पर जो बवाल किया था, उसे याद कर आज भी दुःखी हो जाती हूँ...।
     घर में अगर कोई बीमार पड़ जाए तो बहुत कुछ अस्त-व्यस्त हो जाता है। मेरा घर भी कुछ ऐसा ही हो गया था। बाबू जी के बीमार पड़ जाने के कारण इधर मेरा भी घर से जल्दी-जल्दी निकलना हो रहा था। यह तो अच्छी बात थी कि आलोक ने कभी मेरे इस तरह आने-जाने पर रोक नहीं लगाई। आशू भी सीधा ही था। खाना बना कर अक्सर मैं रख देती, तो बाप-बेटे गरम कर के चुपचाप खा लेते। उन्हें बाबूजी के बारे में पता था पर कभी ज़्यादा खोज़बीन नहीं करते थे। उन्हें अपने मायके के बारे में बताना मुझे भी पसन्द नहीं था। सबकी अपनी ज़िन्दगी और उससे जुड़ी परेशानियाँ थी, कोई कितना परेशान होता...पर वे मेरे तो बाबूजी थे...और वो भी ऐसे बाबूजी जिन्होंने काफ़ी कष्ट से अपने बच्चों की ज़रूरतों को पूरा किया था, बिना किसी को इस बात का अहसास कराए हुए...। आज जब आशू के लिए मैं कुछ ऐसा करती हूँ तो बड़ी शिद्दत से इस बात का अहसास होता है...।
     रात मेरे जागरण के बावजूद आसानी से कटी। इस दौरान मैने चार-पाँच बार अम्मा को फोन कर के बाबूजी का हाल लिया था। नींद की दवा के असर से बाबूजी खा तो कुछ नहीं पाए, बस अम्मा जो ज़बर्दस्ती, फुसला कर उन्हें दूध पिला पाई थी, वही पीकर सारी रात गहरी नींद सोते रहे...पर सुबह...?
     एकदम अल्लसुबह जैसे तूफ़ान आ गया। मैने आलोक और आशू का नाश्ता दिया ही था कि अम्मा का फोन आ गया। वह बुरी तरह रो रही थी,"बिट्टोऽऽऽ...मेरा तो जीना दुश्वार हो गया है...। कोई भी मुझसे नहीं सम्भल रहा...।"
     "क्यों, क्या हो गया...?"
     "किसी ने पता नहीं कब बाबूजी का बनाया बगीचा मेज पर से हटा दिया है। पूछने पर कोई बता नहीं रहा है। मैं क्या करूँ...? सुबह उठते ही बाबूजी को अपना बगीचा नहीं दिखा तो उन्होंने जो उत्पात मचाया कि मैं तुझसे क्या कहूँ...। गुस्से मेम पूरा घर तहस-नहस कर बिना कुछ खाए-पिए बैठे हैं...। बहुत मजबूर होकर फोन किया है...। आलोक बाबू भी क्या सोचेंगे...।"
     अम्मा फिर रोने लगी थी। मैने उन्हें आने का बोल कर फोन रखा ही था कि आलोक सामने आ गए,"क्या हो गया...? इतना परेशान क्यों हो...?"
     "कुछ नहीं...बाबूजी की हालत ठीक नहीं है...।" रोकते-रोकते भी मेरे आँसू छलक ही पड़े थे।
     "अरे...इसमें रोने की क्या बात है...? पहले बताया होता न...चलो, आज छुट्टी लेकर उन्हें डॉक्टर को दिखा देता हूँ...।"
     "नहीं...आप परेशान न होइए...। नितिन-आशीष हैं न...। ज़रूरत पड़ी तो मैं आपसे खुद कहूँगी...।"
     मैं आलोक को अपने मायके की इस स्थिति के बारे में कुछ बताना नहीं चाहती थी। उनके परिवार में सब बहुत शालीन और बड़ों का सम्मान करने वाले थे, पर मेरे यहाँ...?
     जब तक बाबूजी और अम्मा सशक्त थे, सभी शायद डर की वजह से उनका सम्मान करते थे, पर उनके अशक्त होते ही...। माता-पिता तन और मन से अशक्त हो जाएँ तो क्या बच्चों के लिए फ़ालतू हो जाते हैं? यह बात सोच कर अक्सर मैं डर जाती थी। कहीं आशू ने भी हमारे साथ यही किया तो...?
      अम्मा ने मेरे डर को दूर करने की कोशिश की थी,"बिट्टॊऽऽऽ...सारी दुनिया के बच्चे एक जैसे स्वभाव के नहीं होते। हर घर में ऊँच-नीच होती रहती है। अब अपने ही घर में देख लो। छोटी, तुम और सीमा...तीन मेरे ऐसे लायक बच्चे हो जिसने कभी हम दोनो का अपमान नहीं किया पर...।" समझाते-समझाते अम्मा रो ही पड़ी थी,"पर बाकी...? उस दिन मेरा कलेजा ही फट गया था जिस दिन आशीष ने गुस्से में कहा था...इससे तो अच्छा बाबूजी मर ही जाएँ...। इनके मरने से किसी को फ़र्क नहीं पड़ेगा...।"
     उस दिन तो मैं भी सकते में आ गई थी। कोई औलाद अपने बाप के लिए ऐसा भी सोच सकती है, पर ये दुनिया है...यहाँ कुछ भी हो सकता है...।
     आलोक और आशू चले गए तो मैं भी तैयार हो कर अम्मा के घर पहुँच गई पर ये क्या...?
     भीतर अजीब तरह की अस्त-व्यस्तता थी। डाइनिंग टेबिल पूरी तौर से साफ़ था...। सारे गमले और भगवान की मूर्तियाँ अपनी पुरानी जगह पर थी। बाबूजी का तख़्त वहाँ से उठा कर बरामदे में डाल दिया गया था और्र बाबूजी...? वे तो पहले की तरह सबसे आगे वाले कमरे में गावतकिया लगाए गुमसुम बैठे थे...। कुछ इस तरह जैसे किसी ने उनकी पूरी दुनिया ही लूट ली हो...।
     अम्मा उन्हें समझा कर हार गई थी पर वे अपने बिस्तर से किसी तरह उठने को तैयार नहीं थे। मैने भीतर झाँका, पर वहाँ भी एक अनकहा सन्नाटा पसरा था...। रसोई ठण्डी पड़ी थी...। जिसे जहाँ जाना था, अपने काम और पढ़ाई के लिए गया। छोटी और सीमा चुपचाप बैठी थी। मुझे देखा तो उठ कर पास आ गई,"तुम आ गई दीदी...अब तुम्ही सम्हालो बाबूजी को...। सुबह इस कदर तूफ़ान मचा रखा था कि सम्भाले नहीं सम्भल रहे थे...। आशीष भैया ने मारने के लिए हाथ उठाय तब कहीं जा कर चुप हुए...।"
      "क्याऽऽऽ...?" मैं लगभग चीख पड़ी थी,"उस कमीने की इतनी हिम्मत कि बीमार बाप पर हाथ उठाए...? आने दो उसे...हाथ न तोड़ दूँ उसका तो कहना...। उसने समझ क्या रखा है...? अम्मा-बाबूजी को एकदम असहाय-अकेला समझता है...? अरे, अभी मैं हूँ...किसी को उनके साथ अन्याय नहीं करने दूँगी...।"
      मेरी चीख सुन कर अम्मा दौड़ी चली आई,"चुप कर बिट्टोऽऽऽ...बात बढ़ाने से कोई फ़ायदा नहीं...। आशीष धमकाता नहीं तो ये चुप भी न बैठते...। बड़ा तूफ़ान मचा रखा था...।"
     "अम्मा तुम भी...?" मैने आश्चर्य से अम्मा की ओर देखा। अम्मा की आँखों में गबरू-जवान बेटों का अनकहा ख़ौफ़ साफ़ झलक रहा था। बाबूजी की इस हालत के चलते वे अपने को बेहद असहाय महसूस कर रही थी। अभी तीन अनब्याही बेटियाँ बैठी हुई हैं, उनका क्या होगा?
     अम्मा की आँखों में उतरे इस ख़ौफ़ और बेचारगी को देख कर मैं भी शान्त हो गई। अम्मा का डर ग़लत नहीं था। मैं तन से साथ दे सकती थी, पर बाकी काम...? घर चलाना...बहनों की शादी...हारी-बीमारी...?
     मैने डरते-डरते बाबूजी के कमरे में झाँका। बाबूजी एकदम पत्थर के बुत की तरह बैठे थे। दिमाग़ी हालत ठीक न होने के बावजूद उन्हें गहरा सदमा लगा था। जिन बाबूजी की बुद्धिमत्ता का लोग लोहा मानते थे, उन्हें बेहद सम्मान देते थे, उनकी ऐसी हालत देख कर मेरा कलेजा मानो फट-सा गया था, पर मैं कर ही क्या सकती थी, सिवाय उन्हें सान्त्वना देने के...?
     अम्मा ने मुझे भीतर जाने का इशारा किया तो मैं धीरे से जाकर बाबूजी के पास खड़ी हो गई,"बाबूजीऽऽऽ...चलिए...उठिए...मुँह-हाथ धोकर कुछ खा लीजिए...। आपने तो रात में भी कुछ नहीं खाया...।"
     प्रत्युत्तर में बाबूजी दहाड़ मार कर रो पड़े। बड़ी देर से रुका बाँध का पानी भरभरा कर पूरे वातावरण को बहा ले गया,"बिट्टोऽऽऽ, तू आ गई...। देखोऽऽऽ...ये लोग मुझे मारते हैं...। मैं कमज़ोर हो गया हूँ न...।"
     अपने संघर्ष भरे दिनों में भी कभी न हारने वाले बाबूजी इस कदर टूट जाएँगे, मैने कभी सपने में भी नहीं सोचा था, पर आज...?
     मैने अपने को तो सम्भाल लिया पर माँ नहीं सम्भल पाई, रो ही पड़ी,"इनकी हालत देख रही है...? ऐसे कैसे जी पाएँगे...?"
     "कुछ नहीं होगा अम्मा...। डॉक्टर को दिखा कर मैं आज ही इनका कुछ इन्तज़ाम करती हूँ...। तुम परेशान न हो...।"
     अम्मा को समझा कर मैं बाबूजी की ओर मुड़ी। वे मसूम बच्चे की तरह अब भी रो रहे थे। सहसा मुझे नीता की बात याद आई,"बुढ़ापे में आदमी एकदम बच्चा बन जाता है और अगर बीमार होकर असहाय हो जाए तो...। उफ़! एक बच्चे की तरह उनकी देखभाल करनी पड़ती है।" पर यहाँ...?
      बाबूजी शुरू से ही भारी बदन के रहे हैं। आज भी बीमारी के बावजूद वो भारीपन बरकरार है। मुझसे अकेले नहीं उठाए गए तो छोटी को बुलाया। उन्हें किसी तरह बहला कर गुसलखाने तक ले गई। उन्हें नहला-धुला कर कपड़ा पहनाने के लिए रोज़ की तरह अम्मा पहले से ही मौजूद थी, सो हम दोनो बाहर निकल आए...।
      "दीऽऽऽदी...बिना चश्मे के बाबूजी को ठीक से दिखाई नहीं देगा न...। वो तो बाथरूम में भी चश्मा पहन कर जाते हैं...।"
     "अरे, मैं तो भूल ही गई...कहाँ है उनका चश्मा...?"
     प्रत्युत्तर में छोटी ने टूटा हुआ फ़्रेम मेरे आगे कर दिया,"गुस्से में बाबूजी ने इसे तोड़ दिया...।"
     अभी मैने टूटे फ़्रेम को हाथ में लिया ही था कि तभी धम्म की तेज़ आवाज़ हुई। अम्मा के कमज़ोर हाथ आज बाबूजी के भारी बदन को सम्भाल नहीं पाए या कुछ और हुआ...ये देखने हम दोनो भीतर दौड़े और फिर एकदम जड़ हो गए।
     बाथरूम के फ़र्श पर बाबूजी औंधे पड़े थे। उनका सिर नल से टकरा कर फट गया था और उनको सम्भालने की कोशिश में अम्मा खुद फिसल गई थी...। दोनो की ऐसी हालत देख कर घर मे कोहराम मच गया था। मैने किसी तरह अम्मा को उठाने के बाद दोनो बहनों की मदद से बाबूजी को बिस्तर तक पहुँचाया। छोटी ने तुरन्त भाइयों को फोन किया और मैं चौराहे के डॉक्टर विनीत को बुलाने दौड़ पड़ी...।
     डॉक्टर के पास जाने और आने में लगा समय मानो एक युग की तरह लगा। भीतर कमरे में डॉक्टर बाबूजी का मुआयना कर रहा था और अम्मा उनके माथे को कपड़े से दबाए तेज़ी से बहते खून को रोकने का असफ़ल प्रयास कर रही थी...और मैं...?
     मैं उस पल खुद पत्थर की बुत बन गई थी...। पूरा तन बेजान-सा था पर आँखें अम्मा पर टिकी थी...। गुलाबी रंग की सिल्क की साड़ी...कलाई भर लाल-हरी काँच की ढेर सारी चूड़ियाँ...माथे पर अठन्नी भर टीका और माँग में ढेर सारा सिन्दूर...। अम्मा उम्र के साथ बहुत कुछ भूलने लगी थी पर इस साजो-श्रंगार को एक पल के लिए भी नहीं भूलती थी...। यह उनके सुहागन होने का प्रतीक-चिह्न जो था...पर इस पल...?
     सहसा अम्मा दहाड़ मार कर रोने लगी तो मुझे जैसे होश आया। डॉक्टर विनीत ‘न’ में सिर हिला कर चले गए थे,"सीवीयर हॉर्ट अटैक...सब कुछ ख़त्म हो गया...।"
     बाबूजी नहीं रहे। कानो को सहसा विश्वास नहीं हो रहा था...यह कैसे हो सकता है...? अभी थोड़ी देर पहले ही तो मैं उन्हें समझा रही थी। पल जैसे थम गया था...। बाबूजी बिन कुछ खाए चले गए थे। साथ ही अपने भीतर दुःख लिए हुए भी...। बाबूजी का दुःख मैं दूर नहीं कर पाई। वह दुःख अब मेरे भीतर भर गया था, पर ज़्यादा देर रुका नहीं...बाँध तोड़ कर बाहर आ ही गया...। मैं बाबूजी से लिपट कर बिलख उठी। मुझे अम्मा को सम्हालना था, पर अम्मा मुझे सम्हाल रही थी।
     पूरा घर एक अजीब तरह के शोर से भर गया था। छोटी ने सबको फोन कर दिया था। भाई-भाभी...नाते-रिश्तेदार...अड़ोसी-पड़ोसी सभी तो आ गए थे और अपने-अपने तरीके से अम्मा को धीरज बँधा रहे थे, पर अम्मा...?
     छोटी ने बताया था, कल अम्मा पूरी रात रोती रही थी और अब उनकी आँखें एकदम सूखी थी। ख़बर पाकर तुरन्त आ गए आलोक और आशू की ओर अम्मा ने तटस्थ भाव से देखा, कुछ इस तरह जैसे कुछ हुआ ही न हो...। आँखों के भीतर पानी का स्टॉक कुछ इस तरह सूख गया था जैसे कोई नदी अपनी छाती पर ढेर सारी भुरभुरी मिट्टी व रेत के आ जाने पर सूख जाती है...।
     मुझे अन्दाज़ा भी नहीं था कि एक बाबूजी के चले जाने से घर का वातावरण इस कदर असामान्य हो जाएगा...। भीतर दालान में कुण्डे से लटके पिंजरे में तोता ज़ोर-ज़ोर से चीख रहा था...। काफ़ी देर से चुप बैठी अम्मा सहसा ही रमन की ओर घूमी,"इतनी देर से मिठ्ठू चिल्ला रहा, उसे कुछ खाने को दे दो...भूखा है...। रात से उसने कुछ नहीं खाया है...।"
      सहसा कइयों की निगाह अम्मा की ओर घूम गई पर अम्मा ने किसी की ओर नहीं देखा। ऐसा लगा जैसे वे नींद में हों...। मैं अम्मा की हालत को समझ रही थी। ऊपर से शान्त दिख रही अम्मा के भीतर कितनी उथल-पुथल थी, यह कोई भी नहीं जान पाया। भीतर के उस भयानक तूफ़ान ने उनका सब कुछ तहस-नहस कर दिया था, पर फिर भी वे अपनी गृहस्थी को बिखरने नहीं देना चाहती थी...।
     बाहर बाबूजी को घाट पर ले जाने की तैयारी शुरू हो चुकी थी...। बाबूजी के निर्जीव शरीर के पास बैठी मैं उन्हें एकटक देख रही थी, पर बाहर देखने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी। उस समय तो मेरी हिम्मत बिल्कुल टूट गई जब बाबूजी को नहलाने-धुलाने के समय बाकी औरतों के साथ मुझे भी बाहर जाने को कहा गया...। मेरे भीतर एक गहरा अपराधबोध भर गया। न मैं बाबूजी को नहाने भेजती, और न शायद वे इस तरह जाते...। इस बात को याद कर-कर के मेरा कलेजा फटा जा रहा था...।
      आलोक मुझे धीरज बँधा रहे थे और मैं बच्चों की तरह बिलख रही थी...। छोटी, याशी और सीमा का भी बुरा हाल था। वे सब बारी-बारी से अम्मा को भी सम्हाले हुए थी। सहसा भाइयों ने बाबूजी की अर्थी को कन्धा दिया तो एक हाहाकार-सा मच गया...। उस क्षण मैं एकदम असहाय सी हो गई थी। सफ़ेद चादर और फूलों से ढँके बाबूजी हमेशा के लिए जा रहे थे और मैं कुछ भी नहीं कर पा रही थी...। अम्मा भी गिरती-पड़ती बाबूजी के पीछे भागी पर थोड़ी दूर पर ही गिर पड़ी। अपना दुःख भूल कर मैं अम्मा को संभालने लगी। उन्हें धीरज बँधाते हुए मैं किसी तरह घर लाई, पर घर कहाँ था...? वो तो जैसे श्मशान-सा बन गया था...।
     पल भर में घर एकदम शान्त हो गया था।
     "बाबूजी को कुछ समय के लिए अस्पताल में भर्ती कर दो तो घर में थोड़ी शान्ति हो जाए...। जब देखो तब घर में शोर मचाए रहते हैं...।"
     आशीष की यह बदतमीज़ी भरी बात याद करके मुझे रुलाई के साथ गुस्सा भी आ रहा था। लो, आशीष की इच्छा पूरी हो गई न...। अब बाबूजी कभी शोर नहीं मचाएँगे...। उनकी आवाज़ सुनने को हम सब तरस जाएँगे...।
     मातमपुर्सी में आए लगभग सारे लोग जा चुके थे। घाट से लौटने में भाइयों को अभी देर थी। भाभियाँ घर की धुलाई करने में जुटी थी। मैने घर के हर हिस्से पर नज़र घुमाई, पर अम्मा कहीं नहीं दिखी...। छॊटी से पूछने ज ही रही थी कि तभी गुसलखाने से अम्मा की तेज़ रुलाई मेरा कलेजा चाक कर गई। छोटी उस ओर दौड़ी पर मैने रोक दिया,"आज अम्मा का दुःख पूरी तरह से बह जाने दो...।"
     भीतर गुसलखाने में अम्मा और बाहर हम सब फूट-फूट कर रो रहे थे...। सबका दुःख अपने तरीके से बाँध तोड़ कर बह रहा था...। सब कुछ जैसे ख़त्म हो गया था।
     आज तेरह दिन बीत गया है, पर इन तेरह दिनों में भी बाबूजी ने मेरे इर्द-गिर्द अपनी उपस्थिति दर्ज़ रखी...। अक्सर लगता जैसे बाबूजी कभी इस घर से गए ही नहीं और जाने क्यों लगता कि अगर वे गए नहीं तो भला बिना चश्मे के उनका काम कैसे चलेगा...? सो अपने घर लौटने से पहले मैने दो काम किए...एक तो जैसा चश्मा मैने बाबूजी को पहले बनवा कर दिया था, ठीक वैसा ही दूसरा भी बनवा कर ले आई...और दूसरा, उनकी वह मोटी-सी लॉ की किताब ढूँढ कर निकाली, जो वो अक्सर पढ़ते रहते थे। अपनी प्रक्टिस के दौरान तो रात-रात भर जाग कर भी उसको पढ़ते देखा था मैने...। ये दोनो चीज़ें मैने मेज़ पर रखी उनकी तस्वीर के आगे रख दी और फिर अम्मा को बहुत सारी हिदायतें दे कर वापस अपने घर आ गई...।
     घर में इतने सारे काम हो गए थे कि एक हफ़्ता कैसे निकल गया, पता ही नहीं चला। अब मेरे भीतर एक हूक-सी उठने लगी, जाकर अम्मा को देखूँ तो सही...अब कैसी हैं...? सिर्फ़ फोन करते रहने से क्या होता है...।
     गेट खोल कर अन्दर घुसी तो एक अजीब-से मातमी सन्नाटे ने मुझे चारो ओर से घेर लिया। सब कॉलेज, ऑफ़िस वगैरह गए होंगे, पर बाबूजी के कमरे से भुन-भुन की आवाज़ आ रही थी। सबसे पहले मैं उसी ओर गई।
     कमरे की चौखट पर पाँव धरा ही था कि चार सौ चालीस वोल्ट का झटका सा लगा...। सामने बाबूजी की तस्वीर के आगे पालथी मार के बैठी अम्मा आँखों पर बाबूजी का नया चश्मा लगाए पूरी तल्लीनता से उनकी वो मोटी-सी लॉ की किताब पढ़ने की कोशिश कर रही थी...।

6 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर । सभी के साथ घटता होगा समय का कुछ अंश कहीं ना कहीं कुछ कुछ इसी तरह ।

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत अच्छी कहानी प्रस्तुति हेतु आभार

vibha rani Shrivastava ने कहा…

.

अजय कुमार झा ने कहा…

बहुत ही कमाल की कहानी दी | आपकी ये विशेष श्रृंखला अब अंतरजाल का एक सहेजने कोना बन चूका है ..बहुत सारे मोती करीने से सज़ा दिए हैं आपने

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अक्सर ऐसी ही कहानियाँ हमारे इर्दगिर्द पाई जाती हैं ...

राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर = RAJA Kumarendra Singh Sengar ने कहा…

:)

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