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रविवार, 9 अगस्त 2015

काकोरी काण्ड की ९० वीं वर्षगांठ - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम |

काकोरी काण्ड (अंग्रेजी: Kakori conspiracy) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रान्तिकारियों द्वारा ब्रिटिश राज के विरुद्ध भयंकर युद्ध छेड़ने की खतरनाक मंशा से हथियार खरीदने के लिये ब्रिटिश सरकार का ही खजाना लूट लेने की एक ऐतिहासिक घटना थी जो ९ अगस्त १९२५ को घटी। इस ट्रेन डकैती में जर्मनी के बने चार माउज़र पिस्तौल काम में लाये गये थे। इन पिस्तौलों की विशेषता यह थी कि इनमें बट के पीछे लकड़ी का बना एक और कुन्दा लगाकर रायफल की तरह उपयोग किया जा सकता था। हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के केवल दस सदस्यों ने इस पूरी घटना को अंजाम दिया था।
क्रान्तिकारियों द्वारा चलाए जा रहे आजादी के आन्दोलन को गति देने के लिये धन की तत्काल व्यवस्था की जरूरत के मद्देनजर शाहजहाँपुर में हुई बैठक के दौरान राम प्रसाद बिस्मिल ने अंग्रेजी सरकार का खजाना लूटने की योजना बनायी थी। इस योजनानुसार दल के ही एक प्रमुख सदस्य राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी ने ९ अगस्त १९२५ को लखनऊ जिले के काकोरी रेलवे स्टेशन से छूटी "आठ डाउन सहारनपुर-लखनऊ पैसेन्जर ट्रेन" को चेन खींच कर रोका और क्रान्तिकारी पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में अशफाक उल्ला खाँ, पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद व ६ अन्य सहयोगियों की मदद से समूची ट्रेन पर धावा बोलते हुए सरकारी खजाना लूट लिया। बाद में अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पार्टी हिन्दुस्तान रिपब्लिकन ऐसोसिएशन के कुल ४० क्रान्तिकारियों पर सम्राट के विरुद्ध सशस्त्र युद्ध छेड़ने, सरकारी खजाना लूटने व मुसाफिरों की हत्या करने का मुकदमा चलाया जिसमें राजेन्द्रनाथ लाहिड़ी, पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खाँ तथा ठाकुर रोशन सिंह को मृत्यु-दण्ड (फाँसी की सजा) सुनायी गयी। इस मुकदमें में १६ अन्य क्रान्तिकारियों को कम से कम ४ वर्ष की सजा से लेकर अधिकतम काला पानी (आजीवन कारावास) तक का दण्ड दिया गया था।

काकोरी काण्ड की ९० वीं वर्षगांठ पर सभी जांबाज क्रांतिकारियों को पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम और हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से शत शत नमन |
 
इंक़लाब जिंदाबाद !!!
सादर आपका
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कलम आज उनकी जय बोल

Gopesh Jaswal at तिरछी नज़र
9 अगस्त, 1925 को हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के लगभग सौ क्रांतिकारियों ने पंडित रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में सरकारी खज़ाना ले जा रही ट्रेन को काकोरी में लूटा था. इस ट्रेन डकैती में सरकारी खज़ाना लूटने के सिवा, खून-खराबा करने का क्रांतिकारियों का कोई इरादा नहीं था पर इसमें एक यात्री उनकी गोली से मारा गया था. क्रांतिकारियों के हाथ केवल 8000 रुपये लगे थे पर इस छोटी सी रकम का भी वो सदुपयोग नहीं कर सके और इस कांड से जुड़े हुए अधिकांश शीघ्र ही पकडे गए. इसमें पंडित रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्लाह खां, राजेन्द्र लाहिरी और ठाकुर रौशन सिंह को फांसी, शचीन्द्रनाथ सान्याल व शचीन्द्रनाथ बक्शी ... more » 

लघुकथा - सुखी कौन ???

Jyoti Dehliwal at आपकी सहेली
[image: Woman talking on phone] *शिल्पा,* एक निहायत ही अमीर घर की महिला ने अपने काम वाली बाई को दोपहर चार बजे फ़ोन किया। फ़ोन उसके पति ने रिसीव किया, "मैडम, वो अभी सो रही है। उठने के बाद बात करने बोलता हूँ।" शाम छ: बजे काम वाली बाई का फ़ोन आया, "मैडम, आपका फ़ोन आया तब मैं सोई हुई थी। अब बताइये क्या बात है?… " शिल्पा सोचने लगी कि "मैं चाहे रात को ग्यारह बजे एकदम गहरी नींद में ही क्यों न सोई हो, फ़ोन खुद ही रिसीव करती हूँ। दिन भर में कभी भी फ़ोन आने पर, फ़ोन रिसीव करने ऐसे दौड़ती हूँ कि मुझे देख कर पी.टी. उषा को भी शर्म आ जाए। क्योंकि हर किसी को मुझ से यही उम्मीद जो रहती है। मेरे पति महोदय भ... more » 

ऐडसेंस एकाउंट को निरस्त / बंद होने से बचायें

ऐडसेंस / AdSense के बारे में जितना कहा जाये कम है आज हिंदी ब्लॉगर्स भी इससे लाभांवित हो रहे हैं। हिंदी ब्लॉगिंग में जाने-माने साल में लाखों रुपये की आमदनी कर पा रहे हैं और ये सब ऐडसेन के कारण ही सम्भव हुआ है। हिंदी ब्लॉगर्स के मध्य गूगल द्वारा किये गये सर्वे के कारण ही गूगल टीम इस निष्कर्ष पर पहुँची की यदि इंटरनेट पर हिंदी भाषा का विकास और प्रचार-प्रसार करना है तो हिंदी ब्लॉगरों को ऐडसेंस विज्ञापनों से वंचित नहीं किया जा सकता है। हिंदी ब्लॉगर्स ऐडसेंस के लिए आवेदन करके आसानी से विज्ञापन अपने... It's post summary, read full post on the blog.  

पोटली समोसा - Potli Samosa

आजकल बारिश का मौसम है, कहीं-कहीं तेज बारिश हो रही है, तो कहीं रिमझिम-रिमझिम। ऐसे मौसम में गरम-गरम समोसे मिल जाएं, तो फिर क्या बात है। तो आइए इसी बात पर आज हम आपको एक अलग स्टाइल के समोसे के बारे में बताते हैं, जिसका नाम है पोटली समोसा। सिर्फ नाम से नहीं, यह अपने स्वाद के कारण भी अनोखा है। बना कर देखि‍ए, मजा आ जाएगा। [image: पोटली समोसा - Potli Samosa] *आवश्यक सामग्री:* मैदा-01 कप, रिफाइंड तेल-03 बड़े चम्मच, नमक-स्वादानुसार, तेल-तलने के लिए। *स्टफिंग (भरावन हेतु):* आलू-04 (उबले, मैश किए हुए), सौंफ-01 छोटा चम्मच, जीरा-01 छोटा चम्मच, खड़ी धनिया-01 छोटा चम्मच, पिसी लाल मिर्च-आवश्यकतानुसा... more » 

उर्दू साहित्य की बहती त्रिवेणी 'रेख़्ता''

अमेरिकी उपन्यासकार, संपादक, और प्रोफेसर टोनी मॉरिसन ने लिखा है कि जो किताब आप पढ़ना चाहते हैं, यदि बाजार में उपलब्ध नहीं है, यदि अभी तक लिखी नहीं गर्इ तो वो किताब आपको लिखनी चाहिए। यह कथन उस समय मेरे सामने सच बनकर आया, जब मैं शायरोशायरी की तलाश में भटकता हुआ रेख़्ता डाॅट ओआरजी पर पहुंचा। दरअसल, रेख़्ता का जन्म भी कुछ इस तरह हुआ है। रेख़्ता के जनक संजीव सर्राफ, जो पेशे से व्यवसायी हैं, एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र को दिए साक्षात्कार में बताते हैं कि उनको उर्दू शायरी पढ़ने का पुराना शौक था, मगर, कुछ शब्द जब उनको समझ नहीं आते थे, तो उनको घुटन महसूस होती थी। दरअसल, यह बहुत सारे लोगों के ... more » 

UP : कम से कम भ्रष्टाचार में तो ईमानदारी हो

महेन्द्र श्रीवास्तव at आधा सच...
माननीय अखिलेश यादव जी मुख्यमंत्री, उत्तर प्रदेश सरकार लखनऊ विषय : भ्रष्टाचार को ईमानदारी से लागू करने के संबंध में महोदय, मैं आपसे ऐसी कोई मांग नहीं करना चाहता जो संभव न हो, मै ये भी नहीं चाहता कि आप दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की तरह भ्रष्टाचार पर बड़ी बड़ी बातें करें और फिर भ्रष्टाचारियों को खुद ही संरक्षण दें। अखिलेश जी मेरी मांग बहुत ही व्यवहारिक है और इसे लागू करने से सरकार की आमदनी तो बढेगी ही, प्रदेश के लोगों का सरकार पर भरोसा भी बढेगा। खास बात ये है कि इस योजना को लागू करने से सरकार पर किसी तरह का अतिरिक्त बोझ भी नहीं बढ़ने वाला है। मैं आपको विश्वास दिलाता हूं ... more » 

खाली पेट का शैतान

हिमकर श्याम at शीराज़ा [Shiraza]
सुना था बुर्जुगों से बचपन में हमने कि खाली दिमाग शैतान का घर इस फ़लसफ़े को गढ़नेवाले या फिर इसे कहनेवाले भूल गये होंगे यह बताना या विचारा नहीं होगा कि खाली पेट शैतान का घर क्योंकि खाली पेट में भी बसता है एक शैतान जो भारी पड़ता है खाली दिमागवाले शैतान पर भूख की ज्वाला में झुलस जाती है संवेदनाएँ सारे आदर्श, सारे ईमान भूल जाता है इंसान सारे मान-अभिमान कायदे-कानून, बुरा 

मानव जिजीविषा

बदली अर्थात ट्रान्सफर वाली नौकरी के कई लाभ हैं तो बहुत सी हानियाँ। लाभ यह है कि आप और आपका परिवार कूपमंडूप नहीं बना रहता। हर दो या तीन साल के बाद, एक नई जगह, नया प्रदेश, नई भाषा, नए लोग, नया खानपान, नई संस्कृति देखने समझने को मिलती है। बच्चे भी जीवन में कहीं भी, किसी भी वातावरण में अपने को ढालना सीख जाते हैं। सबसे बड़ी बात, कितनी भी बड़ी असुविधा हो यह जान कि यह अस्थाई है सहन हो जाती है। हानियों में सबसे बड़ी यह है कि पति पत्नी दोनो के लिए नौकरी कर पाना असम्भव सा हो जाता है। अन्यथा जीवन भर अलग अलग रहने को अभिशप्त हो जाते हैं। प्रायः पत्नी को ही पति को इंजन मान पीछे का डिब्बा बन साथ साथ ज... more » 

पार उतरना धीरे से:स्पष्ट पक्षधरता और बदलती ग्रामीण चेतना की मार्मिक कहानियाँ

"पार उतरना धीरे से" विवेक मिश्र का दूसरा कहानी-संग्रह है जो विश्व पुस्तक मेला 2014 में सामयिक प्रकाशन से आया है। विवेक की कहानियों से मेरी पहचान कई साल, या कहें कि कई कहानियों पुरानी है। उनकी कहानियाँ उनके पहले कहानी संग्रह ‘हनियाँ तथा अन्य कहानियाँ’ से ही अपने विशिष्ट कहन और यथार्थपरकता के चलते अपनी ओर ध्यान खींचती रही हैं। उनके इस नए संग्रह में कुल दस कहानियाँ है जिनमें से अधिकांश कहानियाँ विभिन्न साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित और चर्चित हो चुकी हैं। आज विवेक मिश्र का शहरों से लेकर गाँव-कसबों तक फैला एक बड़ा पाठक वर्ग है और उसका कारण है उनकी कहानियों का परिवेश, जो तेज़ी से शह... more » 

विनम्र श्रद्धांजलि ब्लागर निलॉय नील

सुशील कुमार जोशी at उलूक टाइम्स
*जमघट हर जगहएक नहीं कई सारे एक जैसी आकाँक्षाऐं एक जैसी महत्वाकाँक्षाऐं एक सी आवाजें और शोर तीखे संगीत और गीतों के सायों से कहीं दूर बहुत दूर कुकर्म की उर्जा का जोर सियार एक नहीं बहुत सारे एक हो कर कुचलने को आमादा तिमिर से ढक कर निचोड़ कर हर नई भोर कहाँ कहाँ देखे कोई क्या कुछ सोचे क्या करे कोई हताशा अपने आस पास बहुत नजदीक भी हताशा दूर बहुत दूर उसी तरह की वही क्रूरता लालच बेरहमी की जय जयकार से खुश हो रहे लोग दर लोग फिर से एक बार कुचल दी गई हत्या कर एक और आवाज बोलने लिखने की आजादी को करने के लिये कमजोर पर रुक नहीं पाये कभी इस तरह दीवानों के ... more » 

अधूरी नींद...टूटे ख़्वाब...और कुछ कच्ची-पक्की सी कहानियाँ-( भाग-छह )

प्रियंका गुप्ता at कही-अनकही
अभी वह ऑफिस जाने की तैयारी में लगा ही था कि सहसा बदहवास सी पत्नी कमरे में आई ,"जल्दी बाहर निकलिए...। बिलकुल भी अहसास नहीं हो रहा क्या...भूकंप आ रहा । चलिए तुरंत...।" वो उसकी बाँह पकड़ कर लगभग खींचती हुई उसे घर से बाहर ले गई । पत्नी को यूँ रुआंसा देख कर जाने क्यों ऐसी मुसीबत की घड़ी में भी उसे हँसी आ गई । बाहर लगभग सारा मोहल्ला इकठ्ठा हो गया था । एक अफरा-तफरी का माहौल था । कई लोग घबराए नज़र आ रहे थे। कुछ छोटे बच्चे तो बिना कुछ समझे ही रोने लगे थे । सहसा उसे बाऊजी की याद आई । वो तो चल नहीं सकते खुद से...और इस हड़बड़-तड़बड़ में वह उनको तो बिलकुल ही भूल गया । वो जै... more » 
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

6 टिप्पणियाँ:

Jyoti Dehliwal ने कहा…

उम्दा लिंक्स ... मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद.

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति शिवम जी । काकोरी काँड की 90 वीं बरसी पर अमर शहीदों को नमन ।

हिमकर श्याम ने कहा…

सुंदर सूत्र संकलन, मेरी रचना को स्थान देने के लिए आभार... काकोरी कांड के अमर नायकों को सर झुका कर नमन.

DrZakir Ali Rajnish ने कहा…

काकोरी कांड की वर्षगांठ पर शुभकामनाएं।
लजीज खाना को बु‍लेटिन में शामिल करने का शुक्रिया।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार |

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

मैं कहीं बाहर था, देख नहीं पाया।
मुझे यहां स्थान देने के लिए बहुत बहुत आभार

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