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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

सबकी पहचान है





गड़ेरिया बन मैं भेड़ों को नहलाता रहा 
नुकीले सिंघों का नुकीलापन 
सहलाकर कम करता रहा 
एक साथ ले जाना घुमाने 
इकट्ठे ले आना 
आज तक नहीं जान सका 
कौन अधिक प्यारा रहा ! … 













7 टिप्पणियाँ:

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत रोचक बुलेटिन...

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति ।

राजीव कुमार झा ने कहा…

बहुत सुंदर बुलेटिन.
मेरे पोस्ट को शामिल करने के लिए आभार.

shashi purwar ने कहा…

hardik dhnyavad ..... sundar post hai

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति
आभार!

Aparna Sah ने कहा…

sundar buletin..

Shanti Garg ने कहा…

सुन्दर व सार्थक रचना ..
मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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