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मंगलवार, 14 जुलाई 2015

कुछ नई कुछ पुरानी तासीर





 यादों की खरोंचें 
विकृत चीखें 
लाख भूलना चाहो 
हथौड़े की तरह यादों का दरवाज़ा पीटती हैं 
फिर भी न खोलो 
तो कोई बहुत अपना खोलने की कोशिश करता है 
तब तक 
जब तक पूरी दिनचर्या न बिगड़ जाए !

कोई शुभचिंतक ऐसा नहीं होता 
हो ही नहीं सकता 
उसकी पुरज़ोर कोशिश ही यही होती है 
कि सारे ज़ख्म हरे हो जाएँ 
आँखें सूज जाये 
नींदें हराम हो जाये  … 

ऐसे लोगों से  एक दूरी ज़रूरी है 



4 टिप्पणियाँ:

रचना दीक्षित ने कहा…

जख्मों को हरा रखने का यही तरीका सलीका का लगता है लोगों को.

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

दूरी जख्म खाने वाला बनाये तो कितनी बनाये
कुरेदने वालों का काम ही जख्म सूंधना होता है ।

सुंदर बुलेटिन ।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन दीदी ... आपका आभार |

Kavita Rawat ने कहा…

बहुत सुन्दर बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

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