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सोमवार, 6 अक्तूबर 2014

अवलोकन - 2014 (2)



चाहा था करवट बदलकर देख लूँ तुम्हें
पर  .... 
यूँ तो तुम मेरी हर करवटों में थे 
पर कोई चेहरा नहीं हुआ 
चहलकदमियाँ थीं जिस ख्याल की 
उसका ख्याल ही रहना ज़िन्दगी को रास आया 
……………  

अहलिया गोया चांद...!

अली सैयद  http://ummaten.blogspot.in/



सूर्य और चंद्रमा ने शादी तो की मगर सूर्य काफी बदसूरत और बेहद झगड़ालू स्वभाव का था ! एक बार, बहस के दौरान उसने चंद्रमा से कहा, तुम अच्छी नहीं हो, यहाँ तक कि तुम्हारे पास अपनी रौशनी भी नहीं है , अगर मैं तुम्हें अपनी रौशनी ना दूं तो, तुम किसी काम की नहीं हो, इस पर चंद्रमा ने उससे कहा कि तुम बेहद गर्म स्वभाव के हो, इसीलिये धरती पर स्त्रियां, मुझे तुमसे ज्यादा पसंद करतीं हैं, जब मैं रात को आलोक बिखेरती हूं तो वे अपने घरों से बाहर निकल कर नृत्य करने लगतीं हैं ! चंद्रमा का ये जबाब सुन कर सूर्य बहुत नाराज़ हुआ और उसने चंद्रमा के मुंह पर रेत फेंक दी, जिससे उसके मुंह पर गहरे काले दाग पड़ गये !ऐसे ही एक दिन झगड़े के वक़्त सूर्य, उसे दैहिक रूप से प्रताड़ित करने के लिये उसे पकड़ने के वास्ते , उसका पीछा करने लगा...सूर्य से डर कर भागते भागते चन्द्रमा थक चुकी थी और सूर्य लगभग उसे पकड़ने ही वाला था कि आसन्न संकट से सावधान होकर वो पुनः सूर्य की पहुंच से दूर हो गई, बस उसी दिन से लगातार ये सिलसिला चलता जा रहा है कि सूर्य हर बार उसे पकड़ते पकड़ते चूक जाता है / पीछे रह जाता है !

कहते हैं कि उनका पहला पुत्र, इंसानों जैसा दिखने वाला एक बड़ा तारा था, जिसे एक दिन गुस्से में आकर सूर्य ने छोटे छोटे टुकड़ों में काट कर आकाश में बिखेर दिया था और उन टुकड़ों से ही आकाश के असंख्य तारे बने ! उनका दूसरा पुत्र एक महाकाय केकड़ा था, जो कि आज भी जीवित है और ज्यादातर समय समुद्र की अतल गहराई में बने एक विशाल गर्त में रहता है , वो इतना शक्तिशाली है कि जब भी अपनी आँखे खोलता या बंद करता है तो बिजलियाँ कौंधने लगती हैं ! इस महाकाय केकड़े के गर्त में बैठने या गर्त को छोड़ते समय विशाल लहरें बनती और बिगड़ती हैं !  केकड़ा अपने पिता सूर्य की तरह से कलहप्रिय है और अक्सर अपनी मां को निगलने की कोशिश में लगा रहता है ! बहरहाल धरती के लोग चंद्रमा को पसंद करते हैं, इसीलिए जैसे ही केकड़ा चंद्रमा के करीब आता है , वे सब उसे बचाने के लिये अपने अपने घरों से बाहर निकल कर जोर जोर से घड़ियाल बजाने लगते हैं और तब तक शोर करते रहते हैं जब तक कि केकड़ा डर कर पीछे ना चला जाए...इस तरह से चंद्रमा का जीवन सुरक्षित बना रहता है !

दक्षिण पूर्व एशियाई मूल की इस लोक कथा में स्त्री और पुरुष के संबंधों, उनके स्वभाव तथा उनकी सामाजिक संस्थितियों का लेखा जोखा, सूर्य और चंद्रमा की प्रतीकात्मकता के माध्यम से, प्रस्तुत किया गया है ! इस आख्यान को गढ़ने वाला समाज, पुरुषों की तुलना में स्त्रियों को, उनके मृदु स्वभाव, समाज में उनकी लोकप्रियता और सौंदर्य के मापदंडों के अधीन कहीं ज्यादा बेहतर आंकता है ! सामान्यतः ये कथा सूर्य के रूप में पुरुष को उग्र स्वभाव / ज्वलनशील तथा पत्नि से मारपीट करने वाले झगड़ालू व्यक्ति के रूप में चिन्हांकित करती है ! बहस के दौरान पत्नि को निज तुलना में हेय ठहराने का यत्न और फिर तर्केत्तर गतिविधि के रूप में पत्नि के सुंदर चेहरे को खुरदरी रेत से विरूपित करने वाले कार्य का ठीकरा अंततः पुरुष वर्ग के माथे ही फोड़ा जा सकता है ! यही नहीं वो झगड़े के एक दिन अपनी पत्नि को दैहिक प्रताड़ना देने के मंतव्य से घर से बाहर पलायन करने को  मजबूर कर देता है , पुरुषों की दैहिक श्रेष्ठता / अहंकार / शक्ति प्रदर्शन की इस घटना में , आगे की सांकेतिकता यह कि स्त्रियां आज भी आतंकित बनी हुई हैं ...और अपने अस्तित्व की रक्षा के लिये निरंतर भाग रही हैं !

परस्पर विपरीत स्वभाव के बावजूद उनका पति पत्नि होना तथा पति की सतत आक्रामकता के विरुद्ध पत्नि को समाज से कोई विशेष संरक्षण प्राप्त नहीं होना, शायद इस बात का संकेत करता है कि उनका विवाह , व्यवस्थित विवाह ही रहा होगा ? कहने का आशय यह है कि प्रेम विवाह में स्त्री एवं पुरुष एक दूसरे को पहचान पाने का अवसर कदाचित पा ही जाते हैं , जबकि व्यवस्थित विवाह में इसकी सम्भावना न्यूनतम हो सकती है ! कथा कहती है कि, सूर्य की तुलना में चंद्रमा के पास खुद की रौशनी भी नहीं है , इसका मतलब बेहद साफ़ है कि समाज से प्राप्त तमाम शक्तियां / ऊर्जा और अधिकार केवल पुरुषों के आधिपत्य में हैं और स्त्रियां इन अधिकारों से वंचित हैं ! नि:संदेह , कथा कालीन समाज स्त्रियों को रौशनी / सामर्थ्य  / शक्तियों तथा ऊर्जा के लिये पुरुषों पर निर्भर बनाये रखने वाला समाज रहा होगा , कम-ओ-बेश आज के समाज के जैसा ! जहां पति सूर्य अपनी शक्तियों का इस्तेमाल व्यक्तिगत रूप से चंद्रमा को कुचलने तथा दुःख पहुंचाने के लिये करता है , वहीं पत्नि चंद्रमा, उधार अथवा कृपा की तरह से प्राप्त धधकती सौर्य ज्वाला को शीतल कर समाज की ओर परावर्तित कर देती है , यानि कि स्त्रियां क्रोध / अहंकार / अग्नि तत्व को भी आनंद योग्य बना देती हैं !

इस आख्यान में सूर्य अपने पहले पुत्र के टुकड़े कर देता है , नि:संदेह वो एक हिंसक परसोना है ! पुत्र के टुकड़ों का आकाश में बिखर कर असंख्य तारों में बदल जाना, दक्षिण पूर्व एशियाई समाज की एक अन्य लोक कथा की ओर ध्यान आकर्षित कराता है जहां एक स्त्री चावल के दानों को आकाश में बिखेर देती है , जिससे तारों का जन्म होता है ! तारों के जन्म की इस सांकेतिकता का उद्देश्य मोटे तौर पर स्त्री और पुरुष के व्यवहार के अंतर को समझाना भी हो सकता है , ये अंतर मूलतः संबंधों में अनुराग अथवा निर्ममता जैसे तत्वों को लेकर बेहद साफ़ दिखाई देता है ! सूर्य और चंद्रमा दम्पत्ति की दूसरी संतान के रूप में केकड़ा, समुद्र में रहता है, वो पिता की तरह से हिंसक और स्त्री विरोधी है ! यहाँ गौरतलब बात ये है कि चंद्रमा की मृदुता के प्रत्युत्तर में समाज, उसे उसके ही पुत्र के हिंसक व्यवहार से तो बचाता है पर...पति की निर्ममता के समय इसी समाज का मौन मुखर हो उठता है ! नि:संदेह समाज के दोहरे मानदंडों को उजागर करती है ये कथा ! स्त्री और पुरुष के प्रकृति रूप में सूर्य और चंद्रमा तथा उनके पुत्र के रूप में तारों और केकड़े को देखें तो टिम टिम रौशनी और उत्ताल तरंगों के बतौर अपना योगदान तो वे दे ही रहे हैं !


आस्था के जंगल में……एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है!!!

वंदना गुप्ता 


http://ekprayas-vandana.blogspot.in/

आस्था के जंगल में उगा 
विश्वास का वटवृक्ष 
जब धराशायी होता है 
जाने कितने पंछी 
बेघर हो जाते हैं 
जाने कितने घोंसले टूट जाते हैं 
जाने कितनी मर्यादाएं भँग हो जाती हैं 
छितरा जाता है पत्ता पत्ता 
और बिखर जाता है जंगल के कोने कोने में 
कभी न जुड़ने के लिये 
फिर कभी न शाख पर लगने के लिये 

विश्वास के टूटते ही 
धूमिल हो जाती हैं 
सभी संभावनाएं भविष्य की 
और आस्था बन कर रह जाती है 
महज ढकोसला 
जहाँ चढ़ते थे देवता पर 
फूल दीप और नैवैद्य 
वहीँ अब खुद की अंतश्चेतना 
धिक्कारती है खुद को 
झूठ और सच के पलड़े 
लगते हैं महज 
आस्था का बलात्कार करने के उपकरण 

 धर्मभीरु मानव मन
नहीं जान पाता सत्य के 
कंटीले जंगलों का पता 
जहाँ लहूलुहान हुये बिना 
पहुंचना सम्भव नहीं 
और दूसरी तरफ़ 
झूठ करता है अपनी 
दूसरी परंपरा का आह्वान 
तो सहज सुलभ हो जाती है आस्था 
मानव मन का कोना 
'चमत्कार को नमस्कार '
करने में विश्वास करने वाला 
चढ़ जाता है आस्था की वेदी पर बलि 
मगर नहीं कर पाता भेद 
नहीं कर पाता पड़ताल 
कैसे दीवार के उस तरफ़ 
कंक्रीट बिछी है 
और उसकी आस्था ठगों के 
हाथों की कठपुतली बनी है 
वो तो बस महज एक वाक्य को 
मान लेता है ब्रह्मवाक्य 
क्योंकि ग्रंथों पुराणों मे वर्णित है 
इसलिए धर्मभीरुता का लाभ उठा 
हो जाता है शोषित कुछ ठगो की 
जो बार बार यही समझाते हैं 
यही बतलाते हैं 
गुरु से बढ़कर कोई नही 
दीक्षा गुरु सिर्फ़ एक ही है होता 

प्रश्न यहीं है खड़ा होता 
आखिर वो कहाँ जाये 
किससे  कहे अपने मन की व्यथा 
जब दीक्षा गुरु ही 
विश्वास के वृक्ष पर 
अपनी हवस की कुल्हाड़ी से वार करे 
अपनी कामनाओं की तलवार से प्रहार करे 
पैसा पद और लालच के लिये 
अपने अधिकारों का दुरूपयोग करे 
तब कहाँ और किससे कोई शिकायत करे 
कैसे उसे गुरु स्वीकार करे 
जिसने उसकी आस्था के वृक्ष को 
तहस नहस किया 
कैसे उसके लिये मन में पहले सा 
सम्मान रख प्रभु सुमिरन किया करे 

क्या सम्भव है उसे गुरु स्वीकारना 
क्या सम्भव है पुराणों की इस वाणी को मानना 
कि दीक्षा गुरु तो सिर्फ़ एक ही हुआ करता है 
जो कई कई गुरु किया करते हैं 
घोर नरक मे पड़ा करते हैं 
मगर कही नहीं वर्णित किया गया 
यदि गुरु ने जघन्य कर्म किया 
तो कैसे उसके द्वारा दिये मन्त्र में 
शक्ति हो सकती है 
जो खुद ही गलत राह का राही हो 
उसकी बात मे कहाँ दम हो सकता है 

जिसकी आस्था एक बार खंडित हो गयी हो 
कैसे उसकी नये सिरे से जुड़ सकती है 
कैसे किसी पर फिर विश्वास कर 
एक और आस्था के वटवृक्ष को 
उगाया जा सकता है 
गर कोशिश कर किसी पर 
विश्वास कर नये सिरे से कोई जुड़ता है 
तो पुराणों मे वर्णित प्रश्न उठ खड़ा होता है 
'एक ही दीक्षा गुरु होता है '
ऐसे में 
साधक तो भ्रमित होता है 
कहाँ जाये 
किससे मिले सही उत्तर 

प्रश्न दस्तक देता प्रहार कर रहा है 
क्या पुराण में जो पढ़ा सुना 
उसे माने या 
जो आँख से देख रहा है 
और जिसे उसकी अंतरात्मा 
नहीं स्वीकारती 
उस पर चले 
ये कैसा धर्म  के नाम पर 
होता पाखण्ड है 
जिसने मानवता को किया हतप्रभ है 

सुना है 
धर्म तो सत्य का मार्ग दिखलाता है 
फिर ये कैसा मार्ग है 
जहाँ आस्था और विश्वास से परे 
मानवता ही शोषित होती है 
और उस पर चलने वाले को 
धर्मविरुद्ध घोषित करती है 

सोच का विषय बन गया है 
चिंतन मनन फिर करना होगा 
धर्म की परिभाषाओं को फिर गुनना होगा 
वरना 
अनादिकाल से चली आ रही 
संस्कृति से हाथ धोना होगा 

झूठ सच 
धर्म आस्था विश्वास 
गुरु शिष्य संबंध 
महज आडम्बर न बन जाये 
वो वक्त आने से पहले 
विश्लेषण करना होगा 
और धर्म का पुनः अवलोकन करना होगा 
उसमे वर्णित संस्कारों को 
पुनः व्यख्यातित करना होगा 

तर्क और कसौटियों की गुणवत्ता पर 
खरे उतरे जाने के बाद 
फिर शायद एक बार फिर आस्था का वृक्ष अपनी जड़ें जमा सके 
और मेरे देश की संस्कृति और संस्कार बच सकें 

एक कशमकश उत्तर की चाहत में भटकती है ……


अभय

कौशलेन्द्र ) http://bastar-ki-abhivyakti.blogspot.in/

यह प्रश्न लाख टके का नहीं है
एक टके का भी नहीं है
अधेले का भी नहीं है ।
दरअसल 
जिस प्रश्न का उत्तर हर किसी को पता हो
उस प्रश्न का भला क्या मूल्य ?
फिर भी
यह एक प्रश्न है
जो उत्तरों को चिढ़ाते हुये
मूछों पर ताव देते हुये
सबको चुनौती देते हुये
अपनी पूरी निर्लज्जता के साथ
तन कर खड़ा है । 

यह प्रश्न
एक समस्या है
जिसका उत्तर
प्रजा से लेकर राजा तक
सबको पता है ।
प्रजा के पास
साहस का अभाव है
राजा के पास
समाधान की इच्छाशक्ति का अभाव है ।
समस्या विकराल होती जा रही है
राजा
प्रश्न को बनाये रखते हुये
समाधान का दिखावा करता है
और इस दिखावे के लिए
करोड़ों रुपये स्वीकृत करता है ।
यह एक निर्लज्ज खेल है
जो प्रजा के प्राणों के मूल्य पर
खेला जा रहा है ।
सुना है
यह संत
सुनता नहीं
देखता नहीं
बोलता नहीं
क्योंकि
उसने पाप को
अभय दे दिया है ।


संदर्भ :- इस कविता का संबन्ध एक पुजारी से भी हो सकता है जो सुबह-शाम पूजा करता है और शेष समय डाके डालने में व्यस्त रहता है । इस कविता का संबन्ध एक राजा से भी हो सकता है जो दिन में ग़ुनाहों के उन मुकदमों का फ़ैसला करता है जिन्हें वह ख़ुद सारी रात करता रहा है । इस कविता का संबन्ध उस वीतरागी से भी हो सकता है जो सन्यासी है और हर रात एक कन्या से बलात्कार करता है । इस कविता का संबन्ध हर उस धूर्त भेड़िये से भी हो सकता है जो संत बनकर हर क्षण किसी शिकार की तलाश में व्यस्त रहता है । इस कविता का संबन्ध लोकतंत्र की उन सभी दुष्ट व्यवस्थाओं से भी हो सकता है जो जनता की आँखों में धूल झोंकते हुये अपने पापी अस्तित्व को बनाये रखने में सफल होते रहते हैं ।

अर्थ :- अब बात बस इतनी सी है कि एक नरभक्षी शेर को इंसानों की सेहत का ज़िम्मा दे दिया गया है ।

3 टिप्पणियाँ:

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सटीक विश्लेषण ।

कौशलेन्द्र ने कहा…

धन्यवाद रश्मि जी ! मुझे मालूम है, यह मेरी एक ख़तरनाक पोस्ट है । यदि "उसकी"निगाह में आ गयी तो मेरी ख़ैर नहीं । लेखन धर्म की रक्षा के लिए यह ख़तरा लेना आवश्यक लगा मुझे । लेकिन समझ में नहीं आता कि मीडिया को ऐसे अपराधी नज़र क्यों नहीं आते ?

अली सैयद ने कहा…

बहुत दिनों से ब्लाग पर लेखन ठप था संभव है आपकी सदाशयता से प्रेरित होकर उस और भी ध्यान दे पाऊं ! बहरहाल आपका आभार व्यक्त करता हूँ ! अपनी पे क्या कहूँ वो तो एक साधारण सी प्रस्तुति है बस :)

वंदना जी की कविता काफी लंबी है, जिसका मूल कथ्य है , धार्मिकता का पुनरावलोकन / पुनर्व्याख्यायित किया जाना ! गुरु शिष्य परम्परा के आहत होने के कथन से वे आस्था और विश्वास के क्षरण / की टूटन का संकेत देती हैं ! धर्मगत कर्मकांडीयता / नक्कालों के उदभव से उन्हें शिकायत है ! वे शताब्दियों पुरानी , उनके ही शब्दों में अनादिकाल से चली आ रही संस्कृति और संस्कारों की पुनर्स्थापना के लिए आश्वस्त होना चाहती हैं ! उनका प्रश्न जिस अव्यवस्था से उदभूत है, वे उसी को परिमार्जित कर व्यवस्थापित करने में अपने प्रश्न के उत्तर ढूंढती हैं / समाधान की आकांक्षा करती हैं ! प्रतीत होता है कि उनकी कविता का सूत्रपात 'आसा' के 'लीला-ए-तन' प्रकरण से हुआ होगा या फिर इस कांड ने चहुँ दिस बिखरी गंद के विरुद्ध कवियित्री के असंतोष को और भी भड़का दिया होगा ! बहरहाल वे, तर्कों के आलोक में अतीत के संशोधित पुनर्जीवन की कामना करती हैं ! मुझे लगता है कि कविता थोड़ी छोटी होती तो उसकी धार और भी पैनी हो जाती शायद ?

कवि कौशलेन्द्र जी की कविता नितांत राजनैतिक है और व्यक्तिगत असहायता /व्यक्तिगत आशय से बंधी हुई प्रतीत होती है ! भले ही कविता के बाद , सन्दर्भों को विस्तारित करके वे, उसे बहुआयामी और खतरनाक कविता भी कह रहे हों पर एक पंक्ति का अर्थ कह कर वे पुनः अपनी कविता को उसी कुंवे में समेट लेते हैं , जहां से वो शुरू हुई थी ! वे , सत्ता के शिखर पर बैठे संत के मौन / अनसुनेपन और अनदेखा करने का आधार चुनते हुए, सारे संसार के पाप उसके ही माथे मढ़ देते हैं , क्योंकि उनकी कविता एक ही नायक के खलनायकत्व पे आधारित है , जहां निचलेक्रम / अधीनस्थों के व्यक्तिगत पापों / अप्कर्मों का लांछन भी अगुवा को भुगतना है , क्योंकि कवि की दृष्टि में वो एक अपाहिज / लाचार नायक है , तो सारे अनुयाइयों के छल उसके ही हिस्से ! शायद यह कविता पिछले गठबंधन के शासन काल को इंगित करके लिखी गयी है , एक विशिष्ट राजनैतिक दृष्टि से निबद्ध है / प्रेरित है ! मुझे लगता है कि इसे कविता से बेहतर एक गद्य / निबंध / आलेख माना जाना चाहिए !

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