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गुरुवार, 11 सितंबर 2014

परिवर्तन में ही नयापन है





हम खुद से डरते हैं
खुद से भागते हैं 
और जब तक यह होता है
कोई किनारा नहीं मिलता !  ..... तो जीतना होगा अपने डर से, अपने खालीपन से,  … 
सोचना होगा कि रुक जाने से न हम खुश रहते हैं, न लोग।  परिवर्तन में ही नयापन है।  

4 टिप्पणियाँ:

वाणी गीत ने कहा…

चलना /चलते रहना नए पुराने रास्तों पर ही जिंदगी है …
आभार !

yashoda agrawal ने कहा…

शुभ सेध्या बड़ी दीदी
सतरंगी बुलेटिन
बूँद का एहसास ही भीगा हुआ होता है
संजय जी की रचना भा गई

सादर

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर और बहुत दिनों से इंतजार भी हो रहा था ।

Dr.NISHA MAHARANA ने कहा…

सोचना होगा कि रुक जाने से न हम खुश रहते हैं, न लोग। sahmat hoon ....jivan ki katu sacchai ....

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