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मंगलवार, 5 अगस्त 2014

भारतीयता से विलग होकर विकास नहीं - ब्लॉग बुलेटिन



नमस्कार मित्रो,
कतिपय कारणोंवश विगत चार दिनों से बुलेटिन का प्रकाशन नहीं हो सका, इसके लिए क्षमाप्रार्थी हैं. पुनः आपके समक्ष सभी के स्वास्थ्य, कुशलता, सम्पन्नता की कामना के साथ आज मंगलवार की बुलेटिन लेकर आपका मित्र उपस्थित है. इस अन्तराल के मध्य हर्ष-उल्लास से भरे पर्व भी निकले; भारतीय भूमि पर विदेश से आयातित दिवस भी गुजरे. हम भारतीयों ने सभी पर्व-उत्सवों-दिवसों को सहजता से स्वीकार किया है किन्तु वर्तमान में देखने को मिल रहा है कि हम जिस उत्साह से विदेशी-आयातित दिवसों, त्योहारों का स्वागत करते हैं, उसी उत्साह से भारतीय पर्वों-त्योहारों को नहीं मना रहे हैं. फ्रेंडशिप डे आया सर्वत्र चर्चा रही, उसी के ठीक पहले नागपंचमी गुजरी दो-चार लोगों ने परम्परा का पालन किया. प्रेम का पर्व माने जाने वाले वेलेंटाइन डे पर बहार छाई रहती है पर भारतीय प्रेम-पर्व ‘बसंत पंचमी’ हम विस्मृत कर जाते हैं, जैसे अभी-अभी हमने हरियाली तीज को विस्मृत किया, तुलसी जयंती को विस्मृत किया.
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भारतीयता से, भारतीय संस्कृति से, सभ्यता से, भाषा से, बोली से अलग होकर हम किस तरह का विकास चाहते हैं, अब ये निर्धारण करने का समय आ गया है. ज्ञान-विज्ञान के नाम पर हिन्दी को हाशिये पर लगाया जा रहा है; धार्मिक तुष्टिकरण की नीति के चलते धार्मिक ग्रंथों को, वैदिक ग्रंथों को दूर किया जा रहा है; भारतीय संस्कृति का वाहक मानी जाने वाली रामचरित मानस को भी रेशमी कपड़े में लपेट आम भारतीय की पहुँच से दूर कर दिया गया. हम सभी को विचारना होगा कि ऐसा कब तब तक चलेगा? ऐसा कैसे चलेगा? अपनी जड़ों से कट कर हम कहाँ विकास कर पाएंगे? अपनी संस्कृति से अलग रहकर हम क्या सीख पायेंगे? अपनी भाषा को विस्मृत कर हम कौन सा ज्ञान ले पाएंगे? काश हम जागने-समझने की स्थिति में आयें.... तो संभव है कि हम वास्तविक विकास कर पायें. आशा, आकांक्षा, विश्वास को मन में लिए आगे बढ़ना है, खुद को गढ़ना है... समाज को गढ़ना है... देश को गढ़ना है. इसी विश्वास के साथ कि भविष्य सुदृढ़ होगा, संपन्न होगा.... आज्ञा दीजिये... फिर मिलेंगे अगली बुलेटिन के साथ.
नमस्कार....!!!

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नागपंचमी की कहानी .....

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सामाजिक दशा और दिशा: निर्भर है योग्य नेतृत्व पर

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समाज में विषमता व कृषक उत्पीड़न को उजागर करती है 'दुश्मन'

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चित्र गूगल छवियों से साभार 

6 टिप्पणियाँ:

आशा जोगळेकर ने कहा…

बिलकुल सही। हमें अपनी संस्कृति से जुडे रहना चाहिये। नाग पंचमी हमें हमारे लिये सर्पों की भी उपयोगिता बताती है जो खेती के दुष्मन चूहों की संख्या को काबू में रखते हैं। सात ही िस बात की भी महत्ता बताती है कि मनुष्य का प्रकृति के साथ तालमेल बिठा कर चलना जरूरी है।
एक अगस्त को तिलक जयंति की भी हमें याद नही रही।

Ratan singh shekhawat ने कहा…

शानदार

कविता रावत ने कहा…

बहुत सही ..भारतीय से विलग होकर विकास की कल्पना बेमानी है ..बहुत बढ़िया बुलेटिन प्रस्तुति ..

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति ।

Ashish Shukla ने कहा…

सर, बहुत बढ़िया प्रस्तुति ..
http://pratibimbprakash.blogspot.in/2013/12/girlfriend-boyfrend-the-Indian-culture.html

Arogyabharti ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति

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