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रविवार, 20 अप्रैल 2014

जनता का राजनीतिकरण... ब्लॉग बुलेटिन

आज का बुलेटिन मैं उन लोगों की नज़र करना चाहता हूं जो हमारे और आपके जैसे ही हैं..  लेकिन राजनीतिक माहौल में वह अपनी सोच पर राजनीति को हावी होनें देता है। व्यक्तिगत सम्बन्धों पर राजनिति का हावी हो जाना वाकई में चिन्ता का विषय है। सरकार कोई भी बनाए लेकिन आपके मित्र और सम्बन्धी तो आपके हैं, इस राजनीति के फ़ेरे में उन्हे क्यों छोडना? राजनीति से खुद को अलग कीजिए और निरपेक्ष राय रखिए... आपके घर के बाहर की सडक जो बनाए उसे वोट दीजिए... अच्छा कैंडीडेट समझिए और वोट दीजिए... अपनी राय किसी पर थोपिए मत... मुफ़्त में किसी राजनितिक दल के प्रचारक न बनिए... पिछले कई दिनों से सुबह की वाक पर भी लोगों को आपस में लडाई करते हुए देखता हूं, कोई मोदी को लेकर ललकारता है तो कोई केजरीवाल की झाडू का डर दिखाता है... फ़ेसबुक पर भी लोग तरह तरह के पूर्वाग्रहों से ग्रसित हैं... कोई केवल मोदी विरोधी पोस्ट को ही अपनें हिट होने का ज़रिया मान बैठा है तो कोई मोदी के समर्थन में.. यही हाल केजरीवाल के भक्तों और विरोधियों का भी है। कई मित्रों नें तो हर प्रकार की नकारात्मकता में ही अपना भविष्य तलाश लिया है। आखिर भारत का भविष्य कैसे निर्धारित होगा? फ़ेसबुक पर ही यदि वोट होता और सरकार चुनी जाती तो हालात और होते.. लेकिन देश का भविष्य बैलट बाक्स तय करेगा... चुनाव होनें दीजिए और फ़िर देखिए..  देश की जनता को किसे चुनना होगा और किसे नहीं समय पर पता चल ही जाएगा... 

मैं यहां बुलेटिन के मंच से लोगों की बदलती और राजनीतिक होती सोच पर प्रश्न करता हूं... यदि कोई लेखक या आलोचक केवल एक व्यक्ति विशेष के पीछे पडा रहे और केवल एक ही व्यक्ति पर नकारात्मक लेखन करे तो फ़िर उसे हम तटस्थ कैसे मानें? वहीं कोई यदि केवल समर्थन की बीन बजाए रहे तो फ़िर उसे भी हम कैसे अपनाएं? यदि आप किसी से अनुराग या द्वेश रखते हुए पोस्ट करेंगे तो आपसे विपरीत विचारधारा वाला उसे काटनें हेतू कोई और नकारात्मक कंटेण्ट लेकर आएगा... वास्तव में इससे न तो आपकी सोच बदली और न ही उस व्यक्ति की। दोनों की राजनीतिक सोच अपनी अपनी जगह रहेगी और आपका बरसों से चला आ रहा रिश्ता एकदम से खटाई में जाता दिखेगा.. कई ब्लागरों नें इस प्रकार की हरकत की है और इसका खामियाज़ा या फ़ायदा उन्होने उठाया है। सोच कर देखिए.... कहीं आप भी उनमें से एक तो नहीं ? 



चलिए आज के बुलेटिन की ओर चलें... 

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विरोधियों की एकता तथा संघर्ष के नियम का सार

कार्टून :- ज़मीन से जुड़े आदमी का आर्थि‍क सलाहकार होना

बाँटने से पहले बांचने तो दो

दिल्ली में दिल्ली के इतिहास की खोज जारी है --

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एक रहेन मिश्रीलाल : चुनावी चकल्लस

चुनावी मौसम में.. चुनावी पैरोडी

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मित्रों, अन्त में बशीर बद्र साहब की एक लाईन.. दुश्मनी जम कर करो लेकिन यह गुंजाईश रखना, जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिन्दा न हों... बस बात विवाद में तर्क और कुतर्क के बीच अपनी मर्यादा बनाए रखें और यदि वैचारिक मतभेद हों तो उन्हे अपनें अहं का प्रश्न न बनाएं.. दुनिया बहुत खूबसूरत है और इसमें नफ़रत के लिए समय काफ़ी कम है। 





जय हिन्द
देव

5 टिप्पणियाँ:

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

सबकी अपनी राजनैतिक विचारधारा होती है और होनी भी चाहिए.बात केवल इतनी सी है कि जब वह विचारधारा देश और समाज के हितों को प्रे रखकर भी अपनी राजनीति को पोषने लगे तो उसमें और राजनैतिक दल में कोई फर्क नहीं रह पाता.यहाँ किसी दल के कार्यकर्ता और समर्थक में फर्क होना चाहिए.
मूल प्रश्न यह है कि यदि हम किसी एक दल के प्रति निष्ठावान होकर दूसरों का विरोध करते हैं तो वह गलत है पर एक सजग नागरिक की हैसियत से हम यह लगातार और बार-बार करते रहें,जिससे लगता है कि देश और समाज को ,सांप्रदायिक सद्भाव को खतरा हो सकता है.
रही बात एक पक्ष की,तो यहाँ समझने वाली बात यह है कि जो मुद्दा या मुद्दई जिस वक्त प्रभावी और मजबूत रहता है,प्रासंगिक होता है,समाज और देश में उससे असर पड़ने वाला हो,उस पर ही उस समय बोला या कहा जाता है.केवल तटस्थता दिखाने के लिए औरों को नहीं लिया जा सकता.जब और मुद्दे बनते हैं तो उन की भी आलोचना ज़रूरी है.जो आज बोल रहे हैं यदि कल किसी और के गलत करने पर मौन रहते हैं,वे अपराधी हैं,आलोचक नहीं.
आपसी रिश्तों से बढ़कर कुछ नहीं है.मैं उस राजनीति को व्यर्थ और अनुपयोगी इसीलिए मानता हूँ जो सौहार्द के बजाय कटुता फैलाती है.इसे समझने पर बाकी चीज़ें भी समझना आसान हो जाएँगी.
हमें किसी के झंडे उठाने की जरूरत नहीं है और न ही प्रचारक बनने की.जनजागरण की ज़रूरत सर्वथा बनी रहेगी.
आपने संतुलित शब्दों में अपनी बात कही,आभार मित्र !

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

संतोष जी से सहमत हूँ । बहुत सुंदर बुलेटिन देव ।

आशीष भाई ने कहा…

बढ़िया प्रस्तुति , पोस्ट को स्थान देने के लिए बुलेटिन व देव भाई को धन्यवाद व अन्य लिंक्स भी शानदार , पोस्ट के लिए सूचित नहीं किया गया इस लिए देर से आया ! तब भी बुलेटिन को धन्यवाद

शिवम् मिश्रा ने कहा…

देव बाबू बेहद सार्थक बातें कही है आप ने ... पर काश कुछ लोग इन बातों का ख्याल हर समय रख पाते ... कहने को तो यहाँ यह लोग बड़ी बड़ी बातें हाल बना जाते है ... पर जब उन बातों पर अमल करने का समय आता है तो कहीं नज़र नहीं आते ... उल्टा उनका खुद का बर्ताव अपनी ही कही हुई बातों के विपरीत नज़र आता है ... ऐसा एक उदाहरण कल देखने को मिला |

कुछ लोग यह नहीं सोचते कि उनकी कथनी और करनी मे कितना फर्क आता जा रहा है | बातें तो वो बहुत बड़ी बड़ी करते है ... और खूब वाहवाही भी होती है उनकी ... पर असलियत मे उन बातों के पीछे उनकी मंशा कुछ और ही होती है ... मौका मिलते ही यह लोग आपको नैतिकता पर लंबा चौड़ा भाषण दे देते है ... पर खुद पर जब बात आती है तब नैतिकता से कोसो दूर खड़े दिखते है ... उस समय उन के चरित्र का एक अलग ही रूप दिखता है जो केवल निजी खुंदक, पूर्वाग्रह और राजनीतिक सोच के आधीन होता है |
बड़ी साफ सी बात है अगर किसी से नैतिकता नहीं संभालती तो उसे छोड़ दीजिये ... बेकार का नैतिकता का ढोंग तो न कीजिये ... पोल तो खुल ही जाती है ... जिस पल आप के विचार खुले मे आते है ... फिर कितने भी बहाने या सफाई देते रहिए ... कोई लाभ नहीं ... इस लिए समय रहते अपनी कथनी और करनी को एक कीजिये ... उस मे आप का हित है और इस देश का भी |

उम्मीद है मेरी बात यथास्थान तक पहुंची होगी |

इस सार्थक बुलेटिन के किए देव बाबू आपको साधुवाद

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

इस बुलेटिन के माध्यम से एक सकारात्मक सन्देश दिया है देव बाबू ने. पता नहीं क्यों हम भूल जानते हैं कि किसी का समर्थन करने का अर्थ दूसरे का विरोध करना नहीं होता. ये सब करना नेताओं को शोभा देता है, हमें नहीं. उनका क्या, वे दिन में गाली-गलौज करेंगे और शाम को बैठकर "काजू भुनी प्लेट में-व्हिस्की गिलास में" करेंगे.
वे तो बड़ी आसानी से कह देते हैं कि राजनीति में न तो कोई स्थाई मित्र होता है, न शत्रु, हमें यह बात समझने में बड़ी देर लग जाती है!!

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