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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

ब्लॉग बुलेटिन के साथ चलिये गुलज़ार से गुल्ज़ारियत तक...

हम जब छोटे थे तो हर इतवार को जंगलबुक आता था, तब तक हम कोनो गुलज़ार-उलजार को नहीं जानते थे.... लेकिन हमको ऊ चड्ढी पहन के फूल खिला है वाला गाना बहुत अच्छा लगता था.... मतलब एकदम डांस करने का फीलिंग आता था, अब हम लोग तो अइसने गाना पे डांस करते थे ऊ वखत... तब तक उन्होने बीड़ी जलईले नय न लिखा था....
फिर एक दिन टीवी पर आनंद सिलेमा आ रहा था, हम तो तब्बो बच्चे ही थे लेकिन जब ऊ लाइन आता है न "मौत तू एक कविता है"... तो लगा वाह अमिताभ बच्चन क्या डायलोग मारा है, तब तक ई थोड़े न पता था कि ई डायलोग सब हीरो नय कोनो औरे कोई लिखता है....
फिर बड़ा और समझदार होने के रास्ते पर कितना बार बहुते कुछ अच्छा लगा लेकिन समझ नहीं आता था कि इतना अच्छा कौन है जो इतना कुछ लिखता है... बहुत दिन बाद जब औडियो केसेट खरीदने का उम्र आया तो कई मनपसंद एल्बम पर एक नाम लिखा पाता था "गुलज़ार".... जगजीत दा ने भी उनकी कितनी गजलें  गायीं.... नाम में ही कोनो जादू सा था, फिर धीरे धीरे ऐसी गुल्ज़ारियत चढ़ी कि अब नहीं उतर सकती... हर गजल, हर शब्द जैसे कहीं जन्नत से उतार लाते है वो.. फिर जाना कि वो फिल्में भी बनाते हैं, उनकी बनाई सारी फिल्में एक एक कर देख डालीं... वाह !!! बस एक्के  लफ्ज निकला हर बार....
खैर, अभी पता चला उनको "दादा साहब फाल्के पुरस्कार" मिला है... वैसे तो एक वक़्त ऐसा भी आता है जब ई  सब पुरस्कार इतना माने नहीं रखते, इंसान अपना धुन में काम करते चले जाता है फिर भी बधाइयों का गुलदस्ता भेज देते हैं और ऊपर वाले से प्रार्थना कर सकते हैं कि उन्हें लंबी उम्र बख्से..
               
चलिये अब आते हैं आज की बुलेटिन पर, ढूंढते हैं कुछ ऐसी जगहें जहां गुलज़ार का जिक्र हुआ हो.... ऋचा जी लिख रही हैं कुछ गुल्ज़ारिशें, जोया जी गुलज़ार की तरफ से पूछ रही हैं, वो आई थी क्या ??, आवाज़ के जादूगर युनूस भाई रेडियोवाणी पर सुना रहे हैं, 'हम चीज़ हैं बड़े काम की यारम'    , घुमक्कड़ मनीष कुमार जी दिखा रहे हैं रद्दी का अखबार और बातें कर रहे हैं गुलज़ार की.... विवेक जैन के यहाँ हैं, दर्द और गुलज़ार... एक अंजाने ब्लॉग पर मिल गयी मुझे कहानी गुलज़ार के पहले गीत की... पारुल 'पुखराज' जी के ब्लॉग पर गुलज़ार/खय्याम/भूपेंद्र-आज बिछड़े हैं कल का डर भी नहीं , अभिषेक भाई के ब्लॉग पर आप भी जी सकते हैं गुलज़ार के साथ बिताए लम्हों की पूरी सीरीज....  इस सीरीज में कुल सात पोस्ट्स हैं पढ़िएगा ज़रूर....

तो आज के बुलेटिन की रेलगाड़ी यहीं तक, बहुत शॉर्ट नोटिस पर ये विशेष रेलगाड़ी खामोश दिल के स्टेशन से निकली है आइए बैठिए और सफर का आनंद लीजिये....

5 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

असली गुल्जारियत।

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

बहुत सुंदर बुलेटिन । गुलजार जी से मिलने की तमन्ना है बस एक बार ।

sadhana vaid ने कहा…

वाह ! बहुत खूब ! आज का बुलेटिन हर दिल अज़ीज़ गुलज़ार जी को समर्पित है यह देख कर बहुत खुशी हो रही है ! उनकी लिखी कोई रचना, कोई गीत, कोई गज़ल, कोई कविता, कोई फिल्म दिल को छुए बिना ऐसे ही गुमनाम सी गुजर जाये आँखों के सामने से कभी हो ही नहीं सकता ! फिल्म जगत के सर्वोच्च सम्मान से नवाजे जाने के लिये उन्हें अनेकानेक बधाइयाँ तथा इतने खूबसूरत लिंक्स उपलब्ध कराने के लिये आपका बहुत-बहुत धन्यवाद !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं
एक है जिसका सर नवें बादल में है
दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है
एक है जो सतरंगी थाम के उठता है
दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है
फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा
एक है दौड़ लगाने को तय्यार खडा है
‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तय्यार खडा है
हिंदुस्तान उम्मीद से है!
आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है
सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है
साठ साल आजादी के…हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है
अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!
हिन्दोस्तान उम्मीद से है..
- गुलज़ार

गुलजार साहब को हार्दिक मुबारकबाद |

तुम्हें एक लंबे ब्रेक के बाद बुलेटिन के मंच पर इस तरह से वापसी करते देखना बेहद सुकून दे रहा है ... शुभकामनायें शेखर |

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

हमारे गुरुदेव हैं... हमने तो नज़्म का मतलब भी इन्हीं से सीखा है. हमारे लिये भी यह बहुत खुशी की खबर है!!

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