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शनिवार, 30 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (22)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का २२ वाँ भाग ...



प्रेम में ईश्वरीय शक्ति होती है 
प्रेम ही लक्ष्य 
प्रेम ही सारथि 
प्रेम ही प्रत्यंचा 
प्रेम ही दान 
प्रेम ही मान   ………… प्रेम है तो सबकुछ है !



ब्रजेश)
शब्द संजीवनी हैं मेरे लिए. शब्द मेरे मन को बहलाते हैं और दुलारते भी हैं. शब्दों की लड़ी पिरोकर मन की विकलता दूर हो जाती है. शब्द मेरे मन के सच्चे मीत हैं.

जब हम प्रेम में होते हैं,
पूरी दुनिया से रूबरू होते हैं

सजग हो जाती हैं जिहवा पर स्वाद कलिकाएँ 
बढ़ जाता है जीवन का आस्वाद
त्वचा पर उग आते हैं संवेदनशील संस्पर्शक
सारे गंधों को ग्रहण करती है हमारी नासा पुट
सारा शोर-शराबा, जीवन का संगीत बन,
बजता है कानों में-

जब हम प्रेम में होते हैं,
रोकते हैं शरीर बच्चे को,
आवारा कुत्तों पर पत्थर फेकने से
गर्दन झुका ,बंद आँखों से
बड़े अदब से देते हैं विदाई
अंतिम यात्रा पर जा रहे सहयात्री को.
जब हम प्रेम में होते हैं,
रोप देते हैं गुलाब का एक विरवा.

जब हम प्रेम में होते हैं,
स्कूल जा रहे छोटे बच्चों के माथे पर रखते हैं आश्वस्ति भरा हाथ
जब हम प्रेम में होते हैं,
हमारे पास समय होता है कविताओं को पढ़ने का
प्रकृति के सौन्द्र्य को निहारने का
अलग-अलग फूलों के रंगो को विचारने का
जब हम प्रेम में होते हैं,
सुबह का स्वागत करते हैं मुस्कुराकर
और ईश्वर को धन्यवाद देते हैं इस जीवन के लिए

जब हम प्रेम में होते हैं,
खुले आसमान के नीचे विचरते हैं
और,चाँद-तारों से करते हैं दिल की बात
जब हम प्रेम में होते हैं,
अख़बारों के स्याह खबरों से होते हैं दुखी
हिन्दी फिल्मों का भला किरदार
होठों पर मुस्कुराहट और आँखों में ला देता है नमी
शाहरुख ख़ान के संग गाते हैं-
तुझे देखा तो ये जाना सनम
और महरूम रफ़ी साहब की मखमली आवाज़ के साथ मिलाते हैंअपनी आवाज़ -
तेरी आँखो केसिवा दुनिया में रखा क्या है.

जब हम प्रेम में होते हैं,
माँ को भर लाते हैं अंक मेंऔर
जताते हैं थोडा अतिरिक्त प्यार
आईने को करते हैं विवश,
ढीठ की तरह खड़े रहते हैं सामने
जब तक वह यह ना कह दे
चलो, काफ़ी है आज के लिए

जब हम प्रेम में होते हैं,
हो जाते हैं सदय
और अपनी गाड़ी को टक्कर मारने वाले को भी
पीछे मुड़कर,
देखते हैं मुस्कुराकर
और ज़ुबान बच जाती है गंदी हो जाने से

जब हम प्रेम में होते हैं,
शब्दों का टोटा हो जाता है ख़त्म
हम हो जाते हैं बातुनी

जब हम प्रेम में होते हैं,
अपनी हथेलियों पर लिखते हैं, मिटाते हैं
दुनिया की सबसे हसीन लड़की का नाम
जब हम प्रेम में होते हैं,अकारण ही जुड़ जाती हैं हथेलिया
दुनिया की तमाम इबादतगाहों में की जा रही प्रार्थनाओं के लिए

जब हम प्रेम में होते हैं,
सुलझ जाती है ब्रह्मांड की सबसे रहस्यमयी गुत्थी
आख़िरकार, जीवन का मकसद क्या है?
जब हम प्रेम में होते हैं,धरती बन जाती है अपनी देह
और ईष्ट हो जाता है आसमान।


(रीना मौर्य)


जानती हूँ तुम मुझे मना नहीं करते किसी भी चीज के लिए,, पर कभी - कभी तुम्हारी ना सुनने को जी चाहता है....
इसलिए जानबूझकर कुछ ऐसी बात कर ही देती हूँ की तुम चाहकर भी हाँ ना बोल पाओ .....
और मैं तुम्हारी ना सुन पाऊँ...
अरे || ना में भी तो प्यार होता है
फिक्र होती है ,,, ख्याल होता है...
और यही तो प्यार होता है.....
उसदिन तुमसे पूछ लिया था,,,अपने दोस्त की शादी में चली जाऊँ दो दिन के लिए..( तेज बुखार होने पर भी)

और तुम्हारा जवाब झट्ट से " ना " ....
उस वक्त कितना मजा आया था बता नहीं सकती....
बस ऐसे ही मजे लेने को मन कर जाता है कभी-कभी... और पूछ बैठती हूँ तुमसे उलफ़िज़ूल सवाल..
और सुन लेती हूँ तुमसे मीठी सी "ना"
आह||
मीठी सी नोंक- झोंक के बाद कुछ मीठा हो जाये..

:-)


(उपासना सियाग)

तुमसे भी अच्छा 
तुम्हारा नाम लगता है 
मुझे 
जो रहता है 
मेरे आस -पास ही
महका -महका सा ...

 जब धीमे से गुनगुनाती हूँ 
तुम्हारा नाम
 हवा में घुल कर
 महका जाता है  हवा को ...

कभी -कभी  मुझे ,
खिड़की से झांकती 
रेशमी - मुलायम सी ,
सुबह के  सूरज की
 पहली किरण सा लगता है ...

सर्द रातों में 
गर्म लिहाफ सा 
तुम्हारा नाम मुझे तुमसे भी 
अच्छा लगता है ...

प्यार में इसका चेहरा उसका - इसका नाम उसके नाम में ढल जाता है - और कब  .... पता भी नहीं चलता, प्यार बस प्यार होता है 

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (21)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का २१ वाँ भाग ...



अगर तुमने कभी , नदी को गाते नही
प्रलाप करते हुए देखा हैं
और वहाँ कुछ देर ठहर कर
उस पर गौर किया हैं
तो मैं चाहूंगी तुमसे कभी मिलूं!

अगर तुमने पहाडों के
टूट - टूट कर बिखरने का दृश्य देखा हैं
और उनके आंखों की नमी महसूस की हैं
तो मैं चाहूंगी तुम्हारे पास थोडी देर बैठूं !

अगर तुमने कभी पतझड़ की आवाज़ सुनी हैं
रूदन के दर्द को पहचाना हैं
तो मैं तुम्हे अपना हमदर्द मानते हुए
तुमसे कुछ कहना चाहूंगी!  …… स्व. सरस्वती प्रसाद 

कहते-सुनते हैं कुछ आज की प्रतिभाओं से =


(सुमन)

बारिश  भी ,
बड़ी अजीब होती  है 
    कहीं बूंद-बूंद को 
       मानव तरसे 
           कहीं 
     बाढ़  ले आयी    ...
                   
        कही  बारिश  
साथ ले आयी किसी की 
      यादों  की  सौंधी 
            गंध 
  भावना में बह गये 
       कविता के 
         छंद ...!


(अनु सिंह चौधरी)

मैं अलवर में थी, दो दिनों के एक फील्ड विज़िट के लिए। मैं फील्ड विज़िट के दौरान गांवों में किसी महिला के घर में, किसी महिला छात्रावास में या किसी महिला सहयोगी के घर पर रहना ज़्यादा पसंद करती हूं। वजहें कई हैं। शहर से आने-जाने में वक़्त बचता है और आप अपने काम और प्रोजेक्ट को बेहतर तरीके से समझ पाते हैं - ये एक बात है। दूसरी बड़ी बात है कि आप किसी महिला के घर में और जगहों की अपेक्षा ख़ुद को ज़्यादा सुरक्षित महसूस करते हैं। मेरी उम्र चौतीस साल है और मैं दो बच्चों की मां हूं। बाहर से निडर हूं और कहीं जाने में नहीं डरती। डरती हूं, लेकिन फिर भी निकलती हूं। रात में कई बार अकेले स्टूडियो लौटी हूं। देर रात की ट्रेनें, बसें या फ्लाइट्स ली हैं। कई बार मेरे पास कोई विकल्प नहीं होता, कई बार ख़ुद को याद दिलाना पड़ा है कि डर कर कैसे जीएंगे।

लेकिन यकीन मानिए, अंदर का डर वही है जो छह साल की एक बच्ची के भीतर होता होगा।

ख़ैर, इस बार अलवर में मेरे लिए एक होटल में रुकने का इंतज़ाम किया गया। मैं दिल्ली से अकेली गई थी, एक टैक्सी में। (यूं तो मैं पब्लिक ट्रांसपोर्ट लेने में यकीन करती हूं, लेकिन यहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट में भी 'safety' है?) दिन का काम खत्म करने के बाद बेमन से होटल में चेक-इन किया। मुझे अकेले होटलों में रहने से सख़्त नफ़रत है। फैंसी होटल था - सुना कि अलवर के सबसे बड़े होटलों में से एक। कार्ड लेकर कमरे में गई। पीछे से एक हेल्पर ने आकर मेरा सामान रखा। मैंने दरवाज़ा खोला और दरवाज़े पर ही खड़ी रही, तब तक जब तक वो हेल्पर मेरा सामान और टिप लेकर बाहर नहीं चला गया (मैं कमरे में अंदर किसी अनजान इंसान के साथ खड़ी होने का ख़तरा भी नहीं मोल लेती)। तब तक सहायक कार्ड लेकर उसे जैक में डालकर कमरे की बत्तियां जला चुका था।

अंदर आई। सबसे पहले दरवाज़ा देखा। दरवाज़े में भीतर कोई कुंडी, कोई चिटकनी नहीं थी। लोहे की एक ज़ंजीर थी बस, जिसके ज़रिए आप दरवाज़े को हल्का-सा खोलकर बाहर देख सकते थे। सेफ्टी के नाम पर बस इतना ही। वो ज़ंजीर भी बाहर से खोली जा सकती थी। वैसा दरवाज़ा बाहर से किसी भी डुप्लीकेट कार्ड से खोला जा सकता था।

मैंने रिसेप्शन पर फोन किया। पूछा, "भीतर से दरवाज़ा बंद कैसे होता है?" एक आदमी आया और कमरे में घुसते ही उसने सबसे पहले कार्ड निकाल लिया, "इसी कार्ड से बंद होगा कमरा", उसने कहा और कार्ड निकालकर मोबाइल की रौशनी में दरवाज़ा बंद करने का तरीका बताने लगा। कमरे में घुप्प अंधेरा, मोबाइल की हल्की रौशनी के अलावा। मैं इतनी ज़ोर से डर गई थी कि मुझे पक्का यकीन है, उस आदमी को मेरे मुंह में आ गई जान और मेरी धड़कनें साफ़ सुनाई दे गई होंगी। (विडंबना ये कि मैं अभी-अभी गांव में लड़कियों के स्कूल में सेल्फ-डिफेंस की ज़रूरत पर बक-बक करके आई थी)

मैंने ज़ोर से चिल्लाकर कहा, "लाइट जलाइए आप पहले।"

उसने मुझे घूमकर देखा और कहा, "मैडम मैं तो..."

"मैं समझ गई हूं कि दरवाज़ा कैसे बंद होता है। पुट द डैम थिंग बैक एंड स्विच ऑन द लाईट्स", मैंने चिल्लाकर कहा, उस आदमी को कमरे के बाहर भेजा, रिसेप्शन पर फोन करके उन्हें कमरे में चिटकनियों की ज़रूरत पर भाषण दिया (जो महिला रिसेप्शनिस्ट को समझ में आया हो, इसपर मुझे शक़ है) और फिर दरवाज़ा अंदर से बंद कर दिया। उसके बाद मैंने जो किया वो हर उस कमरे और नई जगह पर करती हूं जहां सोने में मुझे घबड़ाहट होती है। मैंने कमरे के स्टडी टेबल को खींचकर दरवाज़े के पीछे लगाया। फिर उसके ऊपर भारी-भरकम बेडसाईड टेबल रखा। फिर उसके ऊपर अपना सूटकेस रखा।

नहीं, उस रात मुझे नींद नहीं आई थी और वो रात कई उन रातों में से थी जिस रात मुझे अकेले (या अपने बच्चों के साथ अकेले) सफ़र करते हुए नींद नहीं आती। क्यों? मैंने ट्रेन में अपनी बर्थ पर सो रही एक अकेली लड़की के साथ रात में बदतमीज़ी होते देखा है। वो लड़की डर के मारे नहीं चिल्लाई थी। मैं चिल्लाई थी। हर हिंदुस्तानी लड़की की तरह मैंने अपने बचपन में एक भरे-पूरे घर में छोटी बच्चियों तो क्या, बड़ी लड़कियों और छोटे लड़कों के साथ होती गंदी हरकतें देखी हैं जिसे सेक्सुअल अस़ल्ट कहा जाता है। देखा है कि उन्हें कहां-कहां और कैसे छुआ जाता है। ये भी बताती हूं आपको कि इनमें से कई बातें मुझे आजतक किसी को भी बताने की हिम्मत नहीं हुई, मां को भी नहीं और मुझे पक्का यकीन है कि उन लड़कियों ने भी किसी से कहा नहीं होगा। चुप रह गई होंगी। क्यों, वो एक अलग बहस और विमर्श का मुद्दा है। उस दिन भी मैंने गांव के स्कूल की बच्चियों की ज़ुबान में उनके अनुभव सुने थे। आप सुनेंगे तो आपको शर्म आ जाएगी। 

उस दिन मेरा हौसला पूरी तरह पस्त हो गया जिस दिन मेरी साढ़े छह साल की बेटी ने स्कूल ड्रेस पहनते हुए कहा, "मम्मा, स्कर्ट के नीचे साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दो।" "क्यों", मैंने उसे तैयार करते हुए एक किस्म की बेफ़िक्री के साथ पूछा, "आज हॉर्स-राइडिंग है?" "नहीं मम्मा। कुछ भी नहीं है। स्कूल में लड़के नीचे से देखते हैं। सीढ़ी चढ़ते हुए, चेयर पर बैठते हुए। मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता।"

मैं शब्दों में अपना शॉक बयां नहीं कर सकती। मैंने उसे मैम और मम्मा को बताने की दो-चार बेतुकी हिदायतों के बाद साइकलिंग शॉर्ट्स पहना दिया और पूरे दिन परेशान होकर सोचती रही। छह साल की बच्ची को अच्छी और बुरी नज़र का अंदाज़ा लग गया। हम अपनी बेटियों की कैसे समाज में परवरिश कर रहे  हैं! उसे विरासत में क्या सौंप रहे हैं? डर?

आद्या अभी भी पार्क में साइकलिंग शॉर्ट्स में जाती है, या फिर वैसे कपड़ों में जिससे उसकी टांगें ढंकी रहें। यकीन मानिए, मैंने उसे कभी नहीं बताया कि उसे क्या पहनना चाहिए। इस एक घटना ने मुझपर एक बेटे की मां होने के नाते भी ज़िम्मेदारी कई गुणा बढ़ा दी है। मैं रिवर्स जेंडर डिस्क्रिमिनेशन करने लगती हूं कभी-कभी, न चाहते हुए भी। बेटे को संवेदनशील बनाने की ज़िम्मेदारी बहुत बड़ी है। बेटा पालना ज़्यादा मुश्किल है, ज़्यादा बड़ी ज़िम्मेदारी है।

फिर भी 'रेप' या यौन हिंसा को रोकने के लिए ये काफ़ी नहीं है। जब तक छोटे से छोटे यौन अपराधों (ईवटीज़िंग, छेड़छाड़) को लेकर कानून को अमल करने के स्तर पर ज़ीरो टॉलेरेन्स यानी पूर्ण असहिष्णुता का रास्ता अख़्तियार नहीं किया जाएगा, महिलाओं, लड़कियों, बच्चियों के ख़िलाफ़ हिंसा को लेकर बड़े बदलाव की उम्मीद बेकार है। दरअसल, इतना भी काफ़ी नहीं। जब तक ज़्यादा से ज़्यादा लड़कियां और औरतें पब्लिक स्पेस में नहीं आएंगी, डिस्क्रिमिनेशन कम नहीं होगा। समस्या ये है कि एक समाज के तौर पर हम अभी भी लड़कियों और औरतों से घरों में रहने की अपेक्षा करते हैं। सार्वजनिक जगहों पर उनकी संख्या को लेकर हम कितने पूर्वाग्रह लिए चलते हैं, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि मेट्रो में, लोकल ट्रेनों में महिलाओं के नाम के एक ही कोच होते हैं। बाकी जनरल कोचों में गिनी-चुनी महिलाएं। अपने दफ्तरों, बाज़ारों, दुकानों, सड़कों, गलियों में देख लीजिए। क्या अनुपात होता है पुरुष और महिला का? को-एड स्कूलों में? कॉलेजों में? डीटीसी की बसों में महिलाओं के लिए कितनी सीटें आरक्षित होती हैं? शहर की सड़कों पर कितनी महिलाओं को गाड़ी चलाते देखा है आपने? ६६ सालों में सोलह राष्ट्रीय आम चुनाव, लेकिन देश की ४८ फ़ीसदी आबादी के प्रतिनिधित्व के लिए ३३ फ़ीसदी सीटों के आरक्षण को लेकर बहस ख़त्म ही नहीं होती। जो पुरुष औरतों को बराबरी का हक़दार मानते ही नहीं, वे उसे अपमानित, शोषित और पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ेंगे। फिर हमारे यहां तो यूं भी पुरुषों के इस बर्ताव को मर्दानगी समझा जाता है। जब तक मर्दानगी की परिभाषा बदलेगी नहीं, मर्द नहीं बदलेंगे, बराबरी की बात फ़िज़ूल है। हम हर बलात्कार का मातम ही मना सकते हैं बस।    

रह गईं औरतें और लड़कियां तो सदमे में होते हुए भी, अपने डर से लड़ते हुए भी बाहर जाने और काम करने का हौसला रखेंगी ये। हमारे पास चारा क्या है? फिर भी मैं अकेले अनजान जगहों पर सफ़र करने की हिम्मत रखूंगी, चाहे इसके एवज़ में मुझे कमरे को भीतर से कई सारे फर्नीचर लगाकर ही क्यों न बंद करना पड़े। फिर भी मैं मर्दों पर, लड़कों पर भरोसा करती रहूंगी। पूरी ईमानदारी से इस भरोसे को बचाए रखने की कोशिश करूंगी और इसके ख़िलाफ़ उठने वाले हर शक़ का इलाज ढूंढने की कोशिश करूंगी।  मैं फिर भी अपने बच्चों को एहतियात बरतने के साथ-साथ भरोसा करना ही सिखाऊंगी। बेटी नज़र और 'टच' पहचानने ही लगी है। बेटा भी शायद धीरे-धीरे अपनी बहन की ख़ातिर और उसके जैसी कई लड़कियों की ख़ातिर ख़ुद को बदलना सीख जाए, मर्दानगी की परिभाषा बदलना सीख जाए। आमीन! 

(शेखर सुमन)
एक मुसाफिर हूँ, जो तारों को देखता है, चाँद को सहलाता है, आसमान को बांधता है, सुबह की सूरज की किरणों में सुकून महसूस करता है... जिसने तितलियों की आखें पढने की कोशिश की है, जो जागती आखों से सपने देखता है... यहाँ बांटता है अपनी ज़िंदगी के कई अधखुले पन्ने, अनखुले एहसास...

पिछले एक घंटे से न जाने कितनी पोस्ट लिखने की कोशिश करते हुए कई ड्राफ्ट बना चुका हूँ... सारे खयालात स्कैलर बनकर एक दुसरे से भिडंत कर रहे हैं... कई शब्द मुझे छोड़कर हमेशा के लिए कहीं दूर जा चुके हैं, मेरे पास चंद उल-झूलुल लफंगे अक्षरों के सिवा कुछ भी नहीं बचा है ... कई चेहरों की किताबें मुझसे मूंह फेर चुकी हैं... वो अक्सर मेरे बिहैवियर को लेकर शिकायत करते रहते हैं, ऐसे शिकायती लोग मुझे बिलकुल पसंद नहीं है, ऐसा लगता है उनकी शर्तों पर अपनी ज़िन्दगी जीने का कोई एग्रीमेंट किया हो मैंने... बार-बार अपनी कील लेकर मेरी पर्सनल लाईफ पर ठोकते रहते हैं... खैर, ऐसी वाहियात चेहरों की किताबें मैंने भी छत पर रख छोड़ी हैं, धुप-पानी लगते-लगते खुद सड़ कर ख़त्म हो जायेंगी...

लेकिन इस बेवजह के बवंडर में मेरी कलम बेबस होकर आह भरने लगी है.... आज कितने दिनों के बाद खुद के लिखे शब्दों को देखा तो खुद को जैसे कोई सजा देने का मन किया... ना जाने मैं आज कल क्या कर रहा हूँ, कुछ लिखते रहने की आदत छोड़ देना भी मेरे लिए किसी सज़ा से कम नहीं है... मैं आँख बंद कर थोड़ी देर के लिए बैठ जाता हूँ, आस-पास कुछ भी नहीं, कोई भी नहीं जो प्यार से इस सर पर एक हाथ भर फिरा दे ... कभी-कभी किसी का नहीं होना बहुत मिस करता हूँ, हालांकि यूँ अकेले रहने का निर्णय सिर्फ और सिर्फ मेरा है, क्यूंकि मुझे अपने आस-पास मुखौटे लगाए सर्कस के जोकर बिलकुल पसंद नहीं है... लेकिन उनसे बचने की जुगत करते करते ऐसे लोग भी बहुत दूर हो गए हैं जिनसे जुदा रहना मेरे ख्याल में शामिल नहीं था... 

अपने आस-पास सूखी लकड़ियों का ढेर इकठ्ठा करके आग लगा लेना चाहता हूँ, लेकिन वो भी मुमकिन नहीं, उस आग के साथ कई नाजुक डोर भी जल जायेंगी.. अगर मुमकिन हुआ तो इन्हीं रिश्तों की नाजुक डोर पकडे-पकडे ही इस दौर से निकल जाऊँगा...

आज समंदर बहुत याद आ रहा है, उसकी वो उचकती लहरें मुझे ज़िन्दगी से लड़ना सिखा जाती हैं... मैं यहाँ से कहीं दूर चला जाना चाहता हूँ, उसी समंदर के आगोश में... उसकी लहरों से लिपट जाना चाहता हूँ ... मुझे माफ़ करना ए ज़िन्दगी कि मुझे जीने का सुरूर ही नहीं आया...

मुझे पता है तुम ये पढ़ोगी तो ज़रूर सोचोगी ये क्या लिखा है, लेकिन क्या करूँ ...तुम्हारे लिए ही कुछ प्यारा सा लिखने बैठा था लेकिन पिछले दो महीने का मौन लिख बैठा हूँ...

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (20)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का २० वाँ भाग ...


हर आँख यहाँ यूँ तो बहुत रोती है 
हर बूँद मगर अश्क़ नहीं होती है 
पर देख के रो दे जो ज़माने का ग़म 
उस आँख से आंसू जो गिरे मोती है  ... नीरज की ये पंक्तियाँ दर्द से दर्द के रिश्ते की अहमियत बताते हैं,इसी अहमियत का अहम् हिस्सा है कलम और कलम से निःसृत प्रतिभायें  ....


(प्रवीश  दीक्षित "तल्ख़")
मन की ख़ामोशी , तन की ख़ामोशी. ख़ामोशी इच्छाओं की , अरमानो की ख़ामोशी , सच को जान कर उसे न कह पाने की ख़ामोशी , बिन वर्षा प्यासी धरती की ख़ामोशी , बिन जल धारा तडपती नदी की ख़ामोशी , लहरों की हलचल में समुन्दर की ख़ामोशी , अत्याचारी निजाम में घुट घुट जीती आवाम की ख़ामोशी कब टूटेगी चारों और पसरी अविश्वास की ख़ामोशी , कब तोड़ेंगे हम ये ख़ामोशी ..........?

एक वैचारिक अकाल सा मचा है,
इंसानी दिमाग में.
सोच की जमीं दरकने लगी है,
और खयाल मरने लगे हैं !
इंसानी दिमाग में.......

लफ्ज़ आकार बदलने लगे हैं
अब  गालियों की शक्ल में 
अपनों को कोसने लगे हैं 
ये क्या चल रहा है 
इंसानी दिमाग में .....

अदीब अब महज किताबी अदीब हैं 
कातिब हर्फों से जंग करने लगे हैं
सफों के जंगे मैदान में
ये क्या बदल रहा है
इंसानी दिमाग में.....

लफ़्ज़ों के कीचड़ में सराबोर है,
आज हर आम ओ ख़ास ,
मासूम चिलमनों में लग रहे हैं 
अब घिनोने दाग, ये क्या हो रहा है 
इंसानी दिमाग में......

(पल्लवी त्रिवेदी)

कुछ लोग प्रेम रचते हैं ...प्रेम की कानी ऊँगली पकड़कर जीवन की नदी की मंझधार बीच चलते रहते हैं! वो एक ऐसी ही कवियित्री थी! लोग कहते थे , वो प्रेम पर कमाल लिखती थी! वो कहती थी प्रेम उससे कमाल लिखवा लेता है! उसके कैनवास पर प्रेम की विराट पेंटिंग सजी हुई थी! सामने ट्रे में न जाने कितने रंग सजे रहते ..मगर वो केवल प्रेम के रंग में कूची डुबोती और रंग देती सारा आकाश! जब कोई नज़्म उसके दिल से निकलकर कागज़ पे पनाह पाती तो पढने वाले की रूह प्रेम से मालामाल हो जाती!

समय सरकते सरकते उस मुहाने पे जा पहुंचा ,जिसके बाद सिर्फ युद्ध फैला पड़ा था दूर दूर तक! अंतहीन ..ओर छोर रहित युद्ध! लोगों ने नज्में दराजों में बंद कर दीं और नेजे ,भाले और तलवारें अपने कंधों पे सजा लिए! प्रेम का रंग छिटक कर न जाने कहाँ दूर जा गिरा था! क्रान्ति के शोर में मुहब्बत की बारीक सी मुरकी खामोश हो गयी! वीरों का हौसला बढाने कवियों ने क्रान्ति पर कलम चलानी शुरू कर दी! चारों और वीर रस की धार बह चली!

मगर वो अभी भी प्रेम रच रही थी! सिर्फ और सिर्फ प्रेम! अब उसकी नज्में कोई न पढता! मगर वो अपने पागलपन में डूबी कागजों पे मुहब्बत उलीचती जा रही थी! लोगों ने समझाया . " समय की मांग है कि अब तुम जोश भरी नज्में लिखो! " वो सर ऊपर उठाकर देखती और प्रेम की एक बूँद कागज़ पर गिरा देती! जब लोग उसे धिक्कार कर चले जाते तो वो अपनी ताज़ा लिखी नज़्म से कहती " वक्त के इस दौर को तुम्हारी सबसे ज्यादा ज़रूरत है "

न जाने कितने लोग मरे ...कितनों के घर काले विलाप से रंग गए! सैनिक दिन भर युद्ध करते और स्याह रातों में अपनी माशूकाओं के आये ख़त सीने पर रखकर सो जाते! उन रातों को वीर रस की नहीं सिर्फ प्रेम के रस की दरकार होती!

वक्त गवाह है .... उस कवियित्री की नज्मों ने सिर्फ जगह बदली थी! जो नज्में कभी उन सैनिकों ने अपनी माशूकाओं को अपने चुम्बनों में लपेटकर सौंपी थीं ,अब वे नज्में सैनिकों की माशूकाएं ख़त में लपेटकर पहुंचा रही थीं! प्रेम रुका नहीं था, मरा नहीं था और कहीं खोया भी नहीं था ...लगातार बह रहा था और सैनिकों के लहू से तपते जिस्मों पर ताज़ी ओस की बूंदों की तरह बरस रहा था!

सुन रहे हो ओ प्रेम ... " जब सबसे भयानक और सबसे बुरा दौर होता है तब तुम्हारी ज़रूरत भी सबसे ज्यादा होती है "

अब जो रचना मैं पेश कर रही हूँ वह 2013 का अवलोकन नहीं,क्योंकि 2011 तक ही यह ब्लॉग लिखा गया है  .... पर इस प्रतिभा के आँगन से मैं लौट आऊँ - मुमकिन नहीं  ....
आप खुद ही देख लें मुमकिन है क्या !

(प्रत्यक्षा)

किसी दिन 
अभी सोचते किसी दिन
आयेगा कभी ? 
जब सूरज लाल होगा 
और आत्मा दीप्त 
जब नदी बहेगी 
शरीर होगा मीठा तरल
शब्द संगीत होगा 
धूप होगी 
रात भी
तीन तरह के रंग होंगे
किसी के चेहरे पर आयेगा
बेतरह प्यार
उसके जाने बिना
जानना होगा 
कि अब भी 
खिलता है एहसास
जबकि लगता था 
इतनी हिंसा 
इतनी बेईंसाफी 
इतना घाव
इतने दंश 
सोख कर 
भूल जाती आत्मा
ओह ज़रूर भूल जाती होगी 
आत्मा अपनी आत्मा

कहते हैं हाथी
स्मृति की छाप
ढोते हैं पीढ़ियों तक
और कबूतर उड़ते हैं
हज़ारों मील
चीटिंयाँ अपना बिल
सफेद बगुले अपने आसमान
कोई कछुआ तालाब
मैं बचपन की काटी पीटी किताब

माँ कहती हैं ऐसे शब्द
जिन्हें भूल गई थी मैं
जैसे भूल गई थी धूप में बैठकर
मूँगफली नहीं चिनिया बदाम खाना
जैसे भूल गई थी रिबन
और टॉर्टाय्ज़ शेल वाले चश्मे
जैसे ये भी कि पहली दफा कब सुना था
पंडित भीमसेन जोशी को
"कंचन सिंहासन"
और अब खोजने पर भी नहीं मिलता यू ट्यूब पर
जैसे लम्बे बाल कैसे बहन ने हँसते काट डाले थे 
जान गई थी मेरे कहे बिना कि
मुझसे ऐसे झमेले सधते नहीं
जैसे जानती थी ये भी बिना
मेरे कहे कि चूड़ियाँ अच्छी लगती थीं
और पढ़ सकती थी रात भर
मैं किताब जाड़े के दिनों में
रज़ाई के भीतर टॉर्च जलाये
और रह सकती थी भूखी , पूरे दिन
माँ से नाराज़ होने पर
लड़ सकती थी किसी के लिये भी
महीनों साल दिन
कि गुस्सा सुलगता था मेरे भीतर आग

अब कहती है बहन , तुम्हें पहचानना मुश्किल
जब कहती हूँ मैं , मेरे भीतर सुकून
जब कहती हूँ मैं , शब्द मेरे भीतर जलते भाप के कुंड
जब कहती हूँ रिश्तेदारों के धोखे अब दिखते नहीं
जब कहती हूँ कोई पंछी चक्कर काटता उठता है
लगातार भीतर
जब पूरी नहीं होती कविता और
अधूरी छूटी रहती कहानी
लावारिस पड़ा रहता घर
और छूटते बिसूरते बच्चे होते
खुद में मगन
पढ़ा जाता प्रेम
और पकाई जाती नफरत
सीखा जाता अर्शिया से बँगाली कशीदाकारी
की महीन हर्फें
और हुआ जाता खुश
तुम्हारी हँसी के गुनगुने घूँट में
और समझाया जाता दोस्तों को
एक बार फिर
मोहब्बत में पड़ने को
और बोला जाता ज़ोर से
ऐसे शब्द जो होंठों और जीभ पर
छोड़ते भाप
गर्म गुलाब जामुन
तहज़ीबदार , तमीज़दार
हँसा जाता ठठाकर बेशउर
फिर रोकी जाती हँसी
कि बुरा ना माने कोई
कि मेरी खुशी दूसरों के
तकलीफ का सबब न बने
कि
किसी दिन
होगा सब
जैसे
होना
लिखा है
किसी दिन
किसी एक दिन

जैसे पृथ्वी
जैसे पक्षी
जैसे देव
और दानव
अच्छा और बुरा
जैसे प्राणी सिमटा
एक बिंदु
मृत्यु
फिर जीवन
और इसके बीच का
मोहक लम्बा अंतराल

अब और क्या कहूँ - अब तो जो कहेंगे पाठक कहेंगे :)

बुधवार, 27 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (19)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १९ वाँ भाग ...


यह माया का देश सनेही 
इस जग का विश्वास नहीं 
इस मरीचिका के मरुवन में 
मिटी किसी की प्यास नहीं  … आरसी प्रसाद 

प्रतिभायें आती रही हैं,आती रहेंगी - प्यास जितनी बढे,जीवन की खोज उतनी दुगुनी ! लेखन प्रतिभाओं के हर घूँट में एक नशा है, कह सकते हो इसे तुम एहसासों की मधुशाला  …। 


(प्रबोध कुमार गोविल)

यादों की  फितरत  बहुत अजीब है। किसी को यादें उल्लास से भर देती हैं।  किसी को ये दुःख में डुबो भी देती हैं। आखिर यादें हैं क्या?
हमारे मस्तिष्क के स्क्रीन पर, हमारे मन में बैठा ऑपरेटर किसी ऐसी फ़िल्म को, जिसमें हम भी अभिनेता या दर्शक थे, "बैक डेट" से इस तरह चला देता है कि इस दोबारा शुरू हुए बॉक्स ऑफिस कलेक्शन को हम दोनों हाथों से समेटने लग जाते हैं।  ये बात अलग है कि इस आमदनी में हमें कभी खोटे सिक्के हाथ आते हैं और कभी नकली नोट। फिर हम मन मसोस कर रह जाते हैं, और हमें इस सत्य का अहसास होता है कि एक टिकट से दो बार फ़िल्म नहीं देखी जा सकती।
आइये, यादों की कुछ विशेषताएं और जानें- 
१. उन व्यक्तियों से सम्बंधित यादें हमारे ज़ेहन में ज्यादा अवतरित होती हैं, जिन्हें हम दिल से पसंद करते हैं, अथवा जिनसे हम ज्यादा भयभीत होते हैं।
२. यादें हमारे चेहरे पर ज्यादा उम्रदराज़ होने का भाव लाती हैं, क्योंकि हम "जिए" हुए को दुबारा जीने की छद्म   चालाकी जो करते हैं। एक जीवन में किसी क्षण को दो बार या बार- बार जीने की  सुविधा मुफ्त में थोड़े ही मिलेगी।
३. जब हम किसी को याद करते हैं, तो सृष्टि अपने बूते भर हलचल उस व्यक्ति के इर्द-गिर्द मचाने की  कोशिश ज़रूर करती है, जिसे हम याद कर रहे हैं। 
४. हम यादों के द्वारा उस बात या व्यक्ति के प्रति अपना लगाव बढ़ाते हुए प्रतीत होते हैं, जिसे हम  याद कर रहे हैं, पर वास्तव में हम  लगाव कम कर रहे होते हैं।  
५.किसी बात या व्यक्ति को बार-बार याद करके हम  अपने दिल के रिकॉर्डिंग सिस्टम को खराब कर लेते हैं।
 ६.गुज़रे समय को फिर खंगालना हमारी अपने प्रति क्रूरता है। इस से बचने की  कोशिश होनी चाहिए। 


(प्रवीण)
मित्र मुझे ईश्वर द्रोही, धर्म विरोधी,आदि न जाने क्या क्या कहते हैं, जबकि मैं केवल कुतर्क, अतार्किकता व अवैज्ञानिकता का विरोधी हूँ, अगर आप तार्किक या समझ आने वाली बात कह रहे हैं, मैं भी आपके साथ हूँ, पर, यदि आप अतार्किक बात कह रहे हैं या ऐसा कुछ कह रहे हैं जिसका कोई अर्थ ही नहीं निकलता (जब आप कुतर्क कर रहे हों, अवैज्ञानिक या अतार्किक बातें कह रहे हों तो आपकी बातों से अर्थ नहीं निकलेगा, यह निश्चित है!)तो जहाँ तक मुझसे बन पढ़ेगा मैं आपका विरोध करूँगा,मेरे इस कृत्य के लिये आप मुझे कुछ भी कह सकते हैं। मैं अपने इर्दगिर्द घट रहे मसलों,हालातों व किरदारों पर अपना नजरिया यहाँ लिखता हूँ पर मैं कभी भी अपने ही सही होने का कोई दावा नहीं करता, मैं सही हो भी सकता हूँ और नहीं भी, कभी मैं सही होते हुए भी गलत हो सकता हूँ और कभी गलत होते हुए सही भी, कभी पूरा का पूरा सही भी हो सकता हूँ और कभी पूरा का पूरा गलत भी, कभी आधा अधूरा सही होउंगा तो कभी आधा अधूरा गलत भी, यह सब आपके नजरिये के ऊपर भी निर्भर करता है, पर एक बात जो निश्चित रहेगी वह यह है कि मैं पूरी ईमानदारी से वही लिखूँगा जो मैं सोचता हूँ, पोलिटिकल करेक्टनेस और दुनियादारी कम से कम मेरी ब्लॉगिंग के लिये वजूद नहीं रखते। काम चलाने लायक शिक्षा मैंने भी ली है, बाकी कुछ खास नहीं है अपने बारे में लिखने को...


मैं 
मस्त हूँ 
खुश 
और 
संतुष्ट भी
अपने 
मैं
ही 
रहने में


मैं
कभी
ख्यालों में
तक नहीं
होना चाहता
तुम 
या 
किसी 
और सा 


मैं
जो 
मैं 
बना
खुद ही
मेरा
मैं 
बनना
मेरा ही
जागृत 
निर्णय था 

मैं
ही हूँ 
जिम्मेदार
अपने
मैं 
होने का
और
इस कारण हुई 
हर जीत
और
हरेक हार का 


मैं
नहीं चाहता
दौड़ना
तुम्हारे
या 
तुम जैसे
कई औरों के
साथ
किसी भी
दौड़ में


मैं
दौड़ता हूँ
खुद के साथ 
स्वयं
चुनकर 
अपनी दौड़
दौड़
का समय 
और
दौड़ने का
मैदान भी


मैं
हमेशा 
खुद को
नापता हूँ
खुद की ही
नजरों से
अपने
ही 
पैमानों पर


मैं
मानता हूँ
कि
तुम्हारे 
या किसी और
के पास
मुझे नापने
का पैमाना
और 
नजर नहीं


मैं
अपने
मैं बनने 
के लिये
अपने 
परिवार
के सिवा 
किसी का
कृतज्ञ या
कर्जदार नहीं


मैं
मानता हूँ
कि मेरा
मैं 
रहना
नहीं जुड़ा
किसी के
भी स्वीकार 
या
अस्वीकार से


मैं
मैं ही रहूँगा
तुम्हारे
मुझ को
कुछ कुछ
या 
बहुत कुछ 
कहने के
बाद भी 


मैं
जानता हूँ
कि 
फिर भी
तुम
आँकोगे मुझे
लगाओगे 
अनुमान
मेरी हैसियत
और वजूद का 


मैं
हमेशा की
तरह ही
कर दूँगा
दरकिनार
तुम्हारी
इस 
अनधिकार
चेष्टा को


मैं
मैं
ही रहूँगा
पर यह
पूछंगा जरूर
कि क्या
तुम्हें वाकई
यकीन था
कि मेरे
मैं 
ही रहने
के अलावा
कोई दूसरा 
परिणाम 
संभव था ?

(अरुण चन्द्र रॉय )

1. 
मृत्यु 
स्वयं मोक्ष है 
वह गंगा तट पर हो 
या हो 
किसी स्टेशन प्लेटफार्म पर 


भगदड़ में 
अनगिनत पैरों के नीचे 
कुचलकर 
मिलता है मोक्ष 
अवाम को 

2.
मोक्ष की चिंता 
उन्हें नहीं होती 
जिनके लिए 
खाली होते हैं 
रास्ते/प्लेटफार्म/हवाई अड्डे/गंगा का घाट भी 

3.
मोक्ष के लिए 
जरुरी है करना 
पाप
जितना अधिक पाप 
मोक्ष का आडम्बर उतना ही अधिक 

4.
मोक्ष का 
होता है उत्सव 
पूर्व नियोजित 
सुनियोजित 

5.
मोक्ष भी 
एक किस्म का 
बाज़ार ही 
हम सब 
उसके ग्राहक 

मंगलवार, 26 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं (18)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -


अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १८ वाँ भाग ...



पन्ने,प्रकृति,आकाश,  …… कलम के बगैर भी प्रतिभायें अपनी दिशा बना लेती हैं  . शब्द तो निश्चेष्ट आँखों से,सीले होठों से,घुटी घुटी आवाज़ों से,खो गई आवाज़ से भी निकलते हैं - एक स्पर्श महसूस कर लो,तो कई ग्रन्थ लिख जाते हैं - 
बस उन्हें ढूंढते जाओ,बहुत बड़ा है ये दुनिया का मेला  ....... कोई है,जो खींच लेता है अपनी तरफ !


किशोर कुमार खोरेन्द्र  
http://facebook.com/kishor.khorendra
"मन की किताब"

पुल से तुम्हारे घर तक
पहुंची ..सड़क पर मैं 
कभी नही चला हूँ 
पुल तक आकर ...
लौटते हुए मै ...
तुम्हें देखे बिना ....ही ...
यह मान लिया करता हूँ 
कि -
मैंने तुम्हें देख लिया है

मुझे लेकिन हर बार -
यही लगता है की -
बंद खिडकियों के पीछे ...
खड़ी हुई तुम -
हर प्रात:
हर शाम
उगते और डूबते हुए .....सूरज की तरह ..मुझे
जरूर देखती रही हो

सड़क के किनारे खड़े वृक्ष भी
अब
मुझे पहचानने लगे है
पत्तियाँ मेरे मन की किताब मे लिखी जा रही
कविताओ कों पढ़ ही लेती है

पुल पर बिछी सड़क कों
मेरी सादगी और भोलेपन से प्यार हो गया है
मेरे घर की मेज पर -जलता हुआ लैम्प
मुझसे पूछता है ..
क्या तुम्हारी कविता कभी समाप्त नही होगी ...?

मेरा चश्मा ...मेरी आँखों मे भर आये आंसूओ कों
छूना चाहता है
पर उसके पास भी हाथ नही है
काश तुम्हारी आँखों की रोशनी के हाथ लम्बे होते
और तुम मुझे छू पाती ......



अमरेन्द्र शुक्ला  

आज ,
बहुत दिनों के बाद ,
तुमसे बात करने को जी चाहा
तो सोचा पूछ लू तुमसे, की ,
तुम कैसे हो, 
कुछ याद भी है तुम्हे 
या सब भूल गए -----
वैसे, 
तुम्हारी बातें मुझे
भूलती नहीं, 
नहीं भूलते मुझे तुम्हारे वो अहसास 
जो कभी सिर्फ मेरे लिये थे 
नहीं भूलते तुम्हारे "वो शब्द" 
जो कभी तुमने मेरे लिए गढ़े थे ----

तुम्हे जानकार आश्चर्य होगा 
पर ये भी उतना ही सत्य है 
जितना की तुम्हारा प्रेम, 
की , 
"अब शब्द भी बूढ़े होने लगे है" 
उनमे भी अब अहम आ गया है 
तभी तो, 
इस सांझ की बेला में,
जब मुझे तुम्हारी रौशनी चाहिए 
वो भी निस्तेज से हो गए है 
मैं कितनी भी कोशिश करू
तुम्हारे साथ की वो चांदनी रातें, वो जुम्बिश, वो मुलाकातें 
जिनमे सिर्फ और सिर्फ हम तुम थे 
उन पलो को महसूस करने की 
पर इनमे अब वो बात नहो होती,

कही ये इन शब्दों की कोई चाल तो नहीं, 
या 
ये इन्हें ये अहसास हो चला है 
की इनके न होने से,हमारे बीच
एक मौन धारण हो जायेगा 
और हम रह जायेंगे एक भित्त मात्र,
क्यूंकि अक्सर खामोशियाँ मजबूत से मजबूत रिश्तों में भी, 
दरारे दाल देती है .....

तो मैं तुम्हे और तुम इन्हें (शब्दों को) बता दो 
मैं कभी भी तुम्हारी या तुम्हारे शब्दों की मोहताज न रही 
हमेशा से ही मेरी खामोशियाँ गुनगुनाती रही 
चाहे वो तुम्हारे साथ हो या तुम्हारे बगैर 
जानते हो क्यूँ , क्यूंकि , 
"शब्दहीन संवाद, शब्दीय संवाद से हमेशा ही मुखर रहा है"


विभा श्रीवास्तव  http://facebook.com/vrani.shrivastava

काश !
मैं एक विशाल वृक्ष और 
छोटे-छोटे पौधे ही होती ....

एक विशाल वृक्ष ही होती जो मैं ....
मेरी शाखाओं-टहनियों पर 
पक्षियों का बैठना - फुदकना 
मेरे पत्तों में छिपकर
उनका आपस में चोंच लड़ाना ,
उनकी चह-चहाहट - कलरव को सुनना , 
उनका ,शाखाओं-टहनियों पर ,पत्तों में घर बनाना ,
गिलहरी का पूछ उठाकर दौड़ना-उछलना मटकना , 
मेरी छाया में थके मनुष्य ,
बड़े जीव जंतुओं का आकर बैठना 
उनको सुकून मिलना , 
सबको सुकून में और खुश देख कर 
मेरी खुशी को भी पंख लग जाते ....
मेरे शरीर से निकली आक्सीजन की 
स्वच्छ वायु जीवन को सुकून देते , 

छोटे-छोटे पौधे ही होती जो मैं ....
मेरे फूलो से निकले खुसबु , 
वातावरण को सुगन्धमय बनाती ....
मेरे पत्तों-बीजों से 
औषधि बनते
सबको नवजीवन मिलते 
कितनी खुश होती मैं ...........
मुझे बयाँ करना मुश्किल है ......

लेकिन एक नारी औरत स्त्री हूँ मैं
जुझारू और जीवट
जोश और संकल्पों से लैस मैं
सामाजिक-राजनीतिक चादर की गठरी में कैद मैं

सामाजिक ढाँचे में छटपटातीं-कसमसातीं मैं 
नए रिश्तों की जकड़न-उलझन में पड़ कर 
पर पुराने रिश्तों को भी निभाकर 
हरदम जीती-चलती-मरती हूँ मैं
रिश्तों में जीना और मरना काम है मेरा ....
ऐसे ही रहती आई हूँ मैं 
ऐसे ही रहना है मुझे ?

उलझी रहती हूँ उनसुलझे सवालों में मैं
जकड़ी रहती हूँ मर्यादा की बेड़ियों में मैं
जीतने हो सकते हैं बदनामी का ठिकरा 
हमेशा लगातार फोड़ा जाता है मुझ पर
उलझी रहती हूँ मैं
लेकिन 
हँसते-हँसते सब बुझते -सहते 
हो जाती हूँ कुर्बान मैं 

कब-कब , क्यूँ-क्यूँ , कहाँ-कहाँ , कैसे-कैसे
छली , कुचली , मसली और तली गई हूँ मैं 
मन की अथाह गहराइयों में 
दर्द के समुद्री शैवाल छुपाए मैं 
शोषित, पीड़ित और व्यथित मैं 
मन, कर्म और वचन से प्रताड़ित मैं

मानसिक-भावनात्मक और 
सामाजिक-असामाजिक 
कुरीतियों-विकृतियों की शिकार मैं
लड़ती हूँ पुराने रीति-रिवाजों से मैं 
करती हूँ अपने बच्चों को सुरक्षित मैं
अंधविश्वासों की आँधी से 
खुद रहती हूँ हरदम अभावों में मैं
पर देती हूँ सबको अभयदान मैं 

अभाव ? शब्दों अमीरी,दुआओं की अमीरी - अभाव कैसा !!!

=======================================


  ५ साल पहले आज ही के दिन मुंबई घायल हुई थी ... वो घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे है ... 



केवल सैनिक ही नहीं ... हर एक इंसान जिस ने उस दिन ... 'शैतान' का सामना किया था ... नमन उन सब को !
============

जाते जाते एक वीडियो आप सब की नज़र है ...

============

जय हिन्द !! 

सोमवार, 25 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (17)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -

अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १७ वाँ भाग ...


जितनी आसानी से कोई कहानी कही जाती है
उतने आसान न रास्ते होते हैं
न मन की स्थिति ...
अंत एक दर्शन है
जीवन की साँसों का
रिश्तों का
विश्वास का, प्यार का ...........
एक अद्भुत रहस्य अंत से आरम्भ होता है
अद्वैत के प्रस्फुटित मंत्रोचार में
जो सूर्योदय की प्रत्येक किरण की परिक्रमा में है
और ख़त्म नहीं होती  … 

ख्याबो को बना कर मंजिल ...बातो से सफर तय करती हूँ ..अपनों में खुद को ढूंढती हूँ ....
खुद की तलाश करती हूँ ... .. बहुत सफर तय किया ...अभी मंजिल तक जाना हैं बाकि...
जब वो मिल जाएगी तो ...विराम की सोचेंगे 
(अंजु (अनु ) चौधरी)

कब और कैसे,
एक लम्बा सा मौन 
पसर चुका है हम दोनों के बीच 
ये मौन बहुत शोर करता है
और कर देता है बेचैन इस मन को 
तुम्हारी सोच की संकरी गली से 
गुज़रने के बाद 
मैं देर तक खुद के अन्धकार में 
भटकती हूँ 
और सोचती हूँ,ये मौन कहाँ से आता है ?

कब और कैसे,
कभी ना खत्म होने वाला 
तेरे और मेरे बीच 
बातों और विवादों का ऐसा मकड जाल 
जो अब टकराव की सीमा तक 
आ कर थम गया है,
और मैं ये भी जानती हूँ 
जिस दिन ये टकराव हुआ 
उस दिन हम दोनों की दिशाएँ
बदल जाएँगी 
तुम  दूर चले जाओगे और बसा लोगे 
अपनी एक नयी दुनिया 
क्यों कि मैं जानती हूँ कि 
खुद के जीवन में
पथराए आँचल से,
पर्वतों के शिखर तक मौन उड़ते है 
जिस से इस जीवन में    
उग आती हैं वीरानियाँ इतनी 
जिसे जितना काटो, वो ओर  
फैलने लगती है,नागफणी सी 
क्योंकि  
ये जिंदगी की धूप भी 
अजीब होती है, नहीं चाहिए तभी 
करीब होती है और 
रात की चांदनी में जब भी 
सोना चाहो 
वो तब ओर भी कोसो दूर 
महसूस होती है
इस लिए तो,
कब  और कैसे,
मैं,खुद को धकेल कर अलग करती हूँ,
और देर तक खुद के अन्धकार में 
भटकती हूँ 
और सोचती हूँ,
कब और कैसे,
ये मौन कहाँ से आता है ?


--ख्यालों की बेलगाम उड़ान...कभी लेख, कभी विचार, कभी वार्तालाप और कभी कविता के माध्यम से......
हाथ में लेकर कलम मैं हालेदिल कहता गया
काव्य का निर्झर उमड़ता आप ही बहता गया.
(समीर लाल की उड़न तश्तरी... जबलपुर से कनाडा तक...सरर्रर्रर्र...)

एक अंगारा उठाया था कर्तव्यों का
जलती हुई जिन्दगी की आग से,
हथेली में रख फोड़ा उसे
फिर बिखेर दिया जमीन पर...
अपनी ही राह में, जिस पर चलना था मुझे
टुकड़े टुकड़े दहकती साँसों के साथ और
जल उठी पूरी धरा इन पैरों के तले...
चलता रहा मैं जुनूनी आवाज़ लगाता
या हुसैन या अली की!!!
ज्यूँ कि उठाया हो ताजिया मर्यादाओं का
पीटता मैं अपनी छाती मगर
तलवे अहसासते उस जलन में गुदगुदी
तेरी नियामतों की,
आँख मुस्कराने के लिए बहा देती
दो बूँद आँसूं..
ले लो तुम उन्हें
चरणामृत समझ
अँजुरी में अपनी
और उतार लो कंठ से
कह उठूँ मैं तुम्हें
हे नीलकंठ मेरे!!
-सोच है इस बार
कि अब ये प्रीत अमर हो जाये मेरी!!


आम आदमी होने का सुख 
**************************
जीवन के कंटीले जंगलों से तिनका तिनका सुख 
बटोरने में ना जाने कितनी बार उंगलियों से खून 
रिसा है,संघर्ष से तलाशे गये इन सुखों को जी भर
के देख भी नहीं पाये थे कि अपनेपन को जीवित 
रखने के लिये इन सुखों को अपनों में बांटना पड़ा 
आदमी के भीतर पल रहे पारदर्शी आदमी का यही
सच है,और आम आदमी होने का सुख भी--------
दौर पतझर का सही---उम्मीद तो हरी है----------- 
(ज्योति खरे)

 माँ 
                                जब तुम याद करती हो
                                मुझे हिचकी आती है
                                पीठ पर लदा
                                जीत का सामान
                                हिल जाता है----

                                 विजय पथ पर
                                 चलने में
                                 तकलीफ होती है----
                                 
                                 माँ
                                 मैं बहुत जल्दी आऊंगा
                                 तब खिलाना
                                 दूध भात
                                 पहना देना गेंदे की माला
                                 पर रोना नहीं
                                 क्योंकि
                                 तुम बहुत रोती हो                   
                                 सुख में भी
                                 दुःख में भी-------

रविवार, 24 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (16)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -

अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १६ वाँ भाग ...


प्रभु को आगाह किया है
एक नहीं - कई बार,हर बार -
' जब तक शून्य का भय ख़त्म नहीं होता
तुम दिए की मानिंद अखंड जागते रहोगे
ठीक उसी तरह
जिस तरह ख़्वाबों को हकीकत बनाने में
तुम निरंतर जागते रहे हो ....
मुझे थकान न हो इस खातिर
अपनी हथेली का सिरहाना मुझे दिया है
.... तो आज हकीकत के लिए जागना होगा
अपनी हथेली पर
मेरी हकीकत को सुलाना होगा ' . … 

हकीकत की ठोस चट्टानें प्रश्नों के अमर बेल से भरी होती हैं, - उत्तर परिस्थितिजन्य,परिवेशीय होते हैं ! अपने उत्तर के बीज हम दूसरों की जमीं पर नहीं लगा सकते,सिंचन की कुछ बूंदें बना सकते हैं - 
प्रतिभायें एक सी नहीं होतीं,कहीं चूल्हे की आग,कहीं जंगल की,कहीं धुँआ,कहीं छोटी सी चिंगारी - समझना एक सा कहाँ !समझ एक सी कहाँ !!!


(वंदना गुप्ता)

एक गृहणी हूँ। मुझे पढ़ने-लिखने का शौक है तथा झूठ से मुझे सख्त नफरत है। मैं जो भी महसूस करती हूँ, निर्भयता से उसे लिखती हूँ। अपनी प्रशंसा करना मुझे आता नही इसलिए मुझे अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। मेरा ब्लॉग पढ़कर आप नि:संकोच मेरी त्रुटियों को अवश्य बताएँ। मैं विश्वास दिलाती हूँ कि हरेक ब्लॉगर मित्र के अच्छे स्रजन की अवश्य सराहना करूँगी। ज़ाल-जगतरूपी महासागर की मैं तो मात्र एक अकिंचन बून्द हूँ। 

आज  फिर अंतस में एक प्रश्न कुलबुलाया है 
आज फिर एक और प्रश्नचिन्ह ने आकार पाया है 
यूं तो ज़िन्दगी एक महाभारत ही है 
सबकी अपनी अपनी 
लड़ना भी है और जीना भी सभी को 
और उसके लिए तुमने एक आदर्श बनाया 
एक रास्ता दिखाया 
ताकि आने वाली  पीढियां दिग्भ्रमित न हों 
और हम सब तुम्हारी  दिखाई राह का 
अन्धानुकरण करते रहे 
बिना सोचे विचारे 
बिना तुम्हारे कहे पर शोध किये 
बस चल पड़े अंधे फ़क़ीर की तरह 
मगर आज तुम्हारे कहे ने ही भरमाया है 
तभी इस प्रश्न ने सिर उठाया है 

महाभारत में जब 
अश्वत्थामा द्वारा 
द्रौपदी के पांचो पुत्रों का वध किया जाता है 
और अर्जुन द्वारा अश्वत्थामा को 
द्रौपदी के समक्ष लाया जाता है 
तब द्रौपदी द्वारा उसे छोड़ने को कहा जाता है 
और बड़े भाई भीम द्वारा उसे मारने को कहा जाता है 
ऐसे में अर्जुन पशोपेश में पड़ जाते हैं 
तब तुम्हारी और ही निहारते हैं 
सुना है जब कहीं समस्या का समाधान ना मिले 
तो तुम्हारे दरबार में दरख्वास्त लगानी  चाहिए 
समाधान मिल जायेगा 
वैसा ही तो अर्जुन ने किया 
और तुमने ये उत्तर दिया 
कि अर्जुन :
"आततायी को कभी छोड़ना नहीं चाहिए 
और ब्राह्मण को कभी मरना नहीं चाहिए 
ये दोनों वाक्य मैंने वेद में कहे हैं 
अब जो तू उचित समझे कर ले "
और अश्वत्थामा में ये दोनों ही थे 
वो आततायी भी था और ब्राह्मण भी 
उसका सही अर्थ अर्जुन ने लगा लिया था 
तुम्हारे कहे गूढ़ अर्थ को समझ लिया था 

मेरे प्रश्न ने यहीं से सिर उठाया है 
क्या ये बात प्रभु तुम पर लागू नहीं होती 
सुना  है तुम जब मानव रूप रखकर आये 
तो हर मर्यादा का पालन किया 
खास तौर से रामावतार में 
सभी आपके सम्मुख नतमस्तक हो जाते है 
मगर मेरा प्रश्न आपकी इसी मर्यादा से है 
क्या अपनी बारी में आप अपने वेद में कहे शब्द भूल गए थे 
जो आपने रावण का वध किया 
क्योंकि 
वो आततायी भी था और ब्राह्मण भी 
क्या उस वक्त ये नियम तुम पर लागू नहीं होता था 
या वेद  में जो कहा वो निरर्थक था 
या वेद में जो कहा गया है वो सिर्फ आम मानव के लिए ही कहा गया है 
और तुम भगवान् हो 
तुम पर कोई नियम लागू नही होता 
गर ऐसा है तो 
फिर क्यों भगवान् से पहले आम मानव बनने का स्वांग रचा 
और अपनी गर्भवती पत्नी सीता का त्याग किया 
गर तुम पर नियम लागू नहीं होते वेद के 
तो भगवान बनकर ही रहना था 
और ये नहीं कहना था 
राम का चरित्र अनुकरणीय होता है 
क्या वेदों की मर्यादा सिर्फ एक काल(द्वापर) के लिए ही थी 
जबकि मैंने तो सुना है 
वेद साक्षात् तुम्हारा ही स्वरुप हैं 
जो हर काल में शाश्वत हैं 
अब बताओ तुम्हारी किस बात का विश्वास करें 
जो तुमने वेद में कही या जो तुमने करके दिखाया उस पर 
तुम्हारे दिखाए शब्दों के जाल में ही उलझ गयी हूँ 
और इस प्रश्न पर अटक गयी हूँ 
आखिर हमारा मानव होना दोष है या तुम्हारे कहे पर विश्वास करना या तुम्हारी दिखाई राह पर चलना 
क्योंकि 
दोनों ही काल में तुम उपस्थित थे 
फिर चाहे त्रेता हो या द्वापर 
और शब्द भी तुम्हारे ही थे 
फिर उसके पालन में फ़र्क क्यों हुआ ? 
या समरथ को नही दोष गोसाईं कहकर छूट्ना चाहते हो 
तो वहाँ भी बात नहीं बनती 
क्योंकि 
अर्जुन भी समर्थ था और तुम भी 
गर तुम्हें दोष नहीं लगता तो अर्जुन को कैसे लग सकता था 
या उससे पहले ब्राह्मण का महाभारत में कत्ल नहीं हुआ था 
द्रोण भी तो ब्राह्मण ही थे ?
और अश्वत्थामा द्रोणपुत्र ही थे 
आज तुम्हारा रचाया महाभारत ही 
मेरे मन में महाभारत मचाये है 
और तुम पर ऊँगली उठाये है 
ये कैसा तुम्हारा न्याय है ?
ये कैसी तुम्हारी मर्यादा है ?
ये कैसी तुम्हारी दोगली नीतियाँ हैं ?

संशय का बाण प्रत्यंचा पर चढ़ तुम्हारी दिशा की तरफ ही संधान हेतु आतुर है 
अब हो कोई काट , कोई ब्रह्मास्त्र या कोई उत्तर तो देना जरूर 
मुझे इंतज़ार रहेगा 
ओ वक्त के साथ या कहूँ अपने लिए नियम बदलते प्रभु…………… एक जटिल प्रश्न उत्तर की चाह में तुम्हारी बाट जोहता है


उत्तम पुरुष: मैं उससे कह रहा था


(विमलेन्दु द्विवेदी)


मैं पृथ्वी की एक घनी बस्ती का
वीरान हूँ
जिसे ठीक ठीक देखने के लिए
आपको पर्यटक बनना पड़ेगा....)

मैं उससे कह रहा था
कि तुम्हें नींद न आती हो
तो मेंरी नींद में सो जाओ
और मैं
तुम्हारे सपने में जागता रहूँगा ।

असल में
यह एक ऐसा वक्त था
जब बहुत भावुक हुआ जा सकता था
उसके प्रेम में ।

और यही वक्त होता है
जब खो देना पड़ता है
किसी स्त्री को ।

यह बात तब समझ में आयी
जब मुझ तक
तुम्हारी गंध भी नहीं पहुँचती है
और भावुक होने का
समय भी बीत चुका है ।

एक दिन देखता हूँ
कि सपने
व्यतीत हो गये हैं
मेरी नींद से ।

सपने न देखना
जीवन के प्रति अपराध होता है
कि हर सच
पहले एक सपना होता है ।

यह सृष्टि
ब्रह्मा का सपना रही होगी
पहले पहल,
और उसी दिन
लिखा गया होगा
पहला शब्द- प्रेम !    

(कृष्ण कुमार यादव)
सम्प्रति भारत सरकार में निदेशक. प्रशासन के साथ-साथ साहित्य, लेखन और ब्लागिंग के क्षेत्र में भी प्रवृत्त।

गाँधी जैसे इतिहास पुरूष
इतिहास में कब ढल पाते हैं 
बौनी पड़ जाती सभी उपमायें
शब्द भी कम पड़ जाते हैं ।

सत्य-अहिंसा की लाठी
जिस ओर मुड़ जाती थी
स्वातंत्र्य समर के ओज गीत
गली-गली सुनाई देती थी।

बैरिस्टरी का त्याग किया
लिया स्वतंत्रता का संकल्प
बन त्यागी, तपस्वी, सन्यासी
गाए भारत माता का जप।

चरखा चलाए, धोती पहने
अंग्रेजों को था ललकारा
देश की आजादी की खातिर
तन-मन-धन सब कुछ वारा।

हो दृढ़ प्रतिज्ञ, संग ले सबको
आगे कदम बढ़ाते जाते
गाँधी जी के दिखाये पथ पर
बलिदानी के रज चढ़ते जाते।

हाड़-माँस का वह मनस्वी
युग-दृष्टा का था अवतार
आलोक पुंज बनकर दिखाया
आजादी का तारणहार।

भारत को आजाद कराया
दुनिया में मिला सम्मान
हिंसा पर अहिंसा की विजय
स्वातंत्र्य प्रेम का गायें गान।

शनिवार, 23 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (15)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -



अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का १५ वाँ भाग ...
सच्ची - प्रतिभाओं की रत्ती भर भी कमी नहीं - समंदर में जितनी बार गहरे जाएँगे, सीप में छुपे मोती पाएँगे  - 
कुछ धवल मोती मेरी तरफ से -

उठता हैं बवंडर शब्दों का
पर चुप हैं कलम
और खामोश है जुबान
सन्नाटा सा छाया हैं
जब सदियाँ हैं करने को ब्यान
ढूँढ रही हूँ, भटक रही हूँ
चलता हैं एक अंतर्द्वंद
कहने को, है इतना कुछ
पर छाई हैं, एक  गहरी धुंध
उतावले बैठे हैं इतने क्षण
कुछ शब्दों मैं गढ़ जाने को,
एक मूरत सी बनती हैं
कुछ पन्नों मैं छप जाने को
ऐसा नहीं की,
मन का कोष हैं खाली
हैं बहुत से सपने, ढेर सी हकीकत
इतनी खुशियाँ  जो मैंने पाली
अंतर्मन मैं, उठती हैं लहरें
बाँट सकूँ सब संग,
हर पल जो मैंने पाया
हर अश्रु जो पलकों पर आया
बनते बिगड़ते रिश्तों की
दिन रात  उलझते धागों की
मौन पलों और  कहते अधरों की
दास्ताँ हैं बयाँ करनी मुझे
मौसम के आते जाते  हर रंगों की
माना एक प्रश्नचिन्ह है मेरे आगे
पर क्या यह होता हैं सबके संग
क्या हैं कोई एक भी मेरे जैसा
जो चाह कर भी न बाँट सके
अपने अंदर का कोई रंग
आज  चुप हैं कलम
और खामोश है जुबान
सन्नाटा सा छाया हैं
जब सदियाँ हैं करने को ब्यान


"आंखों" के झरोखों से बाहर की दुनिया और "मन" के झरोखे से अपने अंदर की दुनिया देखती हूँ। बस और कुछ नहीं ।
(निवेदिता श्रीवास्तव)

कुंती का नाम आते ही मुझे उसके जीवन का बस एक लम्हा याद आ जाता है जो अजीब सी वेदना भरी घुटन दे जाता है और उस लम्हे में कुंती एक आम सी स्त्री लगती है .....

कर्ण के जन्म के बाद ( यहाँ मैं चर्चा  बिलकुल  नहीं करूंगी कि किन परिस्थितियों में कर्ण का जन्म हुआ , उन घटनाओं की किसी भी  ऐतिहासिकता  अथवा  किवदंतियों  के विषय में बिलकुल भी नहीं ) , जब एक राजपुत्री की तथाकथित मर्यादा निबाहने के लिए , कुंती को कर्ण का परित्याग करना पड़ा ........ सिर्फ इस एक पल ने ही कुंती के  सम्पूर्ण जीवन को एक डगमगाती लहर बना दिया ...... मैं तो उस लम्हे के बारे में सोच कर भी संत्रस्त हो जाती हूँ कि कैसे  एक  माँ  ने अपने ही हाथों , अपनी आत्मा के , अपने शरीर के अंश को उन विक्षिप्त लहरों के हवाले किया होगा ....... कई पुस्तकों में पढ़ा  तो  मैंने  भी है कि उस   टोकरेनुमा नाव को बेहद  सुविधाजनक और सुरक्षित  बनाया  गया था साथ  ही उसमें इतनी प्रचुर मात्रा में धन भी रखा दिया गया था जिससे उस शिशु के पालन - पोषण में ,उसको पाने वाले को असुविधा न हो ...... परन्तु क्या कोई भी सुविधा इतनी सुविधाजनक हो सकती है जो माँ के अंचल की ऊष्मा दे सकती है ..... जिस  पल कुंती के स्पर्श की परिधि से वह नौका विलग हुई होगी ,कुंती ने अपने राजपुत्री होने का दंश अपने सम्पूर्ण अस्तित्व पर अनुभव किया होगा .....

पाण्डु से विवाह के बाद भी , जब कुंती ने अपने अन्य पुत्रों को जन्म भी उसी तथाकथित दैवीय अनुकंपा द्वारा ही दिया होगा , तब भी कर्ण अस्पृश्य ही रहा ...... सम्भवत: इस बार कुंती ने एक राजवधु होने का धर्म निभाया होगा ...... 

कर्ण को उसकी अपनी पहचान मिलने का मूल कारण महाभारत का युद्ध ही था ...... बेशक इस युद्ध ने अनेकों वीर योद्धाओं का और कई राज - वंश , का समूल विनाश कर दिया , पर कर्ण को "एक दानवीर योद्धा कर्ण" के रूप में पहचान भी दे गया ....

अगर ये व्यथित करने वाला लम्हा ,  कुंती  के  जीवन   में  न  आया  होता तो   सम्भवत : वह विवाह  के बाद हस्तिनापुर की उलझी हुई परिस्थितियों को अपेक्षाकृत अधिक संतुलित कर सकती थी । कुंती   ने अपने जीवन की हर सांस एक अपराधबोध के साथ ली ... पहले तो कर्ण को अपनी पहचान न दे सकने की और बाद में शेष पाण्डवों के जीवन के अभय वरदान के फलस्वरूप कर्ण के जीवन के लिए अनेकानेक  प्रश्नचिन्ह बना देने के लिए ..... काश वो अनचाहा सा लम्हा  कुंती के  जीवन में न आता और अगर उस लम्हे को आना ही था तो द्रौपदी को एक राजकन्या एवं राजवधू नहीं होना था ......


स्वप्न स्वप्न स्वप्न, सपनो के बिना भी कोई जीवन है ....
बरसों मेरे स्वप्न डायरी में कैद रहे 
आज में उनको मुक्त करता हूँ ......... (दिगंबर नासवा)

जब तक तुम साथ थीं 
बच्चों का बाप होने के बावजूद 
बच्चा ही रहा 

तेरे जाने के साथ 
ये बचपना भी अनायास साथ छोड़ गया 
उम्र के पायदान 
अब साफ़ नज़र आते हैं 

कहते हैं एक न एक दिन 
जाना तो सभी ने है  
समय तो सभी का आता है 

पर फिर भी मुझे   
शिकायत है वक़्त से 
क्यों नहीं दी माँ के जाने की आहट 
एक इशारा, एक झलक 

क्यों नहीं रूबरू कराया उस लम्हे से 

हालांकि रोक तो मैं भी नहीं पाता उसे
पर फिर भी ... 

होनी से कोई नहीं टकराता, पर मन की बातें - मन को विवश करती हैं,कई उम्मीदें देती हैं :(

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