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रविवार, 30 जून 2013

चवन्नी की विदाई के दो साल .... ब्लॉग बुलेटिन

ब्लॉग बुलेटिन के सभी मित्रों को हार्दिक नमस्कार।


आज से दो साल पहले ठीक आज ही के दिन 30 जून, 2011 ई . को भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा चवन्नी (25 पैसे) और उससे कम मूल्य के सिक्कों का चलन बंद कर दिया गया था। इन सिक्कों का निर्माण सिक्का निर्माण कानून, 1906 की धारा - 15ए के अंतर्गत किया जाता था। पूरा लेख पढ़े यहाँ...

अब चलते है बुलेटिन  की ओर ....


यह भारत है देश मेरा

मुंडे नें ऐसा क्या कह दिया जिसका पता चुनाव आयोग को नहीं था !!

वैज्ञानिक चेतना के प्रसार के लिए ब्लॉग बनाएँ

सौर मंडल की सीमा पर वायेजर 1? शायद हां शायद ना !

आइये जानते है पुराने स्मार्टफोन-टैबलेट को अपग्रेड करने के कुछ टिप्स

रुपये की कहानी उसी की जुबानी ...!

जब कटे हो मेरे अपने ही पंख ...

अपने भविष्य के लिये अपने वित्तीय पक्ष को कैसे मजबूर करें.. एक दिलचस्प वार्ता अपने परम मित्र के साथ..

APPLE ORCHID सेब के बागानो के बीच

तलाश एक अच्छे इन्सान की


अब आज्ञा दीजिये। फिर मिलेंगे। शुभ रात्रि। 

शनिवार, 29 जून 2013

ब्लॉग बुलेटिन की 550 वीं पोस्ट = कमाल है न



जब हम कोई ख्वाब देखते हैं,उसकी नींव डालते हैं तो ईश्वर से यही प्रार्थना होती है कि ख़्वाबों की यात्रा निर्विघ्न हो ..... बाधाएँ बहेलिये के समान जाल बिछाती हैं, पर मन में दृढ़ता हो इन पंक्तियों सी -
'क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो 
उसको क्या जो दंतहीन,विषहीन,विनीत,सरल हो ...'
तो समुद्र भी रास्ता देता है .... इसी भावना के साथ एक शक्स ने कुछ उँगलियों को पकड़कर ब्लॉग बुलेटिन की नींव डाली,लेखन यज्ञ में किसी ने सकारात्मक,किसी ने नकारात्मक आहुति डाली ....... पर शब्द अग्नि देवता निर्बाध जलते रहे ....हर कलम की प्रखरता के लिंक्स आप तक लाते रहे. मील  के तठस्थ पत्थरों के साथ हमने उन नए पत्थरों का भी परिचय दिया - जो मील का पत्थर होने की योग्यता रखते हैं . भूले लिंक्स को भी हमने ढूँढा और आपकी नज़रों के हवाले किया . जी हाँ, इसी यात्रा का सौभाग्य है की आज हम 550 वीं पोस्ट के साथ आपके सामने हैं - कमाल है न ?

तो इस उत्सव की सार्थकता सार्थक लिंक्स के साथ हम स्थापित करते हैं ........ सभी सार्थक लिंक्स एकसाथ नहीं उपस्थित कर सकते,पर जो भी करेंगे - आपको सोचने पर मजबूर करेंगे ...





Main aur Meri Kavitayen: प्रेम शब्द, जिसमे जादू है ....













































शुक्रवार, 28 जून 2013

काँच की बरनी और दो कप चाय - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

जीवन में जब सब कुछ एक साथ और जल्दी-जल्दी करने की इच्छा होती है । सब कुछ तेजी से पा लेने की इच्छा होती है । हमें लगने लगता है कि चौबीस घंटे भी कम पड़ते हैं । उस समय ये बोध कथा, "काँच की बरनी और दो कप चाय" याद आती है ।

दर्शनशास्त्र के एक प्रोफ़ेसर कक्षा में आये और उन्होंने छात्रों से कहा कि वे आज जीवन का एक महत्वपूर्ण पाठ पढाने वाले हैं ।

उन्होंने अपने साथ लाई एक काँच की बडी़ बरनी(जार)टेबल पर रखा और उसमें टेबल टेनिस की गेंदें डालने लगे और तब तक डालते रहे जब तक कि उसमें एक भी गेंद समाने की जगह नहीं बची। उन्होंने छात्रों से पूछा- क्या बरनी पूरी भर गई?

हाँ ..... आवाज आई...

फ़िर प्रोफ़ेसर साहबने छोटे-छोटे कंकर उसमें भरने शुरु किये । धीरे-धीरे बरनी को हिलाया तो काफ़ी सारे कंकर उसमें जहाँ जगह खाली थी समा गये । फ़िर से प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा क्या अब बरनी भर गई है? छात्रों ने एक बार फ़िर हाँ कहा । अब प्रोफ़ेसर साहब ने रेत की थैली से हौले-हौले उस बरनी में रेत डालना शुरु किया । वह रेतभी उस जार में जहाँ संभव था बैठ गई । अब छात्र अपनी नादानी पर हँसे । फ़िर प्रोफ़ेसर साहब ने पूछा क्यों अब तो यह बरनी पूरी भर गई ना?

हाँ .. अब तो पूरी भर गई है । सभी ने एक स्वर में कहा ।

सर ने टेबल के नीचे से चाय के दो कप निकालकर उसमें की चाय जार में डाली । चाय भी रेत के बीच स्थित थोडी़ सी जगह में सोख ली गई ।

प्रोफ़ेसर साहब ने गंभीर आवाज में समझाना शुरु किया–

इस काँच की बरनी को तुम लोग अपना जीवन समझो । टेबल टेनिस की गेंदें सबसे महत्वपूर्ण भाग अर्थात भगवान,परिवार,बच्चे,मित्र,स्वास्थ्य और शौक हैं । छोटे कंकर मतलब तुम्हारी नौकरी,कार,बडा़ मकान आदि हैं  और रेत का मतलब और भी छोटी-छोटी बेकार सी बातें, मनमुटाव,झगडे़ है ।

अब यदि तुमने काँच की बरनी में सबसे पहले रेत भरी होती तो टेबल टेनिस की गेंदों और कंकरों के लिये जगह ही नहीं बचती,या कंकर भर दिये होते तो गेंदें नहीं भर पाते,रेत जरूर आ सकती थी ।

ठीक यही बात जीवन पर लागू होती है । यदि तुम छोटी-छोटी बातों के पीछे पडे़ रहोगे और अपनी ऊर्जा उसमें नष्ट करोगे तो तुम्हारे पास मुख्य बातों के लिये अधिक समय नहीं रहेगा । मन के सुख के लिये क्या जरूरी है ये तुम्हें तय करना है । अपने बच्चों के साथ खेलो,बगीचे में पानी डालो,सुबह पत्नी के साथ घूमने निकल जाओ,घर के बेकार सामान को बाहर निकाल फ़ेंको,मेडिकल चेक-अप करवाओ,टेबल टेनिस गेंदों की फ़िक्र पहले करो । वही महत्वपूर्ण है । पहले तय करो कि क्या जरूरी है । बाकी सब तो रेत है ।

छात्र बडे़ ध्यान से सुन रहे थे । अचानक एक ने पूछा,सर लेकिन आपने यह नहीं बताया कि"चाय के दो कप"क्या हैं?

प्रोफ़ेसर मुस्कुराये,बोले मैं सोच ही रहा था कि अभी तक ये सवाल किसी ने क्यों नहीं किया ।

इसका उत्तर यह है कि,जीवन हमें कितना ही परिपूर्ण और संतुष्ट लगे,लेकिन अपने खास मित्र के साथ दो कप चाय पीने की जगह हमेशा होनी चाहिये ।

तो कब बुला रहे है मुझे आप चाय पर ???

सादर आपका 

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किताबें- ज़ारा अकरम खान

यह ज़रूरी तो नही .... 

बैरागी मन - हाइगा में

किसका सत्कार?

सब यहीं छूट जाएगा

कड़वा सच ...

तुम्हें याद न करूँ तो बेहतर

आजकल के बच्चे न तो कहानी पढ़ रहे हैं न ही सुन रहे हैं

मुस्कुरा दो यार

च से बन्नच और छ से पिच्चकल्ली

एक था धोबी

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 27 जून 2013

हर बार सेना के योगदान पर ही सवाल क्यों - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम !

कल शाम टीवी देखते देखते एक अजीब ही ख़बर देखने को मिली ... मन क्रोध से भर गया ... जहां एक तरफ
उत्तराखंड में राहत आौर बचाव के दौरान हेलीकॉप्टर क्रैश में अपने साथियों को खो देने के बाद भी सेना के जवान लोगों को बचाने में जी-जान से जुटे हैं। दूसरी तरफ राहत कार्य का श्रेय लेने के होड़ में नेता लोग आपस में लड़ने पर उतारू हो गए । उत्तराखंड में फंसे आंध्रप्रदेश के लोगों को सुरक्षित निकाले का श्रेय लेने के चक्कर में बुधवार को कांग्रेस और टीडीपी के नेता आपस में भिड़ गए। टीवी पर साफ साफ दिखाया गया कि कैसे कांग्रेस के नेता हनुमंत राव और टीडीपी के नेता रमेश राव के बीच देहरादून के जॉलीग्रांट एयरपोर्ट पर गाली-गलौज तथा हाथापाई हो गई। बाद मे अर्चना दीदी से चैट पर जब इसी मुद्दे पर बात हुई तो उन्होने बताया कि उन्होने तो टीवी पर जब यह देखा तो उसकी फोटो भी मोबाइल से ले ली !

उधर, सेना के जवान लोगों को बचाने में जी-जान से जुटे हैं। हालांकि मौसम अभी भी उनका साथ नहीं दे रहा है। चारों तरफ धुंध और रुक-रुक कर बारिश होने के कारण बुधवार की सुबह बचाव कार्य कुछ देर से शुरू हो सका। इसी बीच सैनिकों का हौसला बढ़ाने आज सुबह वायु सेनाध्यक्ष एनएके ब्राउन गोचर पहुंचे। उन्होंने कहा, अंतिम व्यक्ति को बचाने तक सेना का ऑपरेशन जारी रहेगा।


इन बेशर्म नेताओं को सेना के जवानों से सबक लेना चाहिए जहां एक तरफ सेना के बड़े से बड़े अधिकारी भी इस समय राहत कार्यों मे जी जान से जुटे है दूसरी ओर यह स्वार्थी नेता है जो आपदा के समय भी अपनी राजनीति चमकने मे जुटे है ! 

और तो और इतना सब होने के बाद भी गाहे बेगाहे यह सवाल भी उठते रहते है कि सेना आखिर करती ही क्या है ... यकीन जनिएगा जब जब किसी 'बुद्धिजीवी' को सेना की उपयोगिता पर सवाल उठाता देखता हूँ ... बड़ी शिद्दत से खुद के 'बुद्धिजीवी' न होने पर बड़े गर्व की अनुभूति करता हूँ by god की कसम !!

शर्म से डूब मारना चाहिए उन लोगो को जो हमारे जीवन मे सेना के योगदान को नज़रअंदाज़ करते है ... कौन सा ऐसा नेता या राजनीतिक दल है अपने देश मे जो सेना का स्थान ले सके इतने बड़े पैमाने के राहत कार्यों के दौरान !? एक भी नहीं ... जी हाँ ... एक भी नहीं ... फिर बार बार सेना के योगदान पर सवाल क्यों उठाए जाते है !? सेना के बिना हम कुछ भी नहीं है ... और यह एक ऐसा तथ्य है जिसे एक बार नहीं कई बार साबित किया जा चुका है !!

सादर आपका 

शिवम मिश्रा 

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आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज है......................

Randhir Singh Suman at लो क सं घ र्ष !
*आज जिनका जन्मदिन है * आपकी आँखों में कुछ महके हुए से राज है आपसे भी खुबसूरत आपके अंदाज है | याद है बारिशो के दिन थे वो पंचम और पहाड़ी के नीचे वादी में धुंध से झाककर निकलती हुई रेल की पटरिया गुजरती थी | धुंध में ऐसे लग रहे थे हम जैसे दो पौधे पास बैठे हो हम बहुत देर पटरियों बैठे हुए उस मुसाफिर का जिक्र करते रहे जिसको आना था पिछली सब लेकिन उसकी आमद का वक्त ढलता रहा | हम बहुत देर पटरियों पर बैठे हुए ट्रेन का इन्तजार करते रहे ट्रेन आई उसका वक्त हुआ और हम यू ही दो कदम चलकर धुंध पर पाँव रखकर गुम हो गये | मैं अकेला हूँ अन्त में -------- | *मुसाफिर हूँ यारो ना घर है ठिकाना मुझे चलते जाना ह... more »

मुस्कुराने का कर्ज़

आज Zee tv पर एक सीरियल या कहें रियलिटी शो देख रही थी Connected HUM TUM ...ये वही शो है ,जो मुझे भी ऑफर हुई थी और मैंने मना कर दिया था {अब ये बताने से क्यूँ चूकें हम :)} खैर हमें अपने निर्णय पर अफ़सोस तो पहले भी नहीं था और अब ये शो देखकर तो जैसे एक सुकून की सांस ले ली ,यूँ कैमरे का हर वक़्त अपनी ज़िन्दगी में झाँक कर देखना मंजूर नहीं था मुझे . वैसे जैसा मुझे बार बार आश्वस्त करने की कोशिश की थी उन्होंने... सच में इस शो में कोई मिर्च मिसाले नहीं हैं बल्कि औरतों के मन में क्या चलता रहता है ,क्या सोचती हैं, उनकी ज़िन्दगी क्या है ,किसी सिचुएशन पर कैसे रिएक्ट करती हैं...यही सब है. साथ म... more »

ताऊ तेल का सारा स्टाक खत्म !

ताऊ रामपुरिया at ताऊ डाट इन
ताऊ कुछ सोच में बैठा हुआ था. अब क्या सोच रहा था यह तो खुद ताऊ जाने, भगवान इस लिये नही जान सकते कि उनको आजकल सोचने की फ़ुरसत ही नही है....अब भगवान भी कहां तक और किस किस की सोचें? इस समय ताऊ जरूर उतराखंड त्रासदी में अपना नफ़ा नुक्सान और वाहवाही के बारे में ही सोच रहा होगा....पर फ़िर भी ताऊ के दिमाग का कोई भरोसा नही...... अचानक रामप्यारे अपने दांत दिखाता हुआ ब्रांड न्य़ू मोटरसाईकिल पर प्रगट हुआ और बोला - ताऊ, आजकल फ़िर से ब्लागिंग को ठंड लग गई है. ट्विटर, फ़ेसबुक के साथ तुलनात्मक अध्ययन और शोध कार्य भी प्रारंभ हो चुका है. मुझे लगता है इससे भी ब्लागिंग की ठंड दूर होने वाली नही है.... more »

दिलरुबाई ही लगे

शारदा अरोरा at गीत-ग़ज़ल
* हम वहाँ हैं जहाँ ,* *अपनी खबर भी पराई ही लगे * * **चिकने घड़े सा कर दिया * *ज़िन्दगी ये भी रुसवाई ही लगे * * **न जाते इधर तो किधर जाते * *हर शय शौदाई ही लगे * * **आईना किस को दिखाऊँ * *अपनी फितरत भी हरजाई ही लगे * * **यही बदा है , यही सही * *रात के पैर में बिवाई ही लगे * * **तेरा मुँह देख के जीते हैं * *आग अपनी लगाई ही लगे * * **इश्क में दर-बदर हर कोई * *दाँव पर सारी खुदाई ही लगे * * **शोला हो , शबनम हो * *ऐ वक्त , दिलरुबाई ही लगे * * *

घर पर छापिये अपनी ई-बुक booklet printing से और कागज बचार्इये

Abhimanyu Bhardwaj at MY BIG GUIDE
अगर आप ई-बुक पढने के शौकीन हैं, और अक्‍सरकर आप अपने प्रिन्‍टर से ई-बुक का प्रिन्‍ट आउट निकाल कर पढते भी हैं, लेकिन वह एक किताब या पुस्‍तक की तरह नहीं लगता है। वह सीधे सीधे ए4 पेज पर एक साइड खाली वाला प्रिन्‍ट निकलता है। जिससे काफी पेज भी खर्च होते हैं, और किताब वाला मजा भी नहीं आता है। मैं आज आपको एक ऐसा बडे काम का आसान तरीका बताने जा रहा हॅू जिससे आप घर पर ही अपनी किताब छाप सकते हैं, और पेज भी बचा सकते हैं। इस तरीके से आप किसी भी 40 पेज की ई-बुक को केवल 10 पेज में ही प्रिन्‍ट निकाल सकते हैं, जिससे पेज की भी बचत होगी और पढने और देखने में किताब वाला मजा भी मिलेगा। *यह तरीका उनके लि... more »

पेड़ तूने काटे नाम कहर पहाड़ का रख दिया

Neelima at Rhythm
तू क्या हैं /?? क्या होना चाहता था अभी ! इंसान के बोलने से पहले इश्वर खेल खेल गया ~~ कैसे तेल का दिया जलाऊ अपने आँगन में उनके घर का तो चिराग ही बुझ गया ~~ अभी तक सिर्फ पठारों में जीते थे हम अब तो सीने पर ही पत्थर रख दिया ~~ रोती हुए आवाज़े सिसकियो मैं बदल रही हैं लोग कहते हैं उसने अब सब्र कर लिया ~~ कोई देखे तो आकर उसके सूखे आंसुओ को जिसने पति बेटे के साथ पोते को भी खो दिया ~~ मातम पुरसी को जमा हैं बहुतेरे लोग बरसात का मौसम बीज बेबसी के बो गया ~~ दूर बैठ कर देखना त्रासदी को बहुत आसान हैं महसूस करना उस प्रलय को आंदोलित कर गया ~~ मेरे घर में बचे हैं बस अब... more »

लिखने का माध्यम और सरोकार !

संतोष त्रिवेदी at बैसवारी baiswari
कई बार यह बहस उठती है कि अभिव्यक्ति के लिए कौन-सा माध्यम उचित है या सबसे उत्तम है,पर मेरी समझ से मूल प्रश्न यह होना ही नहीं चाहिए। हर माध्यम की अपनी सम्प्रेषणता होती है और पहुँच भी। बदलते समय और नई तकनीक के साथ इसमें भी उत्तरोत्तर बदलाव हो रहा है। यह सहज और स्वाभाविक प्रकिया है। इससे,पहले वाले या परम्परागत माध्यमों की उपयोगिता या प्रासंगिकता खत्म नहीं हो जाती। यह व्यक्तिगत रूप से इसका उपयोग करने वाले पर निर्भर है कि उसे किस माध्यम में सहजता और सहूलियत होती है। माध्यमों के बदलने से लिखने वाले के सरोकार नहीं बदल जाते। इसलिए लेखक के सरोकार हर माध्यम से जुड़े होते हैं। इसलिए लेखक के... more »

एक बार फिर वो -- जो अब फेसबुकिया बन गए हैं।

डॉ टी एस दराल at अंतर्मंथन
अभी ब्लॉग पर अरविन्द मिश्र जी का लेख पढ़कर फिर वही मुद्दा मन में मचलने लगा कि क्यों ब्लॉगर्स ब्लॉगिंग छोड़कर फेसबुक आदि की ओर जा रहे हैं। लेकिन यह चर्चा यहीं जारी रहे। हमें तो कुछ दिन से फेसबुक पर सक्रियता से जो देखने को मिला , वह प्रस्तुत है इस हास्य व्यंग रचना के माध्यम से जिसमे हास्य कम, व्यंग ज्यादा नज़र आएगा लेकिन हालात पर खरा उतरेगा। १) वो सुबह सवेरे , मूंह अँधेरे उठती है , चाय नाश्ता बनाकर बच्चों को नहला धुलाकर, टिफिन लगाती है, बच्चों के साथ बच्चों के पिता का। फिर बिठा आती है, बच्चों को स्कूल बस में , अच्छे नागरिक बनाने की चाह में। फिर करती है पति को बाय बाय और बैठ जाती है ख... more »

सुकून मिलता है ....अतीत में !!!

Ashok Saluja at यादें...
*मैं देखता हूँ ,अपने अतीत में* *तूने डेरा अपना जमा रखा है * *दिल के हर टूटे हुए टुकड़े में * *तूने चेहरा अपना छुपा रखा है* *---अशोक "अकेला "* *सुकून मिलता है ....अतीत में !!!* ज्यों काफ़िर मुहँ से लगी छूटती नही ये यादों की लड़ी कभी भी टूटती नही कुछ अरसे के लिए हो जाता हूँ ,बेखबर फिर भी ये कभी मुझसे यूँ रूठती नही करने लगता हूँ याद बीती हुई यादें तभी जब कभी मुझे कोई ख़ुशी सूझती नही इन में समाई हैं मेरे सुख-दुःख की हवाएं जिन्हें आज की ज़हरीली हवा लूटती नही बिखर जाती है मेरी सोच अनेक यादों में वहाँ कोई भी आँख, शक से घूरती नही पलट के देखने दो मुझे यादों की तरफ चारों तरफ अब मेरी... more »

स्वराज या गुंडाराज – मर्ज़ी है आपकी क्योंकि देश है आपका

तुषार राज रस्तोगी at तमाशा-ए-जिंदगी
अपनी बात को मैं इन दो पंक्तियों के माध्यम से आरम्भ कर रहा हूँ *कुछ ज़बानों पर हैं ताले, कुछ तलवों में हैं छाले* *पर कहते हैं कहने वाले, के स्वराज चल रहा है * *किस हाल से हमारा यह समाज गुज़र रहा है ? * *'सब चलता है' के नारे पर स्वराज जल रहा है* स्वराज की बात इसलिए कर रहा हूँ क्योंकि आज भारत की पीड़ित और त्रस्त आम जनता देश में बदलाव की आस लगाये मुंह ताकती बैठी है | हिंसा, गरीबी, भुखमरी, शोषण, महंगाई, बेरोज़गारी, उंच नीच, नक्सलवाद, आर्थिक विषमता और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं की आग में जनता फतिंगों की तरह भुन रही है और हमारे लोकशाही पहलवान उन्हें दिन-बा-दिन और ज्यादा गर्म करते जा रहे हैं |... more »

कार्टून :- उत्‍तराखंड में भॉंडनृत्‍य

मृतकों की बेकद्री

*दस जून से देहरादून, कोटद्वार होते हुए सतपुली एकेश्‍वर पौड़ी गढ़वाल अपने गांव गया हुआ था। इस बीच 16 17 18 जून को जो हुआ उस पर और गढ़वाल के हालातों पर शायद मेरे पास फुर्सत में लिखने के लिए अभी कुछ नहीं है। अभी हतप्रभता हावी है। तब तक अपने मन का हाल नीचे के शब्दों के अनुसार प्रस्‍तुत है**: ** * वस्‍तु विनिमय के माध्‍यम मुद्रा यानी रुपए को जब साधन के बजाय साध्‍य मान लिया गया हो, जीवन की क्षुद्र सच्‍चाइयों व पीड़ांतक अनुभवों से नहीं गुजरे सत्‍ताधारकों को सुख-सुविधाओं वाले अपने सिद्धांत सब से उचित लगते हों तो ऐसी जीवन परिस्थितियों में केदारनाथ मन्दिर के प्राकृतिक ध्‍वस्‍तीकरण को संवेदनशील ... more »

जब अपना कोई रूठ गया...

परमजीत सिहँ बाली at ******दिशाएं******
बरसा बादल जग डूब गया, जब अपना कोई रूठ गया। निरव खग का सब कोलाहल, क्या पवन वेग से दोड़ेगी। क्या नदिया सरपट उछल उछल पर्वत की छाती फोड़ेगी। ये कैसा मन बोध मुझे मेरे सपनों को लूट गया। बरसा बादल जग डूब गया जब अपना कोई रूठ गया। प्रियतम का विरह ऐसा ही क्या होता सब के जीवन में , अमृत भी विष-सा लगता है तृष्णा में वारी पीवन में । क्रंदन करती हर दिशा लगे काला बादल ज्यों फूट गया। बरसा बादल जग डूब गया जब अपना कोई रूठ गया।

माँ - एक एहसास ...

noreply@blogger.com (दिगम्बर नासवा) at स्वप्न मेरे...........
उदासी जब कभी बाहों में मुझको घेरती है तू बन के राग खुशियों के सुरों को छेड़ती है तेरे एहसास को महसूस करता हूं हमेशा हवा बालों में मेरे उंगलियां जब फेरती है चहल कदमी सी होती है यकायक नींद में फिर निकल के तू मुझे तस्वीर से जब देखती है तू यादों में चली आती है जब बूढी पड़ोसन कभी सर्दी में फिर काढा बना के भेजती है “खड़ी है धूप छत पे कब तलक सोता रहेगा” ये बातें बोल के अब धूप मुझसे खेलती है तेरे हाथों की खुशबू की महक आती है अम्मा बड़ी बेटी जो फिर मक्की की रोटी बेलती है नहीं देखा खुदा को पर तुझे देखा है मैंने मेरी हर सांस इन क़दमों पे माथा टेकती है ... more »

फील्ड मार्शल सैम 'बहादुर' मानेकशॉ की ५ वीं पुण्यतिथि पर विशेष

शिवम् मिश्रा at बुरा भला
फील्ड मार्शल सैम 'बहादुर' मानेकशॉ *सैम होर्मूसजी फ्रेमजी जमशेदजी मानेकशॉ* (३ अप्रैल १९१४ - २७ जून २००८) भारतीय सेना के अध्यक्ष थे जिनके नेतृत्व में भारत ने सन् 1971 में हुए भारत-पाकिस्तान युद्ध में विजय प्राप्त किया था जिसके परिणामस्वरूप बंगलादेश का जन्म हुआ था। *जीवनी* मानेकशा का जन्म ३ अप्रैल 1914 को अमृतसर में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनका परिवार गुजरात के शहर वलसाड से पंजाब आ गया था। मानेकशा ने प्रारंभिक शिक्षा अमृतसर में पाई, बाद में वे नैनीताल के शेरवुड कॉलेज में दाखिल हो गए। वे देहरादून के इंडियन मिलिट्री एकेडमी के पहले बैच के लिए चुने गए ४० छात्रों में से एक थे। वहां से... more »
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

जय हिन्द की सेना !!!

बुधवार, 26 जून 2013

दुर्घटनाएं जिंदगियां बर्बाद करती हैं और आपदाएं नस्ल ..........



उत्तराखंड आपदा , अभी पूरे देश के ज़ेहन में सिर्फ़ यही कौंध रहा है , उस भयावह आपदा जो कयामत बनके आई थी , बीते गुजरे एक सप्ताह से भी अधिक का समय बीत चला है , आज भी खबर यही है कि हज़ारों लोग अब भी मौत के मुंह में हैं । जिंदगियों के जाने का आंकडा , वो आंकडा जो सरकार बता रही है बढता जा रहा है और और इससे कई गुना ज्यादा वो संख्या होगी जो दिन बीतने के साथ ही उत्तराखंड की जमींदोज़ हो चुकी धरती और पहाड के बीच अब गुमनाम होने जैसी होती जा रही है । वो जो पिछले नौ दिनों से अपनों की तलाश में भटक रहे हैं , उनके बारे में जानने के लिए बेताब हैं , परेशान हैं , मायूस हैं जाने उनकी ये बेताबी , ये परेशानी और ये मायूसी कितनी लंबी होने वाली है कईयों की तो शायद उम्र भर के लिए ।

इस आपदा ने इंसानियत के रक्षक हमारे वीर जांबाज़ सैनिकों को अपना फ़र्ज़ निभाने का मौका दिया तो वहीं कुछ आदमखोर इंसानों के झुंड ने लाशों तक से व्याभिचार करके ये साबित कर दिया कि , इंसान अब जीवन स्तर की मानसिकता में पशुओं से कहीं अधिक घृणित और नीच हो गया है । ऐसे में एक कही हुई बात मुझे याद आ रही थी कि ,दुर्घटनाएं तो जिंदगियां बर्बाद करती हैं मगर आपदाएं नस्लों को तबाह कर देती हैं , युगों के लिए ।


हिंदी अंतर्जाल के विभिन्न प्लेटाफ़ार्मों पर , सभी अपनी अपनी प्रतिक्रिया दे रहे हैं , लेकिन इसी बीच मैं फ़ेसबुक पर अचानक नज़र पडती है , सुनीता भास्कर , पेशे से पत्रकार ,
जिनका ब्लॉग ही है , पत्रकार की डायरी और जितना मैं पढता जाता हूं दिल दिमाग सन्न होते जाते हैं ,

अपनी ताज़ा रिपोर्ट में वे लिखती हैं ,
" कईयों के परिजन खुद जान हथेली में रखकर ग्रुप में गुप्तकाशी या गौरीकुंड तक हो आए हैं, लेकिन उन्हें अपने कहीं नजर नहीं आए। कई परिजन चार चार हिस्सों में बंटे हैं। संगठनों द्वारा रात गुजारने के लिए दिए आशियाने से मुंह अंधेरे ही यह लोग उठ जाते हैं और चारों दिशाओं में फैल जाते हैं। एक सहस्त्रधारा हैलीपैड पर तो दूजा जौलीग्रांट एयरपोर्ट के गेट के बाहर अड्डा डालता है। तीसरा ऋषिकेश तो चौथा हरिद्वार में अपनों के इंतजार में खड़ा हो जाता है। उन्हें नहीं मालूम कि बचाव व राहत कार्य के बाद कौन किस रास्ते कब व कहां लाया जाएगा। कुछ लोग सभी अस्पतालों के चक्कर काट रहे हैं तो कोई दिन भर कैफे में सरकारी वेबसाइट खंगालते रहते हैं। आलम यह है कि मुंह अंधेरे की सुबह से शाम की कालिमा छंटने तक कोई भी मंत्री, अधिकारी उनके कांधे पर हाथ रख दिलासा देने वाला नहीं है। इसके उलट यह अधिकारी फोन स्वीच आफ कर वातानुकुलित कमरो में रहकर  उनके जले पर नमक ही छिडक़ने का काम कर रहे हैं।"


इस त्रासदी के आठ दिनों बाद कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी के आपदाग्रस्त क्षेत्र के दौरे पर कटाक्ष करते हुए गोदियाल जी अपने ब्लॉग अंधड पर लिखते हैं ,

"निकले तो थे गुपचुप दर्द बांटने 
बाढ़ पीड़ितों का,  
दर्मियाँ सफर तो भेद उनका 
किसी पे उजागर न हुआ, 
 मगर खुला भी तो कब, 
जब मंजिल पे वो पूछ बैठे;  
"आखिर इस जगह हुआ क्या था ?"


और इसके बाद शिवम मिश्रा जी ने एक पोस्ट लिंक प्रेषित की , जिसमें नित्यानंद जी ने बडे ही मार्मिक रूप से , पहाड की मां ’ को चित्रित किया है देखिए ,


पहाड़ की माँ ---------------


सीता 
पांच बच्चों की माँ है 
पार चुकी है पैंतालीस वर्ष 
जीवन के 
दार्जिलिंग स्टेशन पर 
करती है कुली का काम 
अपने बच्चों के भविष्य के लिए |


सिर पर उठाती है
भद्र लोगों का भारी -भारी सामान
इस भारी कमरतोड़ महंगाई में
वह मांगती है
अपनी मेहनत की कमाई
बाबुलोग करते उससे मोलभाव
कईबार हड़तालों में
मार लेती है पेट की भूख |


ब्लॉगर प्लेटफ़ार्म के अतिरिक्त , जागरण जंक्शन और नवभारत टाइम्स ब्लॉग्स जैसे अन्य प्लेटफ़ार्मों पर भी यही विषय सबसे ज्यादा मथा जा रहा है , देखिए वहां यतीन्द्रनाथ , टिहरी बांद और हिमालय को मुद्दा बनाते हुए कहते हैं

"
1972 में योजना आयोग द्वारा टिहरी बाँध परियोजना को मंजूरी के साथ ही टिहरी और आस-पास के इलाके में बाँध का व्यापक विरोध शुरू हो गया था। जब विरोध के स्वर तत्कालीन केंद्र सरकार तक पहुंचा तब संसद की ओर से इन विरोधों की जांच करने के लिए 1977 में पिटीशन कमेटी निर्धारित की गई।1980 में इस कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी ने बाँध से जुड़े पर्यावरण के मुद्दों की जांच करने के लिए विशेषज्ञों की समिति बनाई। इस समिति ने बाँध के विकल्प के रूप में बहती हुई नदी पर छोटे-छोटे बाँध बनाने की सिफ़ारिश की। पर्यावरण मंत्रालय ने विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर गंभीरता पूर्वक विचार करने के बाद अक्टूबर,1986 में बाँध परियोजना को एकदम छोड़ देने का फैसला किया। नवंबर, 1986 में तत्कालीन सोवियत संघ सरकार ने टिहरी बाँध निर्माण में आर्थिक मदद करने की घोषणा की। इसके बाद फिर से बाँध निर्माण कार्य की सरगर्मी बढ़ने लगी। फिर बाँध से जुड़े मुद्दों पर मंत्रालय की ओर से समिति का गठन हुआ। फरवरी, 1990 में इस समिति ने बाँध स्थल का दौरा करने के बाद रिपोर्ट दी कि “टिहरी बाँध परियोजना पर्यावरण के संरक्षण की दृष्टि से बिलकुल अनुचित हैं।”

 वहीं ब्लॉगर श्री जे एल सिंह , अपने ब्लॉग में बरसात से बर्बादी , को शब्दों में कुछ यूं पिरोते हैं ,
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सूरज ताप जलधि पर परहीं, जल बन भाप गगन पर चढही.
भाप गगन में बादल बन के, भार बढ़ावहि बूंदन बन के.
पवन उड़ावहीं मेघन भारी, गिरि से मिले जु नर से नारी.
बादल गरजा दामिनि दमके, बंद नयन भे झपकी पलके!
रिमझिम बूँदें वर्षा लाई, जल धारा गिरि मध्य सुहाई
अति बृष्टि बलवती जल धारा, प्रबल देवनदि आफत सारा "

नवभारत टाइम्स ब्लॉगस पर राजेश कालरा कहते हैं कि अब कभी सामने नहीं आ पाएगी सच्चाई

"बर्बादी के जितने भी अंदाजे लगाए जा रहे हैं, उनमें एक बात विशिष्ट है। मरने वालों की तादाद। शुरुआत 200 लोगों की मौत से हुई थी। फिर उत्तराखंड के सीएम ने कहा कि एक हजार लोग मरे हैं। फिर राज्य के आपदा प्रबंधन मंत्री ने कहा कि मरने वालों की तादाद 5000 तक पहुंच सकती है। अब अंदाजे लगाने का तो ऐसा है कि जिसका जो जी करे उतनी संख्या बता दे। समस्या यह है कि सभी अंधेरे में तीर चला रहे हैं क्योंकि सचाई यह है कि हमें कभी पता नहीं चलेगा कि असल में कितने लोग मारे गए।"

तो डाक्टर सामबे , आपदा प्रबंधन पर सवाल उठाते हुए कहते हैं , " 

kedarnath1.jpgईश्वर-अल्लाह पर हम आगे विचार करेंगे। पहले एक साधारण-सी बात कहते हैं और वह यह कि जो खतरों से खुद को बचाता है, खुदा उसी को बचाता है। अंग्रेजी कहावत है- 'God helps those who help themselves'। हम नदी, झील, पहाड़ और समुद्र के समीप जाएं, तो राम भरोसे न जाएं। अपनी समझदारी साथ लेकर जाएं। वहां की भौगोलिक स्थिति और संभावित खतरों के बारे में सजग होकर जाएं। यह पता करके जाएं कि अगर वहां आफत आई, तो वहां बचाव की क्या व्यवस्था है? वहां का आपदा प्रबंधन का रेकार्ड क्या है? हादसों के रेकार्ड आनेवाले खतरों से निपटने में मददगार होते हैं। कुदरत के कहर से बचने के लिए हम क्या कर सकते हैं?"

वहीं ब्लॉगर तृप्ति अपने ब्लॉग कच्ची लोई में कहती हैं कि बारी हमारी भी बहुत जल्दी आनी है , अपनी पोस्ट को समाप्त करते हुए वो कुछ पंक्तियां लिखती हैं , 

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तरक्की कर रहे हैं हम तरक्की करते जाएंगे
बहुत कुछ खो चुके हैं हम बहुत कुछ खोते जाएंगे
हैं जिंदा हम बड़ी बेशर्म सांसों के सहारे पर
मरेगा सामने वाला मगर हम जीते जाएंगे
कहानी सामने वाले की अपनी भी कभी होगी
वही तब आसमां होगा वही तब ये जमीं होगी
जो समझो बात इतनी सी तो फिर हर बात छोटी है
नहीं तो चाह में जीने की हम बस मरते जाएंगे..."

इधर पिछले दिनों ब्लॉगिंग में भी भूस्खलन का दौर जारी है , यानि कि उठापटक जी , अविनाश वाचस्पति जी ने अपने ब्लॉग को ही अलविदा करने का मन बना लिया , या शायद कह ही दिया और घोषणा कर डाली कि अब वे सिर्फ़ फ़ेसबुक पर ही नुमाया होंगे , इसी उहापोह में डाक्टर अरविंद मिश्रा जी की पोस्ट आई और क्या लबाबल बहस से लबरेज हो गई पोस्ट देखिए , डा मिश्रा ने लिखा ,
"वे पिछडे हैं जो ब्लॉगिंग तक ही सिमटे हैं " , जिसमें उन्होंने इसका कारण बताते हुए कहा कि ,
" आज भी मैं यह बल देकर कहता हूँ कि फेसबुक में ब्लागिंग से ज्यादा फीचर्स हैं और यह ब्लागिंग की तुलना में काफी बेहतर है .बहुत ही यूजर फ्रेंडली है . अदने से मोबाईल से एक्सेस किया जा सकता है .भीड़ भाड़ ,पैदल रास्ते ,बस ट्राम ट्रेन ,डायनिंग -लिविंग रूम से टायलेट तक आप फेसबुक पर संवाद कर सकते हैं . ज़ाहिर है यह सबसे तेज संवाद  माध्यम बन चुका है . महज तुरंता विचार ही नहीं आप बाकायदा पूरा विचारशील आलेख लिख  सकते हैं और गंभीर विचार विमर्श भी यहाँ कर सकते हैं। आसानी से कोई भी फोटो अपडेट कर सकते हैं . वीडियो और पोडकास्ट कर सकते हैं . ब्लॉगर मित्र तो इसे अपने ब्लॉग पोस्ट को भी हाईलायिट करने के लिए काफी पहले से यूज कर रहे हैं .यह पोस्ट भी वहां दिखेगी ही ...." 

जब पोस्ट इतनी धारदार, वारदार हो तो फ़िर प्रतिक्रिया तो आनी ही थी और क्या खूब आईं देखिए , 




  1. ब्लॉग अभिव्यक्ति का सहज माध्यम है। इसकी प्रासंगिगता कभी खत्म नहीं होगी।

    फ़ेसबुक और ट्विटर तुरंता जुमलेबाजी के माध्यम हैं। फ़ेसबुक मेरे लिये नोटिसबोर्ड की तरह है जहां अपने ब्लॉग की नोटिस लगाते हैं, जुमलेबाजी करते हैं, फ़ूट लेते हैं। ब्लॉग हमारे लिये घर की तरह है जहां हमेशा लौटने का, रहने का मन करता है।

    लिखने वाले की सबसे बड़ी इच्छा होती है कि लोग उसे पढ़ें और सराहें। प्रिंट मीडिया में छपना वाह-वाही समझी जाती हैं क्योंकि ब्लॉग के मुकाबले ज्यादा लोग पढ़ते हैं उसे। प्रिंट भले ही खबरों के लिये आउटडेटेड हो गया हो लेकिन बाकी लिखे पढ़े के लिये उसमें छपने का मजा ही कुछ और है। इसे स्वीकारने में कोई संकोच नहीं करना चाहिये।

    लेकिन प्रिंट मीडिया की अपनी सीमायें हैं। अगर आप बहुत बड़े सेलिब्रिटी नहीं हैं तो आपका लिखा सब कुछ वहां नहीं छप जायेगा। आपके अपने मन के भाव, उद्गार, संस्मरण , चिरकुटैयों, अपीलों , धिक्कार के लिये वहां कोई जगह नहीं होगी। उसके लिये आपको लौट के अपने यहां ही आना होगा और उसके लिये ब्लॉग से उपयुक्त कोई माध्यम नहीं है।

    ब्लॉगिंग ने आम लोगों को अभिव्यक्ति का जो सहज माध्यम प्रदान किया है उसकी तुलना और किसी माध्यम से नहीं हो सकती। लोग अपने भाव, कवितायें, सोच, संस्मरण अपने ब्लॉग पर लिखते हैं। ट्विटर पर शब्द सीमा है, फ़ेसबुक पर सर्चिंग लिमिटेशन। ब्लॉग पर आप अपनी सालों पहले की किसी भी पोस्ट पर डेढ़ -दो मिनट में पहुंच सकते हैं, फ़ेसबुक अपना दस दिन पुराना स्टेटस खोजने में भी घंटा लग सकता है। ब्लॉग जैसी आजादी और सुविधा और कहां?

    इस बीच एक घालमेल और हुआ है कि, ब्लॉग जो कि अभिव्यक्ति का माध्यम है और जिसकी कोई सीमा नहीं है को, साहित्यप्रेमियों और पत्रकार बिरादरी ने हाईजैक जैसा करके इसको साहित्यमंच या फ़िर पत्रकारपुरम जैसा बनाने की कोशिश करके इसको सीमित करना शुरु कर दिया है। जबकि ऐसा है नहीं- ब्लॉग आज के समय में दुनिया का सबसे तेज दुतरफ़ा माध्यम है। लेखक/पाठक के बीच अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया का इससे तेज और कोई खुला माध्यम नहीं है।

    ब्लॉग और फ़ेसबुक से पैसे कमाने की बात जो करते हैं वे लहरें गिनकर भी पैसा कमा सकतें हैं। उसके लिये व्यक्ति को लेखन सक्षम नहीं कमाई सक्षम होना चाहिये। पैसे कमाने और नाम कमाने और इनाम जुगाड़ने के लिये भी लोग तरह-तरह की तिकड़में लगानी होती हैं। वे सब आम आदमी के बस की नहीं होती।

    मैं ब्लॉग लेखन से क्यों जुड़ा हूं उसका यही कारण है कि अपनी तमाम अभिव्यक्तियों के लिये ब्लॉग ही सबसे मुफ़ीद माध्यम है। और कोई माध्यम इतना सहज और सुगम नहीं है जितना कि ब्लॉग। इसीलिये अपन इससे जुड़े हैं और इंशाअल्लाह जुड़े रहेंगे। आप भी यह पोस्ट सिर्फ़ ब्लॉग पर ही लिख सकते थे। लिख तो फ़ेसबुक पर भी सकते थे लेकिन अगर वहां लिखते तो हम इत्ता लंबा कमेंट वहां नहीं लिखते। रात को पढ़कर लाइक करके फ़ूट लिये होते। आपकी तमाम बहस-विवाद वाली तमाम पोस्टें जो ब्लॉग पर हैं वे हम फ़ौरन खोजकर पढ़ सकते हैं। फ़ेसबुक और दूसरे तुरंता माध्यमों पर -इट इज हेल ऑफ़ द टॉस्क! :)

    समय के साथ लोगों की धारणायें भी बदलती हैं। डेढ़ साल पहले हमने एक पोस्ट लिखी थी - ब्लॉगिंग, फ़ेसबुक और ट्विटर . उस पर आपका कहना था- ब्लॉग जगत में निश्चय ही एक मरघटी का माहौल बन रहा है ..हमें कोई खुशफहमी नहीं पालनी चाहिए ….

    इसी पोस्ट पर आपके घोषित शिष्य संतोष त्रिवेदी की टिप्पणी थी- फेसबुक की लत छूट चुकी है,ट्विटर पर यदा-कदा भ्रमण कर लेते हैं पर ब्लॉगिंग पर नशा तारी है ! जब तक खुमारी नहीं मिटती,लिखना और घोखना जारी रहेगा !

    आज की स्थिति में ब्लॉग के प्रति आपका लगाव बरकरार है। और आपने लिखा भी -अपने आब्सेसन के चलते ब्लागिंग का दामन थामे हुए हैं मरघट में किसी का इंतजार करेंगे कयामत तक। संतोष त्रिवेदी उदीयमान ब्लॉगर से ब्लॉगिंग में अस्त से हो चुके हैं। फ़ेसबुक की लत दुबारा लगा गयी है। प्रिंट मीडिया में घुसड़-पैठ शुरु है और काफ़ी जम भी गयी है। आगे और जमेगी, जमे शुभकामनायें।

    जो सूरमा ब्लॉग को पिछड़ा बताकर फ़ेसबुक और ट्विटर पर जाने की बात कह रहे हैं उनको यह याद रखना चाहिये कि उनकी पहचान अगर है, कुछ लोग उनको जानते हैं तो वह सब एक ब्लॉगर होने के चलते है। वर्ना फ़ेसबुक और ट्विटर में अनगिन लोगों के हजारों, लाखों फ़ालोवर होंगे। कौन जानता है उनको?

    और किसी का पता नहीं लेकिन अपन ब्लॉगिंग अपन के लिये घर जैसा लगता है। जितनी सहजता यहां हैं मुझे उतना और कहीं नहीं। इसीलिये अपन ब्लॉगिंग से जुड़े हैं और लगता है कि आगे भी जुड़े सहेंगे।
    प्रत्‍युत्तर दें
    उत्तर
    1. अनूप जी ,
      प्रिंट मीडिया की व्याप्ति /पहुंच अब बहुत सीमित भौगोलिक क्षेत्रों तक रह गई है ! सोशल मीडिया वैश्विक है!
      भारत की किसी भी पत्रिका /समाचार पत्र की कितने दूर तक पहुँच है ?
    2. प्रिंटमीडिया की भौगोलिक व्याप्ति सिमटी है लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया के कंधे पर चढ़कर तो अभी भी यह दुनिया जहान तक पहुंचती है। :)
 और अभी तो प्रतिक्रियाओं का दौर जारी है ,

चलिए अब चलते चलते आपको कुछ एक लाइना पोस्ट लिंक थमाए देते हैं ,

१.पढ लें धनुष के बारे में : सिलेमा इसके बाद देख लीजीएगा

२.जो तेरा है वो मेरा है : फ़िर क्यों चिंताओं ने घेरा है

३.उत्तराखंड के संकट में लोकतंत्र लापता :  न लोक का ही न ही तंत्र का है पता

४.जिंदगी यूं ही कटती रही : धूप छांव सी सिमटती रही

५.विंडो ८ में लगाएं विंडो ७ जैसा स्टार्ट बटन : और स्टार्ट करते ही पोस्ट लिखें :)

६.संजय जी कुमुद और सरस को अब तो मिलाइए : जी आप सीरीयल देखते जाइए

७.राहुल बाबा का जन्मदिन बडा या मदद : अकल बडी या भैंस :)

८.पीने में रम गया है मन : रम का नाम सुनके ही मन हुआ प्रसन्न :)

९.ये आपदा सीख भी देती है : मगर हम कतई नहीं लेते , आदत से मजबूर

१०.आज का प्रश्न : हल करिए जी

चलिए आज के लिए इतना ही फ़िर मिलते हैं , नई बुलेटिन में , नए ब्लॉग पोस्टों और नई प्रतिक्रियाओं को समेटे हुए , तब तक उत्तराखंड पीडितों के लिए दुआ करते रहें , पढते रहें , लिखते रहें ।

शुक्रिया .....................

मंगलवार, 25 जून 2013

काश हर घर मे एक सैनिक हो - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

पवन जी का यह कार्टून सब कुछ कह रहा है सो मैं नया कुछ कह कर आप लोगो और आज की बुलेटिन के बीच बाधा नहीं बनूँगा !

सादर आपका 

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राजनीति चालू आहे - - - - - - mangopeopl

ब्‍लॉग कार्यशाला में आप सादर आमंत्रित हैं।

ब्लॉगिंग के ९ वें वर्ष में प्रवेश..

अचानक ..

छज्जू दा चौबारा

आज का केदारनाथ मंदिर और सन 1882 की तस्वीरें

जिज्ञासा जगाता है गाँधी का ब्रह्मचर्य प्रयोग

माइक्रोसॉफ्ट office 2010 डाउनलोड करे

सोनिया, मनमोहन ने पर्यटकों का रास्ता रोका !

जियो तो जानूं

मेरा ही मिजाज !!!

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

सोमवार, 24 जून 2013

श्रद्धांजलि ....ब्लॉग बुलेटिन

ब्लॉग बुलेटिन के सभी मित्रों को हार्दिक नमस्कार।



पिछला हफ्ता काफी उथल - पुथल भरा रहा है। उत्तराखंड में आई प्राकृतिक आपदा से वहाँ लगभग 60 हज़ार से अधिक लोग प्रभावित हुए। इस विनाशलीला में हजारों लोग मारे गए तथा ना जाने कितने ही लोग घायल हुए। इस घटना ने कईयों का जीवन ही बदल दिया। इस प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों को ब्लॉग बुलेटिन परिवार अपनी नम आँखों से श्रद्धांजलि अर्पित करता है।

अब रुख करते हैं बुलेटिन  की और ....

                                                   
                              प्रदूषण का बढ़ता दायरा और भोजन में घुलता जहर

                                          बुजुर्ग हमारी शान है अपमान नहीं ...

                                                   एक हमसफर चाहिए.

                                                 केदारनाथ आपदा पर........

                                                   पागलनामा- पार्ट पाँच

                                राहत और बचाव के बाद उससे बड़ी चुनौती सामने

                                                         ख़ुदा खैर करे 

                                                  हिमालय तुम क्यों रोये

                                                      उत्तराखंड के सबक     

                                                         चाहता है मन....

                                                         किसान की घड़ी


अब आज्ञा दीजिये। कल फिर मिलेंगे।

लेखागार