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शनिवार, 9 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (3)

ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -
अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का तीसरा भाग ...


गुलमोहर सिर्फ वृक्ष नहीं 
फूल नहीं 
एक चेहरा भी होता है 
जिसकी रेखाओं में यादें साँसें लेती हैं 
…… 
कभी सुनो उन साँसों को 
यादों की लुकाछिपी से कई चेहरे निकल आयेंगे 
और अपनी अपनी दास्ताँ सुनाएँगे = 


(अनुपमा पाठक)

अपने आप को समझाने के लिए ही लिखते हैं हम, किसी हताश क्षण में ये भी अपने लिए ही लिखा होगा तब... उस वक़्त शीर्षक नहीं लिखते थे पर तारीखें हैं लिखी हुई... २६.३.१९९८ को लिखित यह रचना जिस मनःस्थिति में लिखी गयी होगी, उस मनःस्थिति का सामना तो हम सब ही करते हैं... जीवन है तो हताशाएं भी हैं... निराशा भी है... और कविता इन्हीं विडम्बनाओं के बीच से जीवन खोज निकालने का भोला भाला सा प्रयास ही तो है... तब की उकेरी कुछ पंक्तियाँ वैसे ही उतार ले रहे हैं यहाँ... अपने लिए... अपने अपनों के लिए! 

एक रौशनी... एक किरण
कहीं दूर हुआ उसका अवतरण
मन उल्लासित हो उठा
आगे बढ़ने की उत्कंठा से मचल उठा
रौशनी ने जो स्फूर्ति का संचार किया
विश्रामरत क़दमों ने आगे बढ़ने पर विचार किया 

अन्धकार के भय से रूकने वालों... पंछियों को उड़ते देखो
तम का सीना चीरते देखो
अरे! तुम तो मनु की संतान हो
प्रभु की अनंत कृतियों में सबसे महान हो
यूँ हताश हो महफ़िल से उठ गए
ज़िन्दगी से यूँ रूठ गए
मानों जीवन एक अभिशाप हो
जीना दुष्कर हो... दुराग्रहपूर्ण ताप हो
ठोकर खाने में बुराई नहीं है
पर गिर कर गिरे रहना कोई चतुराई नहीं है...

याद है...
कुछ समय पहले की ही बात है
नन्हे कदम डगमग कर चलते थे
हज़ार फूल राहों में खिलते थे
तुम्हें ठुमक ठुमक कर चलता देख
मात पिता के प्राण खिलते थे
तुम अनायास गिर जाते थे
मगर फिर उठकर दूनी गति से भाग पाते थे
चाहत ही कुछ ऐसी थी कि नाप लें ज़मीं
नया नया चलना सीखा था... अच्छी लगती थी घास की नमीं 

दिमाग पर जोर डालो
और उस भावना को खोज निकालो
जो वर्षों पहले दफ़न हो गयी
तुम्हारे भोले भाले बाल मन की कफ़न हो गयी 

सरल मधुर सा था स्वभाव
दौड़ने की चाह में विश्रामगृह बने कई पड़ाव 

पर याद करो... तुम बढ़ जाते थे
गिरने के बाद स्वयं संभल जाते थे
कुछ पल के लिए दर्द रुलाता ज़रूर था
पर तुम्हारे अन्दर सीखने का कुछ ऐसा सुरूर था
कि चोटों पर ध्यान ही गया कहाँ
लगता था जैसे अपना हो सारा जहां
माँ की ऊँगली पकड़ चलते थे
आत्मनिर्भर होने को मचलते थे 

क्या स्मरण नहीं तुम्हें तुम्हारा वह अतीत
जब तन्मयता थी तुममें आशातीत
निर्मल निश्चल थी तुम्हारी काया
तुमने स्वयं रघुनन्दन का रूप था पाया 

उन मधुर क्षणों को याद कर
जरा सा बस प्रयास कर 

आज भी तो सुख दुःख की ऊँगली थामे ही चलना है
नन्हे बालक की तरह गिरकर पुनः संभलना है  

जो भोला भाला मनु स्वरुप
आज कहता है जीवन को कुरूप
उसे ज़िन्दगी के करीब ले जाना है
निराश हताश मन को तुम्हें अमृतपान कराना है...!!!


A journalist,writer and always a learner(प्रतिभा कटियार)

उसकी आंखों में जलन थी
हाथों में कोई पत्थर नहीं था।
सीने में हलचल थी लेकिन
कोई बैनर उसने नहीं बनाया
सिद्धांतों के बीचपलने-बढऩे के बावजूद
नहीं तैयार किया कोई मैनिफेस्टो।
दिल में था गुबार कि
धज्जियां उड़ा दे
समाज की बुराइयों की ,
तोड़ दे अव्य्वास्थों के चक्रव्यूह
तोड़ दे सारे बांध मजबूरियों के
गढ़ ही दे नई इबारत
कि जिंदगी हंसने लगे
कि अन्याय सहने वालों को नहीं
करने वालों को लगे डर
प्रतिभाओं को न देनी पड़ें
पुर्नपरीक्षाएं जाहिलों के सम्मुख
कि आसमान जरा साफ ही हो ले
या बरस ही ले जी भर के
कुछ हो तो कि सब ठीक हो जाए
या तो आ जाए तूफान कोई
या थम ही जाए सीने का तूफान
लेकिन नहीं हो रहा कुछ भी
बस कंप्यूटर पर टाइप हो रहा है
एक बायोडाटा
तैयार हो रही है फेहरिस्त
उन कामों को गिनाने की
जिनसे कई गुना बेहतर वो कर सकता है।
सारे आंदोलनों, विरोधों औरसिद्धान्तों को
लग गया पूर्ण विराम
जब हाथ में आया
एक अदद अप्वाइंटमेंट लेटर....


संवेदनाओं को झकझोरने वाली घटनाएँ इन दिनों आम है . ट्रैफिक  सिग्नलों पर लगे छिपे कैमरे आम जानता की संवेदनहीनता को बड़ी मुस्तैदी से रिकोर्ड कर उनका चेहरा बेनकाब करने में जुटे हैं , जैसा की अभी कुछ दिन पहले जयपुर में  एक दुर्घटना में घायल परिवार से राह से  गुजरते लोगों की संवेदनहीनता को उजागर किया . सुसंस्कृत और परम्पराओं से गहरे जुड़े होने वाले इस शहर की संकल्पना को जबरदस्त झटका लगा  . जागरूक नागरिक ठगा सा खड़ा सोचता ही रहा है कि आखिर हमारे अपने इस शहर के लोगों को हुआ क्या है , संवेदनहीनता का ग्रहण  लगा कैसे . एक भागमभाग लगी है इन दिनों , सबको चलते जाना है जैसे भीड़ का हिस्सा बनकर , कौन राह में खो गया , किसी को खबर नहीं , ना ही जानने की उत्सुकता ,  जब तक हमारे काम का है , तब तक पूछ , उसके बाद जैसे कोई पहचान ही नहीं ...गीत याद आता है " मतलब निकल गया है तो पहचानते नहीं , जा रहे हैं ऐसे जैसे हमें जानते नहीं ". इससे भी बढ़ कर यह की जिससे मतलब ही नहीं , उसे पहचाने क्यों !! 
कब घर कर गया यह चरित्र हम सबमे , हमारे शहर  में , पता ही नहीं चला ....

मैं लौटती हूँ पीछे , ज्यादा नहीं यही कोई लगभग दस वर्ष पहले ही , घर से ऑफिस की डगर पर पतिदेव के स्कूटर को पीछे से टक्कर मारी जीप ने , स्कूटर सहित गिरे तो बाएं पैर में वहीँ फ्रैक्चर नज आया , आस पास खड़े लोगो में से एक सहृदय ने उनके स्कूटर पर बैठकर घर छोड़ा और गेट से अन्दर तक गोद में उठा कर छोड़ कर गया . इस घटना से भी कई वर्षों  पहले  एक दिन राह चलते पुरानी  मोपेड में साडी अटकी और सँभालते हुए भी  आखिर गिरने से बचे नहीं , गोद में छह महीने की बच्ची साथ में , पटलियों में से साडी तार -तार . आस पास के घरों से ही एक महिला सहारा देकर अपने घर ले गयी , अपनी साडी पहनने को दी , अजनबी होने के बावजूद उसे हिचक नहीं थी कि  पता नहीं मैं साडी वापस करुँगी भी या नहीं . 
खट्टे- मीठे , अच्छे- बुरे अनुभवों का सार ही है ये जीवन , एक पल में ही आशा टूटती है तो कोई दूसरा पल आस बंधाता  भी , मगर टूटन का समय , अनुभव अधिक लम्बा हो तो भीतर एक शून्य भरता जाता है ...
कैसे बदल गया यह  माहौल , यूँ ही तो नहीं ...कुछ घाव कही तो लगे होंगे जिसने भीतर की करुणा के कलकल बहते स्त्रोत को सोख लिया , प्रशासनिक , सामाजिक ,आर्थिक मजबूरियां लग गयी है हमारे कोमल स्वाभाव , परदुखकातरता को दीमक की तरह ...

शब्दों में लिख कर , बोल कर उस घटना की संवेदनहीनता पर खूब चर्चा कर ले मगर कैसे ...

क्या राह पड़े किसी राहगीर को घायल देखकर हम रुक पाते हैं ....रुकना चाहे तो याद आ जाते है वे किस्से थे कि  रुके थे कुछ लोग , अपना पर्स , घड़ियाँ , गंवाने के अलावा  मारपीट के भी  शिकार हुए . अविश्वास ही भारी तारी रहता है हर समय !

बदल गया है ये जहाँ ..हो हल्ला कर अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने वालों का मजमा लगा होगा , वास्तव में भले किसी गिरे हुए को सिर्फ हाथ पकड़कर भी ना उठाया होगा , मगर नाम लाभ  लेने को तैयार ...प्रेम , करुणा , संवेदना पर सबसे अधिक चर्चा करने वाले वही जिन्होंने कभी कुछ किया नहीं हो  !
  
स्वयं द्वारा कभी की गयी इस  अनदेखी पर ग्लानि हो तो को बात समझ आती है , वर्ना तो सिर्फ शब्द है , बातें है...
बातें है बातों  का क्या !!

बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जायेगी -  कुछ सही लिबास में कुछ चीथड़ों में और सही पर मेरी नज़र टिकती ही है :)

17 टिप्पणियाँ:

vibha rani Shrivastava ने कहा…

खट्टे- मीठे , अच्छे- बुरे अनुभवों का सार ही है ये जीवन , एक पल में ही आशा टूटती है तो कोई दूसरा पल आस बंधाता भी , मगर टूटन का समय , अनुभव अधिक लम्बा हो तो भीतर एक शून्य भरता जाता है ...

vandana gupta ने कहा…

जीवन का यही है रंग रूप्………बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर लिंक्स हैं दी......
बड़ी प्यारी श्रंखला है ये.....
आभार
अनु

अनुपमा पाठक ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति...!

आभार!

नीलिमा शर्मा ने कहा…

उम्दा लिनक्स आने वाली हरेक कड़ी का इंतज़ार रहेगा

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

यादों की लुकाछिपी से कई चेहरे निकल आयेंगे
और अपनी अपनी दास्ताँ सुनाएँगे

बहुत सुंदर !

संजय भास्‍कर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुतिकरण

Digamber Naswa ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति ... अच्छे लिंक ...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

जबाब नहीं दी के चुने हुए फूलों का !!

sadhana vaid ने कहा…

सारी प्रस्तुतियाँ बहुत ही सार्थक एवँ सशक्त ! हर प्रस्तुति आत्मावलोकन के लिये निश्चित रूप से प्रेरित करती है !

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अब अवलोकन २०१३ का यह समय रथ धीरे धीरे रफ्तार पकड़ने लगा है ... और ऐसा हो भी क्यों जब सारथी आप जैसा हो ... जय हो दीदी !

वाणी गीत ने कहा…

बहुत आभार !

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

जय हो............

Udan Tashtari ने कहा…

बढ़िया

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुतिकरण

shikha varshney ने कहा…

एक से बढ़कर एक सब .. शानदार .

Saras ने कहा…

बहोत सुन्दर लिंक्स ..आपकी यही नज़र तो वह ढूंढ लेती है जो हम नहीं देख पाते ..इसकी वजह है आपकी लगन ..सतत मेहनत ...जो बढ़िया से बढ़िया लेखन हम तक पहुँचाने को आतुर हैं....बहोत बहोत आभार रश्मिजी

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