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गुरुवार, 7 नवंबर 2013

प्रतिभाओं की कमी नहीं 2013 (1)

आज से हम शुरू कर रहे है ब्लॉग बुलेटिन का ख़ास संस्करण -
अवलोकन २०१३ ...

कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०१३ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०१३ का पहला भाग ...

प्रतिभाओं का कोई अंत नहीं - इसकी उड़ान,इसकी खोज,इसके हस्ताक्षर मील का पत्थर होने का अमिट इतिहास रचते हैं  . वे नहीं होते प्रशंसा के मोहताज,उनकी अपनी धुन होती है ! बुद्ध का गंतव्य बुद्ध की उत्कंठा थी,अनुकरण,अनुसरण - बुद्ध की माँग नहीं थी  . 
2013 की यात्रा अनवरत हुई,कुछ पाने कुछ खोने के साथ 2014 के करीब है वह  .... अपने लिखित चिन्ह लिए  . आलोचना-समालोचना की पैनी धार पर चलकर,निखरकर मेरी नज़र से जो प्रतिभाएँ गुजरी हैं,उनको विगत वर्षों की तरह मैं बुलेटिन के प्रतिभावान लिंक्स मंच पर लेकर आई हूँ =

ना कविता लिखता हूँ ना कोई छंद लिखता हूँ अपने आसपास पड़े हुऎ कुछ टाट पै पैबंद लिखता हूँ ना कवि हूँ ना लेखक हूँ ना अखबार हूँ ना ही कोई समाचार हूँ जो हो घट रहा होता है मेरे आस पास हर समय उस खबर की बक बक यहाँ पर देने को तैयार हूँ ।(सुशील कुमार जोशी)

सच को बस छोड़कर 
सब कुछ चलता हुआ 
दिखाई देता है 
सच सबके पास होता है 
जेब में कमीज और पेंट की 
हाथ में कापी और किताब में 
एक के सच से दूसरे को 
कोई मतलब नहीं होता है 
अपने अपने सच होते हैं 
सब का आकार अलग होता है 
जैसे किसी के पैर की 
चप्पल या जूता होता है 
एक का सच दूसरे के 
काम का नहीं होता है 
कोई किसी के सच के 
बारे में किसी से 
कुछ नहीं कहता है 
हाँ झूठ बहुत ही 
मजेदार होता है 
सब बात करते हैं झूठ की 
झूठ का आकार नहीं होता है 
एक का झूठ दूसरे के भी 
बहुत काम का होता है 
पर किसी को पता नहीं होता है 
झूठ कहाँ होता है 
सूचना का अधिकार 
झूठ को ही ढूंढने का 
ही हथियार होता है 
सबसे ज्यादा चलता हुआ 
वही पाया जाता है 
सच बेवकूफ 
मैं सच हूं सोच सोच कर 
एक जगह ही बैठा रह जाता है 
जहाँ पहुचने की कोई 
सोच भी नहीं सकता 
झूठ जरूर पहुंच जाता है 
झूठ के पैर नहीं होते है 
बहकाने के लिये ही शायद 
कह दिया जाता है !


देहाती,भदेश,असामाजिक जिससे सभी मित्र,रिश्तेदार अक्सर नाराज रहते है और घंमडी भी कहते है ऐसा आवारा किस्म का इंसान जो बोलता ज्यादा है करता कुछ भी नही...जिन्दगी बेतरतीब जीने की आदत है अतीत का व्यसन है,वर्तमान नीरस है और भविष्य का कोई नियोजन नही है सो जिन लोगो को असफल लोगो से प्यार है उनका स्वागत है। लिखने पढने का शौक तो नही कह सकता पर कभी कभी कुछ मन मे होता है तो कह देता हूं, डिग्री,पदवी,ओहदे से कोई ताल्लुक नही है वैसे मज़ाक मज़ाक मे पी.एच.डी. हो गई है वो भी मनोविज्ञान में। खुद को तो कभी समझ नही पाएं दूसरो को क्या खाक समझेंगे? सो ना सलाह देता हूं ना लेता हूं अदब से थोडा कमजोर हूं और आदत से जज़्बाती... बस यही परिचय है अपना इसमे मेरा कुछ भी नही है सब कुछ उधार का है।(डॉ.अजीत )

उससे बिछडते वक्त  
एक आखिरी सलाह
देना चाहता था वह
लेकिन
न जाने क्यों
लब कंप कपा गए
और शब्द अपना
अर्थ खो बैठे
आखिरी वक्त पर
दी जाने वाली सलाह
वैसे तो नसीहत सी लगती है
लेकिन न माने जाने
की पर्याप्त सम्भावना होने के बावजूद भी
दिल कह ही उठता है
कुछ करने और कुछ न करने के लिए
वक्त,समीकरण और
सम्बन्धो की धुरी के आसपास
घूमता शब्दों का दायरा
प्रयास तो करता है
अर्थ को अनर्थ से बचाने का
लेकिन
संयोग या विडम्बना देखिए
जब वक्त अंतिम होता है
सम्बन्धो की जोड-तोड का
तब
सलाह नसीहत लगने लगती है
और नसीहत का प्रतिरोधी होना
अंतिम सलाह के अर्थ,मूल्य और महत्व को समाप्त कर
सम्बन्धो की परिभाषा बदल देता है
अंतिम सलाह अर्थहीन हो जाती है
लोग सयाने लगने लगते है
सलाह
मात्र एक बौद्धिक प्रलाप...।

जन्मस्थान प्रतापगढ़ 
निवास लखनऊ 
रूचि ---मन के भावो को पन्नो पर उतारना
 कुछ पढना ,कभी लिखना ,
सामाजिक कार्यों  में  छोटा सा योगदान 
अपनी  संस्था  स्वयंसिद्धा  के  द्वारा 
 --NGO --"Swayam Siddha"
Secretary & Founder Member · Aug 1, 2011 to present(दिव्या शुक्ला )

सुनो --तुम कह तो रहे हो परंतु पाँव में बंधी सांकल कैसे तोड़ दूँ
हाँ वो मै ही हूँ जो इस कायनात को ठोकर मार सकती थी कभी
फिर क्यूँ कमजोर पड़ रही हूँ सोचती हूँ फूलों में गुजरने का समय तो
कांटो को चुनने में गुजर गया या सोच लो हमने ही स्वयं गुज़ार दिया
तुम नहीं जानते उन कांटो की पीड़ा बहुत कम थी इन जहरीले फूलों के दंश से तो बहुत ही कम तुम जानते हो वो लोहे की मजबूत सांकल जो कैदीयों के पांव में बांधते है उन्हें क्या कहते है वो बेडियाँ कहलाती है न ? ऐसी ही एक बेड़ी कब की तोड़ डाली मैने
-कब तक भागती कहाँ तक भागती --उससे वो व्याघ्र था -एक चतुर व्याघ्र
उस सुनहरी गुफा के हर कोने में खोजती उसकी दो पैनी निगाहें हर समय इर्दगिर्द होती
मानो शरीर से हड्डियों तक आरपार देख रही हो मौका मिलते ही दबोच लेते दो भयानक पंजे जिनके नख बहुत पैने थे --जबड़े बहुत भयानक ऐसे की समूची हड्डियों तक को निगल जायें ---परंतु हिरणी निकल गई उस के पंजे से सुरक्षित
आत्मा में धधक रही प्रतिशोध की अग्नि लिए परंतु आहत मन पर खरोंचे भी थी
--सोने की उस लंका को दुत्कार गहबर बन में भटकने अपने छौनो के साथ सारे साम्राज्य पर निर्द्वंद राज्य करने वाला व्याघ्र तिलमिला कर रह गया
वह नहीं भूला अपनी हार -----हाथ आई उसके केवल टूटी हुई कड़ियाँ
उसे ढूंढता है मन में लिए प्रतिकार एवं अवसर मिलते ही करता है आघात बार बार
सांकले तोड़ दी मैने ---टूटी सांकलों की कड़ियाँ सहेज़ रखी है उसने ---
अब थक गई हूँ बंद लिया स्वयं को गुफा में --रोशनी एक किरण बस बहुत है मेरे लिए
परंतु मै हारी नहीं हारूंगी भी नहीं --लंका ध्वस्त करने का हौसला जुटाती हूँ अब भी
मै सीता नहीं पर पथभ्रष्ट भी नहीं वो राम नहीं पर रावण के साथ था फिर कोई और उपाय भी नहीं था लंका त्यागने के सिवा ----अतीत चुभता है वर्तमान मुंह चिढाता है -- हाथ खाली हैं ममता संबल है परंतु नन्हे छौने अब स्वालम्बी हैं बन में अपना रास्ता स्वयं बना लेंगे -- मोह धीरे धीरे खतम हो रहा परंतु सत्य यही है वैराग्य नहीं मन में क्रोधाग्नि धधक उठती है प्रतिकार की --एक छण को घृणा होती है विश्वास नहीं होता अब कहीं किसी पर -----एक पल कोमल भाव उठे नहीं कि व्याघ्र के तीक्ष्ण नख न जाने कहाँ से सामने आ जाते और दूर छितिज में टंकी दो आँखे दिखती जो सब देख कर भी मुंद जाती थी शायेद धन का पलड़ा भारी था उन पर अग्नि के समक्ष लिए वचन स्वर्ण की सुनहरी आभा के आगे बिसर गये --- घिन आती है उन पर ही अपराधी वही है --सत्य यही है रक्षा का वचन लेने वाला ही अपराधी होता है न अगर वह अपने कर्तव्य से विमुख हो जाए वह भी लोभ में --सांकले तो अब भी हैं पर --शायेद नियति में यही लिखा है --आखिर रक्त पिपासु व्याघ्र से कहाँ तक लड़ पायेगी हिरणी --समाज भी तो समर्थ के होता साथ है सत्य के साथ तो अधिकांशतः अपने भी नहीं होते !!

अब जब प्रतिभाओं की वार्षिक नदी उफान पर है तो लहरें आती रहेंगी - एक के बाद एक 
इंतज़ार बना रहे :)

24 टिप्पणियाँ:

vandana gupta ने कहा…

सांकले तोड़ दी मैने ---टूटी सांकलों की कड़ियाँ सहेज़ रखी है उसने ---
अब थक गई हूँ बंद लिया स्वयं को गुफा में --रोशनी एक किरण बस बहुत है मेरे लिए
परंतु मै हारी नहीं हारूंगी भी नहीं --लंका ध्वस्त करने का हौसला जुटाती हूँ अब भी

प्रतिभाओं का अवलोकन कितनी खूबसूरती से करा रही हैं आप …………जो पढने रह गये वो भी पढने को मिल जायेंगे और कुछ दिल को छूती पोस्ट दोबारा पढ्ने का आनन्द ही अलग होता है…………बहुत बढिया आयोजन्।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार एक उत्कृष्ट प्रयास के लिए..

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति...आभार एक उत्कृष्ट प्रयास के लिए..

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

Bahut hi sundar prastuti... Ye chuninda rachanaayen sachmuch apne khare hine ka saboot hain..
Meri or se Rashmi Di ka aabhaar aur rachanakaar tray ke liye shubhkaamnaayen!!

Shikha Gupta ने कहा…

- झूठ का पाँव नहीं होते ...सच है . उसके पंख उग आते हैं
बहुत कटु है ...
- सलाह ...वाकई बौद्धिक प्रलाप बन कर रह गयी है ...या शायद ....फ़िज़ूल की बात
- सांकल तो अब भी हैं ....कितना कुछ कहती है ये अकेली पंक्ति ....मार्मिक प्रस्तुति
- मैंने तो एक भी रचना पहले नहीं पढ़ी थी ..तो मेरी तो आज दावत हो गयी ...शुक्रिया रश्मि जी :)

vibha rani Shrivastava ने कहा…

कहाँ से शुरू करूँ

रविकर ने कहा…

बहुत बढ़िया है आदरेया-
आभार आपका-

शिवम् मिश्रा ने कहा…

रश्मि दीदी ,
अवलोकन २०१३ की इस शानदार शुरुआत पर हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनायें स्वीकार करें !

Archana ने कहा…

शुभकामनाएं ... मैंने भी आज ही पढ़ी ...इसी बहाने और भी मिलेंगी ...बहुत खुश हूँ ..

सुशील कुमार जोशी ने कहा…

शब्द नहीं हैं
बस एक
आभार है
कई बार है
बार बार है !

expression ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनाएं.....
सच्चे मोतियों को माला में आप ही पिरो सकती हैं..
आभार दी.
सादर
अनु

Pramod Mishra ने कहा…

उच्च स्तरीय लेखन पड़ कर मन खुश हुवा हर शब्द में अलग ही महक का अहसास होता हे

Pramod Mishra ने कहा…

उच्च स्तरीय लेखन पड़ कर मन खुश हुवा हर शब्द में अलग ही महक का अहसास होता हे

ranjana bhatia ने कहा…

अंतिम सलाह के अर्थ,मूल्य और महत्व को समाप्त कर
सम्बन्धो की परिभाषा बदल देता है
अंतिम सलाह अर्थहीन हो जाती है
लोग सयाने लगने लगते है
सलाह
मात्र एक बौद्धिक प्रलाप...।
bahut sundar abhaar is ko padhwaane ke liye ...behtreen

Rachana ने कहा…

bahut sunder prastuti rashmi ji

sadhana vaid ने कहा…

बहुत ही सुंदर आयोजन ! आपके माध्यम से उन रचनाओं को पढ़ने का सुयोग मिल पा रहा है जो आज तक पहुँच से दूर थीं ! आपका बहुत-बहुत आभार रश्मिप्रभा जी ! हृदय से धन्यवाद !

Udan Tashtari ने कहा…

अनेक शुभकामनाएँ...बहुत सुन्दर

दर्शन कौर धनोय ने कहा…

shubhkamnao sahit ...badhai

Tushar Raj Rastogi ने कहा…

जय हो

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति......

रेखा श्रीवास्तव ने कहा…

bahut din baad net dekha aur aaj pata chala ki itani sari kadiyan aap daal chuki hain. ab ek ek kar padhati hoon.

Saras ने कहा…

रश्मिजी आपके चयन कि सदा कायल रही हूँ.....आपकी बदौलत...बहोत कुछ अच्छा पढ़ने को मिल जाता है ...आभार ...सुन्दर उत्कृष्ट चयन....

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

नित कुछ नयापन... बहुत सुन्दर आयोजन किया है. बहुत आभार एवं शुभकामनाएँ.

Divya Shukla ने कहा…

आभार रश्मि जी
बहुत बहुत आभार
मेरी रचना का चयन करने के लिए
हार्दिक आभार धन्यवाद -

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