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रविवार, 28 जुलाई 2013

५ रुपये मे भरने का तो पता नहीं खाली हो जाता है - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों,
प्रणाम !

जो कहते है कि पाँच रुपये में पेट भर जाता है,
 वो कान खोलकर सुन लें...
 इस देश में पेट खाली करनें का ही पाँच रुपया लग जाता है...

सादर आपका 
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जिन्दगी पैर नहीं तो पहियों पर भी चल ही लेती है

RAJIV CHATURVEDI at Shabd Setu
" जिन्दगी पैर नहीं तो पहियों पर भी चल ही लेती है , खुदा खुदगर्ज था हम जिन्दगी को तनहा तलाशने निकले ." --- राजीव चतुर्वेदी

एक गरीब माँ के सपने..............!!!

इस भयानक रात में मुसलाधार बरसात में अपने छोटे बच्चे को कलेजे से लगाये वो इस भयानक बरसात में कहाँ छुपाये वो रंग -बिरंगे प्लास्टिको से बनी झोपड़ी पानी -पानी हो रहा घर बरसात के होने से घर में एकमात्र खाट के नीचे वह अपने बच्चे को लेके लेटे वह सोचती ये बारिस कब रुकेगी कब वह दिन आयेगा जब अपना भी आशियाना होगा जीवन का तब नया सूरज निकलेगा खाने को अच्छा खाना होगा चारों ओर झोपड़े के अंदर पानी ही पानी बना है समुंदर सिर्फ खाट के नीचे बची थोड़ी सी जमीन जहाँ सीने से लगाये बच्चे को कोसती नसीब भूख से बेहाल बच्चा क्रन्दन कर रहा है बाहर मेघ भी आज गर्जन कर रहा है बालक के क्रन्दन से माँ की छाती फट रही है सू... more »

सम्मान : क्या भूलूं क्या याद करुं ?

महेन्द्र श्रीवास्तव at आधा सच...
मित्रों क्या भूलूं और क्या याद करूं, कुछ समझ में नहीं आ रहा है। दरअसल इस पोस्ट को लेकर मैं काफी उलझन में था। मैं समझ ही नहीं पा रहा हूं कि अपनी 200 वीं पोस्ट किस विषय पर लिखूं। वैसे तो आजकल सियासी गतिविधियां काफी तेज हैं, एक बार मन में आया कि क्यों न राजनीति पर ही बात करूं और देश की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी कांग्रेस से पूछूं कि 2014 में आपका प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है ? फिर मुझे लगा कि इन बेचारों के पास आखिर इसका क्या जवाब होगा ? क्यों मैं इन पर समय बर्बाद करूं। बाद में मेरी नजर तथाकथित तीसरे मोर्चे पर गई, ममता, मायावती, मुलायम और नीतीश कुमार, इनमें से क्या कोई गुल खिला स... more »

मन का रिश्ता

Archana at अपना घर
*यहाँ आपको मिलेंगी सिर्फ़ अपनों की तस्वीरें जिन्हें आप सँजोना चाहते हैं यादों में.... ऐसी पारिवारिक तस्वीरें जो आपको अपनों के और करीब लाएगी हमेशा... * *आप भी भेज सकते हैं आपके अपनेबेटे/बेटी/नाती/पोते या परिवार के किसी सदस्य के साथ आपकी तस्वीर उनका नाम और आपसे रिश्ता बताते हुए ........* *मेरे मेल आई डी- archanachaoji@gmail.com पर, साथ ही आपके ब्लॉग की लिंक ......बस शर्त ये है कि स्नेह झलकता हो तस्वीर में.....* * आज की तस्वीर में मिलीए दिलीप से उसके चंगू-मंगू के साथ (ये हमारे भी चंगू-मंगू हैं) ---- * जहाँ तक मुझे याद है ,मैंने पहला पॉडकास्ट दिलीप की कविता का ही किया था .... अफ़सोस कि द... more »

अभिषेक गोस्वामी की कहानी : मॉर्निंग वॉक

मनोज पटेल at पढ़ते-पढ़ते
*जयपुर में जन्मे अभिषेक गोस्वामी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की थिएटर इन एजुकेशन कं में अध्यापन और आज़ाद थिएटर निर्देशक एवं सलाहकार के तौर पर कार्य कर चुके हैं. उनका अपना थिएटर समूह ब्रीदिंग स्पेस चर्चा में रहा है और वे भारत के अलावा ओमान तथा चीन में भी रंगमंचीय प्रदर्शन कर चुके हैं. फोटोग्राफी और कविता का भी शौक. सम्प्रति अजीम प्रेमजी फाउंडेशन में रंगमंच विशेषज्ञ के तौर पर कार्यरत. कहीं भी प्रकाशित होने वाली यह पहली कहानी... * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * * *मॉर्निंग वाक : अभिषेक गोस्वामी * *श*र्मा जी को टी वी देखने की बहुत बुरी लत लग चुकी थी। घर में, अधिकतर समय रिमोट... more »

मूर्ख!

देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा
भेड़ो कें झुँड से अलग कर दी गई बकरी बकरियों के साथ नहीं रह पाया भेड़ सियार बनने के प्रयास में मारे गये कुत्ते खरगोशों ने दूर तक खदेड़ा सफेद चूहों को बिल्ली मारी गई कुत्तों के चक्कर में। शेर ने खाया बस पेट भर मौके का लाभ उठा स्वाद के लिए निरीह का खून पीते रहे दूसरे जानवर। जी नहीं पाया सुकून से जिसने स्वीकार नहीं किया जंगल का कानून। नहीं दिखते बिच्छुओं से डंक खाते जाने और... माफ करते रहने वाले साधू। क्या आप फँसे हैं कभी ऐसे जंगल में? नहीं...! ओह! निःसंदेह आप भाग्यशाली और बुद्धिमान हैं। .....................

प्रेमपत्र नंबर : 1409

प्रेमपत्र नंबर : 1409 जानां ; तुम्हारा मिलना एक ऐसे ख्वाब की तरह है , जिसके लिए मन कहता है कि , कभी भी ख़त्म नहीं होना चाहिए ... तुम जब भी मिलो , तो मैं तुम्हे कुछ देना चाहूँगा , जो कि तुम्हारे लिए बचा कर रखा है ...................................... एक दिन जब तुम ; मुझसे मिलने आओंगी प्रिये, मेरे मन का श्रंगार किये हुये, तुम मुझसे मिलने आना !! तब मैं वो सब कुछ तुम्हे अर्पण कर दूँगा .. जो मैंने तुम्हारे लिए बचा कर रखा है ..... कुछ बारिश की बूँदें ... जिसमे हम दोनों ने अक्सर भीगना चाहा था कुछ ओस की नमी .. जिनके नर्म अहसास हमने अपने बदन पर ओड़ना चाहा था और इस सब के साथ रखा है ... क... more »

मेरी नज़र से कुछ मील के पत्थर - 6 )

रश्मि प्रभा... at मेरी नज़र से
शब्दों को ओस में भिगोकर ईश्वर ने सबकी हथेलियों में रखे .... कुछ बर्फ हो गए,कुछ नदी बन जीवन के प्रश्नों की प्यास बुझाने लगे .................. शब्दों की कुछ नदियाँ, कुछ सागर मेरी नज़र से = ज्ञानवाणी: सपूत......एक लघु कथा पुराने ज़माने की बात है ....तब आज की तरह पानी के लिए नल और बोरिंग जैसी सुविधा नही थी ....सिर पर कई घड़ों का भार लिए स्त्रियाँ कई किलोमीटर दूर तक जा कर कुओं या बावडियों से पानी भार कर लाती थी एक बार इसी तरह तीन महिलाएं घर की जरुरत के लिए पानी भार कर ला रही थी ... तीनों ने आपस में बातचीत प्रारम्भ की ... पहली महिला ने कहा ..." मेरा पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् है ....शास... more »

हाय ये कुर्सी ! उफ़ ये कुर्सी

Anju (Anu) Chaudhary at अपनों का साथ
ओ! कुर्सी के निर्माता एक कुर्सी हमें भी भिजवा दो गर्दन और कंधे का दर्द मिटा दो || देखो ना... इसी कुर्सी के लिए नेताओं ने देश के हिस्से कर डाले अपनों ने, अपनों को ही मरवा डाला उफ़! इस कुर्सी की महिमा है निराली जो है आम जनता की उम्मीदों पर भारी || ओ-कुर्सी के निर्माता ये कुर्सी-लोक है घूम-फिर कर सबको यहीं है आना इस कुर्सी के लिए हर गठबंधन तोड़ा जाता झूठे बयानों का छींका किसी पर भी फोड़ा जाता बस !सबका सपना है ये कुर्सी अब ओर क्या कहूँ क्या क्या महिमा कुर्सी की मैं बताऊँ | हर नेता की आस है ये कुर्सी राजनीति की चाल है ये कुर्सी हत्याधारी, अत्... more »

हमारा ख़ूं-बहा

Suresh Swapnil at साझा आसमान
हमारा ज़र्फ़ गर मानिंदे-ए-दरिया हो गया होता तो पानी दो-जहां के सर से ऊपर बह रहा होता मरासिम टूटने के बाद ये: अफ़सोस मत करियो के: तुमने ये: कहा होता के: शायद वो: कहा होता ख़बर क्या थी हमें तुम ही हमारे हो ख़ुदा वरना तुम्हारी दीद से पहले वज़ीफ़ा पढ़ लिया होता बड़ा मासूम क़ातिल था के: 'हां' पे जां लुटा बैठा हमीं कुछ सब्र कर लेते तो शायद जी गया होता मेरे एहबाब मुंसिफ़ से अगर फ़रियाद कर आते तो तख़्तो-ताज से ज़्याद: हमारा ख़ूं-बहा होता तेरे इक फ़ैसले ने कर दिया बदनाम दोनों को न जलता दिल ... more »

जीवन

वो वृक्ष सघन,  कितना अपना  जो कड़ी धूप में  छाँह बना .  कितना अपना  वो पथ निर्जन, युग से दिन, बीते  जैसे क्षण .  रह-रह चुभता  जो शूल कहीं, चलने को  उसने भी गति दी .  जो छूट गया  कण-कण सुन्दर, आने वाला  हर क्षण सुन्दर .  - मीता .
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

11 टिप्पणियाँ:

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए धन्यवाद।

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

शुक्रिया
बहुत बहुत आभार

रश्मि प्रभा... ने कहा…

उत्कृष्ट लिंक्स और सच्ची खरी बात ....

vijay kumar sappatti ने कहा…

मेरी पोस्ट को शामिल करने के लिए धन्यवाद। दुसरे लिनक्स भी बहुत अच्छे है. आप सभी का शुक्रिया

रविकर ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति-

रविकर ने कहा…

पाँच रुपैया में सुलभ, शौचालय जब होय |
इक रोटी ही खाइये, अपने हाथे पोय |

अपने हाथे पोय, जमा के ईंधन कचड़ा |
होवे दुहरा काम, गैस का छूटा पचड़ा |

ढूँढो नीम हकीम, मील मिड डे भी भैया |
जहर जरा सा जीम, बचेंगे पाँच रुपैया-

Ranjana Verma ने कहा…

मेरी पोस्ट एक गरीब माँ के सपने .......को शामिल करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया !!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

as usual achche links...

मनोज पटेल ने कहा…

आभारी हूँ !!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

रोचक सूत्रों से सजा बुलेटिन..

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