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रविवार, 26 मई 2013

फ़िर से नक्सली हमला... ब्लॉग बुलेटिन

आज़ादी के पैसठ सालों के बाद भी यह सब समस्याएं? आज भी हमारे देश में यह अलगाववादी क्यों हैं? सरकार की आंतरिक आतंकवाद से लडनें की कोई नीति क्यों नहीं है...  

(तस्वीर गूगल से साभार)

आईए जानते हैं आखिर नक्सलवाद है क्या?

नक्सलवाद भारतीय कम्युनिस्टों के सशस्त्र आंदोलन का अनौपचारिक नाम है। नक्सल शब्द की उत्पत्ति पश्चिम बंगाल के छोटे से गाँव नक्सलबाड़ी से हुई है जहाँ भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी के नेता चारू मजूमदार और कानू सान्याल ने १९६७ मे सत्ता के खिलाफ़ एक सशस्त्र आंदोलन की शुरुआत की। मजूमदार चीन के कम्यूनिस्ट नेता माओत्से तुंग के बहुत बड़े प्रशंसकों में से थे और उनका मानना था कि भारतीय मज़दूरों और किसानों की दुर्दशा के लिये सरकारी नीतियाँ जिम्मेदार हैं जिसकी वजह से उच्च वर्गों का शासन तंत्र और फलस्वरुप कृषितंत्र पर वर्चस्व स्थापित हो गया है। इस न्यायहीन दमनकारी वर्चस्व को केवल सशस्त्र क्रांति से ही समाप्त किया जा सकता है। १९६७ में "नक्सलवादियों" ने कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों की एक अखिल भारतीय समन्वय समिति बनाई। इन विद्रोहियों ने औपचारिक तौर पर स्वयं को भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से अलग कर लिया और सरकार के खिलाफ़ भूमिगत होकर सशस्त्र लड़ाई छेड़ दी। १९७१ के आंतरिक विद्रोह (जिसके अगुआ सत्यनारायण सिंह थे) और मजूमदार की मृत्यु के बाद यह आंदोलन एकाधिक शाखाओं में विभक्त होकर कदाचित अपने लक्ष्य और विचारधारा से विचलित हो गया।

वैचारिक भटकाव

आरम्भ में नक्सली केवल सरकारी विचारधारा के खिलाफ़ मज़दूरों की आवाज़ बननें और उन्हे उनका अधिकार दिलानें की मानसिकता से बनें थे लेकिन उनकी यह विचारधारा मूलरूप से केवल विरोधजन्य थी। उनकी विचारधारा कभी भी किसी समाधान की ओर नहीं गई, और न ही उन्होनें किसी समस्या के समाधान को तलाशनें का प्रयत्न किया। इसी मज़दूर आन्दोलन और मजदूरों को अपनें साथ इसमें जोडे जानें के कारण उन्होनें कलकत्ते पर कई वर्ष राज किया और कांग्रेस की सरकार को बंगाल के बाहर खदेड दिया। 

कालान्तर में वामपंथी नक्सलवाद का केन्द्र की सरकार नें दुरुपयोग शुरु किया, इस समस्या से जनित विरोध का अन्त करनें की जगह उन्होनें हमेशा इस पर राजनीति खेली और इसका राजनीतिक फ़ायदा भी उठाया। नतीज़तन आंतरिक नक्सलवाद केन्द्र सरकार की कठपुतली बनकर रह गया और इसका वामपंथ से कोई वास्ता न रह गया। यह जो आप आज कल की नक्सलवादी हिंसा देखते हैं यह उन्ही का परिणाम है। आज कल का नक्सलवाद केवल सरकार विरोधी ही नहीं वरन देशद्रोही भी है। यह विदेशी दुश्मनों से सांठगाठ करते हैं और हिन्दुस्तान को अस्थिर करनें के लिए बाहरी दुश्मनों का साथ देते हैं। 

ढुलमुल सरकारी कार्यवाही

यकीनी तौर पर अब तक जो भी कार्यवाही हुई है वह नाकाफ़ी है और आज तक भी हमारी कोई नीति नहीं है। सेना और सीआरपीएफ़ के जवानों को नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जिस प्रकार के हथियारों और सुविधाओं की जरूरत चाहिए वह नदारद है। वह आज भी नक्सल क्षेत्रों में मैपिंग और ट्रैकिंग के लिए प्रयोग में आनें वाले उपकरणों की कमी से परेशान है। 

यदि नक्सल समस्या को जड से खत्म करना है तो फ़िर उनके खिलाफ़ आतंकवाद और देशद्रोह का मुकदमा चलना चाहिए। उन्हे देश के खिलाफ़ युद्ध छेडनें के समान ही अपराधी मानते हुए कार्यवाही होनी चाहिए। राज्य सरकारों और केन्द्र सरकारों को मिलकर इस समस्या को जड से समाप्त करनें के लिए प्रयत्न करना चाहिए। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में जनता की सुरक्षा और जनता का सरकारी तंत्र में विश्वास वापस लानें की दिशा में ठोस कार्यवाही होनी चाहिए... 

सोच कर देखिए, यह समस्या जितना हम सोच सकते हैं उससे भी कहीं अधिक गम्भीर है।

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चलिए आज के बुलेटिन की ओर चलें    
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तो मित्रों आज का बुलेटिन यहीं तक... कल फ़िर मिलते हैं एक नये रुप में.. तब तक के लिए देव बाबा को अनुमति दीजिए...

जय हिन्द
देव


9 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

जाने कितनी आहुतियाँ लेकर जायेगा, यह ढुलमुलपन।

Sushil Bakliwal ने कहा…

ये आतंकी सिलसिले ईश्वर ही जाने कहाँ और कैसे अमन-चैन की दिशा में लौट पाएँगे ?

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया बुलेटिंग

तुषार राज रस्तोगी ने कहा…

जब तक निकम्मी सरकार बनी रहेगी ये हमले होते रहेंगे और यह मामला ऐसे ही लटकता रहेगा | बढ़िया बुलेटिन भाई | जय हो |

Rajput ने कहा…

ढुलमुल सरकरी रवैये की वजह से ही खून-खराबा हो रहा है । सार्थक लेख

कविता रावत ने कहा…

नक्सलवाद के बारे में जानकारी शेयर करने हेतु धन्यवाद... ..बड़ी ज्वलंत समस्या है यह!...बहुत बढ़िया सार्थक बुलेटिन प्रस्तुति हेतु आभार!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

नक्सली समस्या का अगर समय पर हल कर लिया जाता तो आज यह नौबत नहीं आती ... अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच शुरू होगा आरोपों के आदान प्रदान का दौर ... इतना सब हो जाने के बाद भी इस समस्या के प्रति कोई भी संजीदा नहीं दिखता ! चाहे नेता मारा जाये ... कोई सैनिक शहीद हो या फिर कोई आम आदमी इस तरह की हिंसा का शिकार बने उस की जिम्मेदार राजनीति ही है !


सार्थक बुलेटिन देव बाबू !

सुज्ञ ने कहा…

जो लोग अन्याय अत्याचार का बहाना आगे कर इस हिंसा का प्रत्यक्ष परोक्ष अनुमोदन करते है, वे कुटिल भी अच्छे से जानते है इस हिंसा का परिणाम। हिंसक विचारधारा के यह लोग छुपे हुए हिंसा के प्रोत्साहक है। अराजकता फैलाना ही इनका ध्येय है। अन्याय इनको अच्छा बहाना मिल गया है किन्तु इनके कुटिल कर्म जो ऐसे ही फैलते गए तो इनके अन्याय से पीडित लोगों का भी एक बहुत बडा तबका खडा हो जाएगा। अभी तो हिंसा से समाधान का भ्रम फैला रहे है ऐसा ही हिंसक समाधान इन लोगों के विरूद्ध खडा होना अवश्यम्भावी है। हिंसा प्रतिशोधात्मक हिंसा को ही जन्म देती है। हिंसा किसी अन्याय का समाधान नहीं है, हिंसा से आज दिन तक न कभी अन्याय मिटा है न कभी समाधान आया है, हिंसा से प्रतिहिंसा ही उत्पन्न होती है। वामपंथी आकाओं डरो, यह हिंसक विचारधारा एक दिन तुम्हारा ही सर्वनाश कर देगी।सभी लोग अन्याय अत्याचार के बहाने हिंसा का कुटिल समर्थन कर रहे है. उन्हें समझा लेना चाहिए हिंसा प्रतिहिंसा से न्यायिक समाधान न कभी हुआ है न कभी होगा.हिंसा से तो फैलता है मात्र प्रतिशोध का चक्र, आज अत्याचार के बहाने जिनकी हत्याएं की जा रही है कल वे इस अत्याचार का बदला हिंसा से ही चाहेंगे. देश का दुर्भाग्य है कि यहां के बौद्धिक वर्ग में भी हिंसक विचारधारा की भरमार है.और वे ही उक्साते रहते है। समय रहते इनका इलाज अब हो जाना चाहिए…।

Sanjay Tripathi ने कहा…

नक्सली आतंकवाद से लडने के लिए इसी कार्य के लिए समर्पित एक विशेष सैनिकबल गठित किया जाना चाहिए जो उपयुक्त नेतृत्व,रणनीति एवं कार्ययोजना और शस्त्रों से सुसज्जित होना चाहिए.साथ ही लाल गलियारे के लिए विकास योजनाएं बनाई जानी चाहिए तभी नक्सलवाद का दमन और शमन हो सकेगा.

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