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शुक्रवार, 12 अप्रैल 2013

मत सोचा कर

प्रिये मित्रगण,

सादर नमन | पिछले कुछ दिनों से ना जाने किस सोच में डूबा पड़ा था | आज सोच टूटी तो एहसास हुआ के कुछ कमी खल रही है जीवन में | वो कमी बुलेटिन के खुद से दूर होने की थी | तो आज फिर से बहुत दिनों बाद बुलेटिन लगा रहा हूँ | बीते दिनों जीवन की अस्त-व्यस्तता और उधेड़-बुन में व्यस्त रहा इसलिए अपने विचार प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा |  अब जब कुछ अजीजों ने पचड़ों को निपटने में मदद की और मैं स्वतंत्र हो गया हूँ और सोचा के अब जीवन में कुछ अनाप शनाप नहीं सोचना है | तो आज फिर से नए जोश के साथ और एक अलग होश के साथ आपके सामने अपनी कुछ चुनी हुई कड़ियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ | साथ ही बुलेटिन का श्री गणेश एक हास्य कविता से कर रहा हूँ | आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी |

फ़रहत शाहज़ाद साहब द्वारा लिखी उनकी कविता 'तनहा तनहा मत सोचा कर' को अपने अंदाज़ में प्रस्तुत कर रहा हूँ |  क्षमा प्रार्थी हूँ, मैं उनका या उनकी नज़्म का अपमान करने या दिल को ठेस पहुँचाने की गरज से यह हास्य कविता नहीं लिख रहा हूँ | सिर्फ मज़ाहिया तौर पर और हास्य व्यंग बरसाने के लिए ऐसा कर रहा हूँ  | प्रस्तुत है :

अगड़म बगड़म मत सोचा कर
निपट जाएगा मत सोचा कर

औंगे पौंगे दोस्त बनाकर
काम आयेंगे मत सोचा कर

सपने कोरे देख देख कर
तर जायेगा मत सोचा कर

दिल लगा कर बंदी से तू
सुकूं पायेगा मत सोचा कर

सच्चा साथी किस्मत की बातें
करीना, कतरीना मत सोचा कर

इश्क विश्क में जीना मरना
धोखे खाकर मत सोचा कर

वो भी तुझसे प्यार करे है
इतना ऊंचा मत सोचा कर

ख्वाब, हकीकत या अफसाना
क्या है दौलत मत सोचा कर

तेरे अपने क्या बहुत बुरे हैं
बेवकूफी ये मत सोचा कर

अपनी टांग फंसा कर तूने
पाया है क्या मत सोचा कर

शाम को लंबा हो जाता है
क्यूँ मेरा साया मत सोचा कर

मीट किलो भर भी बहुत है
बकरा भैंसा मत सोचा कर

हाय यह दारू चीज़ बुरी है
टल्ली होकर मत सोचा कर

राह कठिन और धूप कड़ी है
मांग ले छाता मत सोचा कर

बारिश में ज्यादा भीग गया तो
खटिया पकडूँगा मत सोचा कर

मूँद के ऑंखें दौड़ चला चल
नाला गड्ढा मत सोचा कर

जिसकी किस्मत में पिटना हो
वो तो पिटेगा मत सोचा कर

जो लाया है लिखवाकर खटना
वो सदा खटेगा मत सोचा कर

सब ऐहमक फुकरे साथ हैं तेरे
ख़ुद को तनहा मत सोचा कर

सोना दूभर हो जाएगा जाना
दीवाने इतना मत सोचा कर

खाया कर मेवा तू वर्ना
पछतायेगा मत सोचा कर

सोच सोच कर सोच में जीना
ऐसे मरने का मत सोचा कर

आज की कड़ियाँ 














उम्मीद है आपको आज की बुलेटिन पसंद आई होगी | आगे भी समक्ष ऐसी मनोरंजक प्रस्तुतियां और कड़ियाँ पहुंचता रहूँगा | आप पोस्ट का आनंद उठायें फिलहाल के लिए विदा | आभार | धन्यवाद् | शुभ रात्रि | 

16 टिप्पणियाँ:

Vikesh Badola ने कहा…

बहुत बढ़िया। धन्‍यवाद।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

भैया जी मान गए आप की बात ... नहीं सोचा करेंगे ... ;)


एक बात हमारी भी मान लेना ...

"उतार चड़ाव जीवन का ही एक हिस्सा
हार गया तो क्या होगा ... मत सोचा कर !!"

बढ़िया बुलेटिन !

Neeraj Dwivedi ने कहा…

बेहतर सोच के साथ सुन्दर रचनायों का संकलन ... अच्छा लगा.

Sakshi Singh ने कहा…

Thank you so much for listing the post here! I am glad that everyone can read it now.

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सुनके वो शहजाद के अशआर सर धुनता रहा,
थामकर हम दोनों हाथों से जिगर देखा किये!
फरहत सहजाद साहब के इस शे'र के साथ आपने जो उनकी पैरोडी बनाई है उसका भी मज़ा ले रहा हूँ!!
अच्छी बुलेटिन, बेहतरीन लिंक्स!!

Ranjana Verma ने कहा…

मजेदार रचना ...अच्छा लगा।

Rekha Joshi ने कहा…

बहुत बढ़िया बुलेटिन ,मेरी रचना शामिल करने पर हार्दिक धन्यवाद

गिरिजा कुलश्रेष्ठ ने कहा…

मत सोचा कर ,पैरोडी है लेकिन अपनेआप में अलग । रोचक भी और गंभीर भी ।

सरिता भाटिया ने कहा…

बहुत अच्छी रचना ,अछे सूत्र
मेरी रचना लगाने के लिए शुक्रिया
http://guzarish66.blogspot.in/2013/04/2.html

Shalini Rastogi ने कहा…

अच्छा प्रयास तुषार जी!

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

बीती ताहि बिसार दे, आगे की सुधि ले ....

अतीत से निकलना भले ही कितना मुश्किल क्यों न लगता हो लेकिन हर नजरिये से यही उचित माना जाता है ....
व्यावहारिकता की दृष्टि से देखें तो समय किसी के लिए नहीं रुकता, भले ही आप अतीत की यादों में कितने ही क्यों न जकडे हों ... इसके नुकसान भी आपको झेलने पड सकते हैं ...
पहला नुकसान तो यह है कि जब तक आप पिछला छोड नहीं देते, आगे बढना और भी मुश्किल हो जाता है .... दूसरा यह कि आप अतीत के साथ रहकर खुद को और पिछडा बना लेते हैं ...
लोग यूं ही नहीं कहा करते ....
शुभकामनायें ....

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

सोचना ही तो जड़ है..अति दुख की।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सुन्दर बुलेटिन !!
आभार !!

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

बढ़िया ब्लॉग बुलेटिन -बना बनाया ड्रामा है ये ,कल भी पिटा था मत सोचा कर

मीठा तेरा आज बहुत है ,कल की बातें मत सोचा कर .

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

पठनीय सूत्र सुंदर बुलेटिन ,बधाई तुषार जी, आपकी सुंदर रचना के लिए ,,,

Recent Post : अमन के लिए.

Aziz Jaunpuri ने कहा…

behatareen

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