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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

वर्ष 2012- अच्छा हुआ जो खत्म हो गया ..ब्लॉग बुलेटिन




आज और अभी जैसा एक आम भारतीय को महसूस हो रहा है , उससे तो लगता है कि , चलो अच्छा हुआ जो वर्ष 2012 , के ये 365 दिन अब खत्म होने को हैं । देश के आज जो हालात हैं और उससे भी ज्यादा दुखद ये कि इन हालातों में भी देश के सियासतदां पहले से ज्यादा निर्लज्ज संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार हो गए हैं । इस वर्षांत पर मन कह रहा है कि देश ने , बुरे से भी बहुत बुरा देख लिया और अब भी अगर समाज निष्क्रिय और प्रतिक्रियाहीन रहा तो सबसे बुरा भी बहुत जल्द ही देखने को मिल जाएगा , किंतु मस्तिष्क कह और देख रहा है कि जिस तरह से आम लोगों की संवेदना आक्रोश और कंधे आपस में मिल कर समाज व्यवस्था को बदलने के लिए उठ खडे हुए हैं ,यदि उसके साथ ही लोग खुद को भी बदलने का संकल्प लें ले तो यकीनन वर्ष 2013  के आने वाले 365 दिनों में देश और समाज को सकारात्मक परिवर्तन देखने को जरूर मिलेगा ।

अंतर्जाल और हिंदी अंतर्जाल के लिए भी ये अच्छी बात है कि अब ज्यादा से बहुत ज्यादा लोग अपनी प्रतिक्रियाएं देने के लिए , विभिन्न प्लेटफ़ार्मों पर आ रहे हैं और जितना ज्यादा वे लिख पढ रहे हैं उतने ही निडर और कुछ हद तक निरंकुश भी हो रहे हैं , बेशक ये सरकार और सियासत के लिए किसी खतरे से कम नहीं है खासकर जहां चंद चुने चुनाए हुए लोग और कानून की व्याख्या करने वालों की आलोचना कभी भी अभिव्यक्ति को प्रकट करने के दायरे से मानहानि और अपमान के दायरे में चली जाती है । सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर कुछ कुप्रवृत्तियां बेशक देखने को मिली हों किंतु सुखद बात ये है कि ब्लॉगिंग का दायरा और ब्लॉगों की संख्या बढ रही है , बेशक पाठकों की संख्या में कमी सी लगती है वो भी सिर्फ़ इसलिए कि पाठकों की टिप्पणी कम दिखाई देती है , हालांकि ऐसा शायद है नहीं । बहरहाल , ब्लॉग बुलेटिन से जुडे हम सब ब्लॉगर जाते हुए इस साल में आपसे ये सूचना साझा करना चाहते हैं कि आने वाले दिनों में आप न सिर्फ़ ब्लॉग बुलेटिन की टीम में बदलाव पाएंगे , बल्कि बुलेटिन के स्वरूप और बुलेटिन की प्रस्तुति में भी अलग अलग प्रयोग देखने को मिलेंगे । रश्मि प्रभा दीदी , सलिल दादा , कुलवंत हैप्पी जी ,भाई शिवम मिश्रा , देव कुमार झा के साथ मैं अजय कुमार झा अगले वर्ष बुलेटिन टीम का जिम्मा संभालेंगे और कोशिश करेंगे कि आप पाठकों तक पोस्टों को इस अंतर्जालीय पन्ने से साझा करते रहें ।

आइए अब कुछ पोस्टों के सूत्र देते हैं आपको :


जला दे रात की परतें , जरा शबनम सुलगने दे
सब कुछ छोड छाड के इस पोस्ट को पढने दे

चीनी खिलौने-जितने सस्ते, उतने बेकार
फ़िर काहे इन सबसे ,भरे हैं , मुएं बाज़ार

जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वे कठघरे में हैंसुना है लोकतंत्र के प्रहरी खुद पहरे में हैं

भानु अथैया का तमाचा
कब किसके गाल पे बजाया

कोमा में जा चुकी मन:स्थिति
अफ़सोस कि आज यही है नियति

नया साल मनाने का यह भी एक तरीका सच पूछा जाए तो है ये ही असली सलीका 

साल की आखिरी चि्ट्ठी: बच्चों के नाम
क्या है , आप भी जरूर देखें ये पैगाम

औरतों को लेकर मिथक:थोडी हकीकत ज्यादा फ़साना
आज इसी बहस में देखो न कैसे लगा है जमाना

2012 की घुमक्कडी का लेखा जोखा
ब्लॉगर भी खरा और ब्लॉग भी चोखा

मर्ज़ कहीं और , ईलाज कहीं और
यही विडंबना है , कहीं ठिकाना कहीं ठौर

बलात्कार की संस्कृति और राजसत्ता  दोनों ही समाज को आज बता रहीं धत्ता

आंख पर पट्टी रहे और अक्ल पर ताला रहे 
उस देश में हमेशा ही अन्याय की जलती ज्वाला रहे

कुछ भी तो नहीं बदला है
हां , शायद कोई नहीं संभला है

ये दुनिया मर्दों की नहीं
सच कही बात ये सौ टका सही

प्रधानमंत्री जी , डायलॉग डिलिवरी मत कीजीए
बाद में कहें ठीक है , पहले पर्चा तो पढिए

दामिनी को गूगल की श्रद्धांजलि
उफ़्फ़ जाने कब तक दी जाती रहेगी बेटियों की बलि


आज के लिए इज़ाज़त दें , मिलते हैं कल फ़िर एक नए पन्ने के साथ आपकी खूबसूरत और प्रभावी पोस्टों के सूत्र के साथ




शनिवार, 22 दिसंबर 2012

आक्रोश , आक्रोश ये जनाक्रोश है ....ब्लॉग बुलेटिन





पिछले दिनों दिल्ली में हुए बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को लेकर जो क्रोध लोगों का फ़ूटा है उसने जैसे फ़िर से एक बार ये साबित कर दिया है कि अब आम आदमी , सच में ही इस व्यवस्था से , इन हालातों से , निजात पाने के लिए छटपटा रहा है । दिनों दिन जिस तरह से अवाम का गुस्सा सडकों पर निकल रहा है और वे जिस तरह से सडक से संसद तक अपने सवालों को लेकर सियासत के सामने सीना तान कर खडे हो रहे हैं वो इस बात का सबूत है कि , ये साल बेशक खत्म हो रहा है ,किंतु भारत में अब एक नए युग की शुरूआत हो रही है और वो युग हो न हो आम आदमी के जनसंघर्ष का , उसकी सोच का , उसके फ़ैसले का ही युग होगा । इसलिए ये कहा जाए कि ये हर लिहाज़ न सिर्फ़ देश और समाज के लिए बल्कि  हर आदमी के लिए बहुत ही संवेदनशील और गंभीर फ़ैसले लेने का वक्त है । आने वाला भविष्य , हमारे आपके सामने है और अब ये भी तय है कि वो भविष्य हमें कैसा चाहिए इसका फ़ैसला भी  हमें आज ही करना होगा वर्ना पिछले कई बरसों से मूक बधिर बनकर स्थितियों को बिगडने का परिणाम तो हम सब देख ही रहे हैं । हिंदी अंतर्जाल पर भी बहुत कुछ लिखा पढा जा रहा है और ब्लॉग जगत में भी । आइए देखते हैं आज  की कुछ चुनिंदा पोस्टों को , आज की बुलेटिन में :-



नारी ब्लॉग पर लिखी गई पोस्ट में , अपना आक्रोश व्यक्त करते हुए लेखिका कहती हैं, "1978 में गीता चोपड़ा - संजय चोपड़ा रेप और हत्या काण्ड { लिंक }  के बाद दिल्ली विश्विद्यालय के छात्राओं ने दिल्ली में जुलूस निकाला था और अपनी आवाज को उंचा किया था , मै भी उस जूलुस का हिस्सा थी . गीता चोपड़ा अपने भाई के साथ रेडियो स्टेशन जा रही थी जब ये काण्ड हुआ .

2012 में एक 23 साल की लड़की अपने दोस्त के साथ पिक्चर देख कर आ रही थी और उसके साथ जो कुछ हुआ वो आज पूरा देश जानता हैं . आज फिर लडकियां अपनी आवाज बुलंद कर रही हैं और उसमे मेरी भांजी भी हैं सड़क पर एक जुलूस में .

1978 - 2012 यानी 34 साल अंतराल , एक नयी पीढ़ी और फरक "कोई नहीं " तब हमारी पीढ़ी चिल्ला रही थी आज हमारी   बेटियाँ चिल्ला रही हैं .

बदलाव कहां आया हैं ???
 अरुणा शौन्बौग रेप के बाद 1973 में जब  कोमा में चली गयी थी और आज भी उसी बिस्तर पर हैं
 2012 मे 23 साल की बेटी जीवन के लिये अस्पताल में जूझ रही हैं पर विज्ञान की  तरक्की कर कारण कोमा में नहीं गयी हैं और विज्ञान की तरक्की के कारण लोग कह रहे हैं की उसकी एक आंत जो " एब्नार्मल सेक्स क्रिया " के कारण निकल दी गयी हैं वो रिप्लेस करी जा सकती हैं .

 आईये ताली बजाये की विज्ञान ने इतनी तरक्की कर ली हैं हम एक बलात्कार की शिकार लड़की को बचा सकते , ज़िंदा रख सकते हैं  . क्यूँ ताली नहीं बजाई आप ने ???



 इस पर प्रतिक्रिया देते हुए राजन कहते हैं ,"

34 साल क्या देखा जाए तो चौँतीस सौ सालों में भी कुछ नहीं बदला है।और विज्ञान ने तरक्की भले की हो लेकिन हमने तो इसका भी गलत इस्तेमाल नारी के खिलाफ किया है आज भ्रूण हत्या करना कितना आसान हो गया है।विज्ञान की सहायता से एक को बचा भी रहे तो क्या लाखों को मार भी तो रहे हैं।

काव्य मंजूषा पर अदा जी भी एक प्रश्न उठा रही हैं :
"खजुराहो के मंदिर में, नारी के अनगिनत मनोभाव, अपार प्रतिष्ठा पाते हैं। ये उत्कीर्ण आकृतियाँ, पूर्णता और भव्यता की, प्रतीक मानी जातीं हैं। यहाँ नारी देह की लोच, भंगिमाएँ और मुद्राएं, लालित्यपूर्ण तथा आध्यात्मिक मानी जाती हैं। विनम्रता और आदर पाती हैं, ये प्रस्तर की मूर्तियाँ।  ऐसी विशुद्ध सुन्दरता की दिव्य अनुभूति के लिए, समस्त कामनाओं से मुक्त हो कर, श्रद्धालु वहाँ जाते हैं। स्त्री के कामिनी रूप की, हर कल्पना को सम्मानित करते हैं, क्योंकि वो अपने हृदय में जानते हैं, यही शक्ति, संभावित माता है, जो सृष्टि को जन्म देगी, जो नारी के सर्वथा योग्य है।

लेकिन सड़क पर आते ही, वो सब भूल जाते हैं।
क्यों ???"


आम आदमी के इस फ़ूटे हुए गुस्से को भांपते हुए आनंद प्रधान तीसरा रास्ता में कहते हैं कि ये गुस्सा न सिर्फ़ इस अपराध और इसके अपराधियों के खिलाफ़ है बल्कि ये गुस्सा खाप पंचायतों और पुलिस के खिलाफ़ भी है ,

" क्योंकि इस गुस्से में गूंजती इन्साफ की मांग में एक साथ कई आवाजें हैं: न जाने कब से हर दिन, सुबह-शाम कभी घर में, कभी सड़क पर, कभी मुहल्ले में, कभी बस-ट्रेन में, कभी बाजार में अपमानित होती स्त्री की पीड़ा है. इसमें खाप पंचायतों के हत्यारों के खिलाफ गुस्सा है. इसमें वैलेंटाइन डे और पब में जाने पर लड़कियों के कपड़े फाड़ने और उनके साथ मारपीट करनेवाले श्रीराम सेनाओं और बजरंगियों को चुनौती है. इसमें स्त्रियों के “चाल-चलन” को नियंत्रित करने के लिए बर्बरता की हद तक पहुँच जानेवाले धार्मिक ठेकेदारों और ‘संस्कृति पुलिस’ के खिलाफ खुला विद्रोह है."

इसी मुद्दे पर अंतर्मंथन करते हुए चिकित्सक ब्लॉगर डॉ टी एस दराल कहते हैं कि ऐसे अपराधियों के लिए वो सज़ा मुकर्रर की जानी चाहिए जिससे उनके मन में कानून का भय पैदा हो सके ,

"
बलात्कार एक ऐसा अमानवीय अत्याचार है जो न सिर्फ एक महिला की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार है बल्कि उसकी आत्मा को भी खंडित कर देता है। यह न सिर्फ भयंकर शारीरिक वेदना और पीड़ा देता है बल्कि मानसिक स्वास्थ्य पर भी स्थायी और अमिट दुष्प्रभाव छोड़ जाता है। इंसानियत के विरुद्ध इससे बड़ा और कोई अपराध नहीं हो सकता। इसलिए आवश्यक है कि बलात्कार के आरोपी पर अपराध सिद्ध होने पर सज़ा में कोई नर्मी न बर्ती जाये और उसे सख्त से सख्त सज़ा दी जाये। और फांसी से ज्यादा सख्त सज़ा और क्या हो सकती है। फांसी का तो नाम सुनकर ही बदन में सिरहन सी दौड़ जाती है। फ़ास्ट ट्रेक कोर्ट द्वारा शीघ्र कार्यवाही पूर्ण कर जब दो चार अपराधियों को फांसी लगा दी जाएगी तो संभव है लोग ऐसा अपराध करने से डरने लगें। वर्ना दिल्ली की सड़कों पर यूँ ही ये खूंखार दरिन्दे बेख़ौफ़ घूमते रहेंगे अपने अगले शिकार की तलाश में। 
इन्सान बस एक ही डर से डरता है -- मौत का डर ! जब तक अपराधियों को मौत का डर दिखाई नहीं देगा , सड़कों पर इंसानियत यूँ ही बेमौत मरती रहेगी। "

इस पोस्ट पर टिप्पणी करते हुए गोदियाल जी कहते हैं
शर्म आती है डा0 साहब मुझे तो अपने हिन्दुस्तानी होने पर। आपकी बातो से पूर्णतया सहमत हूँ लेकिन साथ ही अपने ब्लॉग के एक लेख का कुछ हिस्सा भी इस टिप्पनी में जोड़ रहा हूँ, जो मेरी बात कहता है ! क्योंकि हम लोग सिर्फ पुलिस को ही दोष न दे। आज भ्रष्ट जुडीशियरी और विधायिका (राजनीतिग ) इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। (369 तो हमारे ऐसे एम् पी और एम एल ए ही है जिनपर महिलाओं से बदसुलूकी के संगीन अपराध है ) अपराधियों को बचने के लिए हमारी जुडीशियरी यह निर्णय तो झट से सुना देती है की अगर कोई अपराधी फर्जी मुठभेड़ में पुलिस द्वारा मारा जाता है तो उन पुलिस कर्मियों को मृत्यु दंड दिया जाना चाहिए ( मैं यह नहीं कहता की हमारी पुलिस बहुत शरीफ है किन्तु पुलिस का मनोबल तो इन्होने तोड़ा है ). और यहाँ ये खामोश है ! यहाँ क्यों नही जुडीशियरी वही निर्णय सुनाती है इन दरेंदों के लिए ??? लेख का हिस्सा यहाँ चस्पा कर रहा हूँ :
जब से यह दिल्ली की छात्रा के साथ दरिंदगी का मामला प्रकाश में आया है, संसद, विधान सभाओं, खबरिया माध्यमो और टीवी चैनलों पर खूब घडियाली आंसू बहाए जा रहे है। और उन्हें सुनकर , पढ़कर मैं पके जा रहा हूँ क्योंकि एक भी माई के लाल ने यह सवाल नहीं उठाया कि जनता की सेक्योरिटी के लिए जो सुरक्षाबल थे, उन्हें तो इन घडियाली आंसू बहाने वाले कायरों ने हड़प रखा है, जनता तो असुरक्षित होगी ही ! आज तक किसी राजनितिक हस्ती अथवा उसके रिश्तेदारों का गैंगरेप हुआ ? नहीं।।।।। क्योंकि उनके पास तो फ्री के पुलिसवाले बन्दूक्धारी हैं। आप देखें की एक तथाकथित वीआइपी जो एयर पोर्ट आ -जा रहा हो, आपने भी गौर फरमाया होगा कि उसको प्राप्त ब्लैक कमांडो के अलावा भी एयर पोर्ट से नई दिल्ली ( उसके गंतव्य तक ) के हर चौराहे पर सफ़ेद वर्दी वाले 5-5 ट्राफिक पुलिस के जवान और एक से दो जिप्सिया खडी रहती है, जबकि बाकी दिल्ली में कई जगहों पर ट्रैफिक लाईट पर एक भी ट्रैफिक कर्मी नहीं होता, पुलिस जिप्सिया तो दूर की बात है और लोग खुद ही घंटों जाम में जूझ रहे होते है। ये हाल तो सिर्फ दिल्ली का बया कर रहा हूँ, बाकी देश का क्या होगा ! इसलिए यही कहूंगा कि जागो...... राजनीतिक स्वार्थ के लिए दूसरों पर ये कितनी जल्दी आरक्षण थोंपते है लेकिन एक महिला आरक्षण बिल संसद में कब से धूल फांक रहा है, अगर वह समय पर पास हुआ होता और संसद में महिलाओं का उचित प्रतिनिधित्व होता तो क्या वे महिलाओं के साथ होने वाले दुर्व्यवहार को रोकने के लिए कोई सख्त क़ानून नहीं बनाते? इसलिए बस, अब जागो वरना कश्मीर के मशहूर उर्दू कवि वृज नारायण चकबस्त जी का यह शेर सही सिद्ध हो जाएगा - "मिटेगा दीन भी और आबरू भी जाएगी, तुम्हारे नाम से दुनिया को शर्म आएगी।"

अपने ब्लॉग राष्ट्र सर्वोपरि में लिखते हुए सानू शुक्ला कहते हैं कि "यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते " कहने मानने वाले देश में बलात्कार जैसे जघन्य अपराध का होना कितनी शर्म और लज्जा की बात है । वे आगे कहते हैं कि सिर्फ़ मृत्युदंड दे देने से इस अपराध का हल नहीं निकलेगा हमें समाज के गिरते चारित्रिक मूल्यों को भी संभालना होगा । आगे वे सज़ा के तौर पर सुझाते हैं कि ऐसे अपराधियों को सर्जिकल व केमिकल उपायों द्वारा नंपुसक बना देना चाहिए ।

इस बीच एक अफ़वाह जो पिछले दिनों बडे जोरों पर थी वो थी माया कलेंडर द्वारा की गई महाप्रलय और दुनिया के खत्म होने की भविष्यवाणी , इस विषय पर देवेन मेवाडी कहते हैं और दुनिया खत्म नहीं हुई ,

"
माया कलेंडर
लाख अफवाहों के बावजूद हमारी यह प्यारी और निराली धरती 21 दिसंबर यानी आज के बाद भी सही सलामत रहेगी। साढ़े चार अरब वर्ष पहले जन्म लेकर जिस तरह यह लगातार सूर्य की परिक्रमा कर रही है, उसी तरह अब भी सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाती रहेगी और अपनी धुरी पर उसी तरह घूमती रहेगी। उसी तरह सूर्योदय, सूर्यास्त, रात और दिन होंगे और उसी तरह ऋतुएं बदलेंगीं।
पृथ्वी के विनाश का झूठा भ्रम फैलाने वाले लोग एक बार फिर बेनकाब होंगे और विज्ञान का सच एक बार और हमें तर्क करके सोचने का मौका देगा कि हमें केवल सुनी-सुनाई अफवाहों पर अंधविश्‍वास न करे सच का साथ देना चाहिए। यह घटना एक बार फिर साबित कर देगी कि जैसे पत्थर की मूर्तियाँ दूध नहीं पीतीं, रातों को जागने से जीते-जागते आदमी पत्थर नहीं बन जाते, खारा पानी किसी चमत्कार से मीठा नहीं बन जाता, ओझा-तांत्रिकों की हुँकार और धुंए के गुबार से कोई बीमारी ठीक नहीं हो जाती और बिल्लियों के रास्ता काटने, कौवे के बोलने या छिपकली के गिरने से कोई शुभाशुभ फल नहीं मिलते, उसी तरह माया कैलेंडर की आखिरी तारीख के बाद हमारे इस ग्रह का भी अंत नहीं होगा।

चलिए आज के लिए इतना ही जाते जाते अपनी पोस्ट के कुछ अंश भी डाले जा रहा हूं ,"

"देश की राजधानी दिल्ली, जहां की मुख्यमंत्री पिछले कई वर्षों से संयोगवश एक महिला हैं और जिस शहर की सुरक्षा में विश्व की बेहतरीन पुलिस सेवाओं में से एक , दिल्ली पुलिस , लगी हुई है , उस राजधानी में शहर में दौडती एक बस में सरेआम एक युवती की इज़्ज़त और उसके शरीर को इतनी बुरी तरह रौंद दिया जाता है कि अब उसका जीना मौत से बदतर लगने लगता है । कितु इस तरह की न तो ये पहली घटना और अफ़सोसजनक रूप से कहना पडेगा कि आखिरी भी नहीं । जैसा कि अपने बेबाक बयानों के लिए जाने वाले मार्कण्डेय काटजू कहते हैं कि इस बार इस अपराध को लेकर इतनी उग्र और तीव्र प्रतिक्रिया के साथ “मीडिया अटेंशन ” इसलिए भी मिला है क्योंकि ये राजधानी दिल्ली में घटी है । ये सच भी जान पडता है । पडोसी राज्य हरियाणा से लगातार बलात्कार और सामूहिक बलातार जैसे अपराधों की घटनाओं ने स्वयं संप्रग प्रमुख सोनिया गांधी को वहां जाने पर मजबूर कर दिया था । शायद यही वजह है कि लोग अब ये सोचने पर भी विवश हैं कि क्या इन अपराधों और इनके भुक्तभोगियों का दर्द क्या इसलिए प्रशासन , राजनेताओं , कानून निर्माताओं को महसूस नहीं होता क्योंखि अक्सर पीडित पीडिता गरीब या मध्यम परिवार का कोई आम व्यक्ति होता है किसी बडे रसूखदार मंत्री या उद्योगपति का कोई अपना नहीं ।"

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

नारी हो न निराश करो मन को - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

"कल तक सबको 'उस' के दर्द का अहसास था ;
आज सब को अपनी अपनी जीत का अभिमान है !!
कल जहां रेप पीड़ितों की सूची थी ...
उन्ही मेजों पर आज नए विधायकों की सूची तैयार है !!
किसी चैनल , किसी सभा मे 'उसके' बारे मे कोई सवाल नहीं है ;
बहुतों के तन पर नई नई खादी सजी है
तभी तो सफदरजंग के आगे पटाखों की लड़ी जली है ... 
बेगैरत शोर को अब किसी का ख्याल नहीं है !!
जो लोग रोज़ लोकतन्त्र को नंगा करते हो ... 
उनको एक महिला की इज्ज़त जाने का अब मलाल नहीं है !
'तुम' जियो या मारो ... 
किस को फर्क पड़ता है ... 
आओ देख लो अब यहाँ कोई शर्मसार नहीं है !!
दरअसल 'तुम्हारी' ही स्कर्ट ऊंची थी ... 
'इस' मे 'इनका' कोई दोष नहीं ...
"जवान लड़की को सड़क पर छोड़ा ... 
क्या घरवालों को होश नहीं"
"लड़का तो 'वो' भोला था ... 
यह सब चाउमीन की गलती है ... 
वैसे एक बात बताओ लड़की घर से क्यों निकलती है ??"
चलो जो हुआ सो हुआ उसको भूलो ...
भत्ते ... नौकरी सब तैयार है ...
बस 'तुम' मुंह मत खोलो ...
तुम्हारी चीख से मुश्किल मे पड़ती सरकार है ...
अगली जीत - हार के लिए इनको तुम्हारी दरकार है ...
गुजरात - हिमाचल से निबट लिए  ...
अब दिल्ली की बारी है ...
चुनावी वादा ही सही पर यकीन जानना ...
दोषियों को छोड़ा न जाएगा यह मानना ...
हम सब तुम्हारे साथ है डरना मत ...
पर बिटिया अंधेरे के बाद घर से निकलना मत ...
अंधेरा होते ही सब समीकरण बदल जाते है ...
न जाने कैसे ...
हमारे यह रक्षक ही सब से बड़े भक्षक बन जाते है ...
कभी कभी लगता है यह वो मानवता के वो दल्ले है ...
जिन्होने हर चलती बस - कार मे ...
खुद अपनी माँ , बहन , बीवी और बेटी ...
नीलाम कर रखी है !!
========
यहाँ दिये हर एक चित्र मे आपको एक पोस्ट का लिंक मिलेगा पर यह जरूरी नहीं है कि वो पोस्ट इस मुद्दे से जुड़ी हो ... पोस्ट देखने के लिए चित्र पर चटका लगाएँ !
















========
अंत मे एक निवेदन "उस से "
लोग कहते है "नर हो न निराश करो मन को ..."
मैं कहता हूँ ,
"नारी हो न निराश करो मन को ...
उठो और शक्ति रूप धरो तुम ...
बन काल पापियों का नाश करो तुम ...
तुम से संबल हम पाते है ...
खुद को यूं निर्बल न करो तुम ...
उठो और शक्ति रूप धरो तुम !!"
 ============

ब्लॉग बुलेटिन की पूरी टीम और पूरे ब्लॉग जगत के साथ हम सब एक स्वर मे इस  
जघन्य अपराध की घोर निंदा करते है और सरकार से मांग करते है कि इस मामले और इस जैसे बाकी मामलों मे अपने ढीले रवैये तो छोड़ जल्द से जल्द इंसाफ दिलवाएँ !

जय हिन्द !!

गुरुवार, 20 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं (अवलोकन 17)




प्रतिभाओं की कमी न कभी थी न है न होगी ..... थकान होगी,व्यवधान अपने अपने होंगे .... पर सूरज का रथ हर दिन प्रखरता के साथ हमारे मध्य होगा . उस प्रखर प्रकाश से प्रखर किरणें मुट्ठी में भरकर आपको दे रही हूँ ..................................... आपकी रूचि का ख्याल रखते हुए . (और यहीं विराम यानी समापन की घोषणा करती हूँ . )


"कल तक सबको 'उस' के दर्द का अहसास था ;
आज सब को अपनी अपनी जीत का अभिमान है !!
कल जहां रेप पीड़ितों की सूची थी ...
उन्ही मेजों पर आज नए विधायकों की सूची तैयार है !!
किसी चैनल , किसी सभा मे 'उसके' बारे मे कोई सवाल नहीं है ;
बहुतों के तन पर नई नई खादी सजी है 
तभी तो सफदरजंग के आगे पटाखों की लड़ी जली है ... 
बेगैरत शोर को अब किसी का ख्याल नहीं है !! 
जो लोग रोज़ लोकतन्त्र को नंगा करते हो ... 
उनको एक महिला की इज्ज़त जाने का अब मलाल नहीं है !
'तुम' जियो या मारो ... 
किस को फर्क पड़ता है ... 
आओ देख लो अब यहाँ कोई शर्मसार नहीं है !!
दरअसल 'तुम्हारी' ही स्कर्ट ऊंची थी ... 
'इस' मे 'इनका' कोई दोष नहीं ...
"जवान लड़की को सड़क पर छोड़ा ... 
क्या घरवालों को होश नहीं"
"लड़का तो 'वो' भोला था ... 
यह सब चाउमीन की गलती है ... 
वैसे एक बात बताओ लड़की घर से क्यों निकलती है ??"
चलो जो हुआ सो हुआ उसको भूलो ... 
भत्ते ... नौकरी सब तैयार है ... 
बस 'तुम' मुंह मत खोलो ...
तुम्हारी चीख से मुश्किल मे पड़ती सरकार है ...
अगली जीत - हार के लिए इनको तुम्हारी दरकार है ...
गुजरात - हिमाचल से निबट लिए  ...
अब दिल्ली की बारी है ...
चुनावी वादा ही सही पर यकीन जानना ...
दोषियों को छोड़ा न जाएगा यह मानना ...
हम सब तुम्हारे साथ है डरना मत ...
पर बिटिया अंधेरे के बाद घर से निकलना मत ...
अंधेरा होते ही सब समीकरण बदल जाते है ...
न जाने कैसे ...
हमारे यह रक्षक ही सब से बड़े भक्षक बन जाते है ...
कभी कभी लगता है यह वो मानवता के वो दल्ले है ...
जिन्होने हर चलती बस - कार मे ...
खुद अपनी माँ , बहन , बीवी और बेटी ...
नीलाम कर रखी है !!


तुम मुझे दो एक अच्छी माँ, तुम्हें मैं एक अच्छा राष्ट्र दूँगा.

बात तो जिसने कही थी सच कही थी
पर भला वो भूल कैसे ये गया कि
पूत कितने ही सुने हैं कपूत लेकिन
माँ कुमाता हो, नहीं इतिहास कहता.

माँ कहा करते थे नदियों को,
और उनको पूजते थे
तब कहीं जाकर जने थे सभ्यता के पूत ऐसे
आज भी है साक्षी इतिहास जिनका.

पुस्तकों में था पढा हमने कि
दुनिया की पुरानी सभ्यताएँ
थीं फली फूली बढीं नदियों के तट पर.
याद कर लें हम
वो चाहे नील की हो सभ्यता या सिंधु घाटी की
गवाह उनके अभी भी हैं चुनौती आज की तकनीक को
चाहे पिरमिड मिस्र के हों
या हड़प्पा की वो गलियाँ, नालियाँ, हम्माम सारे.

माँ तो हम सब आज भी कहते हैं नदियों को
बड़े ही गर्व से जय बोलते हैं गंगा मईया की,
औ’ श्रद्धा से झुकाते सिर हैं अपना
जब गुज़रते हैं कभी जमुना के पुल से.

वक़्त किसके पास होता है मगर
कुछ पल ठहरकर झाँक ले जमुना के पानी में
था जिसको देखकर बिटिया ने मेरी पूछा मुझसे,
“डैड! ये इतना बड़ा नाला यहाँ पर कैसे आया?
कितना गंदा है चलो  जल्दी यहाँ से!”

कैसे मैं उसको ये बतलाऊँ कि इस नाले का पानी,
हम रखा करते थे पूजा में
छिडककर सिर पे, धोते पाप अपने,

काँप उट्ठा दिल उसी दिन
दुर्दशा को देखकर गंगा की, जमुना की.
आज की इस नस्ल को क्या ये नहीं मालूम,
नदियाँ हों जहाँ नाले से बदतर,
जन्म लेती है निठारी सभ्यता,
जिसमें हैं कत्ले-आम और आतंक के साये.
उजडती आबरू, नरभक्षियों का राज!

मित्रों,
आपको मालूम हो उस शख्स का कोई पता
तो इस नगर का भी पता उसको बताना,
और कहना
आके बस इक बार ये ऐलान कर दे,

तुम मुझे दो एक अच्छी माँ
तुम्हें मैं एक अच्छा राष्ट्र दूंगा! 

anubuthi: माफ करिए आज भाषा पर नियंत्रण नहीं रहा ....(पूनम जैन कासलीवाल)

या खुदा !
आज अपने मादा होने पे ,
जी दुखता है।
हे प्रभु !
आज बेटी जनने से ,
मन सुलगता है ।
क्यूँ नहीं बनाया ,
मच्छर -मक्खी या अदना सा कीड़ा ।
बर्बरता का देख तमाशा ,
अपने पैदा होने पे ह्रदय कलपता है ।
कब तक यूँ ही रहूँ मुँह छिपा ,
और अधिक ढकूँ अपने को ,
जनांगों पर लगा ताला ,
घिस डालूँ ये उभार ?
कर नारेबाजी दिलवा दूँ कोई सज़ा ?
पर क्या यह अश्लीलता यहीं रुक जाएगी ?
मिली सज़ा जो किसी एक को तो ,
क्या यह ,बर्बरता रुक पाएगी ?
जिस चौराहे फेंका मुझे ,
वहीं दिया जाए उल्टा टांग ,
हर आने -जाने वाला करे ,
लोहे के सरिये से तुम्हारे ,
मर्दाना अंगों पे वार पे वार ,
बूंद- बूंद , रिस - रिस मारो तुम ,
तभी होगा समाज का पूर्नउद्धार....
मेरी रूह ...आत्मा.... अस्मिता ..का व्यक्तिकरण....पुनर्जन्म...

हम थोथे चने हैं 
सिर्फ शोर मचाना जानते हैं 
एक घटना का घटित होना 
और हमारी कलमों का उठना 
दो शब्द कहकर इतिश्री कर लेना 
भला इससे ज्यादा कुछ करते हैं कभी 
संवेदनहीन  हैं हम 
मौके का फायदा उठाते हम 
सिर्फ बहती गंगा में हाथ धोना जानते हैं 
नहीं निकलते हम अपने घरों से 
नहीं करते कोई आह्वान 
नहीं देते साथ आंदोलनों में 
क्योंकि नहीं हुआ घटित कुछ ऐसा हमारे साथ 
तो कैसी संवेदनाएं 
और कैसा ढोंग 
छोड़ना होगा अब हमें .......आइनों पर पर्दा डाल कर देखना 
शुरू करना होगा खुद से ही 
एक नया आन्दोलन 
हकीकत से नज़र मिलाने का 
खुद को उस धरातल पर रखने का 
और खुद से ही लड़ने का 
शायद तब हम उस अंतहीन पीड़ा 
के करीब से गुजरें 
और समझ सकें 
कि  दो शब्द कह देने भर से 
कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं होती 
क्योंकि .........आज जरूरी है 
बाहरी आन्दोलनों से पहले 
आतंरिक दुविधाओं के पटाक्षेप का 
केवल एक हाथ तक नहीं 
अपने दोनों हाथों को आगे बढाने का 
जिस दिन हम बदल देंगे अपने मापदंड 
उस दिन स्वयं हो जायेंगे आन्दोलन 
बदल जायेगी तस्वीर 
मगर तब तक 
कायरों , नपुंसकों की तरह 
सिर्फ कह देने भर से 
नहीं हो जाती इतिश्री हमारे कर्तव्यों की 
और मैं ..........अभी कायर हूँ 
क्योंकि........ हूँ बलात्कारियों के साथ तब तक 
जब तक  नहीं मिला पाती खुद से नज़र 
नहीं कर पाती खुद से बगावत 
नहीं चल पाती एक आन्दोलन का सक्रिय पाँव बनकर
इसलिए
शामिल हूँ अभी उसी बिरादरी में 
अपनी जद्दोजहद के साथ ................

वो मर्द है!
मर्ज़ी का मालिक है!
उसका मन किया!
उसने किया!
ज़रूरी है!
ये साबित करता है!
औरत जागीर है उसकी!
और उसका जिस्म मिल्कियत है!
नोच कर खाने का!
उसका मन किया!
उसने किया!
क्यूँ?!
क्यूँकि वो मर्द है!
मर्ज़ी का मालिक है!
औरत त्रियाचरित्र है!
पतिता है!
ज़रूर उकसाया होगा!
कुछ इशारा किया होगा!
हँसी होगी, निर्लज्ज!
ऐसे में वो क्या करता?!
उसका मन किया!
उसने किया!
आखिर वो मर्द है!
मर्ज़ी का मालिक है!
वो दुनिया पे राज करता है!
औरत? बांदी है उसकी!
अपनी सत्ता की मोहर लगाने के लिए!
उसे उसकी जगह दिखाने के लिए!
अपनी मर्दानगी निभाने के लिए!
उसका मन किया!
उसने किया!
अरे! वो मर्द है!
मर्ज़ी का मालिक है!
क्या? औरत की मर्ज़ी नहीं थी?!
वो ज़रूरी नहीं थी!
कहा ना! औरत जागीर है उसकी!
अपना बल दिखाने का!
उस पर हल चलाने का!
उसका मन किया!
उसने किया!
जानते हो न! वो मर्द है!
मर्ज़ी का मालिक है!

बेचैन आत्माशुक्र है...(देवेन्द्र पाण्डेय)

नज़र अंदाज़  कर देते हैं हम
छेड़छाड़
दहलते हैं दरिंदगी पर
शुक्र है...
अभी हमें गुस्सा भी आता है!

देख लेते हैं
आइटम साँग
बच्चों के साथ बैठकर
नहीं देख पाते
ब्लू फिल्म
शुक्र है...
अभी हमें शर्म भी आती है!

करते हैं भ्रूण हत्या
बेटे की चाहत में
अच्छी लगती है
दहेज की रकम
बहू को
मानते हैं लक्ष्मी
बेटियों का करते हैं
कंगाल होकर भी दान
शुक्र है....
चिंतित भी होते हैं
लिंग के बिगड़ते अनुपात पर!

गंगा को
मानते हैं माँ
प्यार भी करते हैं
चिंतित रहते हैं हरदम
नाले में बदलते देखकर
शुक्र है...
मूतते वक्त
घुमा लेते हैं पीठ
नहीं दिखा पाते अपना चेहरा!

यूँ तो
संसद में करते ही रहते हैं
अपने हित की राजनीति
लेकिन शुक्र है...
दुःख से दहल जाता है जब
समूचा राष्ट्र
एक स्वर से करते हैं
घटना की निंदा!

शुक्र है...
अभी खौलता है हमारा खून
किसी की पशुता पर
चसकती है
किसी की चीख
अभी खत्म नहीं हुई
इंसानियत पूरी तरह

मानते ही नहीं अपराध
तय नहीं कर पाते अपनी सजा
शुक्र है...
जानते हैं अधिकार
मांगते हैं
बलात्कारी के लिए
फाँसी!

छोड़ नहीं पाये
दोगलई
लेकिन शुक्र है...
अभी नहीं हुये हम
पूरी तरह से
राक्षस।
................

वीथी: इनकार है(सुशीला श्योरण)


सदियों से रिसी है
अंतस में ये पीड़
स्‍त्री संपत्ति
पुरूष पति
हारा जुए में
हरा सभा में चीर
कभी अग्निपरीक्षा
कभी वनवास
कभी कर दिया सती
कभी घोटी भ्रूण में साँस


क्यों स्वीकारा
संपत्‍ति, जिन्स होना
उपभोग तो वांछित था
कह दे
लानत है
इस घृणित सोच पर
इनकार है
मुझे संपत्‍ति होना


तलाश अपना आसमां
खोज अपना अस्तित्‍व
अब पद्‍मिनी नहीं
लक्ष्मी बनना होगा
जौहर में स्वदाह नहीं
खड्‍ग ले जीना होगा

बुधवार, 19 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (16)



किनारा नदी के साथ होता है
नदी किनारों को तोड़ आगे बढ़ना चाहती है 
तलाश अपने अपने किनारों की होती है 
बाँध दिया तो तलाश कहाँ 
विस्तार कहाँ !
साधारण रेखा हो या लक्ष्मण रेखा 
बाँध तोड़ने के तूफ़ान ही सीख बनते हैं 
... संबंधों के आगे लकीर अमिट हो ही नहीं सकती 
सोचो ना,
लकीर खींचकर तुमने पंखों को बाँध दिया 
नियति को बाँध दिया 
... नियति भला बंधन स्वीकार करती है ...
उसे तो बढ़ना होता है 
.... सूक्ष्म से सूक्ष्मतर होने की तलाश में 
तलाश तत्व में विलीन होने की 
स्वत्व के ऐतिहासिक परिवेश के लिए ........................ 
................................................................................................... प्रतिभाओं की अबाध गति से बहती भावनाएं ऐतिहासिक अवलोकन बन जाये - यही प्रयास है लक्ष्य है एहसास भेदी 

स्पंदन SPANDAN: उलझा सुलझा सा कुछ...(शिखा वार्ष्णेय)


मन की राहों की दुश्वारियां
निर्भर होती हैं उसकी अपनी ही दिशा पर
और यह दिशाएं भी हम -तुम निर्धारित नहीं करते 
ये तो होती हैं संभावनाओं की गुलाम 
ये संभावनाएं भी बनती हैं स्वयं 
देख कर हालातों का रुख 
मुड़ जाती हैं दृष्टिगत राहों पे
कुछ भी तो नहीं होता हमारे अपने हाथों में 
फिर क्यों कहते हैं कि आपकी जीवन रेखाएं 
आपके ही हाथों में निहित होती हैं.
****************************
कुछ पल छोड़ देने चाहिए यूँ ही 
तैरने को हलके होकर 
शून्य में 
मिले जहाँ बहाव ,बह चलें
क्यों जरुरी है उनका 
सही गलत निर्धारण करना
उन्हें भारी बना देना 
और करना ज़बरदस्ती,
बाँधे रखने की कोशिश।
जबकि बंध तो नहीं पाते वे फिर भी
क्योंकि मन की डोरी होती है बड़ी कच्ची 
उससे बाँध भी लें  उन पलों को 
तो रगस उसमें भी लगती है 
फिर शनै : शनै :  कोमल सी वो डोरी 
टूट जाती है कमजोर होकर. 


***************

मेरा अपना मेरा है 

उस पर हक़ भी मेरा है
क्यों हो वो तेरा,इसका, उसका 
क्यों ना मुझसे मेरा साक्षात्कार हो 
जिसपर मेरा, सिर्फ मेरा अधिकार हो .

एक दिन भगवानने आकर मुझसे कहा ,
बस तेरे पास अब बारह घंटे बाकी है ..
तेरी जिंदगीके ...जी ले जो तेरी आरजू हो ,
पूरी हो जायेगी जो तू चाहे ....
मैंने मुस्कुरा दिया ....
बस जो भी कर रही थी वो करती रही ...
भगवानको लगा मैंने उनकी बात को
कोई तवज्जो नहीं दी .....
ग्यारह घंटे के बाद वो फिर मेरे पास आये ,
मुझसे कहा मैं तुम्हे फिर एक पूरा दिन देना चाहता हूँ ,
अभी भी जी ले जैसे तू चाहे ....
मैंने कहा उन्हें ...
जानती हूँ भगवान मेरे होते हुए भी
दुनिया ऐसे ही जीती है जैसा वो चाहती है ,
मेरे बाद भी वैसे ही जियेगी जैसे जी आ रही है ,
कुछ नहीं बदलेगा इसमें ...सिर्फ मैं ही नहीं होउंगी ,
और धीरे धीरे सिर्फ यादोंके दायरेमें कैद हो जाउंगी ....
लेकिन ...अगर आप मुझे इस लिए दो बार मिलने आये ,
उससे बढ़िया किस्मत क्या हो सकती है ,
जो बरसों की तपश्चर्या के बाद भी न होता है ,
वो आपके दीदार मुझे निस्पृह होने पर मिल गए ....
चलो आपका हाथ थामे आपके साथ ही ले चलो ........

अजब वफ़ा के उसूलों से ये ”वफ़ाएं” हैं
तेरी जफ़ाएं, ”अदाएं”, मेरी ”ख़ताएं” हैं 

महकती जाती ये जज़्बात से फ़िज़ाएं हैं
कोई कहीं मेरे अश’आर गुनगुनाएं हैं

वो दादी-नानी के किस्सों की गुम सदाएं हैं
परी कथाएं भी अब तो ”परी कथाएं” हैं

ज़ेहन में कैसा ये जंगल उगा लिया लोगो
जिधर भी देखिए, बस हर तरफ़ अनाएं हैं

बिगडते रिश्तों को तुम भी संभाल सकते थे
मैं मानता हूं ...मेरी भी..... कई ख़ताएं हैं

मेरे ख़्यालों में करती हैं रक़्स ये शाहिद
तुम्हारी याद की जितनी भी अप्सराएं हैं

मंगलवार, 18 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (15)


तुम अकेले हो .... समय नहीं कटता ... दिल घबराता है !
मैं भी तो अकेली ही हूँ 
फर्क इतना है की समय को काटने की कोशिशें करती हूँ 
कभी नन्हीं सी गौरैया बन जाती हूँ 
प्रतिभाओं के दाने उठाती हूँ 
तो कभी हिन्दुस्तान की मल्लिका -ए-आज़म बन 
प्रतिभाओं को सम्मानित करती हूँ 
पूरे राज्य में हिंदी साहित्य की लाइब्रेरी 
लिखनेवालों की किताबें हीरे सी दमकती हैं 
........
सच पूछो तो ख्वाब पूरे हों ना हों 
समय एहसासों के संग बहुत बढ़िया बीतता है .......... एक बार इन्हें पढ़ो तो =

                पुराने समय में एक पंड़ितजी जब पूजा करने बैठते तो उनकी पालतू बिल्ली उनके आपपास बनी रहती, कभी गोद में बैठ जाती, कभी पूजा सामग्री की ओर लपकती । पंड़ितजी पूजा पर बैठते और पहले एक टोकरी से बिल्ली को ढंक देते । बिल्ली बंद रहती और उनकी पूजा निर्बाध संपन्न हो जाती । अचानक उनका देहांत हो गया । कुछ दिनों के बाद पूजा पुनः आरंभ करना थी । पुत्र ने बड़े परिश्रम से बिल्ली को पकड़ा , टोकरी में बंद किया और पूजा की । हर दिन पूजा से ज्यादा समय उसे बिल्ली को पकड़ने में लगाना पड़ता था क्योंकि बिल्ली उसे देखते ही दूर भागती थी । 

                कोई कार्य रूढ़ हो कर कब हमारी चेतना में  जगह बना लेता है , अक्सर हम जान नहीं पाते । विवेक और विज्ञान को अपनी शक्ति  का ज्यादातर भाग पिछले कामों को देखने-समझने और जांचने में खर्च करना पड़ता है । भारत में एक सामान्य परंपरा है कि जब किसी की मृत्यु होती है तो दरवाजे पर कंडे या उपले को जला कर रख दिया जाता है । शवयात्रा के साथ आगे आगे उस जलते उपले को ले कर चला जाता है । उस उपले से बड़े प्रयासों के बाद चिता की अग्नि प्रज्वलित की जाती है । नगरों / महानगरों में भी यही किया जाता है । इसके कारणों के विषय में कहीं कोई जिज्ञासा या प्रश्न  नहीं होता है ।
                  पुराने समय में ‘आग’ माचिस में सुलभ नहीं थी । बड़े परिश्रम और जतन से उसे ‘पैदा’ किया जाता था । रसोई बनाने के बाद चूल्हे में अंगारों को दबा कर रखा जाता था ताकि जरूरत पड़ने पर दोबारा उसी से ‘आग’ पैदा की जा सके । इस तरह चूल्हा हमेशा  आग समेटे गरम रहता था । घर में किसी की मृत्यु होते ही परिजन चूल्हे से आग निकाल कर उपले के साथ दरवाजे पर रख देते थे । चूल्हा ठंडा हो जाता था । ‘चूल्हा ठंडा होना’  शोक सूचक शब्दों  की तरह प्रयुक्त होते थे । शोक  प्रायः तीन दिन, तेरह दिन और कहीं कहीं सवा महीना या चालीस दिनों का होता है । तीन दिनों तक घर का चूल्हा नहीं जलता था । पास पड़ौस या संबंधीजनों के यहां से उपलब्ध कराए भोजन का उपयोग होता है । बाद में बहन-बेटियां और रिश्तेदार  घर का चूल्हा जलवाते थे । ‘चूल्हा जलवाना’ शोक  निवारण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया माना जाता था । अब चूल्हे में पहले की तरह ‘आग’ है , वह गरम है अर्थात् जीवन की सामान्य गतिविधियां पुनःस्थापित हो गईं ऐसा माना जाता था । 
                 आज के समय को देखें तो अग्नि को प्रज्वलित करने में कोई कठिनाई नहीं है । न ही घरों में परंपरागत चूल्हे दिखाई देते हैं , कम से कम नगरों में तो नहीं । गांवों में हैं भी तो उन्हें गरम रखने की आवश्यकता  अब समाप्त हो चुकी है । लोग कुकिंग गैस या बिजली से भोजन पकाते हैं । शिक्षा , समझ और आधुनिकता के मामले में नगरीय समाज तीव्र गतिशीलता  रखता है । लेकिन नगरों में, जहां उपले सहज नहीं मिलते हैं, शोक  के समय इन्हें ढूंढ़ कर जुटाया जाता है । उसे घासलेट या पेट्रोल  डाल कर माचिस से जलाया जाता है और दरवाजे पर रखा जाता है । बिना यह सोचे कि आज इस उपक्रम का कारण और जरूरत क्या है !! 
                     आज की पीढ़ी में जिज्ञासा और चेतना अधिक है । अगर परंपराएं थोथी हैं या अप्रासंगिक हो गईं हैं तो बिना सोचे उसे ढ़ोते जाना हमारे अविवेकी  होने को प्रमाणित करता है । यदि हम नई पीढ़ी के सामने अपने को इसी तरह प्रस्तुत और प्रमाणित करेंगे तो उनसे सम्मान की आशा  करना उचित नहीं है । हमारी अगली पीढ़ी बिल्ली पकड़ने के लिए नहीं होना चाहिए । 

मैंने एक किला देखा था(चिंतन)-वंदना शुक्ला 

मैंने एक किला देखा था
देखे तो ज़िंदगी में कई किले हैं
अब तो एक सी रूहें भटकती हैं उनके सन्नाटों में
ना तो किस्सों के पैर होते और
ना ही रूहों की शक्ल
हाँ तो एक किला देखा  
 मांद के बाहर
 घिसे हुए नखों वाले पंजों में ‘
अपना सिर घुसाये उदास   
बूढ़े लाचार शेर सा निरीह
खंडहर खंडहर हो जाता हुआ  
ईमारत की बुलंदी तो
भ्रमों की ऐयाशी है
ताड़ पत्र पर लिखी अमोल पांडुलिपियों सी
खस्ता हाल मज़बूत दीवारें  
छींटे थे कुछ पुराने खून के धब्बों के
दीवारों पर
यदि नहीं बताता गाइड खून के बारे में तो
पर्यटक यही समझते कि ये
बरसाती काई की जमाहट है पुरानी
पर नहीं वो खून था, जिसका इतिहास ज़रूर
लाल निखालिस और चमकीला रहा होगा
पर वर्तमान काला ,बुझी राख सा   
अलावा इसके थे
 पुराने माँस के कुछ लिथड़े हुए अंश
जो दीवारों पर दीमकों के ठुहों का भ्रम पैदा कर रहे थे  
कुछ भ्रम असलियत से कम क्रूर होते हैं |
ये हमारी पुरातात्विक संपत्ति है
जो संस्कृति की अनमोल धरोहर होती है
और धरोहरें झूठ और दिखाबे से
छल नहीं पातीं खुद को
ये बारीक नक्काशी ,मूर्तियां,छतें,दीवारें  
गाइड के चेहरे पर
गर्व की दिप्दिपाहत थी
ये बताते हुए
पर वो नहीं ज़वाब दे पाया इस प्रश्न का कि
दीवारों पर खून के धब्बे और मटमैले माँस के टुकड़े
देशी थे या विदेशी ?
रानियों के सात दरवाजों के पीछे बने
आराम गाहों और
राजा के एश्गाहों के दरवाजे
दो ध्रुव थे किले के
रानियाँ जहाँ अपने सपनों को सुलाती थीं थपकियाँ दे
ठुमरियों और मुजरों की अश्रु पूरित लोरियों से
संगमरमरी कमरों की एक एक उधड़ी टीप
और नीले-पीले चमकीले रंगों की
भद्रंग होने होने को नक्काशियां
बचे हुए पक्के रंगों ने जैसे  
कसकर पकड़ी हुई थीं छतें
और किस्सों ने महराबें  
डरकर .......
खम्भों मेहराबों पर
वास्तुशिल्पियों के हुनर के  
ध्वस्त उधड़े चहरे
जैसे झुर्रीदार त्वचा में से दिखता 
गुलाबी ताज़ा मांस
ज़मीन के चिकने फर्श में से झांकती
 इतिहास के खुरदुरेपन की टीपें गोया  
 किसी सोये मासूम बच्चे के गालों पर
सूखे आंसुओं के धब्बे
बड़ी छोटी तोपें
जिन से कभी आग के गोले बरसा करते होंगे  
उन मुहं पर दूरदर्शी मकड़ियों ने बुन दिये थे जाले
कर दिये थे उनके मुहं बंद
(ये मकड़ियाँ ,चिमगादड,दीमकें
ना हों तो कितने निरीह/अकेले हो जाएँ सन्नाटे और उनके इतिहास )
अलावा इसके एक विशाल गोलाकार कमरा
जिसका एकमात्र दरवाजा इतना छोटा कि
मुश्किल से जा सके कोई मानव उसमे
बताया गाइड ने कि ये अस्त्र ग्रह कहलाता था
जिसमे गोला बारूद और अस्त्र शस्त्र भरे जाते थे
किसी संभावित युद्ध के लिए  
साथ में ये जोड़ना भी नहीं भूला वो
कि अंग्रेजों,चीनियों,पाकिस्तानियों ने इस पर गोले बरसाए
मिसाइलें छोड़ीं,आक्रमण किये
तिलिस्म कहें अचम्भा या कारीगरी वास्तुशिल्पियों की
 इसका कुछ नहीं बिगाड़ पाए  
पर ना जाने कैसे और क्यूँ
इतना पुरानाऔर मज़बूत अस्त्र ग्रह खुद ब खुद ढहता जा रहा है
 खंडहर हो जाता हुआ
टूट टूट कर गिरते हैं इसके टुकड़े ज़मीन पर गाहे ब गाहे ,यूँ ही
जैसे शोक मनाता हो अपने अकेले छूट जाने का 
अब बेवजह बेमौसम ढह रही हैं दीवारें इस अस्त्र ग्रह की
ज़र्ज़र महराबें,टूटे झरोखे ,जंग लगे लोहे की मोटी जंजीर
और जंजीर में गुंथा एक विशालकाय बूढा ताला
जिसे अपने जंजीर में बंद होने की सदी याद नहीं
ये सब कहते हैं यही कि
अब तबाही को ज़रूरत नहीं किसी
औरंगजेब की
 नहीं है अब दरकार
 देश की आजादी हथियाने के लिए
पहले उसके भाषा और संस्कृति पर आक्रमण करने की
अब हम मशीनी युग में हैं .... 

प्यार करते हुए
जब-जब लड़के ने डूब जाना चाहा
लड़की उसे उबार लाई।
जब-जब लड़के ने खो जाना चाहा प्यार में
लड़की ने उसे नयी पहचान दी।
लड़के ने कहा, “प्यार करते हुए अभी इसी वक्त
मर जाना चाहता हूँ मैं तुम्हारी बाहों में”
लड़की बोली, “देखो तो ज़िंदगी कितनी खूबसूरत है,
और वो तुम्हारी ही तो नहीं, मेरी भी है
तुम्हारे परिवार, समाज और इस विश्व की भी है।”
प्यार करते हुए
लीन हो गए दोनों एक सत्ता में
पर लड़की ने बचाए रखा अपना अस्तित्व
ताकि लड़के का वजूद बना रह सके ।
लड़का कहता ‘प्यार समर्पण है एक-दूसरे में
अपने-अपने स्वत्व का’   
लड़की कहती ‘प्यार मिलन है दो स्वतन्त्र सत्ताओं का
अपने-अपने स्वत्व को बचाए रखते हुए ‘
प्यार करते हुए
लड़का सो गया गहरी नींद में देखने सुन्दर सपने
लड़की जागकर उसे हवा करती रही।
लड़के ने टूटकर चाहा लड़की को
लड़की ने भी टूटकर प्यार किया उसे
प्यार करते हुए
लड़के ने जी ली पूरी ज़िंदगी
और लड़की ने मौत के डर को जीत लिया।                    
लड़का खुश है आज अपनी ज़िंदगी में
लड़की पूरे ब्रम्हाण्ड में फैल गयी।


शतरंज का खेल 
भले न आता हो तुम्हें...
लेकिन शब्दों से शतरंज 
तुम बखूबी खेल लेते हो ,
और सामने वाले को 
सीधे-सीधे मात भी दे देते हो ...!
न जाने कैसे जान जाते हो तुम 
कि कौन सा शब्द चलने से 
कौन धराशायी हो जायेगा....!
और यदि इतने पर भी न हुआ 
तो तुम्हारे पास और भी चालें हैं...!
हर जिंदगी में भावनाओं की,
संवेदनाओं की,धन की अहमियत से भी 
अनभिज्ञ नहीं हो तुम....! 
अपनी चालों में इनका इस्तेमाल 
तुम बखूबी कर लेते हो....!
और सामने वाले को....
इसका पता भी नहीं चल पाता !
लेकिन कुछ लोग ऐसे भी हैं 
जिन्हें तुम्हारी इन चालों का भान है !
उनके लिए जीवन की 
छोटी छोटी बातें,
छोटी-छोटो सच्चाइयाँ ही 
जीने के लिए मायने देती हैं !
बड़ी बड़ी बातों की ये चालें 
भले ही तुम्हारे मन को संतोष दे दें,
तुम्हारे अहं को..... 
जीत के एहसास से भर दें...!
लेकिन तुम भी ये 
अच्छी तरह जानते हो
कि तुम्हारे खेलने की प्रवत्ति का 
उन्हें भी आभास है.......!
इसलिए उन लोगों के सामने तुम 
हमेशा छोटे ही नज़र आओगे
क्यूँ कि.....
वो तुम्हें जानते हुए भी
तुम्हारी इन चालों से 
खुद को तुम्हारे सामने 
हारा हुआ दिखाते हैं...!!

सोमवार, 17 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (14)


बचपन में अक्सर सोचती - एक पर एक सीढ़ी रख लूँ तो चार,पांच सीढ़ियों की मदद से आसमान छू सकती हूँ 
थोड़ी बड़ी हुई तो सोचा - अलादीन का चिराग मिल जाये तो मुक्त हाथों सबको पेट भरी नींद दूंगी 
आज सोचती हूँ - ढूँढने से प्रतिभाओं को एक जगह सहेजा जा सकता है ......
पर आकाश बहुत बड़ा है,दुनिया बहुत बड़ी है और अलादीन का चिराग कहानी बनकर रह गया है 
और सामर्थ्य से जितनी तलाश करो - प्रतिभाओं की जड़ें बहुत गहरी बहुत दूर तक हैं ........... नहीं कह सकते कि काश्मीर से कन्याकुमारी तक .... पूरी दुनिया तक फैली है, जहाँ तक सिंचन कर पाऊं और नायाब फल ले पाऊं - कोशिश जारी है .......
.........................
अपने (http://bitspratik.blogspot.in/) प्रतीक माहेश्वरी
सोचा करता था वह "अपने" लोगों के बारे में
वही जिनको वो कई रिश्तों से पहचानता था
माँ, पिता, भाई, बहन, चाचा, दोस्त, जिगरी दोस्त, चड्डी दोस्त..

"अपने"
यह शब्द भेदती थी उसे कभी..
क्या यह शब्द दुनिया का छलावा नहीं है?
इस शब्द ने कईयों की दुनिया नहीं उजाड़ी है?
पर
फ़िर
क्या इन्हीं "अपनों" ने उसकी ये ज़िंदगी हसीन नहीं बनाई है?
क्या वही ये "अपने" नहीं हैं
जो उसके सुख-दुःख में,
उसके गिरते क़दमों
और
कन्धों को सहारा देते रहे हैं?

पर आज उसे "भय" लग रहा है
आज उसके दिल से खून का कतरा सूखा जा रहा है
आँखों का पानी शरीर में ही कहीं सूख रहा है

क्यों..
आज न जाने क्या ख्याल आया
क्या ये "अपने" उसका साथ निभाएँगे?
तब
जब
पंचतत्व
उसके खून के हर कतरे को,
शरीर की हर बूँद को,
रूह के हर कण को,
अंगों की हर सांस को,
अपनी ओज में सुखाएगा
आखिरी आवाज़ लगाएगा?

उस दिन शायद उसे "अपने" छलावा लगेंगे
वो उसका साथ वहीँ छोड़ देंगे
क्या यह ज़िंदगी का छलावा नहीं है?
जो की फिल्म की चरमावस्था (क्लाईमैक्स) को
दुखांत (ऐन्टी-क्लाईमैक्स) कर देगा?
जिनके लिए पूरी ज़िंदगी जी है
बस वही नहीं मिलेंगे..

"अपनों" को "अपना" कहना
क्या उस दिन इस शब्द के खिलाफ नहीं हो जाएगा?
यह सोच कर वह आज घबरा रहा है
पर
फ़िर
जब तक सच्चाई का पता नहीं चलेगा
तब तक इस छलावे को जीना पड़ेगा
यह छलावा जिसे हम "अपने" कहते हैं
आज यही सच्चाई है..
आज यही ज़िंदगी है..


घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
दो ही लोग निभाते हैं केवल
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं
समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं
घर की चीजें
जो यहां-वहां पडी‌ हैं
उन्हें संभालना अब
हमारी जिम्मेदारी है
बंटवारे में
हमारे हिस्से में मिली चीजों को
संभालकर रखने में निकल जाता है आधा दिन
अब वह
सबकी नहीं बल्कि
केवल हमारी सम्पत्ति का हिस्सा हैं।

गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ, आती थी चिट्ठी ॥
वह स्वप्न-परी बन, मुस्काती थी चिट्ठी ॥

शब्दॊं सॆ उसकॆ स्नॆह,की वर्षा हॊती थी,
बॆटॆ की तन्हाई मॆं, माँ कितना रॊती थी,
पंक्ति-पंक्ति मॆं प्यार, पिता का बहता था,
कब आयॆंगॆ भैया, छॊटा भाई कहता था,

उन सबका चॆहरा भी,दिखलाती थी चिट्ठी ॥
आशिष की अमृत-धार, बहाती थी चिट्ठी ॥१॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बहना की तीखी कुछ,तंज भरी सी बातॆं,
लड़ना-भिड़ना चिड़ना, की सारी सौगातॆं,
भैया यॆ लाना,वॊ लाना,की सब फ़रियादॆं,
ख़त मॆं दिख जाती थीं, नई पुरानी यादॆं,

सावन मॆं राखी भर भर, लाती थी चिट्ठी ॥
अम्मा बाबूजी जैसा, बतियाती थी चिट्ठी ॥२॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
,,

भॆंट भलाई और कुशल, मंगल की पाती, 
पल-भर मॆं वह लाखॊं, खुशियां दॆ जाती,
याद दिला जाती थी,सारॆ दिन मस्ती कॆ,
और दिखाती थी चौबारॆ,अपनी बस्ती कॆ,

पढकर मन कॊ कितना,हरषाती थी चिट्ठी ॥
सच कहता हूं, दर्पण बन, जाती थी चिट्ठी ॥३॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ममता और आशिष की, मूरत हॊती थी,
चिट्ठी आना शुभ-घड़ी, मुहूरत हॊती थी,
एक कागज़ पर कितनॊं, की सूरत हॊती,
तार किया जाता जब,बहुत ज़रूरत हॊती,

अनहॊनी सॆ हमकॊ, बहुत रुलाती थी चिट्ठी ॥
फ़िर खुद इस दिल कॊ, सहलाती थी चिट्ठी ॥४॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एक ख़त मॆं जानॆ,कितनॆ संदॆश भरॆ हॊतॆ,
अम्मा बाबूजी कॆ, लाखॊं निर्दॆश भरॆ हॊतॆ,
कठिन ज़मानॆ की, तस्वीर रखा करतॆ थॆ,
शॆष कुशल-मंगल सॆ,अंत लिखा करतॆ थॆ,

बिल्कुल अम्मा बाबूजी,बन जाती थी चिट्ठी ॥
सब निश्छल रिश्तॆ यही, निभाती थी चिट्ठी ॥५॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

टुकुर टुकुर आँखॆं तकतीं,ख़त आनॆ की राहॆं,
और डाकियॆ कॆ थैलॆ पर,रहती रॊज निगाहॆं,
अब लायॆगी,कब लायॆगी, नया संदॆशा पाती,
हर धड़कन सीनॆ मॆं बस,बात यही दॊहराती,

इन्तज़ार की परिभाषा, सिखलाती थी चिट्ठी ॥
जीवन कॆ कैसॆ कैसॆ, रंग दिखाती थी चिट्ठी ॥६॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


रविवार, 16 दिसंबर 2012

विजय दिवस की हार्दिक बधाइयाँ - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

ऊपर दी गई इस तस्वीर को देख कर कुछ याद आया आपको ?

आज १६ दिसम्बर है ... आज ही के दिन सन १९७१ में हमारी सेना ने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था ... और बंगलादेश की आज़ादी का रास्ता साफ़ और पुख्ता किया था ! तब से हर साल १६ दिसम्बर विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है !

आइये कुछ और तस्वीरो से उस महान दिन की यादें ताज़ा करें !













 आप सब को विजय दिवस की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
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साहब की कोठी
मनोज कुमार at विचार
साहब की कोठी आज सुबह की सैर से वापस आते समय पहले तो धीरे-धीरे फिर ज़ोर से वर्षा होने लगी। तेज हो चुकी बारिश से बचने के लिए मैं छाता ताने अपनी रफ्तार तेज करता घर की तरफ वापस जा रहा था। तभी काफी तेज रफ्तार से पुलिस की गाड़ी मेरे बगल से गुजरी। छपाक ...!!! ... और सड़क पर जम आए पानी से मेरा वह शरीर, जिसे अब तक मेरे छाते ने इंद्र देवता से बचाकर रखा था, भींग गया और साथ ही छोड़ गया कीचड़ से सना वस्‍त्र। अब तो मैं अपना छाता मोड़ने में ही सुख मान रहा था, बारिश की बौछार से कुछ तो कीचड़ धुल जाए! छाता मोड़ते हुए मैं बाई ओर अपनी गरदन घुमाता हूँ। जेल की ऊँची दीवारों पर उग आए पौधों पर मेरी  more »

सहन-शक्ति

सुज्ञ at सुज्ञ
बात महात्मा बुद्ध के पूर्व भव की है जब वे जंगली भैंसे की योनि भोग रहे थे। तब भी वे एकदम शान्त प्रकृति के थे। जंगल में एक नटखट बन्दर उनका हमजोली था। उसे महात्मा बुद्ध को तंग करने में बड़ा आनन्द आता। वह कभी उनकी पीठ पर सवार हो जाता तो कभी पूंछ से लटक कर झूलता, कभी कान में ऊंगली डाल देता तो कभी नथुने में। कई बार गर्दन पर बैठकर दोनों हाथों से सींग पकड़ कर झकझोरता। महात्मा बुद्ध उससे कुछ न कहते। उनकी सहनशक्ति और वानर की धृष्टता देखकर देवताओं ने उनसे निवेदन किया, "शान्ति के अग्रदूत, इस नटखट बंदर को दंड दीजिये। यह आपको बहुत सताता है और आप चुपचाप सह लेते हैं!" वह बोले, "मैं इसे  more »

हम पढ़ें, लिखें या करें ब्लॉगिंग...!

देवेन्द्र पाण्डेय at ब्लॉग और ब्लॉगर की टिप्पणी
(1) न दैन्यं न पलायनम्.... यह प्रवीण पाण्डेय जी का ब्लॉग है। जानता हूँ, इससे सभी परिचित हैं। मैं बस भूमिका के लिए बता रहा हूँ। पिछले दिनो इस ब्लॉग पर एक पोस्ट आई.. *पढ़ते-पढ़ते लिखना सीखो*। शीर्षक पढ़कर तो ऐसा लगा कि यह बच्चों को कोई उपदेश देने वाली पोस्ट है लेकिन पढ़ने के बाद एहसास हुआ कि यह हमारे जैसे बेचैन लोगों की व्यथा-कथा है। इस पोस्ट के माध्यम से जो विमर्श उठाया गया है वह यह.. प्रश्न बड़ा मौलिक उठता है, कि यदि इतना स्तरीय और गुणवत्तापूर्ण लिखा जा चुका है तो उसी को पढ़कर उसका आनन्द उठाया जाये, क्यों समय व्यर्थ कर लिखा जाये और औरों का समय व्यर्थ कर पढ़ाया जाये ? ब्लॉग और कमें... more »

बैंगलोर पासपोर्ट की ऑनलाइन सेवा याने कि भ्रष्टाचार 

noreply@blogger.com (Vivek Rastogi) at कल्पनाओं का वृक्ष
सरकार ने लगभग २ वर्ष पहले पासपोर्ट कार्यालय और पुलिस के भ्रष्टाचार से मुक्ति दिलवाते हुए, पासपोर्ट की प्रक्रिया ऑनलाइन की थी। मैंने खुद लगभग १.८ वर्ष पहले पासपोर्ट बनवाया था और इस प्रक्रिया का साक्षात अनुभव किया था। पासपोर्ट कार्यालय में केवल २ घंटे की अवधि में मेरा पूरा कार्य हो गया था, सरकार ने ऑनलाईन प्रक्रिया करते हुए प्रोसेसिंग का कार्य टीसीएस को ऑउटसोर्स कर दिया था। अभी मेरे ऑफ़िस के कुछ मित्रों को पासपोर्ट बनवाना था तब यह भ्रष्टाचार हमारे सामने आया । जनता समझती है कि अगर सरकार सुविधाएँ ऑनलाइन कर दे उसको सुविधाएँ मिलने लगेंगी। पहली बार जब IRCTC के द्वारा रेल्वे ने more »

शुक्र है अब भी बचा है रेडियो

रमेश शर्मा at यायावर
आवाज की दुनिया मे गुमसुम आलमआरा जैसी मूक फ़िल्मो पर झूमते उस जमाने के हमारे समाज मे एक स्वरीय क्रान्ति ले कर आया रेडियो अब भारत मे तकरीबन सौ साल पूरे करने के समीप है। तमाम कमियो के बावजूद आज भी रेडियो सुनना अच्छा लगता है । जैसे सफ़ारी और जीन्स के युग मे धोती अच्छी लगती है। जैसे विविध भारती पर पुराने नगमो की बरसात पुरानी यादों को जगा जाती है। दुनिया मे टीवी के तमाम जलवो के बावजूद रेडियो की आज भी क्या अहमियत है इसे बयान करने के लिए एक ताजा मामले की चर्चा। यह मामला रेडियो बनाम ऍफ़ एम् के दिग्भ्रमित काल का एक नायाब उदाहरण है। आरजे ने गर्भवती महारानी केट की तबीयत जानने के लिए ब्रिट... more »

एक सीली रात के बाद की सुबह......

नर्म लहज़े में शफ़क ने कहा उठो दिन तुम्हारे इंतज़ार में है और मोहब्बत है तुमसे इस नारंगी सूरज को.... इसका गुनगुना लम्स तुम्हें देगा जीने की एक वजह सिर्फ तुम्हारे अपने लिए... सुनो न ! किरणों की पाजेब कैसे खनक रही है तुम्हारे आँगन में. मानों मना रही हो कमल को खिल जाने के लिए सिर्फ तुम्हारे लिए..... चहक रहा है गुलमोहर बिखेर कर सुर्ख फूल तुम्हारे क़दमों के लिए.... जानती हो ये मोगरा भी महका है तुम्हारी साँसों में बस जाने को... सारी कायनात इंतज़ार में है तुम्हारी आँखें खुलने के... जिंदगी बाहें पसारे खड़ी है तुम्हें आलिंगन में भरने को.... उठो न तुम... और कहो कुछ, इंतज़ार करती इस सुबह से.... जवा... more »

प्रेम की कोई भाषा नहीं होती...

ZEAL at ZEAL
मेरा फ़्लैट दुसरे माले पर है ! सुबह बालकनी में धूप ले रही थी कि निगाह कार पार्किंग में गयी ! सुरेश जल्दी-जल्दी सभी कारें साफ़ करने में लगा था , पता नहीं एक दिन में कितनी कार साफ़ कर डालेगा ... उसे तो बस हर कार मालिक से 300 रूपए महीने पाने थे! अचानक मेरी निगाह नीचे खड़े काले कुत्ते पर गयी , मुंह उठाये दुसरे माले पर मुझे देख रहा था ! प्रेम के लिए अपनी गर्दन को बेवजह इतनी तकलीफ दे रहा था ! मुझे उसका अपनापन बहुत अच्छा लगा ! मैंने मुस्कुरा दिया तो उसने पूंछ और जोर से हिलानी शुरू कर दी ... फिर अपनी जगह बदलकर ठीक मेरी बालकनी की सिधान में आ गया और 180 डिग्री पर सर उठाकर निहारने लगा !more »

सोलह दिसम्बर.......... कहां गये वो लोग......

आज सोलह दिसम्बर है, आज का दिन विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है... आज का दिन अपनी सेना पर गर्व करनें का दिन है... आज का दिन उस कीर्तिमान को याद करनें का दिन है जब ९५००० पाकिस्तानी सैनिकों नें घुटनें टेक कर आत्मसमर्पण किया और सम्पूर्ण विश्व नें हमारी शक्ति को जाना और पहचाना। आईए उस वाक्ये को थोडा विस्तार से पढें.... पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तान एक सिलसिलेवार तरीके से लगभग अत्याचार, नरसंहार और दमन की योजना पर अमल कर रहा था, इसके कारण उस क्षेत्र से लगभग दस लाख लोगों नें भारत के पूर्वी राज्यों में शरणार्थी के रुप में आना शुरु कर दिया। पश्चिम बंगाल, बिहार, असम, त्रिपुरा, मेघालय में इ... more »

अमरीका :- बंदूक में भर के अमरीकी पि‍ज्ज़ा ...

श्रद्धांजलि

*बाल ठाकरे को श्रद्धांजलि * मुम्बई में ‘कार्टूनिस्ट्स’ कम्बाइन’ द्वारा देश के जानेमाने कार्टूनिस्ट बालासाहेब ठाकरे पर बनाये गये कार्टून और कैरीकेचरों की एक विशेष प्रदर्शनी का जल्दी ही आयोजन किया जा रहा है। कार्टूनिस्ट प्रभाकर वाइरकर के अनुसार* ' टाइगर' बालासाहेब ठाकरे के लिए एक श्रद्धांजलि '* प्रदर्शनी के स्थान, समय और दिनांक के बारे में जल्दी ही जानकारी दे दी जाएगी। इस प्रदर्शनी हेतु ‘टाइगर" बालासा्हेब ठाकरे को लेकर सभी कार्टूनिस्टों द्वारा बनाये गये प्रकाशित/अप्रकाशित ३-४ कर्टून और/या कैरीकेचर आमन्त्रित किये गये हैं। *आवश्यक विवरण:* • कागज का आकार आकार: ए३ (२९७X४२० मिमी.) more »

डी.टी.सी. के बस की सवारी

ये डी.टी.सी. के बस की सवारी इससे तो थी अपनी यारी हर सुबह कुछ किलोमीटर का सफर कट “जाता था” , नहीं थी फिकर जैसे सुबह 9 बजे का ऑफिस 11 बजे तक पहुँचने पर कहलाता नाइस तो बेशक घर से हर सुबह निकलते लेट पर बस स्टैंड पर भी थोड़ा करते वेट अरे! कुछ बालाओं को करना पड़ता था सी-ऑफ ताकि कोई “भगा” न ले, न हो जाए इनका थेफ्ट कुछ ऑटो से जाती, कुछ भरी हुई बस मे हो जाती सेट हम आहें भरते, करते रह जाते दिस-देट मेरी बोलती आंखे दूर से करती बाय-बाय मन मे हुक सी होती, आखिर कब 'वी मेट' लो जी आ ही गई हमारी भी बस ! जो एक और झुकी थी, क्योंकि थी ठसाठस तो भी “बहुत “ सारे यात्रीगण चढ़ रहे थे कुछ ही यात्री आगे, बढ़ रह... more »

नम मौसम, भीगी जमीं ..

Rohitas ghorela at Rohitas Ghorela
सर्दी की लम्बी काली रातें तन्हाइयां और घड़ी की टक..टक..टक सुबह तलक, क़हरे-हवा बबूल से टपकती शबनमी बूंदें टप..टप..टप नम मौसम, भीगी जमीं। By:- **रोहित** क़हरे-हवा=यादों का क़हर (कविता के अर्थ में) / हवा की विपदा (शाब्दिक अर्थ)

.....साँवली बिटिया .....

*रंग सांवला बिटिया का * *कैसे ब्याह रचाऊँगा * *बेटे जो होते सांवले...* *शिव और कृष्णा उन्हें बनाता * *बेटी को क्या उपमा दिलाऊंगा ....* * **पढ़ी लिखी संस्कारी है वो* *गुणों से सुसज्जित न्यारी है वो* *मेरी तो राजदुलारी है वो* *पर अपने रंग से थोड़ा सा लजाई है वो .......* * **गोरा तो गोरी ही चाहे* *काले को भी गोरी ही मनभाए* *सांवल किसी को क्यूँ ना सुहाए* *प्रेम का रंग क्यूँ कोई देख ना पाए ......* * **वो भी सृजन है देवों का* *करुणा , ममता उसमे भी है* *घर की लक्ष्मी भी बन दिखाएगी वो* *ग़र समझो उसे की वो अपनी है....* * **सांवली है पर संध्या है वो..* *भोर की पहली सांवली बदरिया है वो* *मेरी तो more »

माँ तुम्हारा चूल्हा

अरुण चन्द्र रॉय at सरोकार
2010 में एक कविता लिखी थी "माँ तुम्हारा चूल्हा" और आज चर्चा है सभी अख़बारों में कि देश के स्वस्थ्य को प्रभावित करने वाला कारक है - चूल्हा (हाउस होल्ड एयर पाल्यूशन). संयुक्त राष्ट्र संघ से डबल्यू एच ओ तक इसे साबित करने पर तुला है। आश्चर्य है कि विकसित देशो में ए सी, गाड़ियाँ, हवाई जहाज़ आदि आदि धरती को कितना नुकसान पहुचते हैं, इस पर कोई अध्यनन नहीं होता। वह दिन दूर नहीं जब लकड़ी को इंधन के रूप में इस्तेमाल पर पाबंदी होगी और सोचिये कि कौन प्रभावित होगा, साथ ही पढ़िए मेरी कविता भी। माँ बंद होने वाला है तुम्हारा चूल्हा जिसमे झोंक कर पेड़ की सूखी डालियाँ पकाती हो तुम खाना कहा जा रहा ... more »

विजय दिवस विशेष - जय हिन्द की सेना

शिवम् मिश्रा at बुरा भला
*ऊपर दी गई इस तस्वीर को देख कर कुछ याद आया आपको ?* *आज १६ दिसम्बर है ... आज ही के दिन सन १९७१ में हमारी सेना ने पाकिस्तानी सेना को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था ... और बंगलादेश की आज़ादी का रास्ता साफ़ और पुख्ता किया था ! तब से हर साल १६ दिसम्बर विजय दिवस के रूप में मनाया जाता है ! * *आइये कुछ और तस्वीरो से उस महान दिन की यादें ताज़ा करें !* *आप सब को विजय दिवस की हार्दिक बधाइयाँ और शुभकामनाएं !* * * *आज जब हम विजय दिवस का जश्न मना रहे है ... आइये साथ साथ याद करे उन सब वीरों और परमवीरों को जिन्होने अपना सब कुछ नौछावर कर दिया अपनी पलटन और अपने देश के मान सम्मान बनाए रखने क... more »
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आज जब हम विजय दिवस का जश्न मना रहे है ... आइये साथ साथ याद करें उन सब वीरों और परमवीरों को जिन्होने अपना सब कुछ नौछावर कर दिया अपनी पलटन और अपने देश के मान सम्मान बनाए रखने के लिए ...
जय हिंद  ... जय हिंद की सेना !!!

लेखागार