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शुक्रवार, 30 नवंबर 2012

विश्व एड्स दिवस पर रखें याद जानकारी ही बचाव - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

कल १ दिसम्बर है यानि ... विश्व एड्स दिवस [1 दिसंबर] ...
 

एड्स के सदर्भ में एक अच्छी खबर यह है कि दुनिया भर में एचआईवी से सक्रमित लोगों की सख्या कम हो रही है। यहीं नहीं, एचआईवी सक्रमण के नये मामलों में भी गिरावट दर्ज हुई है। इसके बावजूद इस जानलेवा रोग की समाप्ति के लिए जारी जंग खत्म नहीं हुई है.. ?
एचआईवी [चूमन इम्यूनोडेफिशिएंसी वाइरस], एक्वायर्ड इम्यूनोडेफिशिएंसी सिड्रोम [एड्स] का प्रमुख कारण है। एड्स जानलेवा बीमारी है। एचआईवी सक्रमण की अंतिम अवस्था एड्स है। वर्तमान में विश्व में साढ़े तीन करोड़ से ज्यादा लोग एचआईवी से ग्रस्त हैं। इन दिनों भारत में लगभग 23.9 लाख व्यक्ति एचआईवी/ एड्स पीड़ित है। वर्तमान आकड़ों के अनुसार एचआईवी पीड़ितों की सख्या कम हो रही है और सक्रमण दर में भी गिरावट आ रही है।

इस साल की 'थीम'

इस वर्ष 'विश्व एड्स दिवस' की थीम है- 'गेटिंग टू जीरो'। यानी नए एचआईवी सक्रमण की दर को शून्य स्तर पर लाना और बेहतर इलाज के जरिये एड्स से ग्रस्त लोगों की मृत्यु दर को शून्य स्तर पर लाना। इस थीम को सन् 2015 तक जारी रखा जाएगा।

एचआईवी क्या है

मानव शरीर में कुदरती तौर पर एक प्रतिरक्षा तत्र [इम्यून सिस्टम] होता है, जो शरीर के अंदर सक्रमण और बीमारियों का मुकाबला करता है। इसका सबसे महत्वपूर्ण अंग होती है एक कोशिका [सेल] जिसे सीडी-4 सेल कहते है। आम तौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में 500 से 1800 सीडी-4/ सीयूएमएल पायी जाती है।

शरीर पर हमला

एचआईवी वाइरस शरीर में प्रवेश कर सीडी-4 सेल्स पर हमला करता है, और उनमें अपनी सख्या बढ़ाकर सीडी-4 सेल्स का विनाश शुरू कर देता है। कई सालों के दौरान धीरे-धीरे सीडी-4 सेल्स कम होने लगती है, जिससे इम्यून सिस्टम कमजोर पड़ जाता है। परिणामस्वरूप शरीर सामान्यत: सक्रमण और बीमारियों का सही तरह से मुकाबला नहीं कर पाता। इस अवस्था को एड्स कहते हैं, जो अंतत: मृत्यु का कारण बनता है। इस मर्ज में संक्रमण निरोधक शक्ति का धीरे-धीरे क्षय हो जाता है। इस कारण साधारण सक्रमण भी जानलेवा बीमारी का रूप लेते है। टीबी [क्षयरोग], डायरिया, निमोनिया, फंगल और हरपीज आदि ऐसे रोग हैं, जिनमें एचआईवी सक्रमण इन रोगों को और जटिल बना देता है।

एचआईवी का प्रसार

* एचआईवी का एक मुख्य कारण सक्रमित व्यक्ति के साथ असुरक्षित यौन सबध स्थापित करना है।
* ब्लड ट्रासफ्यूजन के दौरान शरीर में एचआईवी सक्रमित रक्त के चढ़ जाने से।
* एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति पर इस्तेमाल की गई इंजेक्शन की सुई का इस्तेमाल करने से।
* एचआईवी पॉजिटिव गर्भवती महिला गर्भावस्था के समय, प्रसव के दौरान या इसके बाद अपना दूध पिलाने से नवजात शिशु को सक्रमणग्रस्त कर सकती है।
एड्स से सबधित जाचें

* एलीसा टेस्ट: केवल स्क्रीनिग व प्रारभिक जाच।
वेस्टर्न ब्लॉट टेस्ट: यह एचआईवी सक्रमण की खास जाच है, जो पॉजिटिव टेस्ट बताती है कि कोई शख्स एचआईवी से ग्रस्त है।
* एच.आई.वी. पी-24 एंटीजेन [पीसीआर]: एचआईवी की स्पष्ट जाच व रोग की तीव्रता की जानकारी पता चलती है।
* सीडी-4 काउट: इस परीक्षण से रोगी की प्रतिरोधक क्षमता का आकलन किया जाता है। 


दूरदर्शन पर अक्सर ही हम एक लाइन सुनते है एड्स के बारे में ... पर शायद ही हम से कोई भी इस पर कोई ध्यान देता हो ... सब के अपने अपने कारण है ... और हर एक की समझ से वह अपनी जगह बिलकुल सही है पर सत्य को इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई उसके बारे में क्या सोचता है ...सत्य हमेशा ही सत्य होता है ... अपनी जगह अटल ... और एड्स के मामले में सत्य यही है कि ...


यह आलेख आप ब्लॉग बुलेटिन पर पहले भी पढ़ चुके है ... पिछले साल ... पर क्या करें ...
 
आप तो जानते ही होंगे कि ...

जानकारी ही बचाव है ...  
 
और आप तक जानकारी और नई नई पोस्टों के लिंक पहुंचाना हमारा असली मकसद !!



सादर आपका 

 
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नज़्म : मर्द और औरत

हमने कुछ बनी बनाई रस्मो को निभाया ; और सोच लिया कि; अब तुम मेरी औरत हो और मैं तुम्हारा मर्द !! लेकिन बीतते हुए समय ने जिंदगी को ; सिर्फ टुकड़ा टुकड़ा किया …. तुमने वक्त को ज़िन्दगी के रूप में देखना चाहा मैंने तेरी उम्र को एक जिंदगी में बसाना चाहा . कुछ ऐसी ही सदियों से चली आ रही बातो ने ; हमें एक दुसरे से , और दूर किया ....!!! प्रेम और अधिपत्य , आज्ञा और अहंकार , संवाद और तर्क-वितर्क ; इन सब वजह और बेवजह की बातो में ; मैं और तुम सिर्फ मर्द और औरत ही बनते गये ; इंसान भी न बन सके अंत में ...!!! कुछ इसी तरह से ज़िन्दगी के दिन , तन्हाईयो की रातो में ढले ; और फिर तनहा रात उदास दिन  more »

जानवर कौन?

नेताओं की जुबान। बेशर्मी की सारी हदें पार करतीं और मर्यादा को ताक पर रखकर कुछ भी बयान देने का शायद लायसेंस मिल जाता है नेताओं को। ऐसे ही एक नेता है, मणिशंकर अय्यर। ब्यूरोक्रेट्स से नेता बने अय्यर अपने विवादास्पद बयानों के लिए जाने जाते हैं और उन्होंने ताजा बयान दिया है, कि एफडीआई का विरोध करने वाले सांसद 'जानवर' हैं। अय्यर ने एक निजी न्यूज चैनल के एक कार्यक्रम में जिस अंदाज में अपनी बात की और बाद में अपनी बात पर टिके रहने का दावा किया, उससे साबित होता है कि वे एक अडिय़ल शख्स हैं और उनकी खुद की सोच-समझ किसी 'जानवर' से कम नहीं हैं, जो अपने सामने किसी को कुछ नहीं more »

बार-बार दिन ये आये....:)... (Part-2)

रुनझुन at रुनझुन
पिछली पोस्ट में आप सबके साथ अपने जन्मदिन की कुछ यादें शेयर कर रही थी न! तो बस आज उन्हीं यादों की अगली कड़ी लेकर हाज़िर हूँ ये है *7 नवम्बर 2005 *की कुछ यादें इस वर्ष मेरे साथ मेरा प्यारा भाई भी था और इस बार का केक मेरा अब तक का सबसे सुन्दर केक था.... पिंक कलर की प्यारी सी सुन्दर सी डांसिंग डॉल... सच्ची इस केक को तो काटने का ही मन नहीं कर रहा था..... आप भी देखिये.... है न केक बहुत ही सुन्दर !!! पहले तिलक... And then... Blow.....!!! और अब ये लीजिये केक भी कट गया सबसे पहले केक मेरे प्यारे भाई को उसके बाद मेरी बारी इस साल मैंने अपनी उम्र के चार वर्ष पूरे किये थे... और उसके बाद  more »

फेसबुक वालों से इतनी दुश्मनी क्यों ?-- कानून अथवा तानाशाही ?

ZEAL at ZEAL
हर तरफ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन किया जा रहा है ! जिसे देखो उसे ही गिरफ्तार कर ले रहे हैं लोग ! कारण ? --उनके अहम् को ठेस पहुँच गयी ! सरकार तो इंतज़ार में ही बैठी थी की फेसबुक वालों की कलम तोड़ दी जाए ! इन गिरफ्तारियों को देखकर उन्हें तो मौक़ा मिल गया फेसबुक पर लिखने वालों के खिलाफ ! बना दिया क़ानून ! अब भुगतिए 66-A को, स्वतंत्र लेखन अब संभव ही नहीं है ! जी-हुजूरी का तडका तो लगाना ही पडेगा इन तानाशाहों के लिए ! अब न लोकतंत्र होगा , न ही आजादी , सिर्फ और सिर्फ बचेंगे तानाशाह और उनकी चाटुकार गुलाम जनता ! या तो तलवे चाटो या फिर गिरफ्तार हो जाओ! अपने अहम् को पोषित करने  more »

सासूजी - दामाद जी

Archana at अपना घर
*यहाँ आपको मिलेंगी सिर्फ़ अपनों की तस्वीरें जिन्हें आप सँजोना चाहते हैं यादों में.... ऐसी पारिवारिक तस्वीरें जो आपको अपनों के और करीब लाएगी हमेशा...आप भी भेज सकते हैं आपके अपने बेटे/ बेटी /नाती/पोते के साथ आपकी **तस्वीर मेरे मेल आई डी- archanachaoji@gmail.com पर साथ ही आपके ब्लॉग की लिंक ......बस शर्त ये है कि स्नेह झलकता हो **तस्वीर में... * *आज की तस्वीर मे मैं हूँ अपने दामाद जी निलेश धार्वे के साथ--* * **और मेरा ब्लॉग--- "मेरे मन की"*

पोस्ट (सुन्दर हिंदी प्यारी हिंदी )

Madan Mohan Saxena at काब्य संसार
मुश्किल == अँधेरे में रहा करता है साया साथ अपने पर बिना जोखिम उजाले में है रह पाना बहुत मुश्किल ख्बाबो और यादों की गली में उम्र गुजारी है समय के साथ दुनिया में है रह पाना बहुत मुश्किल .. कहने को तो कह लेते है अपनी बात सबसे हम जुबां से दिल की बातो को है कह पाना बहुत मुश्किल ज़माने से मिली ठोकर तो अपना हौसला बढता अपनों से मिली ठोकर तो सह पाना बहुत मुश्किल कुछ पाने की तमन्ना में हम खो देते बहुत कुछ है क्या खोया और क्या पाया कह पाना बहुत मुश्किल मदन मोहन सक्सेना पोस्ट (सुन्दर हिंदी प्यारी हिंदी )

जागरण की संस्कारशाला !

रेखा श्रीवास्तव at मेरा सरोकार
आज के परिवेश में जब आज की पीढी को देखते हैं या फिर आज की नयी पौध को देख कर यही कहते हुए सुनते हैं कि पता नहीं कैसे संस्कार पाए है ? बच्चों को हम अपनी दृष्टि से कभी सुसंस्कृत नहीं पाते हैं लेकिन हम ये भूल जाते हैं कि ये संस्कार बच्चों को मिलें कहाँ से? परिवार , समाज, स्कूल और अपने परिवेश से - लेकिन अगर हम खुद को इस कसौटी पर कसे तो ये ही पायेंगे कि जहाँ हम संस्कारों की बात करते हैं वहां पर कितनी ऐसी बातें हैं जिनके बारे में पूर्णरूप से शायद हम भी परिचित नहीं है। फिर कुछ भी सीखने की कोई उम्र नहीं होती और ये भी जरूरी नहीं की हमारे बड़े सम्पूर्ण हों और उनसे छोटे हमेश... more »

धानी ओ धानी, तेरी चूनर का रंग कौन?

Puja Upadhyay at लहरें
बचपन में पढ़ी हुयी बात थी 'तिरिया चरित्तर'...नारी के मन की बात ब्रम्हा भी नहीं जानते...वो बहुत छोटी थी...उसे लगता था कोई नारी नाम की औरत होती होगी...कोई तिरिया नाम की चिड़िया होती होगी...जैसे नीलकंठ होता है...एक पक्षी जिसे साल के किसी समय देखना शुभ माना जाता है. गाँव में बहुत दूर दूर तक फैले खेत थे. साल में कई बार गाँव जाने पर भी गाँव के बच्चों के साथ किसी खेल में उसका मन नहीं लगता था. तिलसकरात के समय उसे नीलकंठ हमेशा दिखता. गाँव के शिवाले से जाते बिजली के तार पर बैठा हुआ. बचपन की ये बात उसे सबसे साफ़ और अपने पूरे रंगों में याद है. हरे खेतों के बीच से खम्बों की एक सीधी more »

अतिथि तुम कब जाओगे

उपेन्द्र नाथ at सृजन _शिखर
सर्दी खांसी और जुखाम आजकल है ये मेरे मेहमान तीन दिनों से पैर टिकाये नहीं ले रहे जाने का नाम ।। तीनों आये है पूरी तयारी संग कोई दिखता नहीं किसी से कम दिन रात है इनका पहरा ऐसा बंद हुई खुशिओं की दुकान।। शैतानी इनकी हरदम रहती जारी नहीं मानते ये किसी की बात जब डाक्टर आकर इनको धमकाता ये बन जाते बिलकुल अन्जान।। जब ये फरमाते है थोडा आराम हमें भी मिलती है थोड़ी राहत वरना इनकी जी-हुजूरी में फंसी हुई है अपनी जान।। बार- बार पूछता हूँ इनसे अतिथि तुम कब जाओगे ये मुस्कराकर देते है जबाब बहुत दिन बाद मिले हो जजमान सर्दी खांसी और जुखाम आजकल है ये मेरे मेहमान ।।

अहिस्ता आहिस्ता

** ** *[image: img1090304048_1_1]* ** *मिले जब मुझको ऐसे गम अहिस्ता आहिस्ता* *हुई तब आँख मेरी पुरनम अहिस्ता आहिस्ता* *छोड दिया जब साथ मेरा साये ने* *नाजाने होगई कहा मै गुम अहिस्ता आहिस्ता* *जुबा से तो कुछ भी निकलता नहीं* *फिर भी तन्हाई गाती है हरदम अहिस्ता आहिस्ता* *लहू दिल का उतर है मेरी आँख मे * *युही बेवजह मुस्कुराये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता* *आपकी याद है दिल का चैन जाना* *पर आपको भुलाये जाते है हमदम अहिस्ता आहिस्ता* *दिल में उठते गुबार से मायूस न हो* *सहरा को गुलजार बनाये जाते है हम अहिस्ता आहिस्ता*

लघुकथा : फूल और काँटे ...

mahendra mishra at समयचक्र
बगिया में गुलाब का एक सुन्दर फूल लगा था उसे अपनी सुन्दरता पर बड़ा नाज था और जो भी उस गुलाब के फूल को देखता तो उसकी सुन्दरता की तारीफ किये वगैर न रहता . सुन्दरता को लेकर गुलाब के फूल और उसमें लगे काँटों के बीच बहस होने लगी . गुलाब ने अभिमान में आकर काँटों से कहा - मेरी सुन्दरता का सारा जग दीवाना है और तुम्हें मेरे पास रहकर तनिक भी शर्म नहीं आती . लोग मुझे भगवान को चढ़ाते है तो एक तुम लोग हो जो सदैव दूसरे लोगों को कष्ट देते हो . अच्छा होता की मेरा और तुम्हारा साथ न होता . काँटों ने दुखी होकर गुलाब के फूल से कहा - माना की तुम बहुत सुन्दर हो पर हम कांटे ही तुम्हारे सौंदर्य की रक्षा कर... more »
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!! 

गीतों में कभी कहीं धुप तो कहीं छांव ...


 दान धर्म अब कर्ण की छवि का द्योतक नहीं 
पैसे की ठसक है ... 
यानि पैसे से पुण्य !
..................................... तभी तो कलम ने कहा - दर्द मेरे गान बन जा ....

इन्हीं गीतों में कभी कहीं धुप तो कहीं छांव ... धुप छांव न हो तो दर्द की अनुभूति नहीं,अनुभूति नहीं तो अभिव्यक्ति नहीं ... अभिव्यक्तियों की गठरियाँ एक वर्ष की मेरे आगे हैं और मैं अपनी नज़र से कर रही हूँ वार्षिक अवलोकन इस विश्वास के साथ की 'प्रतिभाओं की कमी नहीं' . कल से इसका आरम्भ है - जहाँ तक मेरी दृष्टि है , वहां तक अवलोकन है .... देखिये कितने मोती इस समंदर से मैं निकाल पाती हूँ . 
(पिछले वर्ष के अवलोकन को एक अंतराल के बाद हमने पुस्तक की रूपरेखा दी ..... इस बार भी यही कोशिश होगी . जिनकी रचनाओं का मैं अवलोकन कर रही हूँ , वे यदि अपनी रचना को प्रकाशित नहीं करवाना चाहें तो स्पष्टतः लिख देंगे . एक भी प्रति आपको बिना पुस्तक का मूल्य दिए नहीं दी जाएगी - अतः इस बात को भी ध्यान में रखा जाये ताकि कोई व्यवधान बाद में ना हो ) .... 

शुभकामनायें 



गुरुवार, 29 नवंबर 2012

अब मैप पर ट्रैक करें ट्रेन और ब्लॉग बुलेटिन पर अपनी पोस्ट




प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

शाम 7:16pm पर देखा गया ट्रेन # 12411 गोंडवाना एक्सप्रेस का स्टेटस
सर्दियों में अक्सर होता है कि ट्रेन का टिकट बुक कराया और पता चलता है कि ट्रेन 4-5 घंटे लेट है। अब ट्रेन की स्थिति जानने के लिए इंक्वॉयरी पर फोन करते रहो। कितनी टेंशन होती है उस वक्त। लेकिन अब इंडियन रेलवे ने इसका इलाज खोज लिया है।
अब पीसी या टैब के मॉनिटर पर लाइव ट्रेन ट्रेक कर सकते हैं। इंडियन रेलवे ने रेल रडार लॉन्च किया है जिससे यूजर लाइव ट्रेन ट्रैक कर सकते हैं। इंडियन रेलवे का यह रीयल टाइम रडार सिस्टम गूगल मैप्स पर काम करता है।
यूजर रेलरडार.ट्रेनइन्क्वायरी.कॉम पर जाकर गूगल मैप्स पर ट्रेन की सही लोकेशन जान सकते हैं। रेलवे का दावा है कि मैप पर दिखने वाली ट्रेन की लोकेशन बिल्कुल सटीक होती है और हर 5 मिनट में ब्राउजर अपडेट होता रहता है। रेलवे का कहना है डेफर लाइव अपडेट होता है, यानी कि अपडेट में चार-पांच मिनट की देरी होती है।
साइट को बड़ी स्क्रीन वाले मोबाइल फोन या टैब पर भी एक्सेस किया जा सकता है। पूरी साइट एचटीएमएल 5 पर बेस्ड है। हालांकि इससे पहले इंडियन रेलवे ने स्पॉट योर ट्रेन सर्विस शुरू की थी। लेकिन यह नई सर्विस ज्यादा भरोसेमंद है।
मैप में दो नीला और लाल रंग के आइकन नजर आते हैं, जिसमें नीले का मतलब है कि ट्रेन ऑन टाइम है जबकि लाल आइकन देरी से चल रही ट्रेनों का स्टेटस दिखाता है।
आइकन पर क्लिक करके ट्रेन की सही लोकेशन और अगले स्टेशन के बारे में जान सकते हैं। वहीं ब्राउजर में जूम इन और जूम
आउट का भी ऑप्शन है। यानी कि आप आइकन को बड़ा-छोटा कर सकते हैं।
इसके लेफ्ट पैनल में सर्च ऑप्शन है, जिसमें स्टेशन या ट्रेन नंबर से ट्रेन का रूट या पोजिशन ट्रैक कर सकते हैं। 
 इस जानकारी को आप यहाँ भी देख सकते है !

सादर आपका 


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महाराणा प्रताप एक बार फिर विस्थापित

किस ने किया 

उत्तर की तलाश में एक सवाल

मिला या नहीं 

'' ऐ जिंदगी!''

गले लगा ले 

मच्‍छर की मौत लाइव रिपोर्टिंग

बड़ा ही तेज़ चैनल है 

एक सवाल...!

किस से 

मैं हँसता था जब वो कहकहों का दौर कोई और था ...!!!

अब क्या हुआ  

अब जीमेल से भेजिए 10 GB तक की फाइल

वाह 

पुस्तकें मौन हैं !

आप तो बोल रहे है ... यह क्या कम है महाराज 

उत्तर दो रघुनंदन -- -- --

बिलकुल दो 

झील पर जमीं बर्फ... या झाग

गौर से देखो और बताओ 

कभी-कभी या हर वक्त...

क्या 

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

बुधवार, 28 नवंबर 2012

नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाने सरबत दा भला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

"आज गुरु नानक देव जी का प्रकाश पर्व और कार्तिक पूर्णिमा है , आप सब को मेरी और पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से गुरुपर्व की और कार्तिक पूर्णिमा की बहुत बहुत हार्दिक बधाइयाँ और मंगलकामनाएँ !

नानक नाम चढ़दी कला, तेरे भाने सरबत दा भला"
 
सादर आपका 
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ये बात तो सही है...

संजय @ मो सम कौन ? at मो सम कौन कुटिल खल ...... ?
"आपने सिगरेट पीना छोड़ा नहीं न अब तक? ये अच्छी चीज नहीं है, आपसे कितनी बार तो कह चुका हूँ।" कश्यप बोला। "अरे यार, दिमाग खराब मत कर। है तो यहीं हापुड़ का और आप-आप कहकर बात करता है जैसे लखनऊ की पैदाइश हो तेरी।   बराबर के दोस्त और फ़िर एक ही बेल्ट के बंदों से आप-जनाब वाली भाषा अपने से होती नहीं।  फ़िर पैस्सिव स्मोकिंग से इतनी परेशानी है तो आने से पहले टेलीग्राम भेज दिया कर, हम कमरे से बाहर ही

देवी चौधरानी और महारानी तपस्वनी .......

रणधीर सिंह सुमन at लो क सं घ र्ष !
इन दो महिलाओं ने देश की आजादी के लिए वो अलख जगाई जिसे आज हम सब भूल गये है ................ नर--- नारी सृष्टि चक्र में दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू है | शक्ति का स्रोत उसी समय फूटता है , जब उसके खनन में इन दोनों का सहयोग होता है | श्रम शक्ति का आधार ही नारी का वह अनोखा योगदान है , जिसे पुरुष ने कभी स्वीकारा नही है | आज हम जिस आजादी की जिस हवा में सांस ले रहे है , उस बयार को प्रवाहित करने में भारतीय नारी किसी भी पुरुष से किसी कदर पीछे नही रही है | ब्रिटिश हुकूमत के आरम्भिक काल में ही देश की नारी ने ही उसकी दासता को चुनौती दी है और भारत के पौरुष को जगाया है | सन 1763 में बंगाल के भयंक... more »

सॉफ्ट टार्गेट

varsha at likh dala
shaheen and her friend faced the charges for writing on facebook rimsha maseeh: pakistani girl facing blassfemy charges पकिस्तान में चौदह साल की किशोरी को ईशनिंदा के इलज़ाम में घेर लिया जाता है  तो भारत में दो लड़कियां  केवल इसलिए गिरफ्तार कर ली जाती हैं क्योंकि     उन्हें भारत की आर्थिक           राजधानी की रफ़्तार के  ठहरने पर एतराज़ था आखिर क्यों ढूंढे जाते हैं सॉफ्ट टार्गेट   . . .

खोखले से हम

खोखले से हम नाते रिश्तों मैत्री सम्बन्धों पड़ोसी से बोलचाल सोफे पर चिपके टी वी पर आँख कान गड़ाए अपनों को छोड़, राह चलतों को राम राम जय श्री कृष्ण नमस्कार दुआ सलाम करना छोड़, जी टॉल्क पर हाय नेट पर या फेसबुक पर कुछ मन को छू लेने वाला खोजते, खीजते खोखले से, खाली मन खाली हाथ, लौट जाते हैं कल फिर से आने को। घुघूती बासूती

आरम्भ 1 दिसम्बर से

रश्मि प्रभा... at परिकल्पना - 5 hours ago
*(कृपया अब दूसरी कोई भी पोस्ट 25 दिसम्बर तक ना डाली जाये )* भीनी भीनी हवाओं की आहटें कहानियों कविताओं संस्मरणों हाइकु क्षणिकाओं .... संग हिंदी साहित्य के परिकल्पना मंच पर दस्तक दे रही हैं स्वागत कीजिये अपनी रचनाओं के संग मील का पत्थर हो यह परिकल्पना कोई कसर न छोड़िये परिकल्पना को इंतज़ार है आपका आप उसके मंच को साकार कीजिये परिकल्पना आपकी कल्पनाओं को पंख देगी है पंख मेरी झोली में सांता क्लॉज से लेकर आई हूँ आप आइये तो :)

दुनिया का ‘सबसे गरीब’ राष्ट्रपति : जोसे मुजिका

Digamber Ashu at विकल्प
जोसे मुजिका का खेत में बना मकान, उनकी पत्नी और कुत्ता (फोटो- बीबीसी) -व्लादिमीर हर्नान्डेज यह एक आम शिकायत है कि राजनीतिज्ञों की जीवनशैली उन लोगों से बिलकुल अलहदा होती है जो उन्हें चुनते हैं. लेकिन उरूग्वे में ऐसा नहीं है. यहाँ के राष्ट्रपति से मिलें– जो खेत में बने एक जर्जर मकान में रहते हैं और अपनी तनख्वाह का बड़ा हिस्सा दान कर देते हैं. अपने कपड़े वे खुद ही धोकर घर के बाहर सूखाते हैं. पानी उनके अहाते में बने कुएँ से आता है, जहाँ घास-फूस फैली रहती है. सिर्फ दो पुलिस अधिकारी और एक तीन टांग वाला कुत्ता, मनुएला बाहर रखवाली करते हैं. यह उरूग्वे के राष्ट्रपति, जोसे मुजिका का घर है जि... more »

मन की कोमल पंखुड़ी पर ....फिर बूँद बूँद ओस.....!!

Anupama Tripathi at anupama's sukrity.
सुषुप्ति छाई ....गहरी थी निद्रा .... शीतस्वाप जैसा .. .. ....सीत निद्रा में था श्लथ मन ........!! न स्वप्न कोई .....न कर्म कोई ...न पारितोष ...... अचल सा था .....मुस्कुराने का भी चलन .... तब ....शांत चित्त ... बस जागृत रही आस ...... है छुपा हुआ कहाँ प्रभास ....? जपती थी प्रभु नाम .... गुनती थी गुन ...गहती थी तत्व ....और ... टकटकी लगाए राह निहारती थी .......शरद की ....!! हर साल की तरह ......कब आये शरद और ... हरसिंगार फिर झरे मेरी बगिया में ...बहार बनके .... अब पुनः ....शरद आया है ..... अहा .....लद कर छाया है ..... चंदा सूरज सा .... श्वेत और नारंगी रंग लिए ... हरसिंगार अबके ... more »

दाम्पत्य जीवन के आठ वर्ष

आज 28 नवम्बर को हमारी (कृष्ण कुमार यादव-आकांक्षा यादव) शादी की 8वीं सालगिरह है। दाम्पत्य के साथ-साथ साहित्य और ब्लागिंग में भी सम्मिलित सृजनशीलता की युगलबंदी करते हुए जीवन के इस सफ़र में दिन, महीने और फिर साल कितनी तेजी से पंख लगाकर उड़ते चले गए, पता ही नहीं चला। आज हम वैवाहिक जीवन के 8 वर्ष पूरे करके 9वें वर्ष में प्रवेश करेंगें। वैसे भी 9 हमारा पसंदीदा नंबर है। !! जीवन के इस सफ़र में आप सभी की शुभकामनाओं और स्नेह के लिए आभार !! रविकर जी की यह खूबसूरत पंक्तियाँ वर्ष-गाँठ आई सुखद, *आठ-गाँठ-कुम्मैद | मस्त रहें आठो पहर, इक दूजे में कैद | इक दूजे मे... more »

फेसबुक पर ज्यादा दोस्त होने का मतलब है ज्यादा तनाव

यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग बिजनेस स्कूल द्वारा फेसबुक पर किए गए एक शोध से बड़ी दिलचस्प बाते सामने आई हैं। आप भी एक नज़र डाल ही लें - फेसबुक पर *जितने ज्यादा दोस्त होंगे अपराध आशंका भी उतनी ही ज्यादा* है - फेसबुक पर अपने नियोक्ताओं को जोडऩे या अभिभावकों को शामिल करने से खाता धारक की चिंता काफी ज्यादा बढ़ जाती है - करीब 55 फीसदी अभिभावक अपने बच्चों का फेसबुक पर पीछा करते हैं - 50 फीसदी कंपनियां* अपने से फेसबुक पर जुड़े व्यक्ति को नौकरी नहीं देतीं * - फेसबुक पर कोई भी व्यक्ति सात अलग-अलग की सामाजिक पृष्ठभूमि वाले लोगों से जुड़ा होता है - फेसबुक पर लोग अपने *मौजूद more »

शिक्षा - एक वार्तालाप

noreply@blogger.com (प्रवीण पाण्डेय) at न दैन्यं न पलायनम्
सहसा पढ़ने बैठ गये बच्चे यह तब प्रारम्भ हुआ जब दशहरा के तुरन्त बाद बच्चों को अपने गृहकार्य की याद आयी। बच्चे घबराये से कार्य करने बैठ गये। पिछली रात के आनन्दमयी उन्माद में डूबे बच्चों को सहसा इतने मनोयोग से काम करते देखना बड़ा रोचक लग रहा था। फोटो खींच कर उसे फ़ेसबुक में डाल दिया। जो प्रतिक्रियायें आयीं, उसमें सबसे आलोचनात्मक और हृदयस्पर्शी आलोक की थी। वार्तालाप शिक्षा के प्रति समाज के दृष्टिकोण का एक संक्षिप्त रूप है, हिन्दी में अनुवाद भाव संरक्षित रखते हुये किया गया है।(आलोक चित्रकार हैं, मोहित बड़ी कम्पनी में कार्यरत हैं, दीप्ति सियोल में शिक्षण में हैं और प्रवीण रेलवे की सरकार... more »

नैन लगे उस पार

आशा जोगळेकर at स्व प्न रं जि ता
देह के अपने इस प्रांगण में कितनी कीं अठखेली पिया रे मधुघट भर भर के छलकाये औ रतनार हुई अखियाँ रे । खन खन चूडी रही बाजती छम छम छम छम पायलिया रे हाथों मेहेंदी पांव महावर काजल से काली अंखियां रे वसन रेशमी, रेशम तन पर केश पाश में बांध हिया रे । कितने सौरभ सरस लुटाये तब भी खिली रही बगिया रे । पर अब गात शिथिल हुई जावत मधुघट रीते जात पिया रे । पायल फूल कंगन नही भावत ना मेहेंदी ना काजलिया रे । पूजा गृह में नन्हे कान्हा मन में बस सुमिरन बंसिया रे । तुलसी का एक छोटा बिरवा एहि अब रहत मोर बगिया रे सेवा पहले की याद करि के रोष छोड प्रिय करो दया रे । दिन तो डूब रहा जीवन का सांझ ढले, फिर रात पिया more »

माता-पिता -बेटा

Archana at अपना घर
*यहाँ आपको मिलेंगी सिर्फ़ अपनों की तस्वीरें जिन्हें आप सँजोना चाहते हैं यादों में.... ऐसी पारिवारिक तस्वीरें जो आपको अपनों के और करीब लाएगी हमेशा...आप भी भेज सकते हैं- आपके अपने बेटे/ बेटी /नाती/पोते के साथ आपकी तस्वीर साथ ही आपके ब्लॉग की लिंक ......बस शर्त ये है कि स्नेह झलकता हो तस्वीर में... * *आज की तस्वीर में है - अनूप शुक्ला जी अपनी पत्नी श्रीमती सुमन शुक्ला जी और छोटे बेटे अनन्य के साथ -* * और अनूप जी के ब्लॉग को कौन नहीं जानता फ़िर भी....नाम है - फ़ुरसतिया*

ये कैसा चक्रव्यूह

पिछले कुछ महीनो में कई फ़िल्में आयीं और उन्होंने काफी दर्शकों को थियेटर की तरफ आकर्षित किया। बर्फी, इंग्लिश-विन्ग्लिश, OMG , जब तक है जान आदि। पर इन सबके बीच ही एक बहुत ही सार्थक, चिंतनशील, हमारे समाज की एक बहुत ही गंभीर समस्या से रूबरू करवाती एक फिल्म आयी 'चक्रव्यूह' और गुमनामी के अंधेरों में खो गयी। मुझे इस फिल्म का बहुत पहले से ही इंतज़ार था वैसे भी प्रकाश झा की कोई फिल्म मुझसे नहीं छूटती। इन फिल्मों की भीड़ में इसे भी देखा और तब से ही लिखना चाह रही थी, पर कुछ prior commitment ने व्यस्त रखा। नक्सल समस्या पर बनी इस फिल्म ने सोचने पर मजबूर कर दिया। हम जो बाहर रहकर देखतेmore »

मैनपुरी की तारकशी कला

शिवम् मिश्रा at मेरा मैनपुरी
*मैनपुरी की तारकशी कला * मैनपुरी का देवपुरा मोहल्ला…..तंग गलियों में हथौडी की चोट की गूंजती आवाज़…..को पकड़ते हुए जब चलना शुरू कर देंगे तो एक सूने से लकड़ी के दरवाज़े के खुलते ही एक ऐसी बेमिसाल कला का दीदार होगा जिसे तारकशी कहते है.पूरी दुनिया में तारकशी कला का मैनपुरी ही एक मात्र केंद्र है.इस कला की शुरुआत कैसे हुयी ये कहना मुश्किल है.लेकिन हिंदुस्तान में जब ब्रितानी हुकमत का सिलसिला शुरू हुआ तो तारकशी सात समन्दर पार पहुंच गयी. हिंदुस्तान से सीधे इस कला को पहचान नहीं मिली. यूरोप के देशो में इस कला को जबरदस्त लोकप्रियता हासिल हुयी.18 वी सदी में तारकशी के चाहने वाले पुरी दुनिया more »

10 रूपये का नोट नहीं , अब 10 रूपये के सिक्के !

HARSHVARDHAN SRIVASTAV at प्रचार
जल्द ही आम आदमी के हाथों से 10 रूपये का नोट ग़ायब हो जाएगा , क्योंकि इसकी जगह 10 रूपये के सिक्के ले लेंगे । भारतीय रिज़र्व बैंक 10 रूपये के नोटों को हटाने की योजना बना रहा है , क्योंकि इस कागज़ी मुद्रा की आयु मात्र आठ से दस महीने ही होती है । वैसे 10 रुपये के सिक्कों का चलन मार्च 2009 से ही बाज़ार में है । इस संदर्भ में लोकसभा में वित्त राज्य मंत्री नमो नारायण मीणा ने यह जानकारी दी है । राज्य मंत्री ने कहा है कि - " भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक यह एक लंबी प्रक्रिया है । नोट के स्थान पर बाज़ार में सिक्कों का वितरण टकसालों की क्षमता पर निर्भर करेगी की वह कितन... more »
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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

मंगलवार, 27 नवंबर 2012

'आम आदमी' की दस्‍तक से मुलाकतों की जगह तक

'आम आदमी' की दस्‍तक, मीडिया को दस्‍त
अन्‍ना हजारे के साथ लोकपाल बिल पारित करवाने के लिए संघर्षरत रहे अरविंद केजरीवाल ने जैसे 'आम आदमी' से राजनीति में दस्‍तक दी, तो मीडिया को दस्‍त लग गए। कल तक अरविंद केजरीवाल को जननेता बताने वाला मीडिया नकारात्‍मक उल्‍टियां करने लगा। उसको अरविंद केजरीवाल से दुर्गंध आने लगी। अब उसके लिए अरविंद केजरीवाल नकारात्‍मक ख़बर बन चुका है। More >>>

 अजहर एक क्रिकेटर, एक नेता
पूर्व भारतीय कप्तान और कलाई से बॉल को ट्विस्ट कर गेंदबाजों की हवाईयां उड़ाने वाले मोहम्मद अजहरुद्दीन ने एक तरह से रिटायरमेंट की घोषणा कर दी. बेशक गुरुवार के पहले वो अगर ऐसा कहते भी कि अब वो क्रिकेट नहीं खेलना चाहते तो इसका कोई मतलब नहीं होता क्योंकि वो भारतीय क्रिकेट बोर्ड (बीसीसीआई) की तरफ ही आजीवन प्रतिबंधित कर दिए गए थे. लेकिन, गुरुवार को जैसे सारा कलंक धुल गया. एक खिलाड़ी फिर से सिर उठा कर चल सकता था. 12 वर्षों तक अपमान का दंश झेलना कम नहीं होता है लेकिन फिर भी अजहरुद्दीन ने इस पर कोई टिप्पणी करने से मना कर दिया. उन्होंने हैंसी क्रोनिए को भी एक तरह से माफ कर दिया. बकौल अजहरुद्दीन "अब वो रहे नहीं तो उसपर किसी तरह की बातचीत ठीक नहीं रहेगी." 
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ईमानदारी का एक दीया
शादी शादी बोल बोल के शादी करवा दी। ऐसा हो रहा था जैसे मै शादी नहीं करती तो कयामत आ जाती। यार कोई  मैं दुनिया की पहली लड़की तो  होती नही बस सात फेरे  लेलो और जि़न्दगी भर सर फोड़ते रहो। शान्त  गुडिया क्या शान्त  जि़न्दगी तो मेरी बरबाद हो गयी आप लोगों के चक्कर में, मै बता रही हूं अब मैं उस भिखारी को और नहीं झेल सकती। मुझे डाईवोर्स चाहिए एट एनी कॉस्ट। हां गुडिया हम डाईवोर्स लेंगे। More>>>


वक़्त वक़्त की बात
पुरानी सदी के डाइलोग:
शशि कपूर: मेरे पास माँ है!
इस सदी के डाइलोग:
रॉबर्ट वाड्रा: मेरे पास सासू माँ है! More>>>





 

 मुलाकातों की जगह
आज फिर कदम उस ओर मुड़ चले हैं कई दिनों के बाद । मुलाकातों की उस जगह में जहाँ हर नए दिन नया अनुभव बांटा जाता है । वह जगह जो हर वक़्त जीवंत नज़र आती है और जीने के लिए साधन को जीवन से जोड़ना सिखाती है। इस गली से गुज़रते हुए क्लास में क्या चल रहा है अक्सर पता चल जाता है गली के माहौल में एक गूँज रहती है। गली में एक घर से बाहर आती हुई एक महिला के कहे शब्दों से पता चल ही रहा है। वो झाड़ू लगाते हुए साथ में बैठी पड़ोसन से कहती-"अब देखो शुरु हो गया स्कूल, आज दूसरा ही दिन है और आवाज़ें सुनों, इन आवाज़ों में अपने घर की आवाज़ें ही खो जाती है। More >>>


पर अब जो आओ बापू.....
देश में जो हाहाकार मची है
मारकाट चीखपुकार मची है
टुकड़े टुकड़े हो जाए ना
आर्यावर्त कहीं खो जाए ना

जाति पांति की हाट सजी है
मजहब की दीवार चुनी है
स्वतंत्रता कहीं बिक जाए ना
देश मेरा खो जाए ना More>>>

 

सोमवार, 26 नवंबर 2012

एक लौ इस तरह क्यूँ बुझी ... मेरे मौला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

४ साल पहले आज ही के दिन मुंबई घायल हुई थी ... वो घाव आज भी पूरी तरह नहीं भरे है ... 



केवल सैनिक ही नहीं ... हर एक इंसान जिस ने उस दिन ... 'शैतान' का सामना किया था ... नमन उन सब को !
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घर के कुछ काम तो ऑफिस में करने दीजिये ---

बस मूक हूँ .............पीड़ा का दिग्दर्शन करके

रूह से रूह का रिश्‍ता ...!!!

मुझे गणित नहीं आती

किताबों की दुनिया-76

टेंशन ...

"सक़ीना"

26/11/2008 के हुतात्माओं को श्रद्धांजलि

माँ - बेटी

मधुशाला ...भाग --- 8

{ २१६ } कहाँ खो गया मेरा आशियाँ

26/11 की चौथी बरसी पर शहीदों को नमन

एक सम्मन नक्षत्रों का .....

आम आदमी को टोपी पहना दी

अरुंधती राय : केजरीवाल के खुलासे

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 जाते जाते एक वीडियो आप सब की नज़र है ...

एक लौ इस तरह क्यूँ बुझी ... मेरे मौला ...

जय हिन्द !!!

रविवार, 25 नवंबर 2012

कहीं आप और हम 'मक्खी' तो नहीं - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रों ,
प्रणाम !

आज का ज्ञान :-
किसी की भी सिर्फ बुराई तलाश करने वाले इंसान की मिसाल उस 'मक्खी' जैसी है जो सारे खूबसूरत बदन को छोड़कर, अक्सर केवल 'जख्मों' पर ही बैठती है !

अब ज़रा ईमानदारी से सोचिए ... कहीं आप और हम 'मक्खी' तो नहीं बनते जा रहे ???
सादर आपका 

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इबादत: एक नाट्य-रूपांतर

चला बिहारी ब्लॉगर बनने at चला बिहारी ब्लॉगर बनने
*जेफरी आर्चर* का एगो कहानी संकलन है जिसका नाम है *“ट्विस्ट इन द टेल”* माने कहानी में पेंच! ई बात त मुहावरा के तरह इस्तेमाल होने लगा है अऊर खासकर फ़िल्मी दुनिया में त बिना इसके कोनो कहानी बन ही नहीं सकता. कहानी में कोनो न कोनो पेंच होना ही चाहिए, चाहे बचपन का बिछडा हुआ भाई का पेंच, चाहे पैदा होते ही बदला गया बच्चा का पेंच, चाहे पति/पत्नी के मरकर अचानक द में ज़िंदा सामने आ जाने का पेंच! पेंच नहीं त कहानी नहीं. मगर कभी कोनो घटना को पेंच बनाकर कहानी लिखने वाले कथाकार के बारे में कभी सोचे हैं! ऐसा पेंच जो कहानी के अंत में अचानक आपके सामने आता है अऊर आपको एकदम अबाक कर देता है. आँख से आंसू... more »

 

एक शाम गीता के नाम - चिंतन

*सुखिया सब संसार है खाए और सोये।* *दुखिया दास कबीर है जागे और रोये।*। ज्ञानियों की दुनिया भी निराली है। जहाँ एक तरफ सारी दुनिया एक दूसरे नींद हराम करने में लगे हुए हैं वहीँ अपने मगहरी बाबा दुनिया को खाते, सोते, सुखी देखकर अपने जागरण को रुलाने वाला बता रहे हैं। जागरण भी कितने दिन का। कभी तो नींद आती ही होगी| कौन जाने, मुझे तो लगता है कि कुछ लोग कभी नहीं सोते। सिद्धार्थ को बोध होने के बाद किसका घर कैसा परिवार। मीरा का जोग जगने के बाद कौन सा राजवंश और कहाँ की रानी, बस"*साजि सिंगार बांध पग घुंघरू, लोकलाज तज नाची।*" जगने-जगाने की स्थिति भी अजीब है। जिसने देखी-भोगी उसके लिए ठीक, बाकियों क... more »

हमारा हवामहल "इबादत"

आज आपके लिए मैं, नहीं हम, जी हाँ ये आभासी रिश्तों का एक सम्मिलित प्रयास है, और हम लेकर आए हैं, आपके लिए *..ओ’ हेनरी की कहानी AService Of Love ( अ सर्विस ऑफ़ लव) का नाट्य रूपान्तरण " इबादत"...*. इस कहानी को नाट्य में रूपांतरित किया है हमारे *छोटू उस्ताद*यानि *अनुभव प्रिय *ने जिससे आपका परिचय करवाते हुए कहा था मैंने .. कि ये तो अभी शुरुआत है देखिये आगे-आगे करते हैं क्या?......अपनी पढा़ई के बीच से समय चुराना कोई अनुभव से सीखे ...अनुभव बच्चों के लिये एक आदर्श है... * **अभिनव के किरदार को आवाज दी है - अनुभव प्रिय ने* और इस नाटक का संपादन किया है मेरे *सलिल भैया* यानि  more »

क्‍यों नहीं सफल होता है पॉलीथीन पर प्रतिबंध?

DrZakir Ali Rajnish at TSALIIM
लखनऊ के कैंट इलाके में पॉलीथीन पर प्रतिबंध है। पर बावजूद इसके दुकानदार चोरी-छिपे पालीथीन का प्रयोग करते पाए जाते हैं। यही हाल उत्‍तराखंड, हिमांचल, पश्चिम बंगाल, दिल्‍ली और गोआ के बहुत से जिलों का है।... Please read full story at blog...

कठै गया बे गाँव आपणा ?

noreply@blogger.com (Ratan singh shekhawat) at ज्ञान दर्पण
कठै गया बे गाँव आपणा कठै गयी बे रीत । कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत || दुःख दर्द की टेम घडी में काम आपस मै आता। मिनख सूं मिनख जुड्या रहता, जियां जनम जनम नाता । तीज -त्योंहार पर गाया जाता ,कठै गया बे गीत || कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||(1) गुवाड़- आंगन बैठ्या करता, सुख-दुःख की बतियाता। बैठ एक थाली में सगळा ,बाँट-चुंट कर खाता । महफ़िल में मनवारां करता , कठै गया बे मीत || कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बीत ||(2) कम पीसो हो सुख ज्यादा हो, उण जीवन रा सार मै। छल -कपट,धोखाधड़ी, कोनी होती व्यवहार मै। परदेश में पाती लिखता , कठै गयी बा प्रीत || कठै गयी बा ,मिलनसारिता,गयो जमानो बी... more »

दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे

*[image: tumblr_mcq0jw5KqU1rjvnoho1_500]* *तुम इल्जाम मुझ पर न लगाओ ऐसे* *दिल को मेरे पत्थर का न बनाओ ऐसे* ** *मेरा जिगर तार तार हुआ है कई बार* *की दिल पर न चोट लगाओ ऐसे * ** *कुछ रंज मुझको पहले ही घेरे हुए है* *तुम मुझको हर बार न सताओ ऐसे* ** *शबो रोज याद कर के उस बेवफा को* *अब चैन दिल का न तुम गवाओ ऐसे* ** *कहा जाऊ मै अपना जख्मे जिगर लेके* *कि खुद को मै दुनिया से छिपाऊ कैसे*

धर्म के नाम पर अधर्म कब तक?

धर्म का मकसद इंसान का ताल्लुक पालनहार से जोड़ना है और धर्म इंसानों से मुहब्बत सिखाता है। लेकिन धर्म की सही जानकारी नहीं रखने वाले लोग दुनिया के लिए परेशानी का सबब बन जाते हैं। उन्हें कोई परवाह नहीं होती कि उनके कारण चाहे किसी को कितनी भी परेशानी होती रहे। मुहर्रम के नाम पर कल रात साड़े ग्याराह बजे (11.30 p.m.) तक लोग हमारे घर के सामने कान-फोडू ढोल के साथ हुडदंग मचाते रहे, और उसके बाद आगे निकल गए और लोगो को परेशान करने के लिए। उनके चेहरों की मस्ती बता रही थी कि उन्हें शहीद-ए-करबला हजरत इमाम हुसैन (रज़ी.) की शहादत के वाकिये से कोई वास्ता नहीं था। उनका वास्ता था, तो केवल और केवल अपन... more »

हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक के लोकार्पण की कुछ झलकियाँ

उपेन्द्र नाथ at सृजन _शिखर
कल 24 नवम्बर को गुवाहाटी प्रेस क्लब में हरकीरत हीर जी के काव्य संग्रह " दर्द की महक " और उनके ही संपादन में निकली देहरादून से प्रकाशित होने वाली "सरस्वती सुमन" पत्रिका के क्षणिका विशेषांक का लोकार्पण हुआ। इस अवसर की कुछ झलकियाँ :- बाये से- श्री आनंद सुमन सिंह , श्री जी एम श्रीवास्तव जी, श्री किशोर जैन जी, श्रीमती सुधा श्रीवास्तव जी और श्रीमती हरकीरत हीर जी सरस्वती सुमन के क्षणिका विशेषांक का विमोचन हीर जी द्वारा रचित काव्य संग्रह " दर्द की महक" का विमोचन "दर्द की महक" का आवरण पृष्ट "दैनिक पूर्वोदय" में ये खबर

चौबीस साला सफ़र........

वन्दना अवस्थी दुबे at अपनी बात...
ये तस्वीर रिसेप्शन के दिन की है ;) जैसा तैयार कर के बिठा दिया, बैठ गये :) आइने में पीछे मेरी भांजी दीपम दिख रही है. रिसेप्शन हॉल में ले जाती मेरी बड़ी ननद कल्पना पांडे. कैसी दहशत होती है, जब सबकी निगाहें आप पर हों....बहुत असहज दिन होता है रिसेप्शन का... यही हाल उमेश जी का भी रहा होगा :) जा रही हूं वरने...उमेश जी को :) बायीं तरफ़ मेरी छोटी बहन कनुप्रिया, और दायीं तरफ़ मेरी बड़ी दीदी. लो, वर लिया ;) बैठे हैं दोनों चुपचाप :) आज की जोड़ी होती, तो बतिया रही होती :) दूल्हा-वेश उमेश जी का :) सिदूर-दान सात-फेरे :) :)

जैसलमेर किले में राजा की व शहर में पटुवों की हवेली का कोई सानी नहीं

संदीप पवाँर (Jatdevta) at जाट देवता का सफर
राजस्थान यात्रा- भाग 1-जोधपुर शहर आगमन भाग 2-मेहरानगढ़ दुर्ग भाग 3-कायलाना झील व होटल लेक व्यू भाग 4-मन्डौर- महापंडित लंकाधीश रावण की ससुराल भाग 5-होटल कैन्डी राजपूताना व उम्मेद भवन भाग 6-होटल द गेट वे जो किसी महल से कम नहीं भाग 7-जैसलमेर का किला (दुर्ग) भाग 8-जैसलमेर में राजा की हवेली व पटुवों की हवेली जैसलमेरके किले में एक घुमक्कडी भरा चक्कर लगाते समय हमने देखा कि यह किला कोई खास ज्यादा बडा नहीं है। (दिल्ली के लाल किले जैसा) लोगों से पता लगा कि पहले इस किले से अन्दर ही सारा शहर समाया हुआ था। किले के अन्दर चारों ओर घर ही घर बने हुए है। यहाँ अन्य किलों की तरह बडा सा मैदान तलाशने पर भी... more »

वार्तालाप

मैं धर्म और धर्म ग्रन्थों में पूरी श्रद्धा रखती हूँ मगर इसका मतलब यह नहीं कि मैं अंधविश्वास को मानती हूँ। लेकिन इतना भी ज़रूर है कि जिन चीजों को मैं नहीं मानती उनका अनादर भी नहीं करती ऐसा सिर्फ इसलिए ताकि जो लोग उस चीज़ को मानते हैं या उसमें विश्वास रखते हैं उनकी भावनाओं को मैं ठेस नहीं पहुंचाना चाहती। एक दिन ऐसे ही धर्म की बातों को लेकर एक सज्जन से बात हो रही थी। सामने वाले का कहना था कि किसी भी धर्म में कही गयी अधिकांश बातें केवल उस धर्म के पंडितों या मौलवियों या यूं कहें कि उस धर्म के मठाधीशों द्वारा बनायी गयी हैं जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं, काफी हद तक यह बात मुझे भी सही... more »
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जय हिन्द !!!

शनिवार, 24 नवंबर 2012

आम आदमी पार्टी और आम आदमी... ब्‍लॉग बुलेटिन


मित्रों, आज के बुलेटिन में आम आदमी की बात करते हैं... आज कल यह आम आदमी बडे जोर से लगा हुआ है अपनी एहमियत जतानें... लेकिन यह आम आदमी आखिर है कौन?

टाईम्स आफ़ इंडिया से साभार
आम आदमी

आखिर कौन है यह आम आदमी
दिन रात की तिकडम
इधर उधर की भागम
ई-एम-आई की जुगाड में
फ़िरता है बज़ार में
सरे आम फ़िरता है
धूप में मरता है
टैक्स की मार में पिसता है 
लेकिन उफ़ तक न करता है............. 

आज तक कभी यह आम आदमी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखता था....  लेकिन आज आम आदमी की पार्टी बनी और बडी उम्मीद जगी आखिर यह आम आदमी की पार्टी आखिर सच में आम आदमी की पार्टी बनेगी ? भाई दूध का जला तो छाछ को भी फ़ूंक फ़ूंक कर पीता है सो इस आम आदमी की पार्टी को कसौटी पर कसना होगा और तभी इसकी नीयत पर लोगो को विश्वास होगा। 

अब तक काँग्रेस कहती थी काँग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ... और वो हाथ तो आम आदमी ने छोड़ दिया.. अब ???????

जनता को आम आदमी आम आदमी बोल बोल कर यह सब लोग अपना अपना उल्लू सीधा करते घूम रहे है ... हम तो जैसे पहले थे 
वैसे अब है ...  और शायद ऐसे ही रहेंगे..  

लेकिन इस समय राजनीतिक स्थिति बहुत अजीब हो चुकी है... और इस आम आदमी की पार्टी से हमें बहुत उम्मीदें हैं.. लेकिन साथ ही डर भी है की कहीं हर राजनीतिक दल की तरह इस आम आदमी की पार्टी ने आम आदमी को चोट पहुंचाई तो फ़िर आम आदमी इस चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.... 



चलिए आज की ब्लाग जगत की हलचलों से आपको रूबरू कराते हैं.... 
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साम्प्रदायिक एकता की बात करें, वैमनस्य की नहीं

रणधीर सिंह सुमन at लो क सं घ र्ष ! 
*प्रकृति के प्रलय का तांडव भले ही अभी हमसे कितनी ही दूर क्यों न हो परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानव अपने ही द्वारा निर्मित प्रलयरूपी चक्रव्यूह में स्वयं बहुत तेजी से उलझता जा रहा है। आज के दौर में विश्व के शक्तिशाली देशों सहित सारा संसार आर्थिक मंदी के भारी दौर से गुजर रहा है। विश्व के बड़े से बड़े बैंक, बड़ी कम्पनियाँ, सरकारी व गैर सरकारी उपक्रम आदि के दीवालिया होने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। महँगाई का दानव गरीबों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। दूसरी ओर इन्हीं दुर्गम परिस्थितियों के मध्य मानव जाति अपने आपको इन विकराल समस्याओं से उबारने के प्रयासों के बजाए उल्टै... more »


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अदृश्य रहस्यमयी गाँव टेंवारी

ब्लॉ.ललित शर्मा at ललितडॉटकॉम 
धरती पर गाँव-नगर, राजधानियाँ उजड़ी, फिर बसी, पर कुछ जगह ऐसी हैं जो एक बार उजड़ी, फिर बस न सकी। कभी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की लड़ाई तो कभी प्राकृतिक आपदा, कभी दैवीय प्रकोप से लोग बेघर हुए। बसी हुयी घर गृहस्थी और पुरखों के बनाये घरों को अचानक छोड़ कर जाना त्रासदी ही है। बंजारों की नियति है कि वे अपना स्थान बदलते रहते हैं, पर किसानों का गाँव छोड़ कर जाना त्रासदीपूर्ण होता है, एक बार उजड़ने पर कोई गाँव बिरले ही आबाद होता है। गरियाबंद जिले का केडी आमा (अब रमनपुर )गाँव 150 वर्षों के बाद 3 साल पहले पुन: आबाद हुआ। यदा कदा उजड़े गांव मिलते हैं, यात्रा के दौरान। ऐसा ही एक गाँव मुझे गरियाबंद जिल... more »
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मिलन

मिलन मिलन मिलन में अक्सर काफी अंतर होता जल जल ही रहता है ,टुकड़े पत्थर होता दूर क्षितिज में मिलते दिखते ,अवनी ,अम्बर किन्तु मिलन यह होता एक छलावा केवल क्योंकि धरा आकाश ,कभी भी ना मिलते है चारों तरफ भले ही वो मिलते ,दिखते है मिलन नज़र से नज़रों का है प्यार जगाता लब से लब का मिलन दिलों में आग लगाता तन से तन का मिलन ,प्रेम की प्रतिक्रिया है पति ,पत्नी का मिलन रोज की दिनचर्या है छुप छुप मिलन प्रेमियों का होता उन्मादी दो ह्र्दयों का मिलन पर्व ,कहलाता शादी माटी और बीज का जल से होता संगम विकसित होती पौध ,पनपती बड़ा वृक्ष बन सिर्फ मिलन से ही जगती क्रम चलता है अन्न... more »

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जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ

घंटों बाहर रहने के बाद जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ एक अपनेपन का अहसास होता है लगता है जैसे मेज़ कुर्सी बेचैनी से मेरा इंतज़ार कर रही हैं मेरी कलम मेरी ऊंगलियों में खेलने को बेताब दिखती है बिस्तर खुली बाहों से मुझे आराम करने का बुलावा देता है महसूस होता है टीवी कह रहा है , अब उसे मेरा मनोरंजन करने का मौका मिलेगा टयूब लाईट रोशनी से कमरे को जगमगाने के लिए तैयार बटन दबाने के इंतज़ार में दिखती इतना इंतज़ार तो मेरा कोई भी नहीं करता कितनी भी देर के बाद कमरे में आऊँ कोई शिकवा शिकायत नहीं करता रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में मेरे साथ मेरे कमरे के सिवाय ऐसा कही भी नहीं होता किसी ना किसी को कोई न... more »

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आम आदमी का तोड़

यह तो बहुत ही न इंसाफी है। ब्रांड हम ने बनाया, और कब्‍जा केजरीवाल एंड पार्टी करके बैठ गई। आम आदमी की बात कर रहा हूं, जिस पर केजरीवाल एंड पार्टी अपना कब्‍जा करने जा रहे हैं। गुजरात में चुनाव सिर पर हैं, कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में चीख चीख कर कह रही थी, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। मगर आम आदमी तो केजरीवाल एंड पार्टी निकली, जिसकी कांग्रेस के साथ कहां बनती है, सार्वजनिक रूप में, अंदर की बात नहीं कह रहा। अटकलें हैं कि कांग्रेस बहुत शीघ्र अपने प्रचार स्‍लोगन को बदलेगी। मगर आम आदमी का तोड़ क्‍या है? वैसे क्रिएटिव लोगों के पास दिमाग बहुत होता है, और नेताओं के पास पैसा। यह दोनों मिलक...more »

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मेरी नज़र में.......

***Punam*** at bas yun...hi.... 
वल्लाह न कहू तो तुझे और क्या कहूँ.... बन कर गज़ल तू मेरे जेहन में उतर गया...! चाहा था लाख तुझको भुला दूँ...मगर नहीं तस्वीर बन के मेरी नज़र में उतर गया....! तेरा जमाल..तेरी मुहब्बत का शुक्रिया... जब से मिला है मुझको..तू मुझमें ठहर गया..! औरों का न ख्याल है...न अपना अब रहा... बस तू ही नज़र आता है...जब भी जहाँ गया...! ए मेरे सनम..मेरे खुदा...तुझको क्या कहूँ.. तू रूह बन के मेरे जिसम में उतर गया.....!
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दुआएं बुनने वाला उदास जुलाहा

Puja Upadhyay at लहरें 
बहुत दिन हुए एक जुलाहों की बस्ती थी...बस्ती में अनगिन कारीगर दिन रहते बेहतरीन करघे पर बुनते रहते थे रेशमी ख्वाब...कच्चे सूत से. बस्ती से थोड़ा ही हट कर थी रंगरेजों की हौद, नदी से बस थोड़ा ही दूर. जगह सभ्यता के बसने के समय कहीं खोयी हुयी रह गयी थी इसलिए यहाँ के लोग नहीं सीख पाए थे सामाजिकता. उन्होंने नहीं जाना था चुप रहने का दर्द. वे करघे पर ख्वाब बुनते हुए गुनगुनाते रहते थे एक सियाह आँखों वाली लड़की की कहानियां...लड़की जो उनके ख्वाबों में आ कर हर रेशमी दुपट्टे का रंग बताया करती थी...लड़की जो रेत में उँगलियों से बेल-बूटे बनाया करती थी. कुछ लोग ऐसा भी कहते थे कि माँ सरस्वती ही लड़की क...more »
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स्त्री पाठ और बन्द द्वार

गिरिजेश राव, Girijesh Rao at एक आलसी का चिठ्ठा 
साँझ से पहले का समय था। उनकी वाणी से सहज सुबोध ज्ञान की निर्झरिणी बरस रही थी। जनता मुग्ध भाव से अश्वत्थ छाँव में बैठी सुन रही थी। अचानक क्रन्दन करती एक विधवा आई और उसने अपने मृत पुत्र को वहीं लिटा दिया – यह मेरा एकमात्र सहारा है। इसे पुनर्जीवित करें आर्य! उन्हों ने अविचलित स्वर में पूर्ववत शांति के साथ कृपा बरसाई – था कहिये आर्ये! अब वह नहीं है। मृत्यु शाश्वत सत्य है। उससे कोई नहीं बचा। मृत्यु एकल दिशा में चलती है। आप का मृत पुत्र पुन: जी नहीं सकता। विधवा के करुण विलाप से अश्वत्थ वृक्ष की पत्तियाँ और डोलने लगीं। जन के नेत्रों में मौन आग्रह देख उन्हों ने विधवा से कहा – माता! जाओ... more »

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शिक्षा - रिक्त आकाश

प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम् 
आलोक का कहना है कि यदि एक वर्ष के लिये शिक्षा व्यवस्था को विराम दे दिया जाये, सारे विद्यालय बन्द कर दिये जायें तो विश्व के स्वास्थ्य पर कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है, यह भी संभव है कि कुछ उत्साहपूर्ण निष्कर्ष सामने आ जायें। आलोक चित्रकार हैं और सृजन और मुक्ति के मार्ग के उपासक हैं, उनके लिये बच्चों पर कुछ भी थोपना उनके सम्मान और अधिकार पर कैंची चलाने जैसा है। एक सीमा तक मैं भी उनसे सहमत हूँ, अर्थतन्त्र से प्रभावित शिक्षातन्त्र की बाध्यतायें हमारी राह सीमित कर देती हैं, लगता है कि हम हाँके जा रहे हैं, हम उस राह जाना चाहें, न चाहें। यदि किसी बच्चे को अपनी प्रतिभानुसार व्यवसाय या कार्य... more »

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सुना है ! कल रात मर गया वो.......

यादें....ashok saluja . at यादें... 
*न जाने कौन सा ज़हर है इन फिज़ाओं में * *ख़ुद से भी ऐतबार.उठ गया है अब मेरा .......*. ...अकेला *मरने वाले के साथ , कौन मरता है * *कल दिन में तो , अच्छा-भला था * *दिल में था कितने ...जख्म लिए वो * *ये गिनती भला...आज कौन करता है |* * **चलो अच्छा हुआ , मर गया वो......* * **जिन्दगी भर किन्ही ,सोचों में डूबा रहा * *अच्छा हुआ ...आज मर के तर गया वो* *जिन्दगी भर , तिल-तिल जलता रहा * *अच्छा हुआ ...आज पूरा जल गया वो * * **चलो अच्छा हुआ , मर गया वो.....* * **चलो अब , खत्म हुई मुलाकातें * *यहाँ पर जितने मुँह ...उतनी बातें* *बहुत पहले से ही था , मर गया वो * *जिन्दगी से जो ...था डर गया ... more »


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नमस्ते करने से क्या होगा ???

वृजेश सिंह at बसंत के विखरे पत्ते
सब्जी के बाजार में सोचता बचपन.. आज एक शिक्षक नें बच्चों को कहा कि अपने माता-पिता के पांव छूकर आना। इससे तुम्हें पढ़ना-लिखना आ जाएगा। तुम केवल परीक्षा के दौरान उनके पांव छूते हो, बच्चों ने सवाल का उत्तर हां में दिया। पता नहीं वे परीक्षा के दौरान भी ऐसा करते हैं या नहीं, लेकिन उन्होनें शिक्षक के सवालों का जवाब हां में दिया। मैं बच्चों की समझदारी देखकर दंग था कि अगर कोई सवाल पूछते हुए, कोई परिस्थिति निर्मित करते हुए अनुमान लगाता है तो वे उसको सही मान लेते हैं। शायद इसलिए ताकि बात आगे न बढ़े। मैं सोच रहा था कि माता-पिता के पांव छूने से क्या होगा ? उनको अच्छा लगेगा ! बुरा भी लग सकता है ?...more »
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मित्रों आशा है आज का यह बुलेटिन आपको पसन्द आया होगा...   तो फ़िर आज देव बाबा को इज़ाजत दीजिए और मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद.. 

जय हिन्द
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