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शुक्रवार, 31 अगस्त 2012

कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

आज जावेद अख़्तर साहब की लिखी हुई किताब 'लावा' पढ़ रहा था तो एक शे'र पर नज़र पड़ी ... लगा जैसे कि आजकल ब्लॉग जगत मे जो चल रहा है ... जावेद साहब उस बारे मे कुछ फ़रमा रहे है !

लीजिये आप सब की नज़र करता हूँ मैं जावेद साहब का वो शे'र ...

"   कभी ये लगता है अब ख़त्म हो गया सब कुछ ;
कभी ये लगता है अब तक तो कुछ हुआ भी नहीं 

कभी जो तल्ख़ - कलामी थी वो भी ख़त्म हुई ;
कभी गिला था हमें उनसे अब गिला भी नहीं  "

सादर आपका 


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क्यूँ कि मिले नहीं 

जाँच जारी है 

मेरी मर्जी यूँ 

जवाब आगे मिलेंगे 

चलो यह भी सही 

उड़ी बाबा ए की गंडगोल 

जन्मदिन की बधाइयाँ दोनों को 

यहाँ भी देखिये 

तो कोई गलती हो गई क्या 

पता नहीं हम वहाँ कभी गए नहीं 

को क्या हुआ 

निवारण क्या है 

इन्हे देख कर जी रहे है सभी 

इसलिए ब्लॉगर कुछ नहीं बोलेगा 

And the Oscar goes to ...

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!!

गुरुवार, 30 अगस्त 2012

अगर यही जीना हैं तो फिर मरना क्या हैं - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

आज आप को एक कविता सुनाने का मन है ... बहुत पहले नेट पर पढ़ी थी ... कवि का नाम तो पता नहीं चला पर कवि की बात दिल को छू गई थी !

लीजिये आप भी पढ़िये ...

शहर की इस दौड में दौड के करना क्या है?
यही जीना हैं दोस्तों... तो फिर मरना क्या हैं?
पहली बारिश में ट्रेन लेट होने की फ़िकर हैं......भूल गये भींगते हुए टहलना क्या हैं.......
सीरियल के सारे किरदारो के हाल हैं मालुम......पर माँ का हाल पूछ्ने की फ़ुरसत कहाँ हैं!!!!!!
अब रेत पर नंगे पैर टहलते क्यों नहीं........?????
१०८ चैनल हैं पर दिल बहलते क्यों नहीं!!!!!!!
इंटरनेट पे सारी दुनिया से तो टच में हैं.......लेकिन पडोस में कौन रहता हैं जानते तक नहीं!!!!
मोबाईल, लैंडलाईन सब की भरमार हैं.........ज़िगरी दोस्त तक पहुंचे ऐसे तार कहाँ हैं!!!!
कब डूबते हुए सूरज को देखा था याद हैं??????
कब जाना था वो शाम का गुजरना क्या हैं!!!!!!!
तो दोस्तो इस शहर की दौड में दौड के करना क्या हैं??????
अगर यही जीना हैं तो फिर मरना क्या हैं!!!!!!!

पता नहीं हम मे से कितने ठीक ऐसे ही मर मर कर जी रहे है !!??

सादर आपका 


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अब आज्ञा दीजिये ... 

जय हिन्द !!

बुधवार, 29 अगस्त 2012

झटपटिया वन लाइनर बुलेटिन :) :)







इन दिनों कुछ अलग मशरुफ़ियत है जो ये जिम्मा गाहे बेगाहे ही उठा पाते हैं जबकि एक खबरी के रूप में इन दिनों इत्ता माल मसाला देश विदेश से लेकर फ़ेसबुक और ब्लॉगिंग तक में है कि रिपोर्टर लाद लाद के आप तक लाता रहे मगर फ़िर भी सामान खत्म न हो । फ़िलहाल तो हमेशा की तरह ब्लॉग महारथियों के जुटान की खबरें , और उन पर आ रही घनघोर प्रतिक्रियाएं ही देखने पढने सुनने को मिल रही हैं । लेकिन ऐसा भी नहीं है कि और कुछ नहीं लिखा पढा जा रहा है , तो फ़िलहाल तो आप एक झटपटिया , फ़टफ़टिया एक लाइनर बुलेटिन बांचिए , जल्दी ही लौटते है फ़ुल फ़ार्म में : -



फ़ूलों से कहती हूं :   कहती ही रहती हूं


एक सफ़र :   जिंदगी से हसीन


भारत परिक्रमा -लीडो -भारत का सबसे पूर्वी स्टेशन : चला मुसाफ़िर घुमक्कडी करने


१६६ कत्ल करने वाले पाकिस्तानी आतंकवादी कसाब को फ़ांसी : नहीं होने देगी , उसकी इटली वाली मासी


कभी तकलीफ़ इतनी हो कि जीना बोझ लगता है :कभी कभी तो ऐसा रोज़ लगता है


तुम सम कौन कुटिल , खल लम्पट :सारा माल ले हो गए चम्पत


ये क्या हो रहा है ? :  कोई हंस तो कोई रो रहा है


आधा कम्बल : देता संबल


परिकल्पना से उनका कलपना ! : तभी तो हुआ आपका इस पोस्ट को लिखना 


हिंदी ब्लॉगिंग की सहज़ प्रवृत्तियां : कित्ती असहज़ता पैदा करती हैं


अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन और परिकल्पना सम्मान : आंखों देखी  : सबसे तेज़ , सबसे आगे


नश्तर चुभा क्या :  आपको दिखा क्या


देख रहा था व्यग्र प्रवाह : आह कहें कि वाह !


यह भय व्यर्थ नहीं है : जीवन निरर्थ नहीं है


मछली : जल की रानी है


क्या सच में बातों से ज़िंदगी नहीं चलती :  सिर्फ़ बातों से तो बिल्कुल नहीं चलती


गम का इतिहास : बडा लंबा होता है


हमें अपनों ने मारा , गैरों में कहां दम था  : उन्हीं के जूते से उनका सर कलम था :)


अब मुझे इज़ाज़त दें , मिलते हैं अगली बुलेटिन के साथ ..आपका ब्लॉग खबरी ।



मंगलवार, 28 अगस्त 2012

बारिश.. ट्रैफ़िक जाम और खिचखिच... ब्‍लॉग बुलेटिन

दिल्ली की बारिश... आय़ं... आज सुना दिल्ली की बारिश से दिल्ली वासियों का जीना मुहाल हुआ... सोचा देखें कितना बारिश हुआ.. 43 मिमी.. बस ? इतना बारिश तो मुम्बई में आम बात है... तो फ़िर ? दिल्ली का बुरा हाल कैसे हो जाता है भाई। मुम्बई और दिल्ली का कम्पेरिज़न कीजिए जान जाईएगा की शीला दीक्षित के दिल्ली मास्टर प्लान में कितने मीन मेख हैं.. वहीं मुम्बई का डिज़ास्टर मैनेजमेंट भी गायब हो जाता है। मुम्बई और दिल्ली दोनों में एक बात समान है और वह यह की यहां सरकार कांग्रेस की है और नगर पालिका पर भाजपा गठबंधन.. जी बिल्कुल इसीलिए इन दोनों शहरों की मुसीबत का कारण भी यही है..   

मुंबई शहर तो हर बारिश में भगवान् भरोसे हो जाती है, शहर की हालत के लिए सरकारी प्रशाशन का योगदान सर्वोप्परी है... मुंबई की सडको को कंक्रीट बनाने के नाम/ मैट्रो ट्रेन / मोनो रेल के नाम पर हुई खुदाई से सड़क के किनारों पर मिटटी जमी हुई है.... यही मिटटी बारिश के समय बहकर ड्रेनेज सिस्टम को चोक कर देती है और बारिश का जमा हुआ पानी निकलने नहीं पाता.... यह समस्या हर वर्ष की है और इस वर्ष कुछ ज्यादा है.... अगर बारिश तेज हुई (तेज बारिश से मेरा मतलब १५० मिमी या उससे ज्यादा) तो फिर शहर परेशानी में पड सकता है.... आम तौर पर हर साल कम से कम ऐसे पांच से दस दिन होते हैं जब मुंबई में २५० मिमी से ४५० मिमी तक पानी बरसता है.... तो मुंबई वासिओं को क्या करना चाहिए.... अपने आप को सरकार भरोसे छोड़ देना चाहिए? जी नहीं बिलकुल नहीं..... तो लीजिये कुछ इस प्रकार की तैयारी कीजिये...  

यदि आपके पास कार है तो 
  • कार की सर्विस रेगुलर कराएं, उसमे विंड स्क्रीन वाशर शैम्पू ज़रूर रखे.
  • कार के इंजिन और इलेक्ट्रिक सिस्टम को चेक करते रहे, एसी ठीक तरह से काम करना चाहिए, उसकी जाँच कर ले...
  • आपकी कार के टायर का रबर और ब्रेक चेक करें...  आपकी कार के ब्रेक एक्सल और ब्रेक लाइनर अच्छे शेप में होने चाहिए... ब्रेक आयल की जाँच करें... 
  • आपके कार का स्टीरिओ में ऍफ़ एम् रेडिओ ठीक से बजता हो... 
  • किसी भी लो-लाइन एरिया में जाने के पहले सोच विचार ले और यदि अति-आवश्यक हो तभी जायें..
  • कार में एक हथौड़ा (सेन्ट्रल लोकिंग के फेल होने की दशा में खिड़की तोड़ने के लिए) , तौलिया, कुछ खाने का सामान, छाता जरूर रख लें... 
  • अपना मोबाईल चार्ज रखें.... घर से निकलते समय मोबाईल ज़रूर चेक करें... 
  • यदि आप अत्यधिक जल-जमाव (जब पानी बोनट तक या केबिन के अन्दर आ जाये) में फंस जायें तो पैनिक होकर कार को बंद न करें, यदि कार अपने आप बंद हो जाये तो उसे गलती से भी स्टार्ट करने की कोशिस न करें...  उस समय कार को स्टार्ट करने का प्रयास आपकी कार को ख़राब कार देगा... धक्का लगाये और कार को पानी से बाहर निकालें... 
  • अपने कार के डीलर का नंबर अपने मोबाइल में स्टोर रखें... 
यदि आपके पास कार नहीं भी है तो 
  • मोबाईल चार्ज रखें... और मोबाईल में ऍफ़ एम् सुनने के लिए हेड-फोन ज़रूर रखें
  • अपने आफिस में एक जोड़ी कपडा एक्स्ट्रा रख दें... 
  • छाता ज़रूर ले कर निकले हो सके तो एक विंड चीटर ज़रूर ले ले.... 
  • अपने बैग में कुछ खाने का सामान ज़रूर लें...  
  • कुछ बचें और दूसरो को बचाने का प्रयास करें.... कोई भी अफवाह न फैलाएं और किसी भी अफवाह पर ध्यान न दें... 
याद रखिए एक जागरूक नागरिक बहुत महत्त्वपूर्ण है हमारे समाज के लिए.... तो जागरूक रहिएगा और पूरी तरह सतर्क भी.. 

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आज का बुलेटिन
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चलिए देव बाबा को इज़ाजत दीजिए... कल फ़िर मुलाकात होगी एक नये मुद्दे के साथ.. तब तक के लिए सतर्क रहिए और बरसात का आनन्द लीजिए वह भी पूरी सावधानी के साथ... 


सोमवार, 27 अगस्त 2012

दबा के खाओ जनता का माल.. ब्‍लॉग बुलेटिन

मोटा माल या छोटा माल यह बीजेपी की संस्कॄति होगी कांग्रेस की नहीं... आज कुछ ऐसा बयान आया कांग्रेसी प्रवक्ता का। जी...  कल भाजपा भी नप गई केज़रीवाल के पैमानें पर सो उसके पास कोई और रास्ता है भी नहीं सो उसनें कोयला आबंटन से जुडी हुई हर कार्यवाही को रोलबैक करनें के लिए चीखना और चिल्लाना शुरु किया है। तो इसी बीच कितनी उच्च स्तर की बयान बाजी हो रही है.. 

बीजेपी कहती हैं.. कोयले की दलाली में कांग्रेस नें मोटा माल दबाया है उसके प्रतिक्रिया में कांग्रेस कहती हैं की मोटा माल या छोटा माल यह बीजेपी की संस्कॄति होगी कांग्रेस की नहीं.. बीजेपी की भाषा सही हो या गलत लेकिन मुझे लगता है कांग्रेस तो एकदम सही कहती है..  भाई कांग्रेस कब छोटा या मोटा माल देखती है वह तो पूरे देश को खा जानें का माद्दा रखती है.. धीरे धीरे वह ऐसा ही तो कर रही है। सही है न.. कोल-गेट मे नपे प्रधानमंत्री जी की हालत इस टाईम पर बडी बुरी हो गई है। 

एक पुरानी पैरोडी है... 

नेताओं की डगर पर चमचों दिखाओ चलके
यह देश है तुम्हारा खा जाओ इसको तलके

कहनें के लिए व्यंग्य दिखेगा लेकिन यह बहुत गहरी चिन्ता का विषय भी है। कुछ भी कहें लेकिन हिन्दुस्तान की राजनीति में अब चमचे ही राज कर रहे हैं और असली माल दबा के जनता को बेवकूफ़ बनाया जा रहा है। न जानें क्यों लेकिन आज कल पक्ष हो या विपक्ष हो दोनों की नीयत पर भरोसा नहीं हो रहा है और मोटे तौर पर यह असली मुद्दों से भटकानें जैसा ही लग रहा है। 

हमारे प्रधानमंत्री जी म्यूट मोड में रहते हैं, कोई बयान नहीं देते... जनता के साथ कभी मुलाकात नहीं करते.. स्टेटमेंट ज़ारी करते हैं... कभी किसी टाक-शो में नहीं आते.. दर-असल वह जनता के बीच से आते ही नहीं हैं सो वह जनता के प्रतिनिधि हैं ही नहीं.. ठीक ऐसा ही हाल सोनियां गान्धी का भी है.. क्या आपनें कभी उन्हे किसी टाक-शो.. प्रेस वार्ता में देखा है ? बिल्कुल नहीं... यह भी अपना स्टेटमेंट मीडिया में ज़ारी करतीं हैं... आज कल फ़ील-बैड का माहौल है..  और सब के सब माल दबा रहे हैं... किसका ? जी आपका और हमारा और क्या...  

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आज का बुलेटिन... 
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कभी तो होगी इस चमन पे भी बहार की नजर :ए . के हंगल
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इज़हार नहीं करेंगे
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कविता
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मेरे साथ इक साया
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अन्जान हूँ मैं । (गीत)
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कुर्सियाँ बुनने वाला
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उम्र यूं ही तमाम होती है
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प्रेम .... मेरे लिए - रश्मि प्रभा...
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यह दिया बुझे नहीं / गोपाल सिंह नेपाली
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सृष्टि में दृष्टि जैसे ह्रदय में स्‍पंदन ....
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अन्ना स्विर : वे तीसरी मंजिल से नहीं कूदे
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आज़ाद पुलिस का धरना-3
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गांधी और गांधीवाद-130
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भारत परिक्रमा- तीसरा दिन- पश्चिमी बंगाल और असोम प्रस्तुतकर्ता नीरज जाट
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चैतुरगढ: मैं कहता हौं आँखन की देखी -- ललित शर्मा
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बहुत परेशान हैं बेचारे यमराज ...

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आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा..  कल कुछ और खबर बाचेंगे.. तब तक के लिए देव बाबा को इज़ाजत दीजिए..

जय हिन्द

रविवार, 26 अगस्त 2012

पुलिसिया लट्ठबाज़ी.. हंगल साहब और क्रिकेट.. ब्लॉग बुलेटिन

मित्रों, आज कल बडी शोर मची हुई है, हर कोई शोर मचाए हुए है..  केज़रीवाल साहब राजनीतिक दल बनानें की ठान चुके हैं और अपनें बन्दो को ले के पक्ष और विपक्ष की बैंड बजानें में व्यस्त हैं। क्या कहिएगा भाई.. जो हो रहा है वह सही है ? बहस का मुद्दा है भाई लेकिन आज का दिन बडा मिक्स्ड सी फ़ीलिंग लेकर आया.. टीवी पर पुलिसिया हाथापाई देखी और देखा की कैसे लोग इंकलाब ज़िन्दाबाद के नारे लगा रहे हैं और पुलिस उठा उठा के ले जा रही थी.. आज तो ऐसा लग रहा था की भाई तिरंगा धारण कीजिए और फ़िर पुलिसिया डंडा झेलिए... सरकार पकड पकड के मारेगी और ज़ेल में डाल देगी.. क्या कहें जो लोग आज इंकलाब ज़िन्दाबाद के नारे लगा रहे थे क्या वह वाकई देशभक्त थे... यह भी बहस का मुद्दा हो सकता है लेकिन प्रधानमंत्री का मौन धारण कर लेना और किसी प्रकार का कोई बयान न देना और भी कई प्रश्न दे जाता है। लेकिन फ़िर भी लोक-तंत्र में यह कहां तक जायज़ है... 




इसी बीच समाचार आया ए के हंगल साहब के चले जानें का... वाकई कुछ समय के लिए सन्नाटा सा ही छा गया... हिन्दी सिनेमा अवतार किशन हंगल को हमेशा याद रखेगा... जी बिल्कुल १५ अगस्त १९१५ को सियालकोट, पंजाब में जन्मे पद्मश्री हंगल साहब चरित्र अभिनेताओं के बीच एक मिसाल बनकर हमेशा जीवित रहेंगे.. 

हंगल साहब १९२९-१९४७ तक एक स्वतंत्रता सेनानी... १९३६-१९६५ एक थियेटर कलाकार और १९६५-२०१२ फ़िल्म कलाकार और चरित्र अभिनेता के रूप में हमेशा याद आएंगे... केवल एक लाईन... इतना सन्नाटा क्यों है भाई...  बुलेटिन की पूरी टीम की तरफ़ से उन्हे श्रद्धांजलि...



हंगल साहब के चले जानें से उबर ही पाए थे की तभी क्रिकेट जगत से न्यूज़ मिली की भारत नें विश्व कप जीत लिया है और वह भी आस्ट्रेलिया जैसी मज़बूत टीम को हराकर... टीवी जो थोडी देर पहले तक पुलिसिया लट्ठबाज़ी और हंगल साहब को दिखा रहा था अब क्रिकेटिया बुखार से त्रस्त था। मामला क्रिकेट से जुडी हुई एक बडी जीत का था सो सारे नेताओं को बधाई तो देनी ही थी.. जी बिल्कुल प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति नें टीम की इस जीत के लिए बधाई संदेश भेजा...  खुशी की न्यूज़ थी तो सभी झूम रहे थे... और अजय माकन साहब नें टीम के लिए इनाम की घोषणा भी दे डाली.. शाम होते होते जब भारत नें न्यूज़ीलैड को हरा कर पहला टेस्ट जीत लिया तो फ़िर बधाई संदेशो का तांता लग गया...



सुबह से टीवी के इस रंग को देख कर हम हैरान थे और सोच रहे थे की प्रधानमंत्री घोटालों पर कोई बयान नहीं देते.. लोगों पर पुलिसिया ज़ुल्म के बारे में कुछ नहीं बोलते और लट्ठबाज़ी पर मौन धारण किए रहते हैं.. कोयले की दलाली खा कर करियाए प्रधानमंत्री की ज़ुबान मुद्दों पर खामोश रहती है लेकिन क्रिकेट के मामलों में बधाई देने के मामले में बयान दे जाते हैं। शायद कोई राजनीतिक समझ उन्हे ऐसा करनें को कहती होगी.. मीडिया और सरकार के रंग को दिन भर देखा... क्या कहें हिन्दुस्तान शायद ऐसे ही चलता है...

चलिए आज के बुलेटिन की ओर चलते हैं....

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मल्हार
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बिहार विभूति रासबिहारी लाल मंडल विशेष.
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किरदार ही नहीं एके हंगल का जीवन भी था आदर्श
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हास्य कविता-चैन से रहूँगा
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बाप (लघु कथा)
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इस फुलवारी की ५०० वीं पोस्ट और चालीसवां पड़ाव !
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आप ब्‍लॉगिंग क्‍यों करते हैं?
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व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल होगी लखनऊ के अंतरराष्‍ट्रीय हिन्‍दी ब्‍लॉगर सम्‍मेलन में 27 अगस्‍त 2012 को ब्‍लॉगार्पित
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क्षणि‍काएं....
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प्रिंट मिडिया में अंतर्राष्ट्रीय हिंदी ब्लोगर सम्मलेन
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पूंजीवाद एक प्रेत कथा – अरुंधति राय
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आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा...  बुलेटिन की पूरी टीम की तरफ़ से लखनऊ में हो रहे ब्लागर मिलन के लिए शुभकामनाएं...  हमारे रिपोर्टर शिवम मिश्रा जी और पाबला जी वहां बुलेटिन का प्रतिनिधित्व करेंगे... आशा है इस मिलन से सार्थक ब्लागिंग को नई दशा और दिशा मिलेगी..

तो आज देव बाबा को कल तक के लिए इजाजत दीजिए.. कल फ़िर मिलेंगे

जय हिन्द

शनिवार, 25 अगस्त 2012

भैया, हम हाथ क्यूं मिलाते हैं - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !
हाथ मिलाने की प्रथा कब शुरू हुई? इस बारे में कोई निश्चित प्रमाण नहीं है। हालांकि, साक्ष्य ऐसे भी मिले हैं, जिनसे यह प्रमाणित होता है कि यह प्रथा सदियों पुरानी है। कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार, हाथ मिलाने की प्रथा की शुरुआत की सर वाल्टर रैले ने। रैले ब्रिटिश कोर्ट में कार्यरत थे और वह समय था लगभग सोलहवीं सदी के आसपास का।
बहरहाल, हाथ मिलाने की इस अनोखी प्रथा से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। मसलन, कहा जाता है कि यदि कोई किसी संक्रामक बीमारी से ग्रसित हो, उनसे हाथ मिलाने से परहेज करना चाहिए। वहीं, मीटिंग में, अभिवादन करने में, बधाई देने के लिए आदि कई अवसरों पर हाथ मिलाने की प्रथा आम है।
विभिन्न संस्कृतियों व देशों में भी यह चलन में है। जैसे, पारंपरिक अमेरिकी लोग जब सार्वजनिक रूप से किसी महिला से हाथ मिलाते हैं, तो वे दाएं हाथ में ग्लव्स जरूर पहने होते हैं। लेकिन किसी समारोह या उत्सव में वे ऐसा नहीं करते। दूसरी तरफ, यूरोप के कुछ देशों में ग्लव्स पहनकर हाथ मिलाने को बैड मैनर्स से जोड़कर देखा जाता है।
गिनीज बुक में हाथ मिलाने को लेकर कई तरह के रिकॉर्ड दर्ज हैं। मेयर जोजफ लैजरो एक ऐसे शख्स हैं, जिन्होंने एक दिन में 11, 000 लोगों से हाथ मिलाने का रिकॉर्ड दर्ज करवाया। यह रिकॉर्ड गिनीज बुक ऑफ व‌र्ल्ड रिकॉ‌र्ड्स में दर्ज हुआ। इससे पहले यह रिकॉर्ड अमेंरिकी राष्ट्रपति थियोडोर रूजवेल्ट के नाम था। उन्होंने एक दिन में कुल 8,513 व्यक्तियों से हाथ मिलाकर यह रिकॉर्ड अपने नाम किया था। गिनीज बुक में साढ़े नौ घंटे तक हाथ मिलाने का अनोखा रिकॉर्ड है, जो आज भी बरकरार है।
अमेरिका में सोल ब्रदर हैंडशेक या यूनिटी हैंडशेक का चलन लगभग साठ के दशक में खूब प्रचलन में था। इसमें अफ्रीकी और अमेरिकी लोग आपस में हाथ मिलाते थे। आज भी यह प्रथा अमेरिका के अलग-अलग प्रांतों में कायम है।
हाथ मिलाने के तरीकों को व्यक्ति की पर्सनैल्टी से जोड़कर देखा जाता है। ऐसा कहा जाता है कि यदि कोई पूरे दमखम या गर्मजोशी से हैंडशेक करता है, तो यह संबंधित व्यक्ति की मजबूत इच्छाशक्ति की ओर संकेत करता है और इसके विपरीत ढीलेपन से हाथ मिलाना कमजोर व्यक्तित्व की निशानी होती है। 
वैसे आप कैसे हाथ मिलाते ??
सादर आपका 

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posted by काजल कुमार Kajal Kumar at Kajal Kumar's Cartoons काजल कुमार के कार्टून 
 
posted by Sanjay Mahapatra at फुरसतनामा
सोमारू – अबे मंगलू , तैं त ईकोनोमिक्स पढ़े हस का बे ? मंगलू - अबे मोला का तैं गँवार समझे हस । अबे ऐमे कियों हो बे, ओ भी बिना चीट मार के । मौनी बाबा जैसन कौनो फर्जी डॉक्टर नई हों । सोमारू – चल बे तो...
 
posted by रश्मि प्रभा... at मेरी नज़र से
कुछ लोग लिखते नहीं नुकीले फाल से सोच की मिट्टी मुलायम करते हैं शब्द बीजों को परखते हैं फिर बड़े अपनत्व से उनको मिट्टी से जोड़ते हैं उम्मीदों की हरियाली लिए रोज उन्हें सींचते हैं एक अंकुरण पर सजग हो...
 
posted by nilesh mathur at आवारा बादल 
कल फिर शहर बंद रहेगा दंगों के विरोध मे रैली और धरना होगा कुछ खद्दरधारी भाषण देंगे और फिर अगले दिन जनजीवन सामान्य होगा, यूँ ही मृतकों के परिजन रोते रहेंगे दंगे और विरोध प्रदर्शन होते रहेंगे, यूँ ही ह...
 
posted by Suman at लो क सं घ र्ष ! 
आदर्श मरना नही आदर्श के लिए जीना ...भगत सिंह * *आतंकवाद के चुभते सवाल के बारे में हमें बहुत साफ़ विचार रखने चाहिए | बम का यह रास्ता काफी पुराना है | 1905 से चल रहा है | यह क्रांतिकारी भारत पर दुखद: टिप्प...
 
नमस्कार दोस्तों आज बहुत दिनों बाद आप सब के बीच उपस्थित हुई हूँ,क्यूंकि पिछले कुछ दिन पूर्व ही इंडिया से वापस आई हूँ और अब तक वहाँ की खुमारी उतरी नहीं है। इसलिए क्या लिखूँ कुछ खास समझ नहीं आ रहा है लेकिन ...
 
posted by Tulika Sharma at मन का कैनवस 
उमर के पूरे आँगन में बिखरी बेचैनियों को पकड़ कैसे सकोगे बहुत फिसलन भरे होते हैं बेचैनियों के हाथ पाँव होते हैं मगर इनके .. टहलती रहती हैं दिल के हर कोने में और झाडती रहतीं हैं राख .. बहुत कुछ ज...
 
posted by पंकज सुबीर at सुबीर संवाद सेवा 
[image: 5th Anniversary Ribbon6] पांच साल पहले जब इस सफ़र की शुरूआत की थी तब पता नहीं था कि 'लोग साथ आते गये और कारवां बनता गया' इस मिसरे को हकीकत में बदलते देखने का मौका आने वाले पांच साल में मिलने वाल...
 
posted by AlbelaKhatri.com at Albelakhatri.com 
*जंगे-आज़ादी के जांबाज़ सूरमा अमर बलिदानी राजगुरु के जन्म दिवस पर * *आज तिरंगे को सलाम करते हुए तीन कह-मुकरियां विनम्र श्रद्धांजलि के रूप में * * सादर समर्पित कर रहा हूँ * सब कुछ अपना हार गये वो प्...
 
जख्म जब तेरी याद आई आँखों में आँसू आ गये, तुम्हारी खातिर हँसते-हँसते जख्म खा गये! न दिन को चैन रहा न रात को नीद आई, जिसके लिए जंग छेडा वो गैरों को भा गई! एक इन्तजार था कि कभी तुझे घर लायेगें, कल्पना न क...
 
posted by आशा जोगळेकर at स्व प्न रं जि ता 
हम बोले तो बडबोले वे बोले, वाह, क्या बोले ! कौन किसी की सुनता है, सब अपनी अपनी बोले । उनसे कल क्या बात हुई, जो तेरा तन मन डोले । काम गती पकडे कैसे, गाडी खाये हिचकोले. रानी हुकुम चलाये तो, मंत्री प्र...
 
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अब आज्ञा दीजिये ...
 
जय हिन्द !!

शुक्रवार, 24 अगस्त 2012

मेरा रंग दे बसंती चोला - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !


शिवराम हरि राजगुरु (मराठी: शिवराम हरी राजगुरू, जन्म:२४ अगस्त १९०८ - मृत्यु: २३ मार्च १९३१) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के एक प्रमुख क्रान्तिकारी थे । इन्हें भगत सिंह और सुखदेव के साथ २३ मार्च १९३१ को फाँसी पर लटका दिया गया था । भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में राजगुरु की शहादत एक महत्वपूर्ण घटना थी ।

शिवराम हरि राजगुरु का जन्म भाद्रपद के कृष्णपक्ष की त्रयोदशी सम्वत् १९६५ (विक्रमी) तदनुसार सन् १९०८ में पुणेजिला के खेडा गाँव में हुआ था । ६ वर्ष की आयु में पिता का निधन हो जाने से बहुत छोटी उम्र में ही ये वाराणसी विद्याध्ययन करने एवं संस्कृत सीखने आ गये थे । इन्होंने हिन्दू धर्म-ग्रंन्थों तथा वेदो का अध्ययन तो किया ही लघु सिद्धान्त कौमुदी जैसा क्लिष्ट ग्रन्थ बहुत कम आयु में कण्ठस्थ कर लिया था। इन्हें कसरत (व्यायाम) का बेहद शौक था और छत्रपति शिवाजी की छापामार युद्ध-शैली के बडे प्रशंसक थे ।


वाराणसी में विद्याध्ययन करते हुए राजगुरु का सम्पर्क अनेक क्रान्तिकारियों से हुआ । चन्द्रशेखर आजाद से इतने अधिक प्रभावित हुए कि उनकी पार्टी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से तत्काल जुड़ गये। आजाद की पार्टी के अन्दर इन्हें रघुनाथ के छद्म-नाम से जाना जाता था; राजगुरु के नाम से नहीं। पण्डित चन्द्रशेखर आज़ाद, सरदार भगत सिंह और यतीन्द्रनाथ दास आदि क्रान्तिकारी इनके अभिन्न मित्र थे। राजगुरु एक अच्छे निशानेबाज भी थे। साण्डर्स का वध करने में इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव का पूरा साथ दिया था जबकि चन्द्रशेखर आज़ाद ने छाया की भाँति इन तीनों को सामरिक सुरक्षा प्रदान की थी।


२३ मार्च १९३१ को इन्होंने भगत सिंह तथा सुखदेव के साथ लाहौर सेण्ट्रल जेल में फाँसी के तख्ते पर झूल कर अपने नाम को हिन्दुस्तान के अमर शहीदों की सूची में अहमियत के साथ दर्ज करा दिया ।
 
ब्लॉग बुलेटिन की टीम और पूरे ब्लॉग जगत की ओर से आज अमर शहीद राजगुरु जी की 104 वी जयंती के मौके पर हम सब उनको शत शत नमन करते है ! 
 
सादर आपका 
 
 
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कुछ कारण तो बताइये 
 
सब को समझ आती है 
 
बधाइयाँ 
 
आप भी आज़माएँ 
 
ज़रा संभाल कर 
 
जो जैसा उसके लिए वैसी 
 
कहाँ से 
 
हैप्पी बर्थड़े 
 
कैसा है 
 
परांठे इधर दीजिये बाकी आप संभालिए 
 
किसे हो गई 
 
कहाँ हुआ 
 
कहीं ब्लॉग बुलेटिन तो इन मे नहीं है 
 
बात मे दम है 
 
सुनाइए 
 
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 अब आज्ञा दीजिये ...

इंकलाब ज़िंदाबाद !!

गुरुवार, 23 अगस्त 2012

अमर मरे नहीं, अमर मरा करते नहीं... ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

आज से ठीक एक साल पहले ब्लॉग जगत खास कर हिन्दी ब्लॉग जगत को एक कठोर आघात का सामना करना पड़ा जिस से कि उबरने की कोशिश अब भी हम सब कर रहे है !

मैं बात कर रहा हूँ ड़ा ॰ अमर कुमार के असमय निधन की ... आज ड़ा ॰ साहब की पहली पुण्यतिथि है !
अमर मरे नहीं, अमर मरा करते नहीं..
वो दिलों में रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए...
पूरे ब्लॉग जगत की ओर से स्व॰ ड़ा॰ अमर कुमार जी को सादर नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि !!
 
सादर आपका 
 
 
 
आज का ब्लॉग बुलेटिन समर्पित है स्व॰ ड़ा॰ अमर कुमार जी को ...
 
 
प्रिय ब्लॉग मित्रों, डॉ अमर कुमार नहीं रहे...ये हक़ीक़त है...लेकिन दिल इसे मानने को तैयार नहीं...मौत को भी ज़िंदादिली सिखा देने वाले शख्स ...
 
 
आप सबसे पहले तो माफ़ी चाहता हूं कि अमर वचन का सिलसिला मेरी व्यस्तता के चलते बीच में टूट गया था... डॉक्टर अमर कुमार के हमारे बीच ...
 
सेक्स वर्कर...वेश्यावृत्ति...दुनिया के सबसे पुराने पेशों में से एक...लेकिन सबसे बदनाम...लेकिन इनसान तो वोभी है...दिल तो उनका भी धड़कता है....
 
रचना जी का मैं शुक्रगुज़ार हूं , उन्होंने डॉ अमर कुमार की अमूल्य टिप्पणियां भेजी हैं ... डा० अमर कुमार बुज़ुर्ग़ ... मैं ? पँगा हो ...
 
31 अगस्त यानि डॉ अमर कुमार की जयंती...जन्मदिन की जगह जयंती कहना वाकई अजीब लग रहा है...लेकिन एक हफ्ता पहले दुनिया को अलविदा कह कर उन्होंने इस...
 
मैं शुक्रगुज़ार हूं रचना जी का, जिन्होंने डॉ अमर कुमार की ये अनमोल टिप्पणियां इस ब्लॉग के लिए भेजी... डा. अमर कुमार ने कहा … A sensibl...
 
डॉ अमर कुमार की टिप्पणियां ब्लॉग के लिए एकत्र करने की कोशिश में मुझे डॉ अनुराग आर्य को पढ़ने का मौका मिल रहा है...और मैं खुद को कोस रहा हूं...
 
रचना जी का मैं शुक्रगुज़ार हूं, उन्होंने डॉ अमर कुमार की अमूल्य टिप्पणियां भेजी हैं...कुछ टिप्पणियां इस पोस्ट में, शेष अगली पोस्ट में... ड...
 
बाल श्रम...हमारे देश में इसे रोकने के लिए क़ानून भी है...लेकिन क्या गांव, क्या शहर, क्या मेट्रो...हर जगह बच्चे मज़दूरी करते नज़र आ जाएंग...
 
शिखा वार्ष्णेय ने पिछले साल जेनेरेशन गैप पर बड़ी सारगर्भित पोस्ट लिखी थी- क्या करें  क्या न करें, ये कैसी मुश्किल हाय... इसमें बताया था क...
 
posted by शिवम् मिश्रा at बुरा भला 
*अमर मरे नहीं, अमर मरा करते नहीं..* *वो दिलों में रहते हैं, हमेशा हमेशा के लिए...* *पूरे ब्लॉग जगत की ओर से स्व॰ ड़ा॰ अमर कुमार जी को सादर नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि !!* 
 
(आज के ब्लॉग बुलेटिन मे शामिल सभी लिंक्स, केवल आखिरी लिंक को छोड़ कर, खुशदीप सहगल जी  के स्व ॰ डॉ अमर कुमार जी को समर्पित एक ब्लॉग अमर कहानियां  से लिए गए है )

मेरा प्रस्ताव है कि 23 अगस्त को स्व ॰ डॉ अमर कुमार जी की याद मे 'हैप्पी ब्लोगिंग डे ' घोषित किया जाये ... आप सब की क्या राय है ???

बुधवार, 22 अगस्त 2012

पीढियों का अन्तर.... ब्‍लॉग बुलेटिन

सभी मित्रों को देव बाबा की राम राम... आज के बुलेटिन में एक गम्भीर मुद्दा उठाते हैं, आखिर पीढियों में हो रहे इस अन्तर और विचारों की सोच का फ़र्क कितना बडा होता जा रहा है... किशोरावस्था के बाद हमें लगता है की हम ज्यादा काबिल हैं और हमारे माता पिता हमें समझ ही नहीं रहे... आप क्या समझेंगे मेरे क्लास में सबके पास प्ले-स्टेशन है... मुझे भी चाहिए... जी वाकई यह घर घर की कहानी है और आनें वाले भविष्य में शायद यह अन्तर बढनें ही वाला है। 

पीढियों में हमेशा से कुछ न कुछ अन्तर होता ही आया है, हर पीढी अपनी पिछली पीढी से ज्यादा तेज़ है और तकनीकि और विज्ञान के मामलें में यह अन्तर वाजिब ही है, लेकिन वैचारिक मतभेद और आज कल की पीढी का ज़रा ज़रा सी बात में अपना नियंत्रण खो देनें की कहानी ज्यादा सुननें और देखनें को मिल रही है। एक बेटा अपनी मां को बोला तुम कभी मेरी बात को समझ ही नहीं सकती और मां बेचारी केवल इतना ही बोली की जब तू छोटा था और ठीक ठीक से अपना नाम भी नहीं बोलता था मैं तब तेरी सब बातें समझ लेती थी और आज जब तू सब कुछ साफ़ साफ़ बोलता है मैं तेरी कोई भी बात को समझ ही नहीं पाती... क्या कहें... 

आज कल की पीढी को अपने माता पिता को समझना होगा और वहीं माता पिता को भी अपनी संतान को पूरी आज़ादी देनी होगी... इस आज़ादी के मायनें अनुशासित व्यवहार होना चाहिए जिसमें बच्चों को अपनी मर्यादा का पूरा खयाल रखना चाहिए। जब बच्चे दूसरों की देखा देखी अपनी मांगो की एक लिस्ट लेकर माता-पिता को पकडा देते हैं उस समय उन्हे अपने परिवार की स्थिति का अंदाज़ा होना चाहिए न... वहीं आज कल की शिक्षा के लिए होनें वाली बच्चों की वाज़िब मांगे माता पिता को प्लान करनी चाहिए और कोशिस करके पूरी करनी चाहिए। यदि बच्चे अपने परिवार को समझे और उन्हे अपनी मर्यादा का भान रहे तो फ़िर आदर्श परिवार और एक बेहतर समाज की कल्पना आसानी से पूरी हो सकती है... सोच कर देखिए...

माता-पिता को समर्पित देव बाबा की एक कविता लीजिए... 


माता-पिता

बोध
संसार का 
बोध
सत्य और असत्य का
बोध
ऊंच और नीच का
हे पिता
पाया बस आप ही से पाया
जीने का साहस
बुद्दि और विवेक
और धैर्य
हे पिता
पाया बस आप ही से पाया

और हे मां
तुझसे पायी ममता
निःस्वार्थ भाव भक्ति
प्रेम और करुणा
भावनाओं की अभिव्यक्ति
कभी भी 
पीछे ना हटनें का साहस

हें पिता और माता
धन्य हुआ जीवन
धन्य हुआ यह तन मन
हे मां... हे पिता...


उम्मीद करते हैं इस पोस्ट से कुछ असर पडेगा... केवल इतना ही समझनें की देर है की... माता-पिता से बढकर दुनियां में कोई हो नहीं सकता इनकी कमी विधाता भी पूरा कर नहीं सकता...  

आईए अब एक नज़र आज के बुलेटिन पर
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मन की बातें..। बहुत खूब
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दो पड़ोसी और अल्पसंख्यक। डिवाईड एन्ड रूल है जी..
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क्रोध का रूपांतरण ......। जो सीख जाए वह धन्य हो जाए
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कुत्ते और आदमी। अच्छी कविता 
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हमेशा .....। क्या ?
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मित्रो आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा.... कल फ़िर मुलाकात होगी... तो मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद

जै हिन्द

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

कुछ हंसी के गोलगप्पे... ब्‍लॉग बुलेटिन

आज कल हम कितने उलझे रहते हैं... न जानें कैसी कैसी परेशानियों से घिरे रहते हैं.... आईए तो फ़िर आज हम कुछ चुटकुलों से आपका मनोरंजन करते हैं..

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पति-पत्नी में झगड़ा हो रहा था.
पति – “अब अगर तुमने एक शब्द भी और कहा तो मेरे अंदर का जानवर जाग जायेगा … !”

पत्नी – “ठीक है, ठीक है … तुम्हारे अंदर जो जानवर बैठा है उसे जाग जाने दो … भला चूहे से भी कोई डरता है .. !!!”

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डॉक्टर - आपके तीन दांत कैसे टूट गए ?
मरीज - पत्नी ने कड़क रोटी बनाई थी.
डॉक्टर - तो खाने से इनकार कर देते !

मरीज – जी, वही तो किया था … !!!

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"तुम इतने चिन्तित क्यों हो ?” ऑपरेशन टेबल पर लेटे मरीज से डॉक्टर ने पूछा ।
"क्या बताऊं डॉक्टर साहब, यह मेरी जिन्दगी का पहला ऑपरेशन है” – मरीज ने जवाब दिया।
"अच्छा ! पर मेरी जिन्दगी का भी यह पहला ऑपरेशन है और मैं तो बिल्कुल भी चिन्तित नहीं हूं।”

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”डॉक्टर साहब, क्या आपको यकीन है कि मुझे  मलेरिया ही है ? दरअसल मैंने एक मरीज के बारे में पढ़ा था कि डॉक्टर उसका मलेरिया का इलाज करते रहे और अंतत: जब वह मरा तो पता चला कि उसे टायफाइड था।”

”चिन्ता मत करो, मेरे साथ ऐसा नहीं होगा। अगर मैं किसी का मलेरिया का इलाज करूंगा तो वह मलेरिया से ही मरेगा।”
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हंसी के हसगुल्लो के बाद आईए ब्लाग जगत के कुछ चुनिंदा पोस्टो पर नज़र डाली जाए....

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५०० वीं टिप्पणीमुझे अब मिल ही गयी ....!!!: बधाई हो
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नींद रात रानी हो गयी। वाह जी वाह
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बुद्धि की झोरिया : कहाँ टांग दिहो। क्या बात है...
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दिल से । (गीत)। बढिया गीत
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एक पत्र बचपन के नाम। एक उम्दा पोस्ट
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कैग की जीरो या मैडम का अंडा। श्श्श!!! का कहें...
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ढलती शाम के संग...। वाह
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वो इमली का पेड़। क्या जी वाह
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मुझ सी ही नटखट मेरी परछाइयाँ। मजा आ गया जी
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जहां निर्वाण होता हो मासूमियत का !!!। अच्छा ही है
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वेब-पत्रिकाओं और ब्लॉग से चोरी हो रही हैं रचनाएँ : मुंबई से प्रकाशित 'संस्कार' पत्रिका का कारनामा। सरजी कापीराईट का मतलब ही होता है राईट टू कापी.... :-)
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आशा है आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा.... तो फ़िर देव बाबा को इज़ाजत दीजिए.. एक छोटे से ब्रेक के बाद फ़िर मुलाकात होगी...

जै हिन्द



सोमवार, 20 अगस्त 2012

नन्हें-मुन्हें बच्चे या खतरों के खिलाड़ी - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

स्कूली रिक्शों व वाहनों में खचाखच भर कर स्कूल जाने वाले इन बच्चों को खतरों का खिलाड़ी कहा जाये तो अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिन्हें देख अनायास ही हर किसी के मुंह से उफ निकलता है कि इन नन्हे मुन्हें बच्चों के साथ कहीं कोई अनहोनी घटना न घट जाये। ऐसा नजारा हर रोज स्कूली बच्चों के स्कूल आते जाते समय देखा जा सकता है।
स्कूल की छुट्टी होते ही इन नन्हें-मुन्हें बच्चों को स्कूली रिक्शों में ठूंस ठूंस कर भर दिया जाता है। कुछ बच्चे तो रिक्शे पर आगे की ओर एक तख्ती पर बैठा दिये जाते हैं व सामने लगे एंगिल को पकड़ कर बैठे यह बच्चे अगर दचकी या ठोकर लगते ही नीचे सरक जाये व गिरकर घायल हो जाये तो कोई बड़ी बात नहीं है। वहीं स्कूली वाहनों पर भी जाने वाले बच्चों का यही हाल है। बच्चे वाहनों में लटक कर घर से स्कूल व स्कूल से घर का रास्ता तय करते हैं। इन्हें देख ऐसा ही लगता है जैसे यह स्कूली बच्चे नहीं बल्कि सर्कस के कलाकार हैं जो चलते वाहन से बाहर की ओर लटक कर करतब दिखा रहे हैं।
लेकिन इन बच्चों की जानमाल की सुरक्षा हेतु न तो स्कूल प्रशासन जिम्मेदारी पूर्ण रवैया अपना रहा है, न अभिभावकों को इस बात की चिंता है। हद तो देखिए इन स्कूली बच्चों पर अब तक प्रशासन की नजर भी नहीं पड़ी है... जो ऐसे स्कूल के विरूद्ध कार्रवाई करें। जिनके रिक्शे व वाहन क्षमता से अधिक बच्चे ढोने का काम करते हैं जैसे यह बच्चे नहीं बल्कि सब्जी तरकारी या कोई सामान हो जो गिर भी जाये तो कुछ नहीं बिगड़ेगा। यदि प्रशासन ने सख्त कदम नहीं उठाये तो किसी भी दिन इन स्कूली बच्चों के साथ कोई अनहोनी घटना घट सकती है।

आप सब से भी अनुरोध है कि अपने आस पास के ऐसे स्कूल वालों को समझाएँ और इन मासूमो को किसी भी अनहोनी का शिकार होने से बचाएं !

सादर आपका 


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शर्म से मरती इंसानियत 

माँ तुझे सलाम 

कैसे बीते 

जैसे एक युग बिता 

कि हर ओर मुस्कुराहट हो 

साथ मे चाय और अखबार
जैसा आपने और हमने बनाया  
सुनाइए 

एक थे ... एक ही रहेंगे हम 

जिस ने मचा रखा है हाहाकार 

सबको 

बहुत सारी 

हमारी नींव 

 हमें क्या लेना जमाने भर की इदों से 

किस के 
 
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 आज ईद, कल ईद, सुबह ईद, और शाम को ईद ;
 खुदा करे कि आप के हर लम्हें का नाम हो ईद !
 ईद मुबारक!




पूरी ब्लॉग बुलेटिन टीम की ओर से आप सब को ईद मुबारक !

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!

रविवार, 19 अगस्त 2012

कितने जागरूक हैं हम... ब्लॉग बुलेटिन

ज के बुलेटिन में देश दुनियां की समस्याओं से इतर कुछ और बात की जाए... आज अपनें देश के समॄद्ध ऐतेहासिक विरासत की बात करते हैं और हिन्दुस्तानियों की उनके प्रति उदासीनता की... एक से एक धरोहर हैं हमारे देश में लेकिन हम किसी का रखरखाव नहीं रख पाते। चलिए एक नज़र डाली जाए कुछ उदाहरणों पर..

(चित्र गूगल से साभार)
देखिए प्यार का इज़हार कीजिए लेकिन हमारी इमारतों को क्यों बरबाद कीजिए.... एक से एक किले और एक से एक सुन्दर जगह हैं लेकिन हमें किसी की कद्र नही है। आखिर इतने उदासीन क्यों हैं हम... मैं जब भी विदेश गया हूं मैनें देखा है की विदेशों में एक छोटा सा तालाब भी होगा तो इतनें कायदे से मेनटेन होगा की क्या कहें... उसकी फ़ीस होगी और उस फ़ीस का पूरा पैसा उस तालाब के रखरखाव में खर्च हो रहा होगा।  हिन्दुस्तान में तो ऐसे कितने तालाब होंगे और कितनें मेनटेन होंगे ? 

मुम्बई से नज़दीक एलीफ़ैंटा केव्स के बारे में आपने सुना होगा, विश्व प्रसिद्ध यह गुफ़ाएं पांचवी शताब्दी की एक बेहतरीन विरासत हैं... इसमें एक व्यक्ति का पांच रुपया और एक विदेशी के लिए ढाई सौ रुपये का शुल्क लिया जाता है... मैं पिछली बार मेरे एक विदेशी मित्र को लेकर गया था.. ढाई सौ रुपया देनें के बाद उसे अन्दर आने दिया गया और मुझे केवल पांच रुपये में... पहले तो यही भेद उसे अखर गया और फ़िर       अन्दर के टायलेट और आम आदमी के लिए तथा-कथित सुविधाएं देखकर उस फ़्रांसिसी नें प्रतिक्रिया में इतना ही कहा की तुम्हारी सरकार विदेशियों से बहुत पैसा लेती है लेकिन रखरखाव के लिए कुछ नहीं करती आखिर टायलेट इतना गन्दा क्यों है। मैं निरुत्तर था... वाकई कोई जवाब न था... वह बिल्कुल सही कह रहा था.. हर जगह बिखरे पालीथीन बैग्स, खाली बोतलें और गन्दगी का साम्राज्य को देख वाकई एक अपराधबोध हो रहा था। धन्य हैं हम हिन्दुस्तानी... कमोबेश यही स्थिति अजन्ता और एलोरा की गुफ़ाओं की भी हैं... 

बनारस के घाटों की स्थिति भी कमोबेश ऐसी ही है... देखिए.. 

(चित्र गूगल से साभार)
अपनी विरासत को जितना बरबाद हमनें किया है उतना शायद किसी ने न किया होगा... पैसा लेने में कोई पीछे न रहेगा लेकिन सुविधा देने और साफ़ सफ़ाई देनें में सबके बारह बज जाएंगे... आखिर क्यों... थोडा सोचिएगा और अगली बार जब किसी पर्यटक स्थल जाएं तो ध्यान रखें हिन्दुस्तान हम और आप से ही है और हिन्दुस्तान की क्षवि को बिगाडनें और गन्दगी बढानें से अपना ही नुकसान है....  

चलिए तो फ़िर इसी संदेश के साथ हम आज के बुलेटिन् को आगे बढाते हैं 

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साँझ के बादल। जी बिल्कुल बरसे या नहीं...
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दर्द की महक और हरकीरत...। भई वाह..
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तुम से प्यार करने की ऋत छा गई है ।। वाह..
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18 अगस्त पर कुछ चुभते सवाल। इन सवालों के ज़वाब हर हिन्दुस्तानी को चाहिए...
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस : सच्चाई सिद्ध हो चुकी हैं| लेकिन बहुत कुछ जानना अभी भी बाकी है...
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मित्रों आज का बुलेटिन यहीं तक.. कल फ़िर मुलाकात होगी... तब तक के लिए देव बाबा को अनुमति दीजिए...

जय हिन्द

लेखागार