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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

आइए कुछ पढते हैं ........




पिछले दो दिनों में उत्तरी ग्रिड फ़ेल होने से हाहाकार सा मच गया है ऐसे में मैं सोच रहा था कि गांव में रहे अपने पांच वर्षों में हमें बिजली के दर्शन ही नहीं हुए तो ग्रिड के फ़ेल या पास होने से कोई फ़र्क ही नहीं पडता था , अब भी नहीं पडता होगा । हां राजधानी दिल्ली समेत जाने कितने ही प्रदेशों और राज्यों में ब्लैक आउट की स्थिति आने से और उस स्थिति में सरकार और प्रशासन की विवशता को देख कर हैरत होती है कि यही देश है जो बात बात में खुद को भविष्य का महाशक्ति बन जाने का दावा करता है , कभी चांद पर पहुंचने तो कभी जाने कौन कौन सी नई प्रौद्योगिकी हासिल करने के लिए खुद की ही पीठ थपथपाता रहता है । आज भी कमोबेश यही स्थिति बनी रही है और यदि आगे भी यही हाल रहा तो ये निश्चित रूप से गंभीर बात होगी । चलिए देखते पढते हैं कि आज मित्र ब्लॉगरों ने क्या कहां लिखा कहा


देर सवेर मानसून ने राजधानी दिल्ली में भी दस्तक दे दी है वर्ना हमारे मित्र ब्लॉगर श्री बी एस पाबला जी अपने फ़ेसबुक स्टेटस में देखिए क्या कहते हैं ,


  • दो हफ्ते हो गए बारिश को. सूरज नहीं देख पाए हैं हम
    इत्ती बारिश, इत्ती बारिश कि हैरान हैं हम इत्ती बारिश है?

और अपने ब्लॉग आरंभ में भाई संजीव तिवारी , विवेक राज सिंह के एक आलेख "मानसून " को प्रस्तुत कर रहे हैं । इसमें विवेक भाई तफ़सील से मानसून के बारे में बता रहे हैं । मानसून का मजा ले ही रहे थे कि भाई महेंद्र मिश्र जी कहने लगे , अच्छा तो हम चलते हैं  ।

हम तो शुरू से ही कहते रहे हैं कि खूब पढा करिए और खूब टीपा करिए ,देखिए आज मनोज भाई ने टीपते टीपते ही कविता रच डाली ,

आज के दौर में

अरुण चंद्र रॉय की कविता ईश्वर पर दी गई टिप्पणी से निकली कविता ...


आज के दौर में 

जिसमें 

बल है 

छल है 

बहाने हैं 

वह ईश्वर है


या फिर ये कहें कि 

जो होता जा रहा है 

निरंकुश 

वह ईश्वर है 

या फिर यह मान लें 

कि 

सुरक्षित है सत्ता 

इसलिए वह अपने को 

ईश्वर 

समझ बैठा है 

सीधा कम 

ज़्यादा ऐंठा है। 

सत्ताधारी ... 

जो लोगों को 

सुख कम 

अधिक बवाल देता है 

एक न एक दिन 

ईश्वर उसकी 

सब कस बल निकाल देता है।"

हिंदी ब्लॉगिंग के लिए एक और सुखद उपलब्धि सरीखी खबर है , राहुल सिंह जी अपने ब्लॉग सिंहावलोकन में इसका खुलासा कुछ इस तरह कर रहे हैं ,"
ये कैसे अपने कि अब तक रू-ब-रू भी न हुए, लेकिन अब तो बहुतेरे अपने जाने-पहचाने नाम, लिखे-उचारे शब्‍दों और चित्र के परोक्ष-यथार्थ से ही 'मूर्तमान' होते हैं। 'ब्‍लागर्स पार्क'' के अंक, ऐसे ही एक परिचित, इस पत्रिका से जुड़े, अश्‍फ़ाक अहमद जी के माध्‍यम से देखने को मिले। भोपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका का पहला अंक अगस्‍त 2009 में आया था, जिसमें मुख्‍य संपादक की टीप है कि इस पत्रिका को मैगज़ीन के बजाय ब्‍लागज़ीन कहना संगत होगा।
ब्‍लागर्स पार्क के प्रवेशांक का संपादकीय - ताजे अंक का मुखपृष्‍ठ
इस नये शब्‍द 'ब्‍लाग-जीन' का 'ब्‍लाग' भी तो नया शब्‍द ही है। सन 1997 के अंत तक वेब-लॉग web-log बन गया we-blog फिर we छूटा तो बच रहा blog-'ब्‍लॉग' या 'ब्‍लाग'। 'मैगज़ीन' शब्‍द मूलतः संग्रह या भंडार अर्थ देता है सो किताबों को ज्ञान का भंडार मान कर मैगज़ीन कहा जाने लगा, लेकिन वर्तमान मैगज़ीन, उन्‍नीसवीं सदी से सीमित हो कर मात्र पत्रिकाओं के लिए रूढ़ है। इस तरह ब्‍लाग-blog और मैगज़ीन-magzine के मेल से बना, ब्‍लागज़ीन-blogazine। अब ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के मुखपृष्‍ठ पर सबसे ऊपर World's First Blogazine अंकित होता है। सोचना है, ब्‍लागजीन शब्‍द पहले अस्तित्‍व में आया होगा या यह पत्रिका, मुर्गी-अंडा में पहले कौन, जैसा सवाल है।
आगे वे कहते हैं कि ,

"
ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के ताजे जुलाई 2012 के अंक-28 में कुछ लेखकों के परिचय के साथ 'ब्‍लागर' उल्‍लेख भी है और एक लेखक कुणाल मेहता के परिचय में उनके शहर का नाम और 'ब्‍लागर' मात्र है। नाम के साथ अपनी ब्‍लागर पहचान अपनाए हिन्‍दी ब्‍लागिंग में गिनती के, एक हैं 'ब्‍लॉ.' उपाधिधारी ललित शर्मा और दूसरी बिना लाग लपेट के ब्‍लॉग वाली, ''ब्‍लागर रचना''। ब्‍लागर्स पार्क में www.scratchmysoul.com पर किए गए पोस्‍ट में से चयनित सामग्री विषयवार, सुरुचिपूर्ण, स्‍तरीय और सुंदर चित्रों सहित शामिल की जाती है। अश्‍फ़ाक जी से चर्चा में मैंने छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित दैनिक ''भास्‍कर भूमि'' समाचार पत्र और साप्‍ताहिक पत्रिका ''इतवारी अखबार'' का उल्‍लेख किया, जिनमें नियमित रूप से ब्‍लाग की रचनाएं छापी जाती हैं। छत्‍तीसगढ़ की तीन उत्‍कृष्‍ट वेब पत्रिकाएं ''उदंती डाट काम'', ''रविवार'', ''सृजनगाथा डाट काम'' सहित छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लाग एग्रिगेटर ''छत्‍तीसगढ़ ब्‍लागर्स चौपाल'', ''ब्‍लॉगोदय'' और गंभीर हिन्‍दी ब्‍लागरों पर भी बातें हुईं, इन चर्चाओं का सुखद निष्‍कर्ष रहा, उन्‍होंने बताया है कि ब्‍लागर्स पार्क, छत्‍तीसगढ़ की ब्‍लाग गतिविधियों पर खास सामग्री जुटाने, प्रकाशित करने की तैयारी में है।"


जब आप खुशखबरी सुन ही रहे हैं तो लगे हाथ अपने शायर मेज़र साहब , यानि ब्लॉगर गौतम राजरिषी , जी की भी एक खुशी आप तक बांटते चलें , उन्हें एक नादां सा रोग पाले हुए पूरे चार बरस हो चुके हैं और इस मर्ज़ के दीवाने हम तो हम खुद धरती अंबर तक हैं , देखिए वे खुद कहते हैं कि ,

चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ...

अपनी कोई ग़ज़ल सुनाये लंबा अरसा हो गया था....और अभी अपने ब्लौग पे नजर डाला तो मालूम हुआ कि चार साल हो गए आज मेरे इस "पाल ले इक रोग नादां..." को  :-) 

तो अपने ब्लौग की चौथी वर्षगांठ पर, मेरी ये ग़ज़ल झेलिये :- 

धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ 
चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ 

साँझ लुढ़क कर ड्योढ़ी पर आ फिसली है 
आँगन से चौबारे तक सब लाल हुआ 

ज़िक्र छिड़ा है जब भी उनका यारों में
ख़ुशबू-ख़ुशबू सारा ही चौपाल हुआ




















नारी ब्लॉग पर नित नई पोस्टें , नारी से जुडी तमाम समस्याओं , मुद्दों , और घटनाओं पर आती रहती हैं । हाल ही में ब्लॉग की संचाकल रचना जी ने इसे पुन: सामूहिक ब्लॉग बनाते हुए साथी ब्लॉगरों के लिए इस पर पोस्ट डालने/लिखने का रास्ता खोल दिया है । आज पढिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्र जो एक पिता ने अपनी पुत्री को लिखा है , 
"
प्रिय अनु,

तुम्हारे विवाह के बाद ये मेरा पहला पत्र है. यकीं ही नहीं हो रहा अब तक कि हमारी छोटी सी,शरारती,चुलबुली बिटिया अब बड़ी हो गयी और ब्याह कर हमसे दूर हो गयी है(दिल से नहीं.)
बेटियों को विदा करके अकसर मां-बाप थोडा फ़िक्र मंद होते हैं उनके भविष्य को लेकर.हम भी हैं...पत्र तुम्हें इसी आशय से लिख रहा हूँ .
वैसे आमतौर पर माएं ये फ़र्ज़ अदा करतीं हैं मगर बचपन से तुम भावनात्मक तौर पर मुझसे ही ज्यादा करीब रहीं .जब कभी तुम व्यथित होतीं, अपनी भीगीं पलकें पोंछने को मां का आँचल नहीं मेरा कंधा खोजा करती थी.....सो तुम्हारी मां का आग्रह था कि ये पत्र तुम्हे मैं ही लिखूँ.

बेटा मुझे तुम्हारी समझदारी पर कोई शंका नहीं है मगर फिर भी कुछ बातें तुमसे कहना चाहता हूँ....जैसा तुम अकसर कहती हो कि"जल्दी मुद्दे पर आइये " मैं भी शुरु करता हूँ अपनी बात, बिंदुवार....
साथ फेरे के साथ सात वचन  लेकर तुम ब्याहता कहलायीं.अब मेरी ये सात बातें गाँठ बाँध कर सुखी जीवन व्यतीत करो ये कामना है मेरी."

और इसके बाद सात बहुत ही जरूरी बातें , जिन्हें आप पोस्ट पर जरूर पढें ।

 इस खत को पढ ही रहा था कि मेरे हाथ एक और खत लगा , वाह मुद्दतों बाद खतों को इस तरह एक पर एक पा रहा हूं क्या बात है , लगता है खतों का जमाना लौटने को है , लेकिन भाई सतीश सक्सेना इस खत को एक बुरा खत कहते हुए लिखते हैं ,

"बिनी ,   
तेरी भाभी अनुप्रिया नागराजन के बारे में, आज सारे अखबारों में छपीं खबरें, जिनके लिंक दे रहा हूँ, हमारे लिए बहुत मनहूस हैं , मगर पढ़ लो ताकि हमें याद रहे कि भगवान् हमें उतना प्यार नहीं करता जितना हम सोंचते हैं ! 
एक झटके में उसकी क्रूरता ने , हमारे परिवार की  रौनक, हर समय मुस्कराती और भरपूर प्यार करती अनु, को हमसे छीन लिया !
स्ट्रेचर पर खून से लथपथ अनु के चेहरे को, दोनों हाथों में लिए, मैं बार बार रो रो कर, उस मनहूस रात उसे मनाता रहा !
उठ जाओ अनु बच्चा , मैं आ गया मेरा बेटा ...
पर वह रूठ गयी थी ...
हम सब उसे बहुत बहुत प्यार करते थे ...और वह हमें ! 
उसे हमसे छिन लिया गया और तब जब उसके पेट में एक मासूम जान और थी !   
और हम उसे नहीं बचा पाया , न उसे.... न उसके अजन्मे बच्चे को....  
हमें पंहुचने में बहुत देर हो गयी थी ..
उस रात पहली बार मैंने अप्पा जी को फूट फूट कर रोते देखा, लगता है अन्नू उनके दिल में भी, अपनी जगह बना चुकी थी ."


अपने गिरजेश राव जी आजकल एक नई परम्परा स्थापित करने में लगे हैं , जैसे ही अपनी पोस्ट पर वे कहते हैं ,"
मैं चलता हूँ वह लीक पकड़ जिस पर हैं विशाल झंखाड़ बरगद, पाकड़ - अमरबेलों के बलियूप। 
कभी बोये थे रक्तबीज पथिकों ने, जिनके हाथ रिसते थे, जो लिखते भी थे। 

हाँ, मुझे पता है कि हैं कुछ उद्यान, सदियों से परिरक्षित ज्ञान, कहलाते जीवंत!  
जिनमें खेलती हैं नई पीढ़ियाँ, जिनकी बेंचों पर बैठ बूढ़े करते हैं लेखजोख सभ्यताओं की मृत्यु के! 
और युवा नशा पीते हैं, संसार को जीते हैं।
चित्राभार : http://previews.agefotostock.com/previewimage/bajaage/b44450dcfd457e8ef02516a1ed7f9720/IBR-591303.jpg
मैं नहीं वहाँ यायावर अक्सर, नहीं अच्छे लगते वे, साज सँभाल बनाती है शंकालु मुझे, मृत्यु की बातें बनाती हैं दयालु मुझे वहाँ बू आती है - षड़यंत्रों, दुरभिसन्धियों की, समझ सकता हूँ जिन्हें समझा नहीं सकता, सूँघ सकता हूँ सूत्रों में सँजो नहीं सकता -गन्ध सूत्रबद्ध न हुये कभी, न होंगे कभी। 
मैं बता नहीं सकता कि शब्द भिंचे छ्टपटाते छोड़ने पड़ेंगे, मुठ्ठियाँ खोलनी होंगी, होना होगा अकेला निपट - 
मैं अकेले चल नहीं सकता और रुकना मुझे स्वीकार नहीं। मैं हूँ वाहक घनचक्करों की परम्परा का - भाषा है, भाष्य नहीं।

तो उस पर टीपते हुए पाठक कहते हैं ,"

  1. भयंकर टाइप माहौल बनाती कविता; यदि इसे कविता ही कहा जाए तो...
  2. पथ में रथ के पहिये चाहे न घूमें,
    पर धरती फिर भी घूम रही है।
  3. रक्तरंजित हाथों और घायल हृदय से ही होता है उत्कृष्ट लेखन!
    मुट्ठियाँ उतनी ही खोलिए जितनी समय की ज़रूरत और विवेक की अनुमति है..शब्दों का क्या है वे कसमसाते रहते हैं.


किसी दिन का महत्व क्या है ये हमें बखूबी याद दिलाते हैं भाई शिवम मिश्र आज अपनी पोस्ट में वे बताते हैं कि ,

३ महान विभूतियों के नाम है आज का दिन

आज ३१ जुलाई है ... आज का दिन हमारे देश की  ३ महान विभूतियों के नाम है ... 

एक है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक , दुसरे है अमर शहीद उधम सिंह और तीसरे  है मुंशी प्रेमचंद

पेश है ३  पोस्ट के लिंक्स जो आपको इन विभूतियों के बारे में और भी जानकारियां देंगी !

पोस्ट पर जाकर  देखिए कि वे कौन सी तीन पोस्टें हैं ।

आमिर खान के शो सत्यमेव जयते ने अपना पहला सीज़न खत्म कर लिया । इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय टेलिविज़न के इतिहास के उन धारावाहिकों , जिन्होंने दर्शकों ,समाज और सरकार तक को प्रभावित करने में सफ़लता प्राप्त की , में से एक नि:संदेह ये धारावाहिक भी रहा । अजय ब्रहात्मज अपनी पोस्ट में खुद आमिर की भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहते हैं ,

"मैं अकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है।"


बीते दिनों , हरियाणा के मानेसर में मारुति कंपनी में कार्यरत मजदूरों ने जिस तरह अपना आपा खोते हुए कंपनी के एक अधिकारी की हत्या तक कर डाली उस घटना ने भविष्य के लिए एक दस्तक दे दी है । इसी घटना पर लिखते हुए दिलीप खान कहते हैं ,
"
मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें विकास-विरोधी नज़रिया दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि गुड कंडक्ट फॉर्म भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। गुड कंडक्ट फॉर्म का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।"
मानेसर का मारुति-सुज़ुकी प्लांट
आइए अब कुछ रैपिड फ़ायर राउंड पोस्टों को देखा पढा जाए
अब ये खिडकियां बंद रहती हैं :   बरसात की वजह से टाईट हो गई होंगी


नीक दिन भी आइहैं :    मुदा के लईहैं



आओ लॉगिन करें :   बत्ती गुल हो तो कैसे करें


बालों को झडने से रोकने के कुछ ये हैं कुछ खास तरीके :   गंजे होने से पहले फ़ौरन ही सीखें


नकारात्मक सोच क्या वास्तव में गलत है :      पोस्ट पढ कर ही फ़ैसला करें


बिलखती नार :   से रहें हुसियार


अन्ना का अनशन असफ़ल क्यों : सत्ता का भ्रष्टाचार सफ़ल क्यों


वोट बैंक की खातिर :   मंतरी जी हैं हाज़िर


उस एक क्षण में :  क्या न हो जाए


मीरासियों के वारिस :   कौन कौन कौन


सत्ता के विरोध से आगे :  अवाम अब भी क्यों न जागे


मिसफ़िट ब्लॉग को मिला सम्मान :   मुबारक को आपको बहुत सीरीमान


लखनऊ में जुटेंगे ब्लॉगिंग के महारथी : हम भी टिकस बुकिंग कराएं क्या

निंदा करना जरूरी है क्या :   अब आदत हो जाए तो क्या करें 









आज की कविता ,

वृक्ष बोला...

अपना सारा फल देकर
वृक्ष मुस्कुराया
और उमंग में भरकर
उसने कोमल टहनियों को ऊपर उठाया;
जैसे अपने हाथ उठाकर
सिरजनहार को धन्यवाद दे रहा हो,
कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हो
और भार-मुक्त करने के लिए
आभार व्यक्त कर रहा हो !

मैंने पूछा--'हे वृक्ष !
अपना सब कुछ देकर
तुम खुश कैसे होते हो ?
क्या अन्दर-अन्दर रोते हो ?

वृक्ष दृढ़ता से बोला-- 'नहीं,
त्याग से मुझे सुख मिलता है,
संतोष मिलता है
और मुझे अपनी पात्रता का बोध होता है;
मैं तो अपने फल लुटाकर
परितृप्त होता हूँ
और सुख की नींद सोता हूँ !
तुम भी अपने मीठे-कड़वे
कृमी-कीट लगे फल त्यागो --
सुख पाओगे,
संपदा की गठरी बांधे रखोगे,
तो लुट जाओगे !!'
और एक ताज़ा ताज़ा कार्टून गोदियाल जी की कूची से ,

कार्टून कुछ बोलता है - ग्रिड फेल हो गए !


तो चलिए आप इन बेहतरीन पोस्टों को बांचिए , पढिए और टीपीए , और तब तक इज़ाज़त दीजीए अपने इस ब्लॉग खबरी को

शुभ रात्रि , शब्बा खैर , अपना ख्याल रखिए और लिखते पढते रहिए ।
आपका ब्लॉग रिपोर्टर
अजय कुमार झा

रविवार, 29 जुलाई 2012

भिक्षावृत्ति मजबूरी नहीं बन रहा है व्यवसाय - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

पहले के जमाने में लोग बहुत ही मजबूरी में शर्म से निगाह नीचे करके भिक्षा मांगने जाते थे और भिक्षा भी इतनी जिससे उनका गुजारा हो जाये। मगर आज के इस समय में भिक्षावृत्ति फायदे का व्यवसाय बन गया है। लोग मजबूरी में नहीं फायदे के लिये भिक्षा मांग रहे हैं और शर्म से निगाह नीचे करके नहीं बल्कि अकड़ के ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करके भिक्षा मांगते हैं कि इनकी बातों से अनायास ही गुस्सा आ जाये। जैसे मालिक ने दिया है वही देगा। दाता देने वाला तो बुलाकर देता है। जो खुद नहीं खा सकते वह भला किसी को क्या खिलायेंगे। अगर मैं अपने ग्रहनगर मैनपुरी की ही बात करूँ तो यहाँ तमाम ऐसे भिखारी हैं जो एटा, छिबरामऊ तथा फर्रुखाबाद, मैनपुरी आदि शहरों से आकर यहां भिक्षा मांगते हैं। सबसे ज्यादा मुस्लिम भिखारियों की संख्या है। यह जहां हिन्दू आबादी है वहां हिन्दू देवी-देवताओं के नाम पर तथा मुस्लिम आबादी में खुदा के नाम पर भिक्षा मांगते हैं। अनेक महिलाएं भी इस धंधे में लिप्त हैं। जो आदिवासी गिहार जाति की हैं। जो दो-दो या तीन-तीन की टुकड़ी में मुहल्लों में जाकर तब भिक्षा मांगती हैं जब अधिकांश पुरुष अपने काम पर चले जाते हैं। यह मीठी, चिकनी, सुपड़ी बातें करके गृहणियों पर अपना जाल बिछाती है कि बहन मेरे छोटे बच्चे हैं इन्हें पुराने कपडे़ दे दो, अपने लिये साड़ी खाने के लिये भोजन, फिर भिक्षा में आटा तथा नकदी भी पांच-दस रुपये लेकर चलती बनती हैं।
बेवर के पास लालापुर ग्राम के पास ऐसे हरवोला जाति के लोग सदियों से भिक्षावृत्ति करते आ रहे हैं। यह सभी साधु वेष में भिक्षा मांगते हैं। साधु भी 12-13 वर्ष से लेकर 80 वर्ष तक के। प्रात: तड़के यह चन्दन का बढि़या तिलक लगाकर बाहों तथा गले में चंदन का लेप लगाकर पीले वस्त्र पहनकर झोली डालकर, डण्डा पकड़ कर, शंख या घंटी बजाते हुये कस्बा तथा ग्रामीण क्षेत्र में भिक्षा मांगने निकल जाते हैं। सबसे दुखद पहलू यह है कि छोटे-छोटे बच्चे जिन्हें स्कूल में शिक्षा ग्रहण करके एक अच्छा नागरिक बनना चाहिये। उनके मां-बाप इन बच्चों को स्कूल भेजने के बजाये भिक्षा मांगने भेज देते हैं।
आशा है प्रशासन केवल नाम के लिए ही 'स्कूल चलो - स्कूल चलो' नहीं कहेता रहेगा बल्कि इन लोग को भी मुख्य धारा में जोड़ने का प्रयास करेगा |
 
सादर आपका 
 

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(ब)वाल 
 
कैसा बिता  

सब से जरूरी यही तो है 
 
रोया होगा किसी बात पर 
 
का क्या है हिसाब 
 
जब तक संभव हो 
 
अब आपकी पोस्ट मे कैद है 

बधाइयाँ 
 
अच्छा 
 
सच बड़ी मुश्किल है 

क्या हुआ 
 
आप बताए इस से कैसे निजात पाये 
 
रेडी ...१ ...२ ...३ ...
 
आजकल नहीं मिलती 
 
जी जो आज्ञा 
 
हर हर गंगे 
 
सोच गहरी हो जाये तो इरादे कमजोर हो जाते है 
 
किसको जी किसको 
 
आप मिले इनसे 
 
इंतज़ार करें आप कतार मे है 
 
शत शत नमन 
 
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अब आज्ञा दीजिये ...
 
जय हिंद !!

शनिवार, 28 जुलाई 2012

रेलवे है सबसे बड़ा खुला टॉयलेट... ब्लॉग बुलेटिन

रेलवे हमेशा खबरों में रहती है... देश की लाईफ़ लाईन जो है... हमेशा चलनें वाली... कभी न रुकनें वाली.... छुक छुक गाडी.... आईए तो आज रेलवे को समर्पित यह बुलेटिन में दो खबरें....

रेलवे है सबसे बड़ा खुला टॉयलेट... यह कहना है केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जी का... सच है या नहीं, लेकिन फ़िर भी सरकारी मंत्री का यह बयान बहुत कुछ कहता है... रेलवे की बदहाली और केन्द्र सरकार का रवैया भी किसी से छुपा नहीं है। योजना आयोग पैतीस लाख का शौचालय बनवाता है और पैसे की कमी का रोना रोता है। तो ऐसे में देश की ग्यारह लाख की आबादी जो मंत्री जी के हिसाब से खुले में शौचालय करता है वह जाए तो जाए किधर.... रेलवे को जैव-शौचालय लगवानें हैं लेकिन उसके लिए पैसा नहीं है। चलिए रेलवे की बदहाली को छोड दिया जाए और एक और रोचक खबर पर नज़र डालें...

गया-मुगलसराय रेलखण्ड के कुमहु स्टेशन के पास एक ईंडिगो कार चालक अपनी गाड़ी हवा की रफ्तार में शुक्रवार की दोपहर फोर कॉरिडोर रेल लाइन के लिए बनाई गई निर्माणाधीन लेन पर दौड़ा रहा था। इसी बीच उसे पता नहीं क्या सुझा कि वह गाड़ी को मेन रेलवे ट्रैक की ओर मोड़ दिया। मंशा यही थी कि अब इसे लोहे की पटरियो पर दौड़ाया जाये। रेल पटरियों पर चढ़ते ही गाड़ी के निचले हिस्से बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गये और गाड़ी वहीं थम गई। डाउन लाइन पर घटी इस घटना के ठीक बाद आ रही मालगाड़ी के चालक ने दूर से ही रेलवे ट्रैक पर दुर्घटनाग्रस्त हुई इंडिगो को देख लिया। उसके बाद उसने इमरजेंसी ब्रेक लगा कर गाड़ी रोक दी, जिससे एक बड़ी दुर्घटना टल गयी। इधर घटना के बाद इंडिगो का चालक और दो अन्य युवक घटनास्थल से भाग खड़े हुए जो जख्मी भी थे। रेल कर्मियों ने ट्रैक की मरम्मती की तब जाकर एक घंटे बाद रेल परिचाल शुरू हो सका। इस दौरान डाउन लाइन का परिचालन ठप था।  हद है न..... हम कहते हैं न भारत महान है और भारतीय रेलवे भारत का एक सही रुप है। 

आईए रेलवे से जुडे अन्य तथ्यों पर भी विचार किया जाए....कुल सवा लाख किलोमीटर का नेटवर्क... ७५०० स्टेशन और दुनियां की चौथी सबसे बडी रेल प्रणाली.. और तो और भारतीय रेलवे दुनियां की चौथी सबसे बडी कम्पनी भी है। चौदह लाख से भी अधिक कर्मचारियों के साथ वह दुनियां की चौथा सबसे बडा इम्प्लायर भी है। तो फ़िर इतनें बडे नेटवर्क होनें के कारण गडबडियों की बहुत बडी गुंजाईश होती है। सरकार का हर मंत्री रेलमंत्री बनाए जानें के ख्वाब देखता है,  ताकि फ़ायदे की मलाई आराम से खा सके....  

चलिए मेरा भारत महान और मेरे भारत की रेलवे और भी महान.... और हां जनता तो सबसे महान है ही.... 



भारत की रेल का यह चित्र तो सभी नें देखा है.... लेकिन अब एक नज़र पाकिस्तानी रेल पर भी डाली जाए... 


जी बिल्कुल पाकिस्तान की हालत से तो हमारी हालत बेहतर ही है.... हम रेल में धक्के खाते हैं, धक्के लगाते नहीं हा हा....

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लीजिए आज का बुलेटिन...
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आखिरी खत Piyush k Mishra at Mera Panna 

लाल स्याही से तुम्हारे नाम लिखा एक अधूरा खत- "गुलमोहर के पेड़ों पर जब फूल आते हैं- तुम बहुत याद आते हो..." *गुलमोहर के पेड़ों पर* *जब फूल आते हैं* *तुम बहुत याद आते हो !*
 
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अंग्रेज सौदागर भारतीय कारीगरों को लुटते थे Suman at लो क सं घ र्ष ! 

*बुनकरों का संग्राम ...............1777--------------- 1800* *क्या आज के दौर में देशी व विदेशी कम्पनियों के लूट ने ठीक वही काम नही किया है? क्या वर्तमान समय में ये कम्पनिया लागत बढाने के साथ -- साथ बड़े उद्योगों के देशी व आयातित विदेशी मालो सामानों से बुनकरों का उत्पादन व बाजार नही छीन रही है ? बुनकरों एवं अन्य दस्तकारो को साधनहीन नही बना रही है ? बिलकुल बना रही है क्या आज बुनकर व अन्य मेहनतकश समुदाय बुनकरों के उस संघर्ष से प्रेरणा लेगा ? क्या वह वैश्वीकरणवादी नीतियों , संबंधो का विरोध भी संगठित रूप में करने का प्रयास करेगा ? जिसकी आज तात्कालिक पर अनिवार्य आवश्यकता सामने कड़ी हो चुकी... more »

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कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ? rajendra tela at "निरंतर" की कलम से..... 

कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ? पर ना भी कैसे कहूँ? समझ नहीं पाता हूँ झंझावत में फंसा हूँ रिश्तों के बिगड़ने का खौफ दुश्मनी मोल लेने का डर मुझे ना कहने से रोकता है कैसे उसूलों को तोडूँ मन को दुखी कर के हाँ कहूँ दुविधा में फंसा हूँ क्यों ना एक बार नम्रता से ना कह दूं सदा के लिए दुविधा से मुक्ती पा लूँ कुछ समय के लिए लोगों को नाराज़ कर दूं समय के अंतराल में सब समझ जायेंगे आदत समझ कर भूल जायेंगे मेरा मन खुश रहेगा फिर हाँ ना के झंझावत में नहीं फंसेगा 03-06-2012 557-77-05-12 (जीवन में अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब इंसान ना कहना चाहता है,पर रिश्तों में कडवाहट के डर से घबराता है ,और अनुचित... more »

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मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं   Kulwant Happy "Unique Man" at युवा सोच युवा खयालात

मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं गैरों से नहीं अपनों से ही डरता हूं मैं शिकारी बैठे हैं ताक में यहां यही सोच के बहुत ऊँचा उड़ता हूं मैं मुझे है अपनी मंजिल की तलाश उसे ही हर पल ढूंडता हूं मैं वक़्त की परवाह नहीं है मुझको वक़्त से भी तेज़ दौड़ता हूं मैं रास्ता बहुत ही कठिन है मेरा यही सोच सब कुछ करता हूं मैं उम्मीद का दामन थामा है मैंने उम्मीद से ही उम्मीद करता हूं मैं मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं गैरों से नहीं अपनों से ही डरता हूं मैं अमित राजवंत के फेसबुक खाते के सौजन्‍य से

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"घास खाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) at उच्चारण 

*हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।*** *लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।*** *मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में बैठकर.*** *भाषणों से खेत में, फसलें उगाना जानते हैं।*** *कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के वास्ते,*** *रात-दिन हम, रासलीला को रचाना जानते हैं।*** *राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,*** *हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।*** *देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,*** *गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।*** *सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये बहुरूपिये,*** *छद्मरूपी **“**रूप**” **से, दौलत कमाना जानते हैं।*

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मनोरमा at इन्द्रधनुष

ताक़त के तीन हिस्से कलह और गुटबाज़ी से जूझ रही कर्नाटक भाजपा का राजनीतिक संकट फ़िल हाल टल गया है लेकिन येदियुरप्पा की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हुए सदानंद गौड़ा का गुट फिर से राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है। *मनोरमा* की रिपोर्ट( द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित ) कर्नाटक में भाजपा का संकट अभी खत्म होता नहीं लगता। सरकार बचाने और चलाने की जद्दोजहद में ही अगला विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, जिसमें मात्र ग्यारह महीने ही बचे हैं। चार साल के अंतराल में राज्य में तीसरे मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले हैं। दरअसल, कर्नाटक भाजपा इन दिनों व्यक्तिगत अहम, कलह और गुटबाजी की राजनीति से जूझ रही है। मौजू... more »

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दिक् शूल  प्रतुल वशिष्ठ at दर्शन-प्राशन

सोम-शनि है प्राची प्रतिकूल दिवस रवि का उसके अनुकूल. प्रतीची में मंगल-बुध जाव शुक्र-रवि में होवें दिकशूल. उदीची में बुध-मंगल भार शुक्र शुभ होता शुभ गुरुवार. अवाची को जाना शनि-सोम गुरु को चलना शकुन-विलोम. ______________ उदीची - उत्तर दिशा अवाची - दक्षिण दिशा प्राची - पूर्व दिशा प्रतीची - पश्चिम दिशा मैं इस कविता को देना नहीं चाहता था.... क्योंकि अब मैं इस विचारधारा से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि 'दिकशूल' जैसा कुछ होता है.... ये कोरा अंधविश्वास है... जब ये रचना बनायी थी. तब मैं दिकशूल से बहुत प्रभावित रहता था.

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खबरगंगा: 'डायन' : औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका   Devendra Gautam at All India Bloggers' Associationऑल इंडिया ब्लॉगर्स एसोसियेशन

वे बचपन के दिन थे ....मोहल्ले में दो बच्चों की मौत होने के बाद काना-फूसी शुरू हो गयी और एक बूढी विधवा को 'डायन' करार दिया गया...हम उन्हें प्यार से 'दादी' कहा करते थे...लोगो की ये बाते हम बच्चों तक भी पहुची और हमारी प्यारी- दुलारी दादी एक 'भयानक डर' में तब्दील हो गयी... उनके घर के पास से हम दौड़ते हुए निकलते कि वो पकड़ न ले...उनके बुलाने पर भी पास नहीं जाते ...उनके परिवार को अप्रत्यक्ष तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया ....आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे बदले व्यवहार ने उन्हें कितनी 'चोटे' दी होंगी ...और ये सब इसलिए कि हमारी मानसिकता सड़ी हुई थी....जबकि हमारा मोहल्ला बौद्धिक (?) तौर पर ... more »

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शाहिद सिद्दीकी सपा से बाहर निकाले गए.   Kusum Thakur at आर्यावर्त

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के बाद आज समाजवादी पार्टी के नेता शाहिद सिद्दीकी को सपा से बाहर कर दिया गया है. इस से पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने संकेत दिए हैं कि शाहिद सिद्दीकी को पार्टी से निकाला जा सकता है. रामगोपाल यादव ने अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ से कहा है कि मोदी का जिस तरह से उन्होंने साक्षात्कार किया है, उसे पार्टी गंभीरता से ले रही है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों उर्दू अख़बार नई दुनिया के संपादक के तौर पर शाहिद सिद्दीकी ने नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया था. यह साक्षात्कार बहुत ... more »

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आयाम बिंधने के   वन्दना at ज़ख्म…जो फूलों ने दिये 

कभी कभी बिना बिंधे भी बिंध जाता है कहीं कुछ सूईं धागे की जरूरत ही नहीं होती शब्दों की मार तलवार के घाव से गहरी जो होती है मगर कभी कभी शब्दों की मार से भी परे कहीं कुछ बिंध जाता है और वो जो बिंधना होता है ना शिकायत से परे होता है क्या तो तलवार करेगी और क्या शब्द नज़र की मार के आगे बिना वार किये भी वार करने का अपना ही लुत्फ़ होता है ........है ना जानम !!!!

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एक हज़ार हिन्दुओं का क़त्ल करो--राजदीप सरदेसाई   ZEAL at ZEAL

*हमारे देश में विक्षिप्त मानसिकता वाले भांडों की कमी नहीं है। राजदीप जैसे ज़मीर का सौदा कर चुके आतंकवादियों का बयान देखिये- " पहले एक हज़ार हिन्दुओं का क़त्ल करो, फिर newz दिखाउंगा अपने चैनल पर"।* *अगर अपने वतन से थोडा भी प्यार करते हैं तो पढ़िए ब्लॉगर विष्णुगुप्त द्वारा लिखे इस महत्वपूर्ण आलेख को*। ---------------------------------------------- *राष्ट्र-चिंतन* *विष्णुगुप्त की कलम से* आईबीएन सेवन के चीफ राजदीप सरदेसाई की असम दंगे पर एक खतरनाक,वीभत्स, रक्तरंजित और पत्रकारिता मूल्यों को शर्मशार करने वाली टिप्पणी से आप अवगत नहीं होना चाहेंगे? राजदीप सरदेसाई ने असम में मुस्लिम दंगाइयों द्व... more »

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एक नन्हा जंगली फूल   डॉ॰ मोनिका शर्मा at परवाज़...शब्दों के पंख 

नन्हा फूल जो चुन लाया चैतन्य बच्चों के मन की संवेदनशीलता और सोच को आँक पाना हम बड़ों के लिए असंभव ही है । आमतौर पर बड़े बच्चों के विषय में सोचते रहते हैं कि उनके लिए क्या लायें....? उन्हें क्या दिलवाएं...? ये बात और है कि ये नन्हें- मुन्हें जो करना चाहते हैं उसके लिए शायद हमारे जितना सोचते नहीं पर हम भी हरदम उनके मन में तो ज़रूर बसते हैं । चैतन्य आज एक नन्हा सा जंगली फूल ले आया । उसे लगता है कि उसकी पसंदीदा एक प्यारी सी कार्टून करेक्टर की तरह माँ भी अपने बालों में फूल लगाये । उसको यह सूझा मुझे इस बात ने चौंकाया तो ज़रूर पर ख़ुशी भी बहुत मिली । आज दो क्षणिकाएँ मेरे आँगन के न... more »

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हैप्पी बर्थड़े ... पापा ... :-)  शिवम् मिश्रा at बुरा भला 

*हैप्पी बर्थड़े ... पापा ... :-)* 

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कवि ने सिर तुड़वाया पर सम्मान नहीं खोया (Ratan singh shekhawat) at ज्ञान दर्पण 

अक्सर लोग चारण कवियों पर आरोप लगा देते है कि वे राजपूत वीरों की अपनी रचनाओं में झूंठी वीरता का बखाण करते थे पर ऐसा नहीं था| राजपूत शासन काल में सिर्फ चारण कवि ही ऐसे होते थे जो निडर होकर अपनी बात अपनी कविता में किसी भी राजा को कह डालते थे| यदि राजा ने कोई गलत निर्णय भी किया होता था तो उसके विरोध में भी चारण कवि राजा को हड़काते हुए अपनी कविता कह डालते थे| ऐसा ही एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है जो साफ जाहिर करता है कि चारण कवि निडर होकर राजाओं को कविता के माध्यम से लताड़ भी दिया करते थे, यही नहीं अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए और अपने सम्मान की रक्षा के लिए वे अपने प्राणों की भी परवा... more » 

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मूठ / मुंशी प्रेमचंद  संगीता स्वरुप ( गीत ) at राजभाषा हिंदी

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मुंशी प्रेम चंद की कहानी मूठ डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य ही कहिए या व्यावसायिक सिद्धान्तों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका घर सँकरी गली में था; पर उनके जी में खुली जगह में घर लेने का विचार तक न उठा। औषधालय की आलमारियाँ, शीशियाँ और डाक्टरी यंत्र आदि भी साफ-सुथरे न थे। मितव्ययिता के सिद्धांत का वह अपनी घरेलू बातों में भ... more »

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विकास हलवाई झूलेवाला   Gyandutt Pandey at मानसिक हलचल - halchal.org 

कल था शिवकुटी का मेला। हर साल श्रावण मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को होता है यह। एक दिन पहले से झूले वाले आ जाते हैं। नगरपालिका के लोग सड़क सफ़ाई, उनके किनारे चूना बिखेरना, सड़क पर रोशनी-पानी की व्यवस्था करना आदि करते हैं। पुलीस वाले अपना एक अस्थाई नियन्त्रण कक्ष बनाते हैं। दो साल [...]

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स्वर्ग मही का भेद प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम् 

स्वर्ग का नाम आते ही उसके अस्तित्व पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं, गुण और परिभाषा जानने के पहले ही। यद्यपि सारे धर्मों में यह संकल्पना है, पर उसके विस्तार में न जाते हुये मात्र उन गुणों को छूते हुये निकलने का प्रयास करूँगा, जिनसे उर्वशी और उसकी प्रेम भावनायें प्रभावित हैं। इस प्रेमकथा में स्वर्ग से पूरी तरह से बच पाना कठिन है क्योंकि इसमें प्रेम का आधा आधार नर और नारी के बीच का आकर्षण है, और शेष आधार स्वर्ग और मही के बीच के आकर्षण का। स्वर्ग और मही के आकर्षण की पहेली समझना, प्रेम के उस गुण को समझने जैसा है जिसमें परम्परागत बुद्धि गच्चा खा जाती है। अच्छे कर्म और परिश्रम करने से स्वर्ग... more » 

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 पाखी की बिल्ली   Akshitaa (Pakhi) at पाखी की दुनिया 
(लीजिये पढ़िए संजीव वर्मा 'सलिल' दादा जी का लिखा एक बाल-गीत "पाखी की बिल्ली") पाखी ने बिल्ली पाली. सौंपी घर की रखवाली. फिर पाखी बाज़ार गयी. लाये किताबें नयी-नयी. तनिक देर जागी बिल्ली. हुई तबीयत फिर ढिल्ली. लगी ऊंघने फिर सोयी. सुख सपनों में थी खोयी. मिट्ठू ने अवसर पाया. गेंद उठाकर ले आया. गेंद नचाना मन भाया. निज करतब पर इठलाया. घर में चूहा आया एक. नहीं इरादे उसके नेक. चुरा मिठाई खाऊँगा. ऊधम खूब मचाऊँगा. आहट सुन बिल्ली जागी. चूहे के पीछे भागी. झट चूहे को जा पकड़ा. भागा चूहा दे झटका. बिल्ली खीझी, खिसियाई. मन ही मन में पछताई. अगर न दिन में सो जाती. खो अवसर ना पछताती. ******

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गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा   ब्लॉ.ललित शर्मा at ललितडॉटकॉम 

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यूधरती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं। चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रा... more »

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 आप तो मनुष्य है ना ........................ आज एक कुत्ता अपने बच्चे को जो बार दौड़ कर सड़क पर चला जाता था , उसको मुह से पकड़ कर ले आता था और अगर कोई वाहन आता दिखाई पड़ जाता तो उसकी तरफ जपत उठता मानो कह रहा हो ...जानते नही यह मेरा बच्चा है कोई आदमी का नही जो सालो से कोर्ट इस लिए दौड़ता है कि उसका बाप उसको अपनी औलाद मानने को तैयार नही है ...............खैर हमको पता है आज तक किसी आदमी ने कुत्ते को भूल से भी आदमी नही कहा होगा क्योकि हम अपने से किसी जानवर की तुलना कर भी कैसे सकते है ...............कुत्तो का अनाथलय कही आपको पता है ..पुरे मन से तन से जीते अपने बच्चो के लिए .जब तक रहते है दुन... more »
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आखिर लडकियाँ अपने साथी (प्रेमी या पति) में कौन सी खूबियाँ देखना चाहतीं हैं...  अदा at काव्य मंजूषा -

प्यार, इश्क, मोहब्बत इन शब्दों में, एक अलग सी धनक होती है । कोई, किसी भी उम्र में हो, मन रूमानी ख्यालों से भर उठता है । इश्क का असर कुछ ऐसा होता है, कि दुनिया खूबसूरत हो जाती है। मौसम रंगीन और समा बस सुहाना-सुहाना हो जाता है। प्यार के इस रंगीन एहसास को महसूस करने के लिए जरुरत होती है, एक अदद उस शख्स की, जिसे देख कर दिल बरबस बोल उठता है, यही तो है वो, जिसका मुझे इंतजार था। मुझे नहीं मालूम.......
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आशा है की आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा.... कल फ़िर मिलेंगे... तब तक के लिए देव बाबा को इजाजत दीजिए..
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शुक्रवार, 27 जुलाई 2012

यह २०१२ का भारत है... ब्लॉग बुलेटिन

दो सौ रुपये... आखिर क्या कीमत है इन दो सौ रुपयों की.... यकीन मानिये बहुत बडी कीमत है दो सौ रुपये की... एक जान चली जाती है दो सौ रुपयों में... जी हाँ यह २०१२ का भारत है... आज़ाद भारत है.. आइये इस भारत को ध्यान से देखते हैं... पंजाब का जालंधर शहर, सरकारी सिविल अस्पताल ... एक नवजात बच्ची का जन्म होता है... और बच्ची को पैदा होने के बाद इन्क्युबेटर पर रखा जाना था... कीमत मांगी गयी दो सौ रूपये...  लेकिन दिहाड़ी मजदूर पिता अपनी बच्ची के लिए दो सौ रूपये जमा नहीं करा पाया.... और अस्पताल प्रशासन बच्ची को लाइफ सपोर्ट सिस्टम से हटा देता है... और बच्ची की जान चली जाती है.... जी हाँ यह वाकई २०१२ का भारत है... फिर ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की भेड़ चाल शुरू होती है.. अस्पताल अपनी ज़िम्मेदारी से भागते हैं.. मुख्यमंत्री जांच का भरोसा देते हैं.. लेकिन... क्या वाकई कुछ होगा? उम्मीद नहीं... जी हाँ यह वाकई २०१२ का भारत है... 




आईए अब आपको देश की राजधानी दिल्ली दिखाते हैं.... तीन नौजवानों ने खुद को एलआईसी एजेंट बताकर मैजिक पेन की मदद से बुजुर्ग से २०० रुपयों का चेक लिया, लेकिन हेरा फ़ेरी करके... खाते से ९० हजार रुपये निकाल लिए। जी हाँ यह वाकई २०१२ का भारत है.... 

इस चकाचौंध... इस चमचमाती हुई समझदार आर्थिक तरक्की महज़ एक छलावा है, और इसकी आड में क्या यही २०१२ का भारत है? सरकार की तरफ़ देखिए तो एक तिहाई मंत्रिमंडल दागदार हैं, कॄषि मंत्री व्यस्त हैं क्योंकी उन्हे दो नम्बर चाहिए... मंहगाई की तरफ़ देखनें और सच्चाई का सामना करनें को कोई तैयारी नहीं है...  क्या कहियेगा। फ़िर एक खबर आती है तिवारी जी छियासी साल में पापा बन गये.... शर्मनाक!! और सामाजिक स्थिति आखिर क्या बनी... जी हाँ बिल्कुल यह वाकई २०१२ का ही भारत है....

इस भारत में जिधर महज़ दो सौ रुपयों के लिए जान चली जाती है, सरकारी अस्पताल बदहाली पर रोते हैं... सरकार बजट का रोना रोती है... और वहीं करोडो रुपये कसाब पर खर्चे जाते हैं... सरकारी बाबूओं की मौज बनी रहे उसके लिए पैसा पानी की तरह बहाया जाता है.... 

ज़रा सोचिए... पन्द्रह अगस्त नज़दीक है... लेकिन क्या वाकई इस २०१२ के इस आज़ाद भारत की आम जनता को आज़ादी मिली है... अदम गौंडवी साहब की चंद पंक्तिंयां.... 

आजादी का वो जश्न मनायें तो किस तरह
जो आ गए फुटपाथ पर घर की तलाश में

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चलिए आज के बुलेटिन की तरफ़ चलें... एक लाईना
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नेग और ब्याज :- जी बिल्कुल... अब इसी की कसर बाकी थी....

कलयुग की सत्यनारायण कथा .  :- जी वाकई यह २०१२ के हिन्दुस्तान की कहानी है



मैं :- कितना खतरनाक होता है न यह मैं...

स्तालिन युग’’: अन्ना लुर्डस्ट्रांग :- पढना अच्छा लगा... देखते हैं अन्ना का क्या होता है..






अगस्त में जुटेंगे ब्लॉगिंग के महारथी :- भाई कोई देव बाबा को भी इन्भिटेशन भेजो...

ईश्वर :- अनन्त है

सच क्या है ? :- भगवान जानें सच क्या है...

घर की खामोशी  :- वो अफ़साना जिसे अंज़ाम तक लाना न हो मुम्किन... उसे एक खूबसूरत मोड देकर छोडना अच्छा...

केजरीवाल...:- टीम अन्ना




हम तेरे शहर में हैं...अनजाने,बिन तेरे कौन हम को पहचाने... :- हर कोई अकेला ही तो है इस अनजान से शहर में...


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मित्रों आशा है आज का बुलेटिन आपको पसन्द आया होगा.... कल फ़िर मिलेंगे... 
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गुरुवार, 26 जुलाई 2012

कारगिल विजय दिवस 2012 - बस इतना याद रहे ... एक साथी और भी था ... ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

आज 26 जुलाई है ... आज के दिन को हम लोग 1999 कारगिल युद्ध विजय दिवस के रूप मे भी मनाते है !

भारत और पाकिस्तान के बीच दुनिया के सबसे ऊंचे रणक्षेत्र में हुए कारगिल युद्ध के बारे में कई रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यदि हमने इसके सबक को गंभीरता से लिया होता तो मुंबई पर  26 /11 को हुए हमले जैसे हादसे नहीं हुए होते। और रक्षा मामलों में हमारी सोच ज्यादा परिपक्व होती।
कारगिल युद्ध के महत्व का जिक्र करते हुए रक्षा विश्लेषक एवं नेशनल मैरीटाइम फाउंडेशन के निदेशक सी उदय भास्कर ने कहा कि यह युद्ध दो परमाणु शक्ति संपन्न देशों के बीच हुआ। यह युद्ध चूंकि मई 1998 में पोखरण परमाणु विस्फोट के बाद हुआ था, लिहाजा पूरी दुनिया की निगाहें इस पर टिकी थी और भारत ने इसमें स्वयं को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति साबित किया।
भास्कर ने एक बातचीत में कारगिल विजय को भारत की सामरिक जीत करार देते हुए कहा कि अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में इसके परिणामस्वरूप दो बातें सामने आईं। पहली तो पाकिस्तान की अंतरराष्ट्रीय साख विशेषकर आतंकवाद को शह देने के कारण काफी खराब हुई। दूसरा कारगिल युद्ध के बाद भारत और अमेरिका के रिश्तों में मधुरता का एक नया दौर शुरू हुआ।
कारगिल युद्ध से सीखे सबक के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि इस युद्ध को 13 साल बीतने के बाद भी हमने इससे कोई सबक नहीं लिया। इस तरह के युद्ध लड़ने के लिए सेना को जिस तरह के ढांचे की जरूरत है, वह आज तक मुहैया नहीं हो सकी है। इसका कारण बहुत हद तक लालफीताशाही है। भास्कर ने कहा कि कारगिल युद्ध की जांच के लिए समितियां बनीं, लेकिन उनकी सिफारिशों पर न तो पूर्व की राजग सरकार और न ही मौजूदा संप्रग सरकार ने कोई गंभीर काम किया। भास्कर ने भी इस बात को स्वीकार किया कि कारगिल युद्ध का एक बहुत बड़ा कारण हमारी खुफिया तंत्र की विफलता था। उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध में हुई गलती से हमने कोई सबक नहीं लिया और इसी कारण मुंबई में 26/11 के आतंकी हमले हुए। रक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि मुंबई हमला 'समुद्री कारगिल' था। रक्षा विशेषज्ञ और इंडियन डिफेंस रिव्यू पत्रिका के संपादक भरत वर्मा के अनुसार कारगिल युद्ध से मुख्य तीन बातें सामने आईं। राजनीतिक नेतृत्व द्वारा निर्णय लेने में विलंब, खुफिया तंत्र की नाकामी और रक्षा बलों में तालमेल का अभाव। उन्होंने कहा कि कारगिल के सबक को यदि हमनें गंभीरता से नहीं लिया तो मुंबई जैसे आतंकी हमले लगातार जारी रहेंगे।
उन्होंने कहा कि कारगिल युद्ध के दौरान दुश्मन हमारी जमीन में अंदर तक घुस आया, लेकिन हमारे राजनीतिक नेतृत्व ने पाकिस्तान में स्कार्दू में प्रवेश कर घुसपैठियों की आपूर्ति को रोकने का निर्णय नहीं किया। यदि हमारा नेतृत्व यह फैसला करता तो इसके दूरगामी परिणाम होते, क्योंकि हम दुश्मन की जमीन में प्रवेश कर जाते और यह उसके लिए आगे तक एक सबक साबित होता, लेकिन हमारे नेतृत्व ने ऐसा नहीं किया और तर्क दिया कि पड़ोसी देश की सीमा में घुसने से युद्ध और लंबा खिंच जाएगा। वर्मा ने कहा कि कारगिल युद्ध के दौरान तीनों सेनाओं के बीच तालमेल का अभाव भी देखा गया, जिसके कारण वायुसेना का हस्तक्षेप थोड़ी देर से हुआ। अगर यह काम पहले हुआ होता तो मरने वाले सैनिकों की संख्या कम होती। कारगिल युद्ध के बारे में बनाई गई समिति की रिपोर्ट की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि इसकी करीब 2,000 पृष्ठों की रिपोर्ट का भी हश्र लगभग वही हुआ जो अन्य जांच समितियों का होता है। इस पर कोई गंभीर बहस नहीं की गई। सेना में हथियारों की खरीद प्रक्रिया सहित स्थितियां आज भी जस की तस हैं।
वर्मा ने कहा कि आज इस बात की बेहद जरूरत है कि हम अपनी शिक्षा में भारत के आधुनिक युद्धों के इतिहास को पढ़ाएं, ताकि आने वाली पीढ़ी सैन्य रणनीतियों के बारे में बुनियादी बातें समझ सके। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों के विपरीत आज हमारे राजनीतिक नेतृत्व में ऐसे लोगों का बेहद अभाव है जो सैन्य रणनीतियों के बुनियादी तथ्यों से अवगत हों। उन्होंने कहा कि जब हमारे बच्चे पानीपत की लड़ाई के बारे में पढ़ सकते हैं तो भारत-पाक या भारत-चीन युद्ध के बारे में उन्हें जानकारी क्यों नहीं दी जानी चाहिए।
रक्षा विश्लेषक ब्रह्मा चेलानी के अनुसार कारगिल युद्ध का सबसे बड़ा सबक यह है कि पाकिस्तान हर उस स्थिति का फायदा उठाने से पीछे नहीं हटेगा, जहां सुरक्षा या सैन्य तैयारियों में कमी है। उन्होंने कहा कि कारगिल के बाद पाक समर्थित आतंकवादियों के आत्मघाती हमलों में काफी वृद्धि हो गई है। चेलानी ने कहा कि यह युद्ध हमारी धरती पर लड़ा गया और हमने युद्ध जीतकर अपने सैन्य साम‌र्थ्य का पूरी दुनिया को परिचय दिया। उन्होंने कहा कि यह कहना चीजों का बहुत सरलीकरण होगा कि कारगिल युद्ध राजनीतिक नेतृत्व द्वारा फैसले लेने में देरी और खुफिया तंत्र की विफलता के कारण हुआ।
उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच मई से 26 जुलाई 1999 के बीच जम्मू-कश्मीर के बेहद ऊंचाई वाले क्षेत्र कारगिल में युद्ध हुआ था। इस युद्ध के शुरू होने का कारण पाक सेना द्वारा समर्थित घुसपैठियों का कारगिल में नियंत्रण रेखा के आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा करना था।
शुरू में भारतीय सेना ने जब घुसपैठियों के खिलाफ जवाबी कार्रवाई शुरू की तो उसे थोड़ी कठिनाई हुई, क्योंकि दुश्मन उससे ऊँची चोटियों पर बैठे थे, लेकिन बाद में वायुसेना की मदद से भारतीय सेनाओं ने पाक सेना को मुहंतोड़ जवाब दिया और यह पूरा क्षेत्र घुसपैठियों से खाली करवा लिया। पाकिस्तान भारतीय सेना की कार्रवाई से इतना घबरा गया कि उसे अमेरिका जाकर अपने आका से गुहार करनी पड़ी कि युद्ध रोकने के लिए भारत से कहा जाए। कारगिल युद्ध में भारतीय पक्ष की ओर से मारे गए लोगों की आधिकारिक संख्या 5,33 थी, जबकि पाकिस्तानी पक्ष की ओर से करीब 4,000 लोगों के मारे जाने का अनुमान लगाया गया। 

शहीदों की सूची मे से कुछ नाम नीचे दे रहा हूँ :- 
Lieutanant Col R.Vishwanathan
Major Ajay Singh Jasrotia
Major Kamlesh Prasad
Major Padmapani Acharya
Major Parmanand
Major Rajesh S. Adhikari
Major Vivek Gupta
Major Mariappan Saravanan
Captain Amit Bhardwaj
Captain Aditya Mishra
Captain Haneefuddin
Captain Jerry Premraj
Captain Jintu Gogoi
Captain Keishing Clifford Nongrum
Captain P.V.Vikram
Captain Vikram Batra
Captain Anuj Nayyar
Captain Amol Kalia
Lieutanant Amit Kaul
Lieutanant Neikezhakou Kengurusie
Lieutanant Sourav Kalia
Lieutanant Vijayant Thapar
Lieutenant Manoj Kumar Pandey
Deputy Commander Sukhbir SinghYadav
Driver-Soldier Gopinath Moharana
Flight Engineer Raj Kishore Sahoo
Flight Lieutanant S Muhilan
Grenadier Amardeep
Grenadier Bajinder Singh
Grenadier Mohan Katha
Grenadier Munish Kumar
Grenadier Raj Kumar
Grenaidier Yogendera Singh Yadav
Havaldar Abdul Karim
Havaldar Beejay Singh
Havaldar Daler Singh Bahu
Havaldar Jai Prakash Singh
Havaldar Khazan Singh
Havaldar Padam Singh Dhama
Havaldar Ram Kumar
Havaldar Sarwan Singh Se
ngar Havaldar Surendra Singh
Havaldar Sultan Singh Narwari
s Havaldar Tan Bahadur Chhetri
Havaldar Tsweang Rigzin
Havaldar Yashvir Singh
Jawan Arvind Kumar Pandey
Lance Havaldar Ramkumar
Lance Havaldar Samandar Singh Hooda
Lance Naik Ahmed Ali
Lance Naik Balwan Singh
Lance Naik Bijender Singh
Lance Naik Eknath Khairnar
Lance Naik Gurmail Singh
Lance Naik Hera Singh
Lance Naik Keshan Singh
Lance Naik Madan Singh
Lance Naik Manas Ranjan Sahu
Lance Naik Om Prakash
Lance Naik Rakesh Chand
Lance Naik Ram Kumar Pradhan
Lance Naik Surianam Singh
Lance Naik Shankar Shinde
Lance Naik T.S.Jaswant Singh
Naik Anand singh
Naik Bharat Singh
Naik Birender Singh Lamba
Naik Buta Singh
Naik Chaman Singh
Naik Dharam Singh
Naik Ganesh Prasad Yadav
Naik Guardian Mekh Bahadur Gurung
Naik Jagat Singh
Naik Kasmir Singh
Naik Krishan Pal
Naik Mangat Singh
Naik Narayana Rao Desai
Naik Nirmal Singh
Naik R. Kamaraj
Naik Raj Kumar Punia
Naik Rakesh Chand
Naik Ram Swarup
Naik Sachidananda Malik
Naik Samunder Singh
Naik Shatrughan Singh
Naik Shiv Vasayya
Naik Surendra Singh
Naik Surendra Pal
Naik Surjeet Singh
Naik Subedar Lal Chand
Naik Vikram Singh
Naik Yoginder Singh
Rifleman Ansuya Prasad Dhayani
Rifleman Bachan Singh
Rifleman Dabal Singh
Rifleman Dilwar Singh
Rifleman Jaideep Singh
Rifleman Kuldeep Singh
Rifleman Linkon Pradhan
Rifleman Mohammed Aslam
Rifleman Mohammed Farid
Rifleman Rattan Chand
Rifleman Shaukat Hussain Kalgam
Rifleman Sunil Jungt Mahat
Rifleman Varinder Lal
Rifleman Vikram Singh
Rifleman Guardian Johar Singh
Rifleman Guardian Sarvan Kumar
Sergeant PVNR Prasad
Sergeant Raj Kishore Sahu
Sepoy Ajmer Singh
Sepoy Amardeep Singh
Sepoy Anil Kumar
Sepoy Arjun Ram
Sepoy Arvind Kumar Pandey
Sepoy Bajinder Singh
Sepoy Bhanwar Lal Bagaria
Sepoy Bhikaram
Sepoy Chara Nicholas
Sepoy Dharambir Singh
Sepoy Dineshkumar Vaghela
Sepoy Gangching Konyak
Sepoy Gazpal Singh
Sepoy Gopinath Mohrana
Sepoy Harendragiri Goswami
Sepoy Jugal Kishore
Sepoy Har Prasad
Sepoy Karan Singh
Sepoy Keolanand Dwivedi
Sepoy Kewal Anand
Sepoy Khem Raj
Sepoy Krishan Kumar
Sepoy Moola Ram
Sepoy Naresh Singh
Sepoy Pramod Kumar
Sepoy Rajinder
Sepoy Rajvir Singh
Sepoy Raswinder Singh
Sepoy Satvir Singh
Sepoy Satnam Singh
Sepoy Senthil
Sepoy Shaikh Mastan Wali
Sepoy Sheesh Ram
Sepoy Shiv Shankar Prasad Gupta
Sepoy Sukhwinder Singh
Sepoy Suresh Chhetri
Sepoy Suresh Kumar
Sepoy Varinder Kumar
Sepoy Vijaypal Singh
Signalman Rajan Sahu
Signalman Vinod Kumar
Subedar Bhanwar Lal
Subedar Harpaul Singh
Subedar Lal Singh
Subedar K. Medappa
Subedar Randhir Singh
Subedar Sumer Singh Rathore
Squadron Leader Ajay Ahuja
Squadron Leader Rajiv Pundir
Squadron Leader Lal Singh
Squadron Leader Ojha
Zrfn Man Singh
Kaushal Yadav
Basavaraj Chougala
न जाने क्यूँ जब जब कारगिल युद्ध का जिक्र आता है ... दिल ओ दिमाग मे जावेद साहब के यह शेर आ ही जाते है ...

"कल पर्वतो पे कही बरसी थी जब गोलियां ,
हम
लोग थे साथ में और हौसले थे जवां |
अब
तक चट्टानों पे है अपने लहू के निशां ,
साथी
मुबारक तुम्हे यह जश्न हो जीत का ,
बस
इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||"

बस इतना याद रहे ........ एक साथी और भी था ||

सादर आपका 

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बिलकुल होती है 

जो आज्ञा 

साथी हाथ बढ़ाना 

किसने सुनी 

आखिर टीआरपी भी कोई चीज़ होती है 

जय हो महाराज क्यूबा याद रहा ... कारगिल भूल गए ??  

जिसे भी हो ... खतरनाक है  

बम बम भोला

कभी बंद न हो 

इस मे कोई शक नहीं 

खुद बदल कर दिखाइए 

तो फिर 

और गाड़ी का क्या हुआ 

आप से ज्यादा कौन जानता होगा 

 आजकल बाल तो वापस आ जाते है ... नकली ही सही 

तो काँग्रेस कौन सा मुंह बंद किए बैठी है 

मेरी भी 

गोलमाल है सब गोलमाल है 

किस के 

पैरहन और जाली नज़्में भूल गई आप 

बड़ा जटिल काम बताया आपने 

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posted by शिवम् मिश्रा at बुरा भला 

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पूरे हिन्दी ब्लॉग जगत की ओर से कारगिल युद्ध के सभी अमर शहीदों को ब्लॉग बुलेटिन टीम का शत शत नमन !

जय हिन्द !!

लेखागार