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सोमवार, 10 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (8)



(पिछले वर्ष के अवलोकन को एक अंतराल के बाद हमने पुस्तक की रूपरेखा दी ..... इस बार भी यही कोशिश होगी . जिनकी रचनाओं का मैं अवलोकन कर रही हूँ , वे यदि अपनी रचना को प्रकाशित नहीं करवाना चाहें तो स्पष्टतः लिख देंगे . एक भी प्रति आपको बिना पुस्तक का मूल्य दिए नहीं दी जाएगी - अतः इस बात को भी ध्यान में रखा जाये ताकि कोई व्यवधान बाद में ना हो )

किस जौहरी ने तराशा तुम्हें 
आत्मा की अग्नि ने निखारा तुम्हें 
तेज की किरणें बिखरी हैं तीनों लोक 
विस्मयविमुग्ध हैं हर प्रतिभाएं 
आपस में पाकर यह आलोक .....

चिंतन(chintan): त्रिशंकु(राजेंद्र शर्मा विवेक)

त्रिशंकु शब्द अस्थिरता के अनिश्चय के लिये
उपयोग मे लाया जाता है
प्रश्न यह है कि त्रिशंकु कौन थे
वे अस्थिरता अनिश्चय के पर्याय क्यो बन गये
त्रिशंकु नामक प्राचीन काल मे महान तथा प्रतापी राजा थे
जो भगवान श्रीराम के पूर्वज थे
दो महान महर्षियो की प्रतिस्पर्धा
तथा स्वयम के सशरीर स्वर्ग जाने के हठ के कारण
उनकी यह स्थिति हुई
महाराजा त्रिशंकु यह चाहते थे कि वे सशरीर स्वर्गारोहण करे
उनकी इस इच्छा की पूर्ति के लिये वे तत्कालिन महर्षी वशिष्ठ के पास पहुॅचे
जो ब्रह्म विद्याअो के ग्याता थे
महर्षी वशिष्ठ द्वारा उन्हे नियति के विधान से बॅधे होने का कारण बता कर
उनकी इच्छा पूरी करने से इन्कार कर दिया
उस समय अपने पुरूषार्थ के बल राजा से
ब्रहम रिषियो मे शामिल हुये महर्षि विश्वामित्र
का तप अौर कीर्ति चरम पर थी
महर्षि विश्वामित्र के द्वारा महाराजा त्रिशंकु को
उनकी इच्छा पुर्ति का अश्वासन दिया गया
तथा इस हेतु उनके द्वारा अनुष्ठान प्रारम्भ किया गया
नियति के विधान के विपरीत किसी
व्यक्ति को स्वर्ग पहुॅचाने का यह पहला प्रयास था
इसलिये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड मे खल-बली मच गई
स्वर्ग के अधिपति देवराज इन्द्र अत्यन्त विचलित हो गये
उन्होने महर्षि विश्वामित्र के अनुष्ठान का विरोध किया
महर्षि विश्वामित्र अत्यन्त संकल्पवान तपस्वी थे
उन्होने देवराज इन्द्र को चेतावनी दी कि
यदि उन्होने महाराजा त्रिशंकु को अपने स्वर्ग लोक मे
सशरीर अाने की अनुमति नही दी तो
वे नये स्वर्ग की रचना कर महाराजा त्रिशंकु की इच्छा पूर्ण करेंगे
सफलता पूर्वक अनुष्ठान पूर्ण होने पर
जब सशरीर महाराजा त्रिशंकु को महर्षि विश्वामित्र ने
उर्ध्व दिशा मे भेजना प्रारम्भ किया तो
देवराज इन्द्र ने उन्हे स्वर्ग मे सशरीर प्रवेश करने से रोक दिया
ऐसी स्थिति मे त्रिशंकु भूलोक अौर स्वर्ग लोक के मध्य अधर मे
अन्तरिक्ष मे ही स्थिर हो गये
न तो वे स्वर्ग का सुख भौतिक शरीर के साथ उठा पाये
अौर नही भू-लोक मे अपनी सम्पूर्ण अायु पूर्ण कर
दिग दिगन्त मे अपनी कीर्ति को फैला पाये
कहने का अाशय यह है कि
जो व्यक्ति नियति का विधान तोडता है
विधी-विधान के विपरित कार्य करता है
लक्ष्य प्राप्ति के लिये संक्षिप्त मार्ग अपनाता
है उसकी दशा महाराज त्रिशंकु की तरह हो जाती है

आम आदमी की पीड़ा दर्शाते
तुम्हारे गीतों , निबंधों
कहानियों और उपन्यासों की शैली
इंगित करती है उसे दीन-हीन
नकारती है उसका अस्तित्व
जो दधीची की तरह
अर्पित कर देता है अपना लहू
गेंहू के पौधों को
तुम्हारी रोटियों के लिए
निचोड़ देता है खुद को पसीना बनाकर
तुम्हारे प्रासादों के गारे के लिए
पर शायद इंगित करती है तुम्हारी शैली
तुम्हारी भूल को
क्योंकी
ऊंचे शिखरों पर बैठकर
मैदानों में बिचरते हाथियों  को 
चूहे का दल समझने की तुम्हारी नजर ने
बौना कर दिया है आम आदमी को
किन्तु
बदली में छिपे चाँद की तरह
अनावृत होगा हर सच भी
और मिटते फसलों की तरह
स्वीकारना होगा तुम्हे भी
रोटी से लगते चाँद की विशालता को 

Rohitas Ghorela: दर्पण सा बना मैं(रोहितास घोरेला)

मैं,
साधारण सा कांच  
जेसे 'शीशागर' ने बनाया
एकदम पारदर्शी,बिल्कुल साफ

पर ज्यूँ ही तूँ आई इस कांच के सामने
अपनी पारदर्शिता ख़त्म कर ली मैंने,
एक तरफ चाँदी की परत आ गयी हो जेसे
जैसे किसी ने जादू कर दिया हो. 

मैंने कैद कर लिया तुम को,
मेरे हर ज़र्रे में समाई हो तुम 
दूर से देखना कभी दम-ब-खुद सा पड़ा हूँ
अन्दर झांक कर देखना कभी
तेरा ही अक्स लिए खड़ा हूँ.
तेरे लिए थोड़ा सा बदला हूँ
कांच से बस दर्पण ही बना हूँ।

स्पंदन SPANDAN: सफ़ेद चादर...(शिखा वार्ष्णेय)

सुबह उठ कर खिड़की के परदे हटाये तो आसमान धुंधला सा लगा। सोचा आँखें ठीक से खुली नहीं हैं अँधेरा अभी छटा नहीं है इसलिए ठीक से दिखाई नहीं दे रहा। यहाँ कोई इतनी सुबह परदे नहीं हटाता पारदर्शी शीशों की खिड़कियाँ जो हैं। बाहर अँधेरा और घर के अन्दर उजाला हो तो सामने वाले को आपके घर के अन्दर का हाल साफ़ नजर आता है।मानव स्वभाव है। हम बाहर से चाहें कैसे भी दिखें पर अपने अन्दर की कुछ चीज़ों पर पर्दा डाले रखना चाहते हैं।वो तो अपनी पुरानी भारतीय आदत है कि सुबह उठते ही घर के सारे परदे खिड़कियाँ खोल दो।सूर्य देव की प्रथम किरण घर अन्दर प्रवेश न करे तो दिन के आरम्भ होने का एहसास नहीं होता।अब यहाँ तो सूर्य देवता ही कम प्रकट हुआ करते हैं।उनके दर्शनों से दिन की शुरुआत करने की कोशिश करें तो जाने कब तक दिन ही न हो।अत: सर्दी की मजबूरी है तो खिड़की तो खुलती नहीं परन्तु परदे बिना किसी की परवाह किये मैं खोल ही देती हूँ।


थोड़ी सी आँख मल कर दुबारा देखने की कोशिश कर ही रही थी कि बच्चे चिल्लाते हुए आये ..इट्स स्नोइंग, इट्स स्नोइंग ..ओह तो यह माजरा है वो धुंध नहीं,बर्फ थी। बच्चे जो रात तक स्कूल जाने के नाम पर खिनखिना रहे थे अचानक स्कूल जाने को उतावले होने लगे।पर मेरा मुँह लटक कर घुटने तक को आने लगा। न जाने क्यों ये बर्फ अब मुझे लुभाती नहीं।अब इसे देखकर मुझे रानीखेत की सीजन में ज्यादा से ज्यादा एक बार होने वाली बर्फबारी याद नहीं आती जब पूरे दिन बाहर बर्फ में खेलते हुए उन्हीं बर्फ के गोले बनाकर, उसमें रूह अफ़ज़ाह मिलाकर उसी से पेट भरा करते थे।अब मुझे इस बर्फ से मास्को की ठिठुरती हुई ठण्ड याद आती है। जब हम 3-4 काल्गोथकियां (स्टोकिंग्स).2 टोपी , 2 जेकेट और मोटे बूट्स पहन कर फेकल्टी जाने को मजबूर हुआ करते थे। और झींका करते थे कि अजीब देश है यार, इतनी ठण्ड में स्कूल, कॉलेज खोलते हैं, और गर्मियों में 2 महीने की छुट्टियां करते हैं। हमारे यहाँ तो पहाड़ों में सर्दियों में छुट्टियां हुआ करती हैं कि बच्चे सर्दी से बचे रहें और मैदानों में गर्मियों में, ताकि झुलसती गर्मी से बच्चे बचे रहें। पर अब समझ में आता है। यही फर्क है हममें और इन पश्चिमी देशों में। वह लाइफ एन्जॉय करने का सोचते हैं और हम उससे बचने का।वह छुट्टियां किसी चीज़ से बचने के नहीं करते बल्कि साल के सबसे खुशनुमा मौसम में जिन्दगी का आनंद लेने के लिए करते हैं। 

तब अपने उन रूसी दोस्तों की बातें बड़ी अजीब लगा करती थीं जब वह हमारे गर्मियों की छुट्टियों में भारत आने की बात पर आहें भरा करते थे कि हाय .."कितने नसीब वाले हो तुम लोग। रोज सूरज देखने को मिलता है"। और हम मन ही मन ठहाके लगाते कि  हाँ आकर देखो एक बार गर्मियों में सूरज को, सभी ज्ञात,अज्ञात भाषा में नहीं गरियाया तो नाम बदल देना।उनकी वह साल में 8 महीने बर्फ की सफ़ेद चादर के प्रति क्षुब्धता जैसे अब मुझमें भी स्थान्तरित सी हो गई है। अब मुझे गिरते हुए बर्फ के फ़ाए मुलायम फूल से नहीं रुई के उन फायों से लगते हैं जिनसे बुनकर जल्दी ही धरती पर एक सफ़ेद कपड़ा बिछ जायेगा। हाँ अब मुझे ये बर्फीली चादर किसी कफ़न की तरह लगती है। जब कफ़न हटेगा तब रह जाएगी कुचली हुई मैली बर्फ की कीचड़।जिसे हटते हुए लग जाएगा बहुत समय।ठीक उसी तरह जिस तरह कफ़न ओढ़े हुए किसी व्यक्ति के चले जाने के बाद पीछे रह जाता है मातम और अनगिनत समस्याएं।

शायद उम्र का तकाजा है अब यह बर्फ उत्साहित नहीं करती पर शायद कोई बालक अब भी मन में कहीं छिपा बैठा है तो बच्चों का साथ देने के लिए उनके साथ गोलामारी खेल लिया करती हूँ। परन्तु उस समय भी मन के किसी कोने में उन गीले जूतों से घर के अन्दर होने वाली किच - किच को साफ़ करना ही रहता है।सफ़ेद रंग मेरा पसंदीदा रंग होते हुए भी यह बर्फ अब नहीं सुहाती, और लाल रंग को हमेशा भड़काऊ रंग की संज्ञा देने वाली मैं, अब सूरज की उसी रक्तिम प्रभा से मुग्ध होती दिखती हूँ।
कौन कहता है कि मनुष्य का मूल स्वभाव कभी नहीं बदलता , मेरे ख़याल से तो देश, काल ,परिवेश के तहत मनुष्य का स्वभाव तो क्या सबकुछ बदल जाता है।बदल जाती हैं रुचियाँ, आदतें, सपने, सोच पूरा व्यक्तित्व भी।हम कब कैसे बदलते जाते हैं यह अहसास खुद हमें भी कहाँ होता है।

अर्द्ध शतक के पार
जिंदगी आ पहुंची है
देख रहा हूँ
तलपट में क्या
दर्ज हुआ है
जो खोया है
ज़िक्र भला क्या
जो पाया है
वो ही देखूं

पाये हैं
कुछ तमगे,ट्राफी
लेबल हैं कुछ
नेम प्लेट है
सींग निकल आये हैं
सर पर
अकड़ी गर्दन
सिर को कब
हिलने देती है
माथे की सलवट
बरसाती अंगारे से
भिंची मुट्ठीयों की
गिरफ्त में
कई कहानी
कह भी डाली
नहीं मगर जो
कह पाया वो

थोड़े से
सिंदूरी पल हैं
मटमैले कुछ
धूसर थोड़े
इक ढक्कन में बंद
बहुत सारा उफान है
चीख दूध की
उबल उबल कर
ना बह पाया

गोल मेज़ पर बैठ
की गयी कानाफूसी
कोनों में कुछ
लिखी इबारत
धुंधली धुंधली
कई उफनते अहसासों की
लिए गठरिया
झोली भर विश्वासों के
साये में दिखते
फटी कंथडी के
कुछ बेबस से टाँके हैं

दर्ज पतंगों की उड़ान है
उलझी उलझी
डोर हाथ में

गहरे पानी के मूंगे
जिन को समझा था
उथले पानी की
सीपों में
बदल गये हैं

एक गोडावण रेगिस्तानी
ठुमक ठुमक
चलता यादों में
काली पीली आंधी में
खोता जाता है
मोर कभी जो
सतरंगी पंखों से नाचा
छोड़ पंख को
घूम रहा है

वीरबहुटी
ताक रही है
इक कलगी धारी
मुर्गे को 

17 टिप्पणियाँ:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

प्रभावशाली रचनाएँ। बढ़िया कलेक्शन !

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

बदल जाती हैं रुचियाँ , आदतें , सपने , सोच और पूरा व्यक्तित्व भी .... !!
हम कब कैसे बदलते जाते हैं ,यह अहसास खुद हमें भी कहाँ होता है .... !!

Aruna Kapoor ने कहा…

...सभी रचनाएँ बहुत सुन्दर है!

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

bahut badhiya

सदा ने कहा…

किस जौहरी ने तराशा तुम्हें
आत्मा की अग्नि ने निखारा तुम्हें
तेज की किरणें बिखरी हैं तीनों लोक
विस्मयविमुग्ध हैं हर प्रतिभाएं
आपस में पाकर यह आलोक ..... कुछ कहना शेष नहीं यहां तो
!!

varun kumar ने कहा…

बहुत बढिया ...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुन्दर चयन...

shikha varshney ने कहा…

बहुत सुन्दर रचनाएँ.मुझे यहाँ स्थान देने का बहुत आभार भी :).

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया
बेहतर लिंक्स

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" ने कहा…

aaderneeya rashmiji..hamesh kee tarah aapkaa y ah shandaar pryas...meri rachna ko shamil kiya gaya..mujhe behad khushi hai..sadar

कालीपद प्रसाद ने कहा…

अच्छा चयन

Akash Mishra ने कहा…

त्रिशंकु की कहानी दुहराने के लिए शुक्रिया , सभी चयन अपनी उपस्थिति को सार्थक ठहराते हैं |
खोया पाया विशेष पसंद आई |

सादर

Disha ने कहा…

बहुत ही सुंदर रचनाएँ हैं सटीक भावों के साथ

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बहुत उम्दा,नायाब चयन,,,

Rohitas ghorela ने कहा…

बहुत ही गजब के लिंक्स पेश किये हैं इस बुलेटिन में ...

"दर्पण सा बना मैं" ये मेरी पहली कविता है जो ब्लॉग बुलेटिन पर पोस्ट की गयी हैं।
रश्मि प्रभा जी आपके इस कदम से मुझे बहुत सराहना मिली है आपका तहे दिल से आभार !!

ज्योति खरे ने कहा…

मन को कुछ सोचने,कहने को आतुर रचनायें
बहुत बढ़िया संग्रह

vandana ने कहा…

प्रभावशाली रचनाये

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