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गुरुवार, 13 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (11)




जब भी किसी प्रतिभा की चौखट पर पहुँचती हूँ 
एहसासों के बंजारे मन का डेरा डाल देती हूँ 
परिक्रमा करती हूँ एहसासों की पर्णकुटी का 
और कुछ मिटटी सर झुककर ले आती हूँ ..... आपसबों के लिए ....

पुरस्कार
सम्मान
मरणोपरान्त……परमवीर चक्र
और अब मुआवजा……शोक संवेदना पत्र,
ये पांच शब्द ईजाद किये हैं
हमारी संसद ने
पिछले पैंसठ सालों में
भूख से कुलबुलाती  अंतड़ियों का
पेट भरने के लिये।

फ़िक्स कर दिया है रेट
हमारी संसद ने
देश की जनता के
हर काम हर कुर्बानी
उनके साथ घटने वाली
घटनाओं,दुर्घटनाओं और
हादसों का।

लिखने पर किसी खद्दरधारी की
यशोगाथा
मिलेगा सम्मान या
पुरस्कार अंगवस्त्रम
पत्रं पुष्पं और रूपये इक्यावन हज़ार
कारगिल में शहादत पर
मिलेगा मरणोपरान्त चक्र
और छोड़ दिया जायेगा परिवार
राम भरोसे/सड़क पर भटकने को।

मरने पर किसी दुर्घटना/बिल्डिंग कोलैप्स
या किसी मेले की भगदड़ में
परिवार को मिलेंगे रुपये
दो,एक लाख या फ़िर पचास हजार।

अगर गलती से भी मौत
हो जाती है किसी युवक की
नौकरी खोजने के दौरान
किसी सेप्टिक टैंक में गिरने
या धूप में बेहोश होने से
(कहने को—असली वजह है भूख)
तो मृतक के परिवार को मिलेंगे
रूपये पच्चीस हजार
नगर प्रशासन से,
और पचास हजार
प्रधानमंत्री सहायता कोष से।

इन सब से भी अलग
अगर आप मर जाते हैं
किसी थू थू/धिक्कार
या शक्ति प्रदर्शन रैली के दौरान
प्लेटफ़ार्म पर मची भगदड़ में
ट्रक पलटने अथवा
मंच ढहने पर उसके नीचे दबकर
तो
इत्मिनान रखिये आप
आपके शवदाह का खर्च भी
परिवार वालों को नहीं उठाना होगा
आपका शव
बहा दिया जाएगा किसी नदी में
या दफ़ना दिया जाएगा कब्रिस्तान में
क्योंकि आपके शव की शिनाख्त ही
नहीं हो सकी थी
फ़िर कुछ दिनों के बाद
आपके परिवार को मिलेगा
रैली की आयोजक पार्टी
की ओर से
सिर्फ़ एक शोक संवेदना पत्र।

अब ये
तय करना है आपको
कि आपको कौन सी मौत चाहिये
हमारी संसद तो
हर तरह से तैयार है।

जितना है गहन तम
शक्ति भी उतनी प्रबलतम
कृष्ण विवरों से भला
जीती है कब किरण!
आँखें भी सहती हैं
तमस,
नहीं
प्रखर किरणों को।
हो गया प्रकाशित 
जो कुछ भी आसपास
उसे ही भर लें अंक में
हो पाता उतना भी कहाँ?
तमस से व्यथित हैं फिर भी
प्रकाश को 
सहते हैं कब नयन? 
कृष्ण विवरों से भला
जीती है कब किरण!

चौदह वर्ष तक जंगलों में क्यों भटकते रहे राम? अग्निपरीक्षा के बाद भी सीता को क्यों होना पड़ा निर्वासित? कृष्ण को मथुरा से क्यों करना पड़ा पलायन? सत्य क्यों होता है पुनःपुनः अपमानित? आध्यात्मिक देश भारत में क्यों पल्लवित-पुष्पित होते हैं पापों के जंगल? क्यों होते हैं बलात्कार उन कन्यायों से जो शक्ति के रूप में पूज्यनीय स्वीकृत हैं भारत में? स्त्रियाँ क्यों वंचित हैं मानवीय अधिकारों से जो घोषित हैं देवी के रूप में? श्रम क्यों रहता है निर्धन जो स्वयं उत्पादक है मुद्रा का? देववाणी संस्कृत क्यों चली गयी नेपथ्य में? क्यों बारबार पराधीन होता है आर्यों का देश? क्यों संकुचित होती जा रही हैं आर्यावर्त की सीमायें? ....और तम क्यों घिर-घिर आता है हर बार? 
इन प्रश्नों ने मुझे सदा ही व्यथित किया है। समाधान की आशा में कहाँ-कहाँ नहीं भटका हूँ। भटकाव से मुक्त नहीं हो सका, अभी भी पथ में ही हूँ।
भारत ऐसा देश है जहाँ यात्रा के प्रारम्भ में ही तीक्ष्ण पाषाणों से भरे दुर्गम पर्वतों का सामना करना पड़ता है संसारी को। गहन अन्धकार में एक दीर्घ और क्लांत कर देने वाली यात्रा .....
और मैं ......
कभी थका ...कभी हारा ...कभी विद्रोही हुआ .....कभी पलायन करने का मन हुआ ....कभी समाधान की आशा दिखी .....कभी आशा ने निराशा को फिर आगे कर दिया ....
नुकीले पत्थरों ने कहा –“ हमारी तीक्ष्णता बाह्य है ...अन्दर झाँक कर देखोगे तो सुगम आकाश पा लोगे। दुर्गमता वह पराकाष्ठा है जहाँ से सुगमता को प्रारम्भ होना ही पड़ता है।”
किंतु ठोस पत्थरों के भीतर झाँक पाना इतना सरल है क्या?
सर्वविदित है कि पश्चिम के लोग भौतिकवादी हैं। इसे इस तरह भी कहा जा सकता है कि पश्चिम के लोग सांसारिक उपलब्धियों का उपभोग करने में प्रवीण हैं। पूर्व के लोग भौतिकता के उपभोग में वानर वृत्ति से मुक्त नहीं हो सके। वानर लोभी होता है ...उसकी लिप्सायें अनियंत्रित होती हैं ...उसके उपभोग की प्रक्रिया अव्यवस्थित होती है, उसमें प्रवीणता का अभाव होता है।
वे पुनर्जन्म में विश्वास नहीं करते इसलिये इस जीवन को भरपूर जीने और जीने देने का प्रयास करते हैं। हम पुनर्जन्म में विश्वास तो करते हैं किंतु स्वयं भर जीना चाहते हैं ...दूसरों का जीना संकट में डालते हुये।
लोग कहते हैं कि पश्चिम के लोग हमारे जितने आध्यात्मिक नहीं होते। पर जितने प्रश्न हमारे पास होते हैं उतने प्रश्न उनके पास नहीं हुआ करते।
पश्चिम से प्रतिभायें पलायन नहीं किया करतीं ...सूर्य की किरणें विश्राम पाती हैं वहाँ। भारत से प्रतिभाओं को सदा ही पलायन करने को विवश होना पड़ा है ...सूर्य की किरणों को अपनी यात्रा पूर्व से ही प्रारम्भ करनी पड़ती है ...पश्चिम की ओर।
दीपक अपने आधार को कब प्रकाशित कर सका है भला!   
हमने स्वयं को आध्यात्मिक तो घोषित कर दिया पर आध्यात्मिकता में भी अपनी भौतिक लिप्साओं को ही अन्वेषित करते रहने के अभ्यस्त हो गये हैं।
अपने आसपास की अनियंत्रित अव्यवस्थाओं, जड़ हो गयी कुरीतियों, स्वीकृत हो चुके भ्रष्टाचार, निरंकुश होते अत्याचार, स्वतंत्र संत्रास और पल्लवित हो रहे पाप से जूझते-जूझते हर बार यही प्रतीत हुआ है कि प्रकाश स्थायी कब हो पाया है .....जो स्थायी है वह तो अन्धकार ही है। ब्रह्माण्ड में अन्धकार ही अधिक है ...प्रकाश बहुत कम। प्रकाश के स्रोत भी अस्थायी हैं ...व्याप्त तो अन्धकार है।
पश्चिम में सूरज उगता भी है तो कभी-कभी। वहाँ अन्धकार इतना घना नहीं होता ...इतना प्रकाश भी नहीं होता ...इसलिये वहाँ के लोग धुंधलके में जीने के अभ्यस्त हैं।
भारत में प्रखर प्रकाश है तो गहन अन्धकार भी। किंतु हम अन्धकार में जीने के अभ्यस्त हैं ...तभी तो प्रार्थना करते हैं ...”तमसोमा ज्योतिर्गमय”।
हम क्रांति तो करते हैं पर क्रांति के परिणाम अवसरवादियों को हस्तांतरित कर देते हैं। एक सुविचार जैसे ही किसी परिणाम में परिवर्तित होता है दूसरा विरोधी विचार उस पर अपना पारम्परिक अधिकार कर लेता है और संपूर्ण परिस्थितियाँ पुनः विसंगतियों और विरोधाभासों से भर जाती हैं।
जटिलतायें इतनी अधिक हैं कि समाधान की भूमिका निर्मित करने में ही पूरा जीवन चुक जाता है। धुंधलके में जिया जा सकता है पर गहन अन्धकार तो जीवन की सारी गतिविधियों को बन्दी बना लेता है।
जीना है तो प्रकाश का संधान करना ही होगा ...तीक्ष्ण पाषाणों से भरे अन्धेरे अपथ पर यात्रा प्रारम्भ कर आगे बढ़ते हुये ...विद्रोह के झंझावातों से जूझते हुये ....प्रकाश का अनुसंधान करना ही होगा।
प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रक्रिया ही आध्यात्मिक यात्रा की प्रक्रिया है। यह अनुपलब्धियों से उपजी उपलब्धि है। यह घोर अशांति से उपजी शांति की यात्रा है। यह पाप के अवश कुण्ड का प्रबल विस्फोट है। यह न सुलझ पाने वाली विकट समस्यायों का व्यक्तिगत समाधान है। यह निर्बल का सबल होना है। यह पराजित की विजय यात्रा है। यह व्याप्त हुये कोलाहल की एकांत शांत प्रस्तावना है। यह चरम दुःखों का अंतिम विसर्जन है। यह गहन अन्धकार से विस्फोटित हुआ तीव्र प्रकाश है।
यही कारण है कि भारत में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रकाश की तीव्रता इतनी अधिक हो सकी। यह तीव्रता इतनी अधिक है कि लोगों की आँखें चौंधिया गयी हैं।
चकाचौंध को हमारी आँखें कब सह पायी हैं भला!
काश! भारत के पास ऐसी आँखें होतीं जो तीव्र प्रकाश को भी सह पातीं।

वो गलियाँ जो कभी हाथ पकड़ कर मेरा,
मुझ में समां जातीं थीं, कहतीं थीं मुझे
कि वो मेरी और मैं हूँ उनका।

आज लौटा हूँ शहर कई अरसे बाद जब,
हर गली, हर चौराहे, हर इमारत पे,
एक अजीब सा, बदरंगी, मटमैला सा 
नकाब चढ़ा है। 
क्या ये तू ही है जो कहता था कि 
तू मेरा और मैं हूँ तेरा।

पहुंचा गली में अपनी मैं जब,
मूह कुछ इस कदर फेर लिया 
मानो कोई बदतमीज़, बेगैरत 
घुस आया है।
क्या ये तू ही है जो कहती थी कि 
तू मेरी और मैं हूँ तेरा।

पहुंचा घर में अपने मैं जब,
अन्धयारी तब छाई थी बस, सन्नाटा वो ले आई थी,
आँगन में कुछ छींटे थे, दीवारों पे रेले थे,
क्या तू वो ही घर है जो कहता था कि 
तू मेरा और मैं हूँ तेरा।


नई पोस्ट - मानस मंथन(शशि पाधा)- अनामिका 


नील गगन की नील मणि सी
ऊषा की अरुणाई सी
संध्या के श्यामल आंचल सी
सावन की पुरवाई सी
दर्पण देख सके न रूप
थोड़ी छाया थोड़ी धूप

मेरी तो पहचान यही है
और मेरा कोई नाम नहीं है ।

रेखाओ से घिरी नहीं मैं
न कोई सीमा न कोई बाधा
आकारों में बंधी नहीं मैं
सूर्य -चाँद यूँ आधा -आधा

खुशबू के संग उड़ती फिरती
कोई मुझको रोक न पाए
नदिया की धारा संग बहती
कोई मुझको बाँध न पाए

जहाँ चलूँ मैं , पंथ वही है 
मेरी तो पहचान यही है ।
और मेरा कोई नाम नहीं है ।  

नीले अम्बर के आँगन में
पंख बिना उड जाऊं मैं
इन्द्र धनु की बाँध के डोरी
बदली में मिल जाऊँ मैं

पवन जो छेड़े राग रागिनी
मन के तार बजाऊँ मैं
मन की भाषा पढ़ ले कोई
नि:स्वर गीत सुनाऊँ मैं

जो भी गाऊँ राग वही है
थोड़ी सी पहचान यही है।
और मेरा कोई नाम नहीं है । 
 
पर्वत झरने भाई बाँधव
नदिया बगिया सखि सहेली
दूर क्षितिज है घर की देहरी्
रूप मेरा अनबूझ पहेली

रेत कणों का शीत बिछौना
शशिकिरणों की ओढ़ूँ चादर
चंचल लहरें प्राण सपंदन
विचरण को है गहरा सागर

जहाँ भी जाऊँ नीड़ वही है
बस मेरी पहचान यही है 
और मेरा कोई नाम नहीं है । 


काथम: एक शाश्वत सच(प्रेम गुप्ता)


                     कल जब
               नीले आसमान से
               छिटक कर चाँद
               सहसा ही
               उतर आया   
               मेरी कोमल..गोरी नर्म हथेली की ज़मीन पर
               और ज़िद कर बैठा
               मेरी आँखों के भीतर दुबके बैठे-सपनों से
               सपने...
               आँखमिचौली का "खेल" खेल कर थक गए थे
               कुछ देर सोना चाहते थे
               पर चाँद की ज़िद
               बस एक बार और...आँखमिचौली का खेल
               सपना पल भर ठिठका
               उनींदी आँखों से चाँद को निहारा
               और फिर खिल-खिल करते
               उसने भी छलाँग लगा दी
               इठलाती-बलखाती यादों की उस नदी में
               जो मेरे नटखट बचपन के घर के
               बाजू में बहती थी
               और उसमें तैरती थी
               मेरी कागज़ की कश्ती
               न जाने किस ठांव जाने की चाह में
               समुद्र-
               मेरे आजू-बाजू नहीं था
               पर फिर भी
               रेत का घरौंदा-चुपके से
               हर रात आता मेरे सपनों में
               सपनों की तरह
               वह कभी बनता- कभी बिखरता
               वक़्त-
               ढोलक की थाप पर थिरकता
               मेरे कानों में
               कभी गुनगुनाता, तो कभी चीखता
               और मैं?
               उसकी थाप पर डोलती रही
               मदमस्त नचनिया सी
               मेरे साथ ज़िन्दगी भी थिरकती रही
               और फिर एक दिन
               थक कर बैठ गई
               चाँद-
               मेरी हथेली पर सो गया था
               तारे, न जाने कब छिटक गए
               आसमान की चादर पर बिखर गए
               मेरे आसपास
               गझिन अंधेरा घिर आया था
               चिहुंक कर चाँद उठा
               और जा छुपा बादलों की ओट में
               मैं...हैरान...परेशान
               अभी-अभी तो तैर रहा था
               मेरी क़ागज़ की नाव के साथ
               एक अनकहा उजाला
               अब मेरे पास
               न चाँद था न कोई तारा
               मेरी खाली हथेली पर
               काली स्याही से लिखे
               कुछ अनसुलझे सवाल थे
               मेरे घर की
               बाजू वाली नदी
               इठलाना भूल
               धीरे-धीरे बहने लगी थी
               मेरे मिट्टी के घरौंदे की छत पर
               चोंच मारती चिडिया
               अपनी अंतहीन तलाश से बेख़बर
               चोंच को सिर्फ़
               घायल कर रही थी
               मैंने,
               अपनी आँखों से बहते झरने के झीने परदे को
               अपनी खाली हथेली से सरका कर
               आकाश की ओर देखा
               और फिर
               धरती पर उतरते गझिन अंधेरे से
               भयभीत हो जड़ हो गई
               यह क्या?
               अब मेरी हथेली सख़्त थी
               और
               उस पर उग आई थी
               जंगली दूब सी
               अनगिनत रेखाएं
               अपनी सिकुड़न के साथ
               मैं,
               जानती थी कि
               वे सिर्फ़ रेखाएं नहीं थी-
               एक सत्य था...
               शाश्वत...
               अब,
               वह सत्य मेरे चेहरे पर भी उग आया है
               मैं क्या करूँ?
               आकाश की गोद में इठलाते चाँद की उजास
               मेरी छत की सतह पर उतर आई है
               चुपके से...दबे पाँव
               और मैं खामोश हूँ
               मेरी खिड़की की सलाखों से
               आर-पार होती हवा हँसी है
               और चाँद भी
               चाहती तो हूँ
               कि,
               उनके साथ खिलखिल करती
               मैं भी हँसू 
               बचपन और जवानी की चुलबुलाहट के साथ
               पर क्या करूँ
               सत्य की कडुवाहट
               अपनी पूरी शाश्वता के साथ
               मेरे मुरझाते जा रहे होंठो पर ठहर गई है...।


19 टिप्पणियाँ:

vandana gupta ने कहा…

बेहतरीन रचनायें संजोयी हैं।

Neelima sharrma ने कहा…

behtreen links

●๋• नीर ஐ ने कहा…

Bahut bahut shukriya Rashmi Ji meri kriti ko in khoobsurat krition ke beech sanmalit karne ke liye. :)

expression ने कहा…

बहुत बढ़िया रचनाएँ....

सादर
अनु

Akash Mishra ने कहा…

बहुत अच्छा चयन |

मन्टू कुमार ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना...|

सादर

सदा ने कहा…

सभी रचनाओं का चयन एवं प्रस्‍तुति अनुपम
आभार सहित

सादर

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

badhiya chayan kee shrinkhala me ek kadam aur aage.. prem gupta ji kee kavita uttamon me sarvottm

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

सत्य क्यों होता है पुनःपुनः अपमानित?

कभी थका ...कभी हारा ...कभी विद्रोही हुआ .....कभी पलायन करने का मन हुआ ....कभी समाधान की आशा दिखी .....कभी आशा ने निराशा को फिर आगे कर दिया ....

एक सच ....:))))))))))))))))))

स्वयं भर जीना चाहते हैं ...दूसरों का जीना संकट में डालते हुये।

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत गहन और सुन्दर रचनाएँ!

Virendra Kumar Sharma ने कहा…


कविताओं के इतने सारे स्टाल एक से बढ़के एक ....मौत का मुआवज़ा ....बैल गाड़ी में मरूं या जहाज हवाई में ....

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

पहुंचा गली में अपनी मैं जब,
मूह कुछ इस कदर फेर लिया ......मुँह ...........
मानो कोई बदतमीज़, बेगैरत
घुस आया है।
क्या ये तू ही है जो कहती थी कि
तू मेरी और मैं हूँ तेरा।



धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

बढिया रचनाओं की प्रस्तुति,,, बधाई।

कालीपद प्रसाद ने कहा…

selection badhiya hai.

Rohitas ghorela ने कहा…

रश्मि प्रभा जी अच्छे लिंक्स संजोये हैं आपने .. हेमंत कुमार जी के द्वारा रचित "पुरस्कार सम्मान मरणोपरान्त……" एक सच्चाई भी, तंज़ भी और दर्द भी है ...और बहुत ही उम्दा तरीके से लिखी गयी है। इसी प्रकार सारे के सारे लिंक्स बहुत ग़जब के हैं।

कौशलेन्द्र ने कहा…

किसी बड़े हुज़ूम में हर किसी को जानना-परखना हँसी-खेल नहीं....किंतु रश्मि जी का ज़ुनून इसकी परवाह कब करता है!

बड़ी तलाश के बाद मिल पाता है कोई छोटा सा किरदार।
और ये तलाश कभी बन्द नहीं करता कोई सच्चा सूत्रधार॥
बहुत बेहतरीन सूत्र थमाये हैं आपने। एक-एक कर पहुँचने का प्रयास करूँगा। शुरुआत करता हूँ - "....मेरा कोई नाम नहीं है" से ..

Hemant Kumar Dubey ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति..

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अवलोकन 2012 के बहाने काफी सारे नए लोगो को पढ़ने का मौका मिला जिन तक इस से पहले पहुंचा नहीं था ... आभार दीदी !

MANI KA HASHIYA ने कहा…

आभार...

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