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सोमवार, 17 दिसंबर 2012

प्रतिभाओं की कमी नहीं अवलोकन 2012 (14)


बचपन में अक्सर सोचती - एक पर एक सीढ़ी रख लूँ तो चार,पांच सीढ़ियों की मदद से आसमान छू सकती हूँ 
थोड़ी बड़ी हुई तो सोचा - अलादीन का चिराग मिल जाये तो मुक्त हाथों सबको पेट भरी नींद दूंगी 
आज सोचती हूँ - ढूँढने से प्रतिभाओं को एक जगह सहेजा जा सकता है ......
पर आकाश बहुत बड़ा है,दुनिया बहुत बड़ी है और अलादीन का चिराग कहानी बनकर रह गया है 
और सामर्थ्य से जितनी तलाश करो - प्रतिभाओं की जड़ें बहुत गहरी बहुत दूर तक हैं ........... नहीं कह सकते कि काश्मीर से कन्याकुमारी तक .... पूरी दुनिया तक फैली है, जहाँ तक सिंचन कर पाऊं और नायाब फल ले पाऊं - कोशिश जारी है .......
.........................
अपने (http://bitspratik.blogspot.in/) प्रतीक माहेश्वरी
सोचा करता था वह "अपने" लोगों के बारे में
वही जिनको वो कई रिश्तों से पहचानता था
माँ, पिता, भाई, बहन, चाचा, दोस्त, जिगरी दोस्त, चड्डी दोस्त..

"अपने"
यह शब्द भेदती थी उसे कभी..
क्या यह शब्द दुनिया का छलावा नहीं है?
इस शब्द ने कईयों की दुनिया नहीं उजाड़ी है?
पर
फ़िर
क्या इन्हीं "अपनों" ने उसकी ये ज़िंदगी हसीन नहीं बनाई है?
क्या वही ये "अपने" नहीं हैं
जो उसके सुख-दुःख में,
उसके गिरते क़दमों
और
कन्धों को सहारा देते रहे हैं?

पर आज उसे "भय" लग रहा है
आज उसके दिल से खून का कतरा सूखा जा रहा है
आँखों का पानी शरीर में ही कहीं सूख रहा है

क्यों..
आज न जाने क्या ख्याल आया
क्या ये "अपने" उसका साथ निभाएँगे?
तब
जब
पंचतत्व
उसके खून के हर कतरे को,
शरीर की हर बूँद को,
रूह के हर कण को,
अंगों की हर सांस को,
अपनी ओज में सुखाएगा
आखिरी आवाज़ लगाएगा?

उस दिन शायद उसे "अपने" छलावा लगेंगे
वो उसका साथ वहीँ छोड़ देंगे
क्या यह ज़िंदगी का छलावा नहीं है?
जो की फिल्म की चरमावस्था (क्लाईमैक्स) को
दुखांत (ऐन्टी-क्लाईमैक्स) कर देगा?
जिनके लिए पूरी ज़िंदगी जी है
बस वही नहीं मिलेंगे..

"अपनों" को "अपना" कहना
क्या उस दिन इस शब्द के खिलाफ नहीं हो जाएगा?
यह सोच कर वह आज घबरा रहा है
पर
फ़िर
जब तक सच्चाई का पता नहीं चलेगा
तब तक इस छलावे को जीना पड़ेगा
यह छलावा जिसे हम "अपने" कहते हैं
आज यही सच्चाई है..
आज यही ज़िंदगी है..


घर की ढेरों चीजें
जो व्यवस्थित रखी हैं
अपने-अपने स्थान पर
फिर भी
हम भूल जाते हैं
रखकर उन्हें
दो ही लोग निभाते हैं केवल
इस जिम्मेदारी को
अम्मा और बाबूजी
जो
आज हमारे साथ हैं
समय बीतते
साथ छोड़ दिया दोनों ने
अब हम
चीजों की जगह
अम्मा और बाबूजी को भूलने लगे हैं
घर की चीजें
जो यहां-वहां पडी‌ हैं
उन्हें संभालना अब
हमारी जिम्मेदारी है
बंटवारे में
हमारे हिस्से में मिली चीजों को
संभालकर रखने में निकल जाता है आधा दिन
अब वह
सबकी नहीं बल्कि
केवल हमारी सम्पत्ति का हिस्सा हैं।

गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ, आती थी चिट्ठी ॥
वह स्वप्न-परी बन, मुस्काती थी चिट्ठी ॥

शब्दॊं सॆ उसकॆ स्नॆह,की वर्षा हॊती थी,
बॆटॆ की तन्हाई मॆं, माँ कितना रॊती थी,
पंक्ति-पंक्ति मॆं प्यार, पिता का बहता था,
कब आयॆंगॆ भैया, छॊटा भाई कहता था,

उन सबका चॆहरा भी,दिखलाती थी चिट्ठी ॥
आशिष की अमृत-धार, बहाती थी चिट्ठी ॥१॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

बहना की तीखी कुछ,तंज भरी सी बातॆं,
लड़ना-भिड़ना चिड़ना, की सारी सौगातॆं,
भैया यॆ लाना,वॊ लाना,की सब फ़रियादॆं,
ख़त मॆं दिख जाती थीं, नई पुरानी यादॆं,

सावन मॆं राखी भर भर, लाती थी चिट्ठी ॥
अम्मा बाबूजी जैसा, बतियाती थी चिट्ठी ॥२॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
,,

भॆंट भलाई और कुशल, मंगल की पाती, 
पल-भर मॆं वह लाखॊं, खुशियां दॆ जाती,
याद दिला जाती थी,सारॆ दिन मस्ती कॆ,
और दिखाती थी चौबारॆ,अपनी बस्ती कॆ,

पढकर मन कॊ कितना,हरषाती थी चिट्ठी ॥
सच कहता हूं, दर्पण बन, जाती थी चिट्ठी ॥३॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

ममता और आशिष की, मूरत हॊती थी,
चिट्ठी आना शुभ-घड़ी, मुहूरत हॊती थी,
एक कागज़ पर कितनॊं, की सूरत हॊती,
तार किया जाता जब,बहुत ज़रूरत हॊती,

अनहॊनी सॆ हमकॊ, बहुत रुलाती थी चिट्ठी ॥
फ़िर खुद इस दिल कॊ, सहलाती थी चिट्ठी ॥४॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

एक ख़त मॆं जानॆ,कितनॆ संदॆश भरॆ हॊतॆ,
अम्मा बाबूजी कॆ, लाखॊं निर्दॆश भरॆ हॊतॆ,
कठिन ज़मानॆ की, तस्वीर रखा करतॆ थॆ,
शॆष कुशल-मंगल सॆ,अंत लिखा करतॆ थॆ,

बिल्कुल अम्मा बाबूजी,बन जाती थी चिट्ठी ॥
सब निश्छल रिश्तॆ यही, निभाती थी चिट्ठी ॥५॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,

टुकुर टुकुर आँखॆं तकतीं,ख़त आनॆ की राहॆं,
और डाकियॆ कॆ थैलॆ पर,रहती रॊज निगाहॆं,
अब लायॆगी,कब लायॆगी, नया संदॆशा पाती,
हर धड़कन सीनॆ मॆं बस,बात यही दॊहराती,

इन्तज़ार की परिभाषा, सिखलाती थी चिट्ठी ॥
जीवन कॆ कैसॆ कैसॆ, रंग दिखाती थी चिट्ठी ॥६॥
गाँव सॆ मॆरॆ जब पहलॆ,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,


5 टिप्पणियाँ:

अरुण चन्द्र रॉय ने कहा…

badhiya chunav...

ज्योति खरे ने कहा…

भावपूर्ण रचनायें---
सुंदर चयन-----रचनाकारों को बधाई

vandana gupta ने कहा…

बहुत भावभीनी रचनाये।

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

सभी एक से बढकर एक
बहुत बढिया

शिवम् मिश्रा ने कहा…

हमेशा की तरह ... बेहद उम्दा पोस्टों का चुनाव ... अवलोकन 2012 की एक और बेहद उम्दा पोस्ट के लिए ... बधाइयाँ दीदी !

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