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शनिवार, 24 नवंबर 2012

आम आदमी पार्टी और आम आदमी... ब्‍लॉग बुलेटिन


मित्रों, आज के बुलेटिन में आम आदमी की बात करते हैं... आज कल यह आम आदमी बडे जोर से लगा हुआ है अपनी एहमियत जतानें... लेकिन यह आम आदमी आखिर है कौन?

टाईम्स आफ़ इंडिया से साभार
आम आदमी

आखिर कौन है यह आम आदमी
दिन रात की तिकडम
इधर उधर की भागम
ई-एम-आई की जुगाड में
फ़िरता है बज़ार में
सरे आम फ़िरता है
धूप में मरता है
टैक्स की मार में पिसता है 
लेकिन उफ़ तक न करता है............. 

आज तक कभी यह आम आदमी राजनीतिक गलियारे में नहीं दिखता था....  लेकिन आज आम आदमी की पार्टी बनी और बडी उम्मीद जगी आखिर यह आम आदमी की पार्टी आखिर सच में आम आदमी की पार्टी बनेगी ? भाई दूध का जला तो छाछ को भी फ़ूंक फ़ूंक कर पीता है सो इस आम आदमी की पार्टी को कसौटी पर कसना होगा और तभी इसकी नीयत पर लोगो को विश्वास होगा। 

अब तक काँग्रेस कहती थी काँग्रेस का हाथ आम आदमी के साथ... और वो हाथ तो आम आदमी ने छोड़ दिया.. अब ???????

जनता को आम आदमी आम आदमी बोल बोल कर यह सब लोग अपना अपना उल्लू सीधा करते घूम रहे है ... हम तो जैसे पहले थे 
वैसे अब है ...  और शायद ऐसे ही रहेंगे..  

लेकिन इस समय राजनीतिक स्थिति बहुत अजीब हो चुकी है... और इस आम आदमी की पार्टी से हमें बहुत उम्मीदें हैं.. लेकिन साथ ही डर भी है की कहीं हर राजनीतिक दल की तरह इस आम आदमी की पार्टी ने आम आदमी को चोट पहुंचाई तो फ़िर आम आदमी इस चोट को बर्दाश्त नहीं कर पाएगा.... 



चलिए आज की ब्लाग जगत की हलचलों से आपको रूबरू कराते हैं.... 
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साम्प्रदायिक एकता की बात करें, वैमनस्य की नहीं

रणधीर सिंह सुमन at लो क सं घ र्ष ! 
*प्रकृति के प्रलय का तांडव भले ही अभी हमसे कितनी ही दूर क्यों न हो परन्तु ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मानव अपने ही द्वारा निर्मित प्रलयरूपी चक्रव्यूह में स्वयं बहुत तेजी से उलझता जा रहा है। आज के दौर में विश्व के शक्तिशाली देशों सहित सारा संसार आर्थिक मंदी के भारी दौर से गुजर रहा है। विश्व के बड़े से बड़े बैंक, बड़ी कम्पनियाँ, सरकारी व गैर सरकारी उपक्रम आदि के दीवालिया होने के समाचार प्राप्त हो रहे हैं। महँगाई का दानव गरीबों के अस्तित्व पर ही प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। दूसरी ओर इन्हीं दुर्गम परिस्थितियों के मध्य मानव जाति अपने आपको इन विकराल समस्याओं से उबारने के प्रयासों के बजाए उल्टै... more »


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अदृश्य रहस्यमयी गाँव टेंवारी

ब्लॉ.ललित शर्मा at ललितडॉटकॉम 
धरती पर गाँव-नगर, राजधानियाँ उजड़ी, फिर बसी, पर कुछ जगह ऐसी हैं जो एक बार उजड़ी, फिर बस न सकी। कभी राजाओं के साम्राज्य विस्तार की लड़ाई तो कभी प्राकृतिक आपदा, कभी दैवीय प्रकोप से लोग बेघर हुए। बसी हुयी घर गृहस्थी और पुरखों के बनाये घरों को अचानक छोड़ कर जाना त्रासदी ही है। बंजारों की नियति है कि वे अपना स्थान बदलते रहते हैं, पर किसानों का गाँव छोड़ कर जाना त्रासदीपूर्ण होता है, एक बार उजड़ने पर कोई गाँव बिरले ही आबाद होता है। गरियाबंद जिले का केडी आमा (अब रमनपुर )गाँव 150 वर्षों के बाद 3 साल पहले पुन: आबाद हुआ। यदा कदा उजड़े गांव मिलते हैं, यात्रा के दौरान। ऐसा ही एक गाँव मुझे गरियाबंद जिल... more »
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मिलन

मिलन मिलन मिलन में अक्सर काफी अंतर होता जल जल ही रहता है ,टुकड़े पत्थर होता दूर क्षितिज में मिलते दिखते ,अवनी ,अम्बर किन्तु मिलन यह होता एक छलावा केवल क्योंकि धरा आकाश ,कभी भी ना मिलते है चारों तरफ भले ही वो मिलते ,दिखते है मिलन नज़र से नज़रों का है प्यार जगाता लब से लब का मिलन दिलों में आग लगाता तन से तन का मिलन ,प्रेम की प्रतिक्रिया है पति ,पत्नी का मिलन रोज की दिनचर्या है छुप छुप मिलन प्रेमियों का होता उन्मादी दो ह्र्दयों का मिलन पर्व ,कहलाता शादी माटी और बीज का जल से होता संगम विकसित होती पौध ,पनपती बड़ा वृक्ष बन सिर्फ मिलन से ही जगती क्रम चलता है अन्न... more »

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जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ

घंटों बाहर रहने के बाद जब भी अपने कमरे में लौट कर आता हूँ एक अपनेपन का अहसास होता है लगता है जैसे मेज़ कुर्सी बेचैनी से मेरा इंतज़ार कर रही हैं मेरी कलम मेरी ऊंगलियों में खेलने को बेताब दिखती है बिस्तर खुली बाहों से मुझे आराम करने का बुलावा देता है महसूस होता है टीवी कह रहा है , अब उसे मेरा मनोरंजन करने का मौका मिलेगा टयूब लाईट रोशनी से कमरे को जगमगाने के लिए तैयार बटन दबाने के इंतज़ार में दिखती इतना इंतज़ार तो मेरा कोई भी नहीं करता कितनी भी देर के बाद कमरे में आऊँ कोई शिकवा शिकायत नहीं करता रोज़ मर्रा की ज़िन्दगी में मेरे साथ मेरे कमरे के सिवाय ऐसा कही भी नहीं होता किसी ना किसी को कोई न... more »

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आम आदमी का तोड़

यह तो बहुत ही न इंसाफी है। ब्रांड हम ने बनाया, और कब्‍जा केजरीवाल एंड पार्टी करके बैठ गई। आम आदमी की बात कर रहा हूं, जिस पर केजरीवाल एंड पार्टी अपना कब्‍जा करने जा रहे हैं। गुजरात में चुनाव सिर पर हैं, कांग्रेस अपने चुनाव प्रचार में चीख चीख कर कह रही थी, कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ। मगर आम आदमी तो केजरीवाल एंड पार्टी निकली, जिसकी कांग्रेस के साथ कहां बनती है, सार्वजनिक रूप में, अंदर की बात नहीं कह रहा। अटकलें हैं कि कांग्रेस बहुत शीघ्र अपने प्रचार स्‍लोगन को बदलेगी। मगर आम आदमी का तोड़ क्‍या है? वैसे क्रिएटिव लोगों के पास दिमाग बहुत होता है, और नेताओं के पास पैसा। यह दोनों मिलक...more »

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मेरी नज़र में.......

***Punam*** at bas yun...hi.... 
वल्लाह न कहू तो तुझे और क्या कहूँ.... बन कर गज़ल तू मेरे जेहन में उतर गया...! चाहा था लाख तुझको भुला दूँ...मगर नहीं तस्वीर बन के मेरी नज़र में उतर गया....! तेरा जमाल..तेरी मुहब्बत का शुक्रिया... जब से मिला है मुझको..तू मुझमें ठहर गया..! औरों का न ख्याल है...न अपना अब रहा... बस तू ही नज़र आता है...जब भी जहाँ गया...! ए मेरे सनम..मेरे खुदा...तुझको क्या कहूँ.. तू रूह बन के मेरे जिसम में उतर गया.....!
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दुआएं बुनने वाला उदास जुलाहा

Puja Upadhyay at लहरें 
बहुत दिन हुए एक जुलाहों की बस्ती थी...बस्ती में अनगिन कारीगर दिन रहते बेहतरीन करघे पर बुनते रहते थे रेशमी ख्वाब...कच्चे सूत से. बस्ती से थोड़ा ही हट कर थी रंगरेजों की हौद, नदी से बस थोड़ा ही दूर. जगह सभ्यता के बसने के समय कहीं खोयी हुयी रह गयी थी इसलिए यहाँ के लोग नहीं सीख पाए थे सामाजिकता. उन्होंने नहीं जाना था चुप रहने का दर्द. वे करघे पर ख्वाब बुनते हुए गुनगुनाते रहते थे एक सियाह आँखों वाली लड़की की कहानियां...लड़की जो उनके ख्वाबों में आ कर हर रेशमी दुपट्टे का रंग बताया करती थी...लड़की जो रेत में उँगलियों से बेल-बूटे बनाया करती थी. कुछ लोग ऐसा भी कहते थे कि माँ सरस्वती ही लड़की क...more »
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स्त्री पाठ और बन्द द्वार

गिरिजेश राव, Girijesh Rao at एक आलसी का चिठ्ठा 
साँझ से पहले का समय था। उनकी वाणी से सहज सुबोध ज्ञान की निर्झरिणी बरस रही थी। जनता मुग्ध भाव से अश्वत्थ छाँव में बैठी सुन रही थी। अचानक क्रन्दन करती एक विधवा आई और उसने अपने मृत पुत्र को वहीं लिटा दिया – यह मेरा एकमात्र सहारा है। इसे पुनर्जीवित करें आर्य! उन्हों ने अविचलित स्वर में पूर्ववत शांति के साथ कृपा बरसाई – था कहिये आर्ये! अब वह नहीं है। मृत्यु शाश्वत सत्य है। उससे कोई नहीं बचा। मृत्यु एकल दिशा में चलती है। आप का मृत पुत्र पुन: जी नहीं सकता। विधवा के करुण विलाप से अश्वत्थ वृक्ष की पत्तियाँ और डोलने लगीं। जन के नेत्रों में मौन आग्रह देख उन्हों ने विधवा से कहा – माता! जाओ... more »

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शिक्षा - रिक्त आकाश

प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम् 
आलोक का कहना है कि यदि एक वर्ष के लिये शिक्षा व्यवस्था को विराम दे दिया जाये, सारे विद्यालय बन्द कर दिये जायें तो विश्व के स्वास्थ्य पर कोई अन्तर पड़ने वाला नहीं है, यह भी संभव है कि कुछ उत्साहपूर्ण निष्कर्ष सामने आ जायें। आलोक चित्रकार हैं और सृजन और मुक्ति के मार्ग के उपासक हैं, उनके लिये बच्चों पर कुछ भी थोपना उनके सम्मान और अधिकार पर कैंची चलाने जैसा है। एक सीमा तक मैं भी उनसे सहमत हूँ, अर्थतन्त्र से प्रभावित शिक्षातन्त्र की बाध्यतायें हमारी राह सीमित कर देती हैं, लगता है कि हम हाँके जा रहे हैं, हम उस राह जाना चाहें, न चाहें। यदि किसी बच्चे को अपनी प्रतिभानुसार व्यवसाय या कार्य... more »

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सुना है ! कल रात मर गया वो.......

यादें....ashok saluja . at यादें... 
*न जाने कौन सा ज़हर है इन फिज़ाओं में * *ख़ुद से भी ऐतबार.उठ गया है अब मेरा .......*. ...अकेला *मरने वाले के साथ , कौन मरता है * *कल दिन में तो , अच्छा-भला था * *दिल में था कितने ...जख्म लिए वो * *ये गिनती भला...आज कौन करता है |* * **चलो अच्छा हुआ , मर गया वो......* * **जिन्दगी भर किन्ही ,सोचों में डूबा रहा * *अच्छा हुआ ...आज मर के तर गया वो* *जिन्दगी भर , तिल-तिल जलता रहा * *अच्छा हुआ ...आज पूरा जल गया वो * * **चलो अच्छा हुआ , मर गया वो.....* * **चलो अब , खत्म हुई मुलाकातें * *यहाँ पर जितने मुँह ...उतनी बातें* *बहुत पहले से ही था , मर गया वो * *जिन्दगी से जो ...था डर गया ... more »


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नमस्ते करने से क्या होगा ???

वृजेश सिंह at बसंत के विखरे पत्ते
सब्जी के बाजार में सोचता बचपन.. आज एक शिक्षक नें बच्चों को कहा कि अपने माता-पिता के पांव छूकर आना। इससे तुम्हें पढ़ना-लिखना आ जाएगा। तुम केवल परीक्षा के दौरान उनके पांव छूते हो, बच्चों ने सवाल का उत्तर हां में दिया। पता नहीं वे परीक्षा के दौरान भी ऐसा करते हैं या नहीं, लेकिन उन्होनें शिक्षक के सवालों का जवाब हां में दिया। मैं बच्चों की समझदारी देखकर दंग था कि अगर कोई सवाल पूछते हुए, कोई परिस्थिति निर्मित करते हुए अनुमान लगाता है तो वे उसको सही मान लेते हैं। शायद इसलिए ताकि बात आगे न बढ़े। मैं सोच रहा था कि माता-पिता के पांव छूने से क्या होगा ? उनको अच्छा लगेगा ! बुरा भी लग सकता है ?...more »
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मित्रों आशा है आज का यह बुलेटिन आपको पसन्द आया होगा...   तो फ़िर आज देव बाबा को इज़ाजत दीजिए और मिलते हैं एक छोटे से ब्रेक के बाद.. 

जय हिन्द
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7 टिप्पणियाँ:

Akash Mishra ने कहा…

सुंदर लिंक्स का संग्रह |

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

हमारी (आम आदमी) की पार्टी बन गयी है, अब तो हम भी खास हो लिये..जय हो..

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा…

आम आदमी की पार्टी की जय हो,,,

recent post : प्यार न भूले,,,

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया लिंक्स

वन्दना ने कहा…

सुन्दर बुलेटिन

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

सामयिक विषय और ताज़ा लिंक्स!!

Aap Smachar ने कहा…

आम आदमी जिंदाबाद

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