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शनिवार, 29 सितंबर 2012

सरकार मस्त.. जनता पस्त.. ब्लॉग बुलेटिन


कभी कभी सोचता हूँ कितना मुश्किल है हिंदुस्तान में आम आदमी का जीवन कितना कठिन है.. हम और आप शायद हर कोई ई-एम्-आई में बोझ तले दबे और कुचले हुए हैं... जिसे देखिये बस कर्ज तले डूबा है... सरकार को टैक्स देने के बाद इस मिडिल क्लास के हिस्से में कितना आता है.. और कितना जाता है... सोचना मुश्किल नहीं है.. हम और आप हमेशा उलझे ही रहेंगे इस किश्त के फेर में... ई-एम्-आई फ्री जीवन शायद कभी नहीं मिलने वाला... सरकार के हिसाब से टैक्सपेयर को सब्सिडी का सिलिंडर नहीं मिलना चाहिए और वह किसी राहत का पात्र नहीं है... इन-डायरेक्ट टैक्स की वसूली में हिंदुस्तान नंबर वन है..  हमारे देश में भिखारी भी टैक्स देता है.. और फिर डायरेक्ट टैक्स पेयर और इस मिडील क्लास के बारे में तो कहना ही क्या.. हम तो पैदा ही कर्जे में हुए थे और जैसे जैसे बड़े होते गए देश में आर्थिक सुधारों के नाम पर कर्जे में बढ़ोत्तरी ही होती गई... अब तो साहब रुपये की इस दुर्दशा को देख कर रोना आता है... क्या हालत हो गयी है अपनी.. एक डालर की कीमत पचपन रुपये ? क्या इस दुर्दशा के लिए सरकार ज़िम्मेदार नहीं.. पेट्रोल कंपनियों के घडियाली आंसू और दाम बढाती सरकार के तर्क की सच्चाई क्या है ? जी यकीं मानिए हिंदुस्तान की कोई भी तेल कंपनी किसी भी प्रकार से घाटे में नहीं हैं और सभी खूब मुनाफा कमा रही हैं और सरकारी मेहरबानी से फल-फूल रही हैं... 

डीजल की कीमत प्रति लीटर पांच रुपये बढ़ी... बाज़ार तुरंत चढ़ गया...  आलू सीधा तीस रुपये की रेंज में और प्याज बीस रुपये की रेंज में आ गया...   अब साहब पता तो हर किसी को है लेकिन बोले कौन...  हम और आप तो अपनी ई-एम्-आई की जुगाड़ में लगे हैं न...  लगे रहेंगे..  यह सब सरकारी साजिश है हर किसी को फ़साने और अपने आप में उलझा देने की... मित्रों आज़ादी के बाद जब कांग्रेसी सरकारों ने औद्योगीकीकरण के राह पर अपने कदम बढ़ाये थे तक कोई माडल साथ नहीं था और भेड़-चाल चाल रही थी... आज भी कमोबेश वही स्थिति है.. कुछ बदला नहीं है वरन कुछ घरानों की तरक्की हुई है और बाकी पूरे देश में मामला फसा हुआ है... छोटे और मझोले व्यापारी अपना वजूद बचाए रखने के लिए जूझ रहे हैं और कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों को छोड़ कर पूरे देश में उहा-पोह की ही स्थिति है.. महंगाई अपने चरम पर है और डिमांड सप्लाई की इस श्रंखला में बन्दर-बाट जोरो पर है.. कहना गलत न होगा लेकिन सरकारी नीतिया कुछ वर्ग विशेष के लिए ही हैं.. हम और आप सरकार के लिए एक खिलौना हैं जिसके साथ सरकार जब चाहे तक खेल सकती है.. बाकी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है.. सतीश जी का यह कार्टून अपने आप में सब कुछ कह रहा है... 


कार्टून साभार श्री सतीश आचार्य
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अब आज के बुलेटिन की और चलते हैं।
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मित्रों आशा है आपको आज का बुलेटिन पसंद आया होगा। तो फिर मिलते हैं कल फिर से एक नए मुद्दे और कलेवर के साथ। तब तक देव बाबा को इजाजत दीजिये।

जय हिंद 

6 टिप्पणियाँ:

Amit Srivastava ने कहा…

बहुत खूब |

expression ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन....कुछ लिंक्स पढ़े...कुछ कल सवेरे...

आभार
अनु

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

शुभप्रभात :)
एक से बढ़ कर एक लिंक आप चुन कर लाते हैं !!
शुभकामनाएं .............. :))

Virendra Kumar Sharma ने कहा…

कुछ व्यापारिक प्रतिष्ठानों को छोड़ कर पूरे देश में उहा-पोह(ऊहापोह ) की ही स्थिति है.. महंगाई अपने चरम पर है और डिमांड सप्लाई की इस श्रंखला में बन्दर-बाट (बाँट )जोरो(ज़ोरों )......ज़ोरों .... पर है.. कहना गलत न होगा लेकिन सरकारी नीतिया (नीतियाँ )......नीतियाँ ........कुछ वर्ग विशेष के लिए ही हैं.. हम और आप सरकार के लिए एक खिलौना हैं जिसके साथ सरकार जब चाहे तक खेल सकती है.. बाकी कुछ कहने की ज़रूरत नहीं है.. सतीश जी का यह कार्टून अपने आप में सब कुछ कह रहा है... ...

सही तर्ज़े बयाँ है आज़ादी का , ब्लॉग बुलेटिन का .

याद रखे दुनिया ,तुम एसा (ऐसा ).....ऐसा .....कुछ कर जाओ...

व्यंग्य कीमती लोग कीमती भोग गत ६५ सालों के सरकारी रवैये का कच्चा चिठ्ठा है ,अल्हड़ लड़की का चाँद सशक्त रचना है ...जानती हूँ तुम्हे नींद की चादर मुझे उड़ानी(उढानी).....ओढना ... है चाँद

बच्चों की खिलती मुस्कान ...

नियत दिन आया, सारे बच्चे नहा धोकर आलोक की प्रतीक्षा कर रहे थे, उन बच्चों में ट्रक ड्राइवरों, निर्माण कार्य में लगे मजदूरों, घर मे काम करने वाली बाईयों(बाइयों )....बाइयों ... मछुआरों और वेश्याओं (वैश्या....वैश्याओं...) बच्चे थे। ....कंक्रीट शब्द .....कोंक्रीट से बेहतर है ....

प्रवीण जी के सभी आलेख एक फलसफा लातें हैं जीवन और जगत से जुड़ा एक विमर्श भी ,यह आलेख भी उसी की अगली कड़ी है ....

'मैं कई नगरों में कार्यशालायें आयोजित करता हूँ, सबको एक चित्र बनाने को देता हूँ, आधे समय के बाद सबके चित्र आपस में बदल देता हूँ और एक दूसरे के चित्र पूरे करने को कहता हूँ। नगर के बच्चे कहते हैं कि यह ठीक नहीं है, हमारा चित्र आपने दूसरे को कैसे दे दिया, हमने इतनी मेहनत से बनाया था? ठीक उसी तरह जिस तरह आधुनिक मैनेजर अपनी योजनाओं से चिपका रहता है, अपनी उपलब्धियों से चिपका रहता है, दूसरों के कार्य उसके लिये महत्वहीन हों मानो। और इन बच्चों को देखो, इन्होने आज तक कभी कोई शिकायत नहीं की है, इन्हें जो भी, जैसा भी, आधा अधूरा चित्र दे दो, उसे भी अच्छा बनाने में लग जाते हैं। काश हम सब भी अन्य की कृतियों और कार्यों के प्रति यही भाव रखें, सब विशिष्ट हैं। मैं हर बार इनके पास बस यही सीखने आता हूँ और यही मेरा पारिश्रमिक भी है।' आलोक प्रवाह में बोलता जा रहा था।

यह दृष्टि सिर्फ प्रवीण जी के ही पास है .समाज को ऐसे ऊर्ध्वगामी बनाने वाले आलेखों की आज बहुत ज़रुरत है .

कुलमिलाकर ब्लॉग बुलेटिन का स्तर अपना ही अतिक्रमण कर रहा है दिनानुदिन .

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

कुछ लिंक तो बहुत जोरदार हैं। जैसे-सुनिल जाना.. वाला।

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बहुत ही प्रभावी बुलेटिन..

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