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सोमवार, 6 अगस्त 2012

वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (कथा-कहानी) का तस्लीम परिकल्पना सम्मान-२०११ चंडी दत्त शुक्ल





वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (कथा-कहानी) का तस्लीम परिकल्पना सम्मान-२०११ चंडी दत्त शुक्ल

चौराहा जिसकी शुरुआत शुक्ल जी ने 2008 में आलेखों , कहानियों और कविताओं से किया

बचपन, बारिश और चाय से .

गरम-गरम सांसों की सरसराहट ने कहा,हाथ में गरम-गरम चाय की एक जोड़ी प्याली उठाओ. चलो, बस चलो, चल दो, लोग सुनें कदमों की आहट. एक जो तुम्हारे पैर हों, दूसरे तुम्हारे साथी के. हम चले, तभी दो बूंदें आसमान से उतरीं, गिरने लगीं तो अधखुली आंखों ने,पलकों ने, गैर-अघाई बाहों ने उन्हें लोक लिया...धीरे-धीरे बारिश बढ़ी, भीगने लगे हम, मन में आग दहकती हुई, पानी पड़ा और उठा धुआं. यादों का ऐसा धुआं, जिनमें कुछ सीलने, सुलगने की महक शामिल है...याद आया बचपन, धुंधलाया पर नए-नकोर बुशर्ट जैसा...चेहरे पर छा गया एक रुमाल, यादों की मीठी महक से महकता हुआ...
बहुत दिन बाद जुर्राबें उतार, पार्क की हरी घास पर नंगे पैर टहलने का दिल किया...दफ्तर का वक्त था, दस्तूर भी न था,फिर भी जूते फेंके टेबल के नीचे, मैं और वो...नहीं तुम नहीं, वो भी नहीं...एक और साथी...पार्क की ओर चल दिए...हम चाय की प्याली लिए पार्क की एक बेंच की दीवाल पर ऊपर उठंगे हुए...साथी से कहा, घास पर चलें पर वो नहीं माना...उसके कपड़े गंदे हो जाते...मैं नीचे आ गया...वहां ढेर सारा पानी था, गंदगी भी रही होगी पर नहीं...घास महक रही थी...पानी भी मुझे अपनी ओर खींच रहा था...मैं एक बड़ा--कमाऊ और जिम्मेदार इंसान नहीं, छोटा सा बच्चा बन गया था...बारिश थम गई है...मैं फिर जुर्राबें पहनकर दफ्तर में आ गया हूं...तुम भी साथ नहीं हो, बस कंप्यूटर है और आठ घंटे की नौकरी...बारिश फिर से आएगी न...मैं भीगूंगा और तुम भी..."

बचपन बीत गया है, बारिश थम चुकी है ... चाय ठंडी हो, उससे पहले मैं इस चौराहे पर हूँ एक राह , एक ख्याल की तलाश
में ...और मिली है मुझे

गौरैया


एक सुर्ख शाम

डूबा नहीं सूरज अभी

पर

दीवार के पांवों तक

घिर रहा अंधेरा.

अभी-अभी

चहकी है गौरैया

घर जाएगी अब

बता रही है

पहले बारिश तो थम जाने दो

सुबह होगी

फिर आएगी

उसकी टोली...

गौरैया बारिश से नहीं डरती

वो उड़ना चाहती है

बूंदों के बीच

पर जानती है

पंख भीग जाएंगे तो नहीं उड़ पाएगी

भूल करती है गौरैया फिर भी

वो बढ़ती है घर की ओर

जो है बाज के बगल

चहको गौरैया

गिलहरी भी तुम्हारे साथ फुदकेगी

पर

बाज से बचकर

हंसो

करो कलरव

पर

थमकर..."


शुक्ल जी की कलम ने हर विषयों को छुआ है .... और हर विषय में कलम की ज़ुबान सक्रीय है ... चलिए सबकी
बानगी देखिये -


अयोध्या का दर्द



राजा राम की राजधानी अयोध्या...।
यहीं राम के पिता दशरथ ने राज किया...यहीं पर सीता जी राजा जनक के घर से विदा
होकर आईं। यहींश्रीराम का राज्याभिषेक हुआ। यहीं बहती है सरयू, लेकिन अब नदी की
मस्ती भी कुछ बदल-सी गई है।कहां तो कल तक वो कल-कल कर बहती थी और आज,
जैसेधारा भी सहमी-सहमी है...धीरे-धीरे बहती है।पता नहीं, किस कदर सरयू प्रदूषित हो गई
है...कुछ तो कूड़े-कचरे से और उससे भी कहीं ज्यादा सियासत कीगंदगी से। सच कहती हूं...
आजसे सत्रह साल पहले मेरा, अयोध्या का कुछ लोगों ने दिल छलनी कर दिया...वो मेरी मिट्टी
मेंअपने-अपने हिस्से का खुदा तलाश करने आए थे...।ऐसा पहली बार नहीं हुआ...सैकड़ों साल
सेमज़हबों के नाम पर कभी हिंदुओं के नेता आते हैं, तो कभी मुसलमानों के अगुआ आ धमकते
हैं...वो ज़ोश से भरी तक़रीरे देते हैं...अपने-अपने लोगों को भड़काते हैं और फिर सब मिलकर
मेरे सीने परघाव बना जाते हैं...। कभी हर-हर महादेव की गूंज होती है,तो कभी अल्ला-हो-
अकबर की आवाज़ें आती हैं....लेकिन ये आवाज़ें, नारा-ए-तकबीर जैसे नारे अपने ईश्वर को याद
करने के लिए लगाए जाते हैं...? पता नहीं...ये तो ऊंची-ऊंची आवाज़ों में भगवान को याद
करने वाले जानें, लेकिन मैंने, अयोध्या ने तो देखा है...अक्सरभगवान का नाम पुकारते हुए
आए लोगों ने खून की होलियां खेली हैं...और हमारे घरों से मोहब्बत लूट लेगए हैं। जिन
गलियों में रामधुन होती थी...जहां ईद की सेवइयां खाने हर घर से लोग जमा होते थे...वहां अब
सन्नाटा पसरा रहता है...वहां नफ़रतों का कारोबार होता है।
किसी को मंदिर मिला, किसी को मसज़िद मिली...हमारे पास थी मोहब्बत की दौलत, घर
को लौटे, तोतिज़ोरी खाली मिली। छह दिसंबर, 1992 को अयोध्या में जो कुछ हुआ...हो गया
पर वो सारा मंज़र अब तकयाद आता है...और जब याद आता है, तो थर्रा देता है। धर्म के नाम
पर जो लोग लड़े-भिड़े, उनकी छातियां चौड़ीहो जाती हैं...कोई शौर्य दिवस मनाता है, कोई
कलंक दिवस, लेकिन अयोध्या के आम लोगों से पूछो--वो क्यामनाते हैं, क्या सोचते हैं।
बाकी मुल्क के बाशिंदे क्या जानते हैं...क्या चाहते हैं? वो तो आज से सत्रह सालपहले का
छह दिसंबर याद भी नहीं करना चाहते, जब एक विवादित ढांचे को कुछ लोगों ने धराशायी
कर दिया था। हिंदुओं का विश्वास है कि विवादित स्थल पर रामलला का मंदिर था। वहां
परबनेगा तो रामका मंदिर ही बनेगा...। मुसलिमों को यकीन है कि वहां मसज़िद थी।
जिन्हें दंगे करने थे, उन्होंने घर जलाए, जिन्हें लूटना था, वो सड़कों पर हथियार लेकर दौड़े
चले आए।नफरतों का कारोबार उन्होंने किया...और बदनाम हो गई अयोध्या...मैंने क्या
बिगाड़ा था किसीका?.............................."

चौराहे पर चलते चलते कदम ठिठके हैं कई कविताओं के आगे और उठा लायी हूँ आपके लिए -

पेश है एक ख्वाहिश -

काश! तुम होते
गर्म चाय से लबालब कप
हर लम्हा निकलती तुम्हारे अरमानों की भाप…
दिल होता मिठास से भरा
काश!
मैं होती
तुम्हारी आंख पर चढ़ा चश्मा..
सोचो, वो भाप बार-बार धुंधला देती तुम्हारी नज़र
काश! मैं होती रुमाल…
और तुम पोंछते उससे आंख…
हौले-से ठहर जाती पलक के पास कहीं
झुंझलाते तुम…
काश, होती जीभ मैं तुम्हारी
गोल होकर फूंक देती…आंख में…।
काश,
हम दोनों होते एक ही हाथ में
उंगलियां बनकर साथ-साथ
रहते हरदम संग,
वही
गर्म चाय से लबालब कप पकड़ते हुए
छू लेते एक-दूसरे को, सहला लेते…
काश, मैं होती तेज़ हवा,
उड़ाती अपने संग धूल
बंद हो जाती सबकी नज़र, पल भर को ही सही
जब तुम छूते मुझे
कोई देख भी ना पाता.."

अरुणा शानबाग के आंसू प्रायः हर कलम की आग बने हैं . शुक्ल जी की कलम से

मौत की गुज़ारिश!

हर तरफ अंधेरा है...उसकी आंखों से रोशनी गैरहाज़िर है, इसलिए काले रंग से उसे कोई शिकायत नहीं। दिल धड़कता है, सांसें चलती हैं, जान बाकी है, वो औरत है और आप कह सकते हैं—है तो ज़िंदगी, क्योंकर हो शिकवा...। फिर भी, उसकी सहेली पिंकी वीरानी चाहती थी कि उसे मौत नसीब हो...जल्द से जल्द मिले मर जाने की दुआ। मौत, यहां सज़ा नहीं थी, दवा थी। अरुणा शानबाग के लिए सबसे बड़ी दवा।
1973 की बात है। कोई सैंतीस साल पहले का वाकया, जिसके बाद अरुणा पत्थर बन गई। वो मुंबई के अस्पताल में नर्स थी, दुखियारों के घावों पर मरहम लगाती थी, अब बिस्तर पर पड़ी है। हिल नहीं सकती, सोच नहीं सकती, बोल नहीं पाती। अरुणा मर चुकी है, महज दिमाग ज़िंदा है। तीन दशक से अरुणा कोमा में है। उसके साथ अस्पताल के ही एक वार्ड ब्वाय ने कुकर्म किया और इस कोशिश में अरुणा के गले में जंजीर डालकर उसे बिस्तर से बांध दिया। आरोपी फरार है और अरुणा कैद रह गई है। इस हादसे में होशोहवाश जाते रहे और वो हमेशा के लिए ज़िंदा लाश में तब्दील हो गई।
सर्वोच्च न्यायालय ने ताज़ा फैसले में कहा है—अरुणा के साथ नाइंसाफ़ी हुई, पर उसे इच्छामृत्यु की इजाज़त नहीं दी जा सकती। कारण महज इतना कि अरुणा के लिए ऐसे निर्देश देने की याचिका मित्र पिंकी वीरानी ने दायर की थी। ख़ैर, बात अरुणा की नहीं, इस मुद्दे की है। इस सवाल की है कि इच्छामृत्यु का हक़ मिलना चाहिए या नहीं। या फिर ऐसी इच्छा पलायन है, ज़िंदगी से भागने की कोशिश है, कमज़ोरी की निशानी है।
जवाब में भी एक सवाल ही पैदा होता है—क्या जीवन का नाम महज सांस है...धड़कनें हैं...लाश जैसा ही सही, रक्तसंचार से गर्माया हुआ शरीर भर है।
सवाल यह भी है कि जीवन के लिए ज़रूरी चेतना, खुशी, सुख, उपलब्धियां और माहौल नहीं है, तो ऐसी ज़िंदगी के क्या मायने हैं?
माना, अरुणा के अस्पताल की नर्सें उसे जी-जान से प्यार करती हैं, इतनी सेवा करती हैं कि उसके बदन पर कभी घाव तक नहीं होने दिए, लेकिन इन सबका क्या फायदा? अरुणा तो हमेशा के लिए बेहोश हो चुकी है। कभी होश में आएगी भी, तो उसके हाथ वेदना से
भरा खाली जीवन ही होगा। ना परिवार, ना खुशी का एक भी क़तरा।
बहुतेरे लोग इस बात से इत्तिफाक़ नहीं रखते। वो कहते हैं—जीवन ईश्वर की देन है। जीवहत्या पाप है। हमें भी इत्तिफाक़ है उनकी बात से...लेकिन अरुणा के जीवन में जीवन जैसा कुछ भी था ही कहां?
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद इच्छामृत्यु को लेकर बहस फिर गरमा गई है। कुछ अरसा पहले रिलीज़ फ़िल्म गुज़ारिश को लेकर भी विवाद हुआ था। जैसे, अरुणा प्यार भरी छुअन से तन-मन की हर तकलीफ़ दूर कर देती थी, ठीक वैसे ही तो गुज़ारिश का जादूगर अपने करतबों से सबके चेहरे पर मुस्कान खिला देता था। जैसे सबकी ज़िंदगी खुशियों के फूल से हरदम नहीं महकती, उसी तरह हर फ़िल्म सुखांत नहीं होती...सो गुज़ारिश का जादूगर भी लकवे का शिकार हो जाता है। चल नहीं पाता...महज बैठे-सोते-सिसकते हुए घिसटती ज़िंदगी की गाड़ी को रेंगते हुए देखता है। तभी तो कहता है--मुझे मृत्यु चाहिए।
... तब भी नैतिकता-मानवतावादियों ने खूब शोर मचाया था, कहा गया था—गुज़ारिश अनैतिक पाठ पढ़ाती है...लेकिन क्या हमें उस जादूगर के दर्द की परवाह नहीं होनी चाहिए थी? अरुणा भी तो ऐसे ही दर्द से भरपूर है। वो चीख सके, इतनी समझ भी नहीं है उसके पास...क्या मौत के बाद उसका जीवन खत्म हो जाएगा...? पुनर्जन्म जैसी आध्यात्मिक सोच को स्वीकार करें, तब तो कह सकते हैं--एक नया जीवन ही उसे मिलेगा।
अरुणा पहली इंसान नहीं, जिसके लिए इच्छामृत्यु की गुहार लगाई गई। अपनी मर्जी से दुनिया को अलविदा कह देने की आरज़ू बहुतों की रही है। दो-तीन साल पहले ही उत्तर प्रदेश में एक व्यक्ति ने दस से सोलह साल की उम्र के अपने बच्चों के लिए इच्छामृत्यु मांगी थी। ये बच्चे पैरों पर खड़े नहीं हो सकते थे। 2008 में हिमाचल प्रदेश की एक इंजीनियर सीमा ने भी इसकी इजाज़त चाही थी। वो आर्थराइटिस से परेशान थी और तेरह साल से एक कमरे के अंधेरे में क़ैद रही। शतरंज खिलाड़ी वेंकटेश ने जीवन रक्षक व्यवस्था के तहत ज़िंदगी बिताने की बहुत जद्दोज़हद की। जब डॉक्टरों ने जवाब दे दिया, तो उसकी मां ने गुहार लगाई—अब मेरे बेटे को मौत ही मिल जाए।
उत्तर प्रदेश के बांदा के बबेरू कस्बे में हृदय रोग से पीड़ित एक दलित छात्रा ने इच्छामृत्यु की इजाज़त ना मिलने के बाद आमरण अनशन शुरू कर दिया, तो झारखंड का दिलीप मचुआ इच्छामृत्यु की मांग करते-करते मर ही गया। बैतूल में सेवा से बेदखल एक कर्मचारी ने बीवी और पांच बेटियों के साथ इच्छामृत्यु की अनुमति मांगी, वहीं इलाहाबाद में 14 वर्षो से ज्यादा समय से जेल में बंद उम्रकैद की सजा पाए 97 कैदियों की गुहार भी यही थी। एचआईवी ग्रस्त लोगों, भुखमरी के शिकार किसानों, अत्याचार से पीड़ित लड़कियों ने भी इच्छामृत्यु की आरज़ू बार-बार दोहराई है। पटना के तारकेश्वर सिन्हा की याचिका चर्चा में रही है, जिसमें उन्होंने पांच साल से बेहोश पत्नी कंचनदेवी को इस पीड़ा से मुक्त कराने की गुज़ारिश की थी।
इन याचनाओं और याचिकाओं के हवाले से बात साफ़ है कि फ़िल्म `मदर इंडिया’ में भले ही नायिका गुनगुनाती रहे—जीवन है अगर ज़हर, तो जीना ही पड़ेगा, लेकिन हर इंसान विष पीने वाला शिव नहीं बन पाता। यह बात एकदम सही है कि कंटकों से जूझकर गुलाब तक पहुंचने वाला ही असली योद्धा होता है, लेकिन इसे भी कैसे गलत कहें कि जब सांस-सांस में शीशा घुल जाए, आंख-आंख में यह बात झलकने लगे कि दुनिया अपने काम की नहीं रही, तो कोई कैसे ज़िंदा रहने की ठान पाए।
मुद्दा मौजूं है...सोचने को मज़बूर करता है। इसे महज भावुक होकर, धार्मिकता के हवाले से हवा में उड़ाया नहीं जा सकता।
बहुतेरे डॉक्टर मानते हैं कि वो अपने प्रोफेशन में ऐसे कदम उठा चुके हैं, जब उन्होंने मरीज की तकलीफ़ की इंतिहां देखकर
उसके इलाज में ढील बरती और उसे चैन की आखिरी सांस लेकर दुनिया छोड़ने का मौका दे दिया। रायपुर के मेडिकल कॉलेज
में इस बारे में ज़बर्दस्त बहस भी हो चुकी है। 2010 में भावी डॉक्टरों ने तर्क दिया था कि देश के अस्पतालों में कुछ निश्चित बेड उपलब्ध हैं। डॉक्टरों की बेहद कमी है। ऐसे में कोई व्यक्ति जीवन की इच्छा और संभावना, दोनों खो चुका है, तो उसे मरने देना चाहिए।
मुद्दा यह नहीं कि अरुणा या उसके जैसे अनेकों लोगों को इच्छामृत्यु की इजाज़त मिले या नहीं...या फिर इच्छामृत्यु आत्महत्या की ही एक किस्म है और इससे बाज आना चाहिए। चिंतन के बिंदु और हैं, जो खास हैं। अहम बात ये है कि कष्ट, संत्रास और खोखलेपन के अहसास के बीच यदि कोई जीवन की लड़ाई से चले ही जाना चाहे, तो उसे क्यों मज़बूर किया जाए—नहीं जियो,
तुम्हें जीना ही होगा। कहा जा रहा है कि इच्छामृत्यु को अनुमति मिल गई, तो लोग अपने छुटकारे के लिए इसका गलत फायदा उठाएंगे, लेकिन इसका भी हल है। सरकार, समाज और परिवार की सतर्क निगाह से ऐसे किसी भी दुरुपयोग पर रोक लगाई जा सकती है।
यूं भी, देश की संस्कृति में इच्छामृत्यु का इतिहास रचा-बसा है। भीष्म पितामह ने तीरों की शैया पर लेटकर मृत्यु की प्रतीक्षा
की। राम-लखन ने जलसमाधि ली। बहुत से साधु-संतों, खासकर जैन धर्मावलंबियों ने जीवन को निस्सार मानकर स्वतः प्राण त्यागे। ध्यान देने की बात ये कि इनमें से किसी ने आत्महत्या नहीं की, विधिवत मृत्यु को ग्रहण किया। उन्हें कष्ट नहीं था,
लेकिन वह जान चुके थे कि जीवन संपूर्ण हो चुका है और अब महज निस्सारता शेष है।
इस सबके बावज़ूद यह सवाल अब भी जवाब के इंतज़ार में है—जीवन से तंग आकर इच्छामृत्यु चुनने का अधिकार मिले या फिर ज़िंदगी से जंग जारी रखी जाए...। इसका उत्तर तलाशते हुए मुझे
`सॉरो ऑफ बेल्जियम’ के रचनाकार ह्यूगो क्लॉस की एक बात याद आती है। उन्होंने कहा था—`मैं एक ऐसा आदमी हूं, जो जैसा चल रहा है, उससे नाखुश है। दुनिया जैसी है, उसे उसी रूप में हम स्वीकार नहीं कर सकते। जिस तरह से अन्याय हो रहे हैं, उसे देखते हुए हमें हर सुबह एक नाराज़ इंसान के तौर पर आंखें खोलनी चाहिए।‘ ह्यूगो की नाराज़गी जब हद से गुज़र गई, तो उन्होंने 78 साल की उम्र में एल्जाइमर्स से मिली तकलीफ़ ना झेलने की ठानी और इच्छामृत्यु चुन ली। वहां निराशा नहीं थी, पलायन नहीं था। वो जान चुके थे—ऐसी ज़िंदगी के कोई मायने नहीं।
कमोबेश, मैं भी यही सोचता हूं। ज़िंदगी अगर सचमुच ज़िंदा है...जीवन की शर्तों को पूरी करती है, आनंद-उपलब्धि और संतोष
के साथ, तब ही उसका मतलब है। हो सकता है, आपको यह बात पलायन से भरी लगे। खिन्नता और कुंठा से सनी हुई नज़र आए, लेकिन ऐसी सोच ना बने, इसकी ज़िम्मेदारी भी तो हमें ही उठानी होगी। क्यों ना हम, फिर किसी अरुणा को बलत्कृत ना होने दें। कोई किसान भूखा ना मरे, इसके लिए रोटी, अनाज और बीज का इंतज़ाम करें। अगर हम ऐसा कर पाए, तो फिर इच्छामृत्यु की ज़रूरत ही ना होगी। दुनिया खूबसूरत बनेगी और उसमें हमारा योगदान भी होगा। ऐसा होगा ना?"

चण्डीदत्त शुक्ल की दो नई कविताएं


देती है दस्तकें , लहरों सा संवेग कितना कुछ समेट लाया है चौराहे पर ...

सो जाओ कि रात बहुत गहरी है, काली है
सो जाओ कि अब कोई उम्मीद नहीं जगाएगा तुम्हारे मन के लिए
सो जाओ कि बंगाल से लेकर मद्रास तक, समुद्र का जल नाराज़ है तुमसे।
दिशाएं पूछती हैं, सनसनाकर हरदम, क्यों हारे तुम, इतना प्रेम किया था क्यों?
सो जाओ कि देश की किसी नायिका की आंख तुम्हारे लिए गीली नहीं होने वाली।
सो जाओ कि प्रेम एक घिसा-पिटा, दोहराए जाने को मज़बूर शब्द भर है।
सो जाओ कि गीली लकड़ी की तरह निरर्थक जलावन है प्रेम,
निहायत दुख के वक्त सिर्फ घुटन भरा धुआं पैदा करेगा।
सो जाओ कि एक और उदास दिन तुम्हारी प्रतीक्षा में है।
एक सुबह, जिसमें मशीन की तरह काम और निष्फल इच्छाएं तुम्हारा रास्ता ताकती होंगी।
सो जाओ कि किसी और को न सही, तुम्हें खुद से एक झीना-सा लगाव तो है।
तुम अब भी प्रेम करते हो न उस लड़के को,
जो प्रेम करते वक्त रोता था, हंसता था, खिलखिलाता था और नंगे पैरों चूमता था हरी-हरी घास को।
सो जाओ कि कुछ और कविताएं लिखना।
उन्हें पढ़कर कुछ लोग रोएंगे। टूटेंगे...। कोई-कोई सिर भी धुनेगा, फिर कुछ तो राहत मिलेगी तुम्हें और उन्हें।
सो जाओ कि निराशा से लबालब इस काव्य के बाद,
सकारात्मक जीवन के लिए कुछ भाषण तुम्हें तैयार करने होंगे।
सो जाओ, कि अब तुम प्रेम में होते हुए भी, प्रेम में नहीं हो।
सो जाओ, क्योंकि खुदकुशियों से भी कुछ भला नहीं होता।
सो जाओ, क्योंकि ज्यादा जागने और बहुत रोने से,
दिन भर आंख रहेगी लाल।
करीब चालीस की उम्र में, लोग कहते हैं, उदास दिखना, उदास होने से ज्यादा खराब समझा जाता है।


एक और कविता

एक दोस्त ने पूछा...कल रात,
तुम्हें, आखिर नींद क्यों नहीं आती...
जागते रहते हो उल्लुओं की तरह...
सो क्यों नहीं जाते...
मैं क्या कहता,
फिर एक बार ओढ़ ली, शब्दों की चादर.
कहने लगा...
वसंत ने आज ही द्वार खटखटाया है
रात ने ब्रश किए हैं शायद
हवा ठंडी है कुछ ज्यादा ही
चांद भी आंख-मुंह धोकर आया है
चांदनी मतवाली-सी फिर रही है...
पत्तियां नए कपड़े पहनकर इतराती हुईं।
फूल और महकते,
परिंदे और चहकते हुए
सब पूछते- तुम उदास क्यों हो?
मैंने भी घर की सब खिड़कियां खुली छोड़ी हैं...
शायद, हवा, खुशबू और चांदनी के साथ वसंत भी आकर ठहर जाए
पुराने अखबार पर जमी धूल खिसकाकर, जमके बैठे जाए।
मुझे सोता देखकर लौट गया फिर... फिर क्या करूंगा...?"

चार राहें .... उद्वेलित सोच - विराम , पाना-खोना , हँसी, उदासी ..... जीवन के गंभीर सुर इस चौराहे पर हैं , जब दिल को कोई तलाश हो तो शुक्ल जी का चौराहा आपका सहयात्री होगा ,जो
कहेगा


15 टिप्पणियाँ:

expression ने कहा…

बधाई हो बधाई....

आभार रश्मि दी.
अनु

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

बधाई!!

रविकर फैजाबादी ने कहा…

shubhkamnayen

संतोष त्रिवेदी ने कहा…

बधाई हो सुकुलजी :-)

dheerendra ने कहा…

चंडी दत्त शुक्ल जी को बहुत२ बधाई,,,,,

veerubhai ने कहा…

बधाई शुक्ल जी ,शुक्रिया रश्मि प्रभा जी .बहुत बढ़िया प्रस्तुति .धन्य हुए पढके .
सोमवार, 6 अगस्त 2012
भौतिक और भावजगत(मनो -शरीर ) की सेहत भी जुडी है आपकी रीढ़ सेविकर भाई बड़ा ही दुखद रहा है यह प्रसंग .राजनीति के आश्रय में कभी प्रेम पल्लवित नहीं हो पाता .

वाणी गीत ने कहा…

चंडीदत्त जी स्वयं एक सशक्त हस्ताक्षर हैं !
बधाई !

वन्दना ने कहा…

बधाई और शुभकामनायें।

peer educators ने कहा…

चाँदी, तुम सोना लिखते हो, बहुत खूब !!

peer educators ने कहा…

चाँदी, तुम सोना लिखते हो, बहुत खूब !!

शिवम् मिश्रा ने कहा…

वाह ...जय हो ... बहुत बहुत बधाइयाँ !

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

badhai..

सदा ने कहा…

बधाई सहित शुभकामनाएं ...
आपका आभार

सुज्ञ ने कहा…

बधाई और शुभकामनाएँ !!

राजीव तनेजा ने कहा…

बहुत बहुत बधाई...

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