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मंगलवार, 14 अगस्त 2012

६६ वे स्वतंत्रता दिवस से पहले उषा जी का खुफिया कांग्रेस रेडियो - ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो ,
प्रणाम !

कल 15 अगस्त है ... हमारे देश का ६६ वा स्वतंत्रता दिवस है कल ... इस आज़ादी को पाने के लिए हम सब ने बहुत कुछ खोया है ... और बदले जो मिला है आज उसको बचाए रखना सब से बड़ी चुनौती है हम सब के लिए ! समय समय पर आपको आज़ादी के दिवानों से मिलवाता रहा हूँ ... तो आज भला कैसे चूक जाता ...

भारत छोड़ो आंदोलन के समय खुफिया कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण पूरे देश में विख्यात हुई उषा मेहता ने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई थी और आजादी के बाद वह गांधीवादी दर्शन के अनुरूप महिलाओं के उत्थान के लिए प्रयासरत रही।
उषा ने भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान अपने सहयोगियों के साथ 14 अगस्त 1942 को सीक्रेट कांग्रेस रेडियो की शुरूआत की थी। इस रेडियो से पहला प्रसारण भी उषा की आवाज में हुआ था। यह रेडियो लगभग हर दिन अपनी जगह बदलता था, ताकि अंग्रेज अधिकारी उसे पकड़ न सकें। इस खुफिया रेडियो को डा. राममनोहर लोहिया, अच्युत पटवर्धन सहित कई प्रमुख नेताओं ने सहयोग दिया। रेडियो पर महात्मा गांधी सहित देश के प्रमुख नेताओं के रिकार्ड किए गए संदेश बजाए जाते थे।
तीन माह तक प्रसारण के बाद अंतत: अंग्रेज सरकार ने उषा और उनके सहयोगियों को पकड़ा लिया और उन्हें जेल की सजा दी गई। गांधी शांति प्रतिष्ठान के सचिव सुरेन्द्र कुमार के अनुसार उषा एक जुझारु स्वतंत्रता सेनानी थी जिन्होंने आजादी के आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। वह बचपन से ही गांधीवादी विचारों से प्रभावित थी और उन्होंने महात्मा गांधी द्वारा चलाए गए कई कार्यक्रमों में बेहद रुचि से कार्य किया।
गांधीवादी सुरेन्द्र कुमार ने भाषा को बताया कि आजादी के बाद उषा मेहता गांधीवादी विचारों को आगे बढ़ाने विशेषकर महिलाओं से जुडे़ कार्यक्रमों में काफी सक्रिय रही। उन्हें गांधी स्मारक निधि की अध्यक्ष चुना गया और वह गांधी शांति प्रतिष्ठान की सदस्य भी थीं। 25 मार्च 1920 को सूरत के एक गांव में जन्मी उषा का महात्मा गांधी से परिचय मात्र पांच वर्ष की उम्र में ही हो गया था। कुछ समय बाद राष्ट्रपिता ने उनके गांव के समीप एक शिविर का आयोजन किया जिससे उन्हें बापू को समझने का और मौका मिला। इसके बाद उन्होंने खादी पहनने और आजादी के आंदोलन में भाग लेने का प्रण किया।
उन्होंने बंबई विश्वविद्यालय से दर्शनशास्त्र में स्नातक डिग्री ली और कानून की पढ़ाई के दौरान वह भारत छोड़ो आंदोलन में पूरी तरह से सामाजिक जीवन में उतर गई। सीक्रेट कांग्रेस रेडियो चलाने के कारण उन्हें चार साल की जेल हुई। जेल में उनका स्वास्थ्य बहुत खराब हो गया और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। बाद में 1946 में रिहा किया गया।
आजादी के बाद उन्होंने गांधी के सामाजिक एवं राजनीतिक विचारों पर पीएचडी की और बंबई विश्वविद्यालय में अध्यापन शुरू किया। बाद में वह नागरिक शास्त्र एवं राजनीति विभाग की प्रमुख बनी। इसी के साथ वह विभिन्न गांधीवादी संस्थाओं से जुड़ी रही। भारत सरकार ने उन्हें पद्मविभूषण से सम्मानित किया। उषा मेहता का निधन 11 अगस्त 2000 को हुआ।

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क्यूंकि जनता मे देशभक्ति इज़ कमिंग बैक 
हमारा भी 
शायद 
तो सरकार कौन सा भोला है 
बस भारत हो इतना बहुत है 
हम खुद 
१०० मे से ९९ बेईमान 
हम इंतज़ार करेंगे 
है भी या नहीं 
रहने को घर नहीं है ... सारा जहां हमारा 
कौन है आजकल 

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अब आज्ञा दीजिये ...

जय हिन्द !!

15 टिप्पणियाँ:

dheerendra ने कहा…

वे क़त्ल होकर कर गये देश को आजाद,
अब कर्म आपका अपने देश को बचाइए!

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए,,,,

मेरी रचना को ब्लॉग बुलेटिन में शामिल करने के लिए आभार,,,,,

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया बुलेटिन
मुझे शामिल करने के लिए शुक्रिया

आशा जोगळेकर ने कहा…

बढिया लिंक्स । मेरी पोस्ट शामिल करने का आभार ।

Dev K Jha ने कहा…

वन्दे मातरम........

रश्मि प्रभा... ने कहा…

रहने को अब घर ही घर है ... प्रकृति नहीं हमारी , जमीन और ज़मीर मर गई हमारी .... फिर भी , दिल है हिन्दुस्तानी !
होठों को गोल गोल करके जितनी अंग्रेजी बोल लो , अंग्रेज लिबास पहन लो - कहलाओगे हिन्दुस्तानी ...
इसी बात पर वन्दे मातरम

वन्दना ने कहा…

बहुत खूबसूरत बु्लेटिन………………स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बलिदानों और खून की होली की पृष्ठभूमि में जो आजादी हमें आज से ६५ साल पहले दिलाई गई थी, उसके लिए मैंने आज २ मिनट का मौन रखा ! और उस मौन के दौरान मैं सोचता रहा कि प्रत्यक्ष गुलाम परोक्ष गुलाम से कहीं बेहतर होता है ! कम से कम वह इस मुगालते में तो नहीं जीता कि वह आजाद है और एक गुलाम की तरह रहकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करता है! मगर एक परोक्ष गुलाम ( एक ऐसा गुलाम जो कहने को तो आजाद है मगर रगों में जिसके गुलामी का ही खून दौड़ता है, मासिकता जिसकी गुलाम है , अपनी स्वार्थ पूर्ति कर्म जिसके सिर्फ चाटुकारिता और तलवे चाटना है) खुद के लिए भी और देश-समाज के लिए भी बहुत घातक होता है ! अपने तुच्छ कर्मों से यह दुषकर्मी क्षणभंगुरता का सुख भले ही भोग ले, लेकिन अपनी आने वाली पीढ़ियों और देश के लिए पूर्ण गुलामी के बीज फिर से बो देता है !

आज हम जिस आजादी की बात करते है, उस आजादी की सही मायने में कीमत उसी भारतवासी के लिए थी जिसने प्रत्यक्ष गुलामी देखी थी, जिसने कदम-कदम पर अपनी आँखों से गोरे-काले का भेद देखा था, जिसने तख्तियों पर यह लिखा देखा था कि 'इंडियनस एंड डॉग्स आर नोट एलाउड ' ....... अफ़सोस के साथ कहना पड़ता है कि आजादी के बाद पैदा हुए ज्यादातर परोक्ष गुलामों और यहाँ तक कि आजादी के वक्त जो अवयस्क लोग थे , उन्होंने इस आजादी का सिर्फ और सिर्फ दुरुपयोग ही किया ! १५ अगस्त और २६ जनवरी को ये तथाकथित स्वतंत्र परोक्ष गुलाम भले ही बच्चों और युवा पीढी को इस आजादी की लड़ाई के बारे में कसीदे पढ़कर सुनाते हो, इसे हर हाल में बचाए रखने का भय दिखाते हों, मगर सच्चाई यह है कि आज अपने देश में कदम-कदम पर जो गंद हम पाते है, ये इन्ही महानुभाओ द्वारा फैलाई गई गंद है ! ये आज की पीढी को दोष देने में ज़रा भी कोताही नहीं बरतते मगर खुद भूल जाते है कि आजादी मिलने के बाद जो नीवे इन्होने रखी थी, उसी पर तो आज की पीढी देश रूपी नए भवनों का निर्माण कर रही है ! नारायणदत जी इसके ताजा उदाहरण है ! ये आज जो भ्रष्टता और घूसखोरी हमारे बीच मौजूद है, ये इन्ही के बोये बीजों की तो फसल है ! रिटायरमेंट के बाद पार्क में तो अथवा गली नुक्कड़ पर आज भेल ही बड़ी-बड़ी फेंके मगर जब खुद सरकारी कुर्सी पर थे तो एक फ़ाइल पर पेज नत्थी करने में ही महीनो लगा देते थे वह भी सेवा सुसुर्वा के बाद ! और मैं तो कहूंगा कि आज का बचपन और युवा वर्ग तो इनसे लाख समझदार है, अपनी भी सोचता है, और देश की भी ! मेरे दादाजी अंग्रेज फ़ौज में थे, प्रथम विश्व युद्ध उन्होंने ईराक में बसरा के मोर्चे पर लड़ा था, वे जब अपनी पुरानी यादे ताजा करते थे तो बताते थे कि अंग्रेज फ़ौज में जो घोड़े होते थे उन्हें वे एक उम्र के बाद लाइन में खडा करके गोली मार देते थे ! कभी- कभार सोचता हूँ कि मैं भी कोई डिसीजन मेकर होता तो इन तमाम खूसटों जिन्होंने इस देश का आज इस गर्त में पहुचाया और एक परोक्ष गुलामी देशवासियों के गले में डाल दी इनको भी ...............!
खैर, जो मुख्य बात मैं यहाँ आज कहना चाह रहा हूँ वह यह कि आजादी के सही मायने क्या है आज की युवा पीढी हमारे और हमारे इन बुजुर्ग महानुभाव से बेहतर समझती है और सम्हालना जानती है ! अत: मैं समझता हूँ कि उनके समक्ष हर साल यह आजादी के नुक्कड़ नाटक खेलना और उन्हें यह अहसास दिलाना कि उनकी रगों में एक गुलाम का खून दौड़ रहा है, समझदारी नहीं है! अत: वक्त के हिसाब से इसे मनाने का स्वरुप बदला जाना चाहिए !

veena sethi ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन अपने अर्थ को सार्थक करता है, मेरे पोस्ट " आजादी के जश्न में कैसा हो भारत" को शामिल करने के लिए धन्यवाद.

Reena Maurya ने कहा…

बहुत बेहतरीन देशभक्ति से भरे लिंक्स
में मुझे शामिल करने हेतु आभार सर जी...
स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाये
:-)

Rajesh Kumari ने कहा…

मेरी टिपण्णी स्पेम से मुक्त करो शिवम् जी

Rajesh Kumari ने कहा…

कुछ तो गड़बड़ हुई है हो सकता है मेरी साइड से ही हुई हो चलो कोई बात नहीं दुबारा दे देती हूँ उषा मेहता जैसी वीरांगना के विषय में जानकारी देती हुई ये पोस्ट बहुत अच्छी लगी आज की नारी के लिए भी उषा मेहता जैसी महान नारियां एक सबक हैं एक उदाहरण हैं कोटिश नमन इस महान नारी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं

शिवम् मिश्रा ने कहा…

आप सब का बहुत बहुत आभार !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बड़ा प्रभावी बुलेटिन..

Kulwant Happy "Unique Man" ने कहा…

आजाद भारत के निवासियों को और ब्‍लॉग बुलेटिन के पाठकों को मेरा प्रणाम

Vinamra ने कहा…

स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाए!!
बहुत अच्छा बुलेटिन

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