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शनिवार, 28 जुलाई 2012

रेलवे है सबसे बड़ा खुला टॉयलेट... ब्लॉग बुलेटिन

रेलवे हमेशा खबरों में रहती है... देश की लाईफ़ लाईन जो है... हमेशा चलनें वाली... कभी न रुकनें वाली.... छुक छुक गाडी.... आईए तो आज रेलवे को समर्पित यह बुलेटिन में दो खबरें....

रेलवे है सबसे बड़ा खुला टॉयलेट... यह कहना है केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री जयराम रमेश जी का... सच है या नहीं, लेकिन फ़िर भी सरकारी मंत्री का यह बयान बहुत कुछ कहता है... रेलवे की बदहाली और केन्द्र सरकार का रवैया भी किसी से छुपा नहीं है। योजना आयोग पैतीस लाख का शौचालय बनवाता है और पैसे की कमी का रोना रोता है। तो ऐसे में देश की ग्यारह लाख की आबादी जो मंत्री जी के हिसाब से खुले में शौचालय करता है वह जाए तो जाए किधर.... रेलवे को जैव-शौचालय लगवानें हैं लेकिन उसके लिए पैसा नहीं है। चलिए रेलवे की बदहाली को छोड दिया जाए और एक और रोचक खबर पर नज़र डालें...

गया-मुगलसराय रेलखण्ड के कुमहु स्टेशन के पास एक ईंडिगो कार चालक अपनी गाड़ी हवा की रफ्तार में शुक्रवार की दोपहर फोर कॉरिडोर रेल लाइन के लिए बनाई गई निर्माणाधीन लेन पर दौड़ा रहा था। इसी बीच उसे पता नहीं क्या सुझा कि वह गाड़ी को मेन रेलवे ट्रैक की ओर मोड़ दिया। मंशा यही थी कि अब इसे लोहे की पटरियो पर दौड़ाया जाये। रेल पटरियों पर चढ़ते ही गाड़ी के निचले हिस्से बूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गये और गाड़ी वहीं थम गई। डाउन लाइन पर घटी इस घटना के ठीक बाद आ रही मालगाड़ी के चालक ने दूर से ही रेलवे ट्रैक पर दुर्घटनाग्रस्त हुई इंडिगो को देख लिया। उसके बाद उसने इमरजेंसी ब्रेक लगा कर गाड़ी रोक दी, जिससे एक बड़ी दुर्घटना टल गयी। इधर घटना के बाद इंडिगो का चालक और दो अन्य युवक घटनास्थल से भाग खड़े हुए जो जख्मी भी थे। रेल कर्मियों ने ट्रैक की मरम्मती की तब जाकर एक घंटे बाद रेल परिचाल शुरू हो सका। इस दौरान डाउन लाइन का परिचालन ठप था।  हद है न..... हम कहते हैं न भारत महान है और भारतीय रेलवे भारत का एक सही रुप है। 

आईए रेलवे से जुडे अन्य तथ्यों पर भी विचार किया जाए....कुल सवा लाख किलोमीटर का नेटवर्क... ७५०० स्टेशन और दुनियां की चौथी सबसे बडी रेल प्रणाली.. और तो और भारतीय रेलवे दुनियां की चौथी सबसे बडी कम्पनी भी है। चौदह लाख से भी अधिक कर्मचारियों के साथ वह दुनियां की चौथा सबसे बडा इम्प्लायर भी है। तो फ़िर इतनें बडे नेटवर्क होनें के कारण गडबडियों की बहुत बडी गुंजाईश होती है। सरकार का हर मंत्री रेलमंत्री बनाए जानें के ख्वाब देखता है,  ताकि फ़ायदे की मलाई आराम से खा सके....  

चलिए मेरा भारत महान और मेरे भारत की रेलवे और भी महान.... और हां जनता तो सबसे महान है ही.... 



भारत की रेल का यह चित्र तो सभी नें देखा है.... लेकिन अब एक नज़र पाकिस्तानी रेल पर भी डाली जाए... 


जी बिल्कुल पाकिस्तान की हालत से तो हमारी हालत बेहतर ही है.... हम रेल में धक्के खाते हैं, धक्के लगाते नहीं हा हा....

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लीजिए आज का बुलेटिन...
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आखिरी खत Piyush k Mishra at Mera Panna 

लाल स्याही से तुम्हारे नाम लिखा एक अधूरा खत- "गुलमोहर के पेड़ों पर जब फूल आते हैं- तुम बहुत याद आते हो..." *गुलमोहर के पेड़ों पर* *जब फूल आते हैं* *तुम बहुत याद आते हो !*
 
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अंग्रेज सौदागर भारतीय कारीगरों को लुटते थे Suman at लो क सं घ र्ष ! 

*बुनकरों का संग्राम ...............1777--------------- 1800* *क्या आज के दौर में देशी व विदेशी कम्पनियों के लूट ने ठीक वही काम नही किया है? क्या वर्तमान समय में ये कम्पनिया लागत बढाने के साथ -- साथ बड़े उद्योगों के देशी व आयातित विदेशी मालो सामानों से बुनकरों का उत्पादन व बाजार नही छीन रही है ? बुनकरों एवं अन्य दस्तकारो को साधनहीन नही बना रही है ? बिलकुल बना रही है क्या आज बुनकर व अन्य मेहनतकश समुदाय बुनकरों के उस संघर्ष से प्रेरणा लेगा ? क्या वह वैश्वीकरणवादी नीतियों , संबंधो का विरोध भी संगठित रूप में करने का प्रयास करेगा ? जिसकी आज तात्कालिक पर अनिवार्य आवश्यकता सामने कड़ी हो चुकी... more »

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कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ? rajendra tela at "निरंतर" की कलम से..... 

कैसे हाँ कहूँ ? जब ना कहना चाहता हूँ ? पर ना भी कैसे कहूँ? समझ नहीं पाता हूँ झंझावत में फंसा हूँ रिश्तों के बिगड़ने का खौफ दुश्मनी मोल लेने का डर मुझे ना कहने से रोकता है कैसे उसूलों को तोडूँ मन को दुखी कर के हाँ कहूँ दुविधा में फंसा हूँ क्यों ना एक बार नम्रता से ना कह दूं सदा के लिए दुविधा से मुक्ती पा लूँ कुछ समय के लिए लोगों को नाराज़ कर दूं समय के अंतराल में सब समझ जायेंगे आदत समझ कर भूल जायेंगे मेरा मन खुश रहेगा फिर हाँ ना के झंझावत में नहीं फंसेगा 03-06-2012 557-77-05-12 (जीवन में अक्सर ऐसी स्थिति आती है जब इंसान ना कहना चाहता है,पर रिश्तों में कडवाहट के डर से घबराता है ,और अनुचित... more »

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मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं   Kulwant Happy "Unique Man" at युवा सोच युवा खयालात

मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं गैरों से नहीं अपनों से ही डरता हूं मैं शिकारी बैठे हैं ताक में यहां यही सोच के बहुत ऊँचा उड़ता हूं मैं मुझे है अपनी मंजिल की तलाश उसे ही हर पल ढूंडता हूं मैं वक़्त की परवाह नहीं है मुझको वक़्त से भी तेज़ दौड़ता हूं मैं रास्ता बहुत ही कठिन है मेरा यही सोच सब कुछ करता हूं मैं उम्मीद का दामन थामा है मैंने उम्मीद से ही उम्मीद करता हूं मैं मौत को अपने साथ लिए चलता हूं मैं गैरों से नहीं अपनों से ही डरता हूं मैं अमित राजवंत के फेसबुक खाते के सौजन्‍य से

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"घास खाना जानते हैं" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) at उच्चारण 

*हम गधे इस देश के है, घास खाना जानते हैं।*** *लात भूतों के सहजता से, नहीं कुछ मानते हैं।।*** *मुफ्त का खाया हमॆशा, कोठियों में बैठकर.*** *भाषणों से खेत में, फसलें उगाना जानते हैं।*** *कृष्ण की मुरली चुराई, गोपियों के वास्ते,*** *रात-दिन हम, रासलीला को रचाना जानते हैं।*** *राम से रहमान को, हमने लड़ाया आजतक,*** *हम मज़हव की आड़ में, रोटी पकाना जानते हैं।*** *देशभक्तों को किया है, बन्द हमने जेल में,*** *गीदड़ों की फौज से, शासन चलाना जानते हैं।*** *सभ्यता की ओढ़ चादर, आ गये बहुरूपिये,*** *छद्मरूपी **“**रूप**” **से, दौलत कमाना जानते हैं।*

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मनोरमा at इन्द्रधनुष

ताक़त के तीन हिस्से कलह और गुटबाज़ी से जूझ रही कर्नाटक भाजपा का राजनीतिक संकट फ़िल हाल टल गया है लेकिन येदियुरप्पा की महत्वाकांक्षाओं के शिकार हुए सदानंद गौड़ा का गुट फिर से राजनीतिक संकट खड़ा कर सकता है। *मनोरमा* की रिपोर्ट( द पब्लिक एजेंडा में प्रकाशित ) कर्नाटक में भाजपा का संकट अभी खत्म होता नहीं लगता। सरकार बचाने और चलाने की जद्दोजहद में ही अगला विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आ जायेगा, जिसमें मात्र ग्यारह महीने ही बचे हैं। चार साल के अंतराल में राज्य में तीसरे मुख्यमंत्री शपथ लेने वाले हैं। दरअसल, कर्नाटक भाजपा इन दिनों व्यक्तिगत अहम, कलह और गुटबाजी की राजनीति से जूझ रही है। मौजू... more »

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दिक् शूल  प्रतुल वशिष्ठ at दर्शन-प्राशन

सोम-शनि है प्राची प्रतिकूल दिवस रवि का उसके अनुकूल. प्रतीची में मंगल-बुध जाव शुक्र-रवि में होवें दिकशूल. उदीची में बुध-मंगल भार शुक्र शुभ होता शुभ गुरुवार. अवाची को जाना शनि-सोम गुरु को चलना शकुन-विलोम. ______________ उदीची - उत्तर दिशा अवाची - दक्षिण दिशा प्राची - पूर्व दिशा प्रतीची - पश्चिम दिशा मैं इस कविता को देना नहीं चाहता था.... क्योंकि अब मैं इस विचारधारा से बिलकुल सहमत नहीं हूँ कि 'दिकशूल' जैसा कुछ होता है.... ये कोरा अंधविश्वास है... जब ये रचना बनायी थी. तब मैं दिकशूल से बहुत प्रभावित रहता था.

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खबरगंगा: 'डायन' : औरतों को प्रताड़ित किये जाने का एक और तरीका   Devendra Gautam at All India Bloggers' Associationऑल इंडिया ब्लॉगर्स एसोसियेशन

वे बचपन के दिन थे ....मोहल्ले में दो बच्चों की मौत होने के बाद काना-फूसी शुरू हो गयी और एक बूढी विधवा को 'डायन' करार दिया गया...हम उन्हें प्यार से 'दादी' कहा करते थे...लोगो की ये बाते हम बच्चों तक भी पहुची और हमारी प्यारी- दुलारी दादी एक 'भयानक डर' में तब्दील हो गयी... उनके घर के पास से हम दौड़ते हुए निकलते कि वो पकड़ न ले...उनके बुलाने पर भी पास नहीं जाते ...उनके परिवार को अप्रत्यक्ष तौर पर बहिष्कृत कर दिया गया ....आज सोचती हूँ तो लगता है कि हमारे बदले व्यवहार ने उन्हें कितनी 'चोटे' दी होंगी ...और ये सब इसलिए कि हमारी मानसिकता सड़ी हुई थी....जबकि हमारा मोहल्ला बौद्धिक (?) तौर पर ... more »

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शाहिद सिद्दीकी सपा से बाहर निकाले गए.   Kusum Thakur at आर्यावर्त

गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार लेने के बाद आज समाजवादी पार्टी के नेता शाहिद सिद्दीकी को सपा से बाहर कर दिया गया है. इस से पूर्व समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव ने संकेत दिए हैं कि शाहिद सिद्दीकी को पार्टी से निकाला जा सकता है. रामगोपाल यादव ने अंग्रेजी अखबार टेलीग्राफ से कहा है कि मोदी का जिस तरह से उन्होंने साक्षात्कार किया है, उसे पार्टी गंभीरता से ले रही है और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी की जा सकती है. ग़ौरतलब है कि पिछले दिनों उर्दू अख़बार नई दुनिया के संपादक के तौर पर शाहिद सिद्दीकी ने नरेंद्र मोदी का साक्षात्कार किया था. यह साक्षात्कार बहुत ... more »

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आयाम बिंधने के   वन्दना at ज़ख्म…जो फूलों ने दिये 

कभी कभी बिना बिंधे भी बिंध जाता है कहीं कुछ सूईं धागे की जरूरत ही नहीं होती शब्दों की मार तलवार के घाव से गहरी जो होती है मगर कभी कभी शब्दों की मार से भी परे कहीं कुछ बिंध जाता है और वो जो बिंधना होता है ना शिकायत से परे होता है क्या तो तलवार करेगी और क्या शब्द नज़र की मार के आगे बिना वार किये भी वार करने का अपना ही लुत्फ़ होता है ........है ना जानम !!!!

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एक हज़ार हिन्दुओं का क़त्ल करो--राजदीप सरदेसाई   ZEAL at ZEAL

*हमारे देश में विक्षिप्त मानसिकता वाले भांडों की कमी नहीं है। राजदीप जैसे ज़मीर का सौदा कर चुके आतंकवादियों का बयान देखिये- " पहले एक हज़ार हिन्दुओं का क़त्ल करो, फिर newz दिखाउंगा अपने चैनल पर"।* *अगर अपने वतन से थोडा भी प्यार करते हैं तो पढ़िए ब्लॉगर विष्णुगुप्त द्वारा लिखे इस महत्वपूर्ण आलेख को*। ---------------------------------------------- *राष्ट्र-चिंतन* *विष्णुगुप्त की कलम से* आईबीएन सेवन के चीफ राजदीप सरदेसाई की असम दंगे पर एक खतरनाक,वीभत्स, रक्तरंजित और पत्रकारिता मूल्यों को शर्मशार करने वाली टिप्पणी से आप अवगत नहीं होना चाहेंगे? राजदीप सरदेसाई ने असम में मुस्लिम दंगाइयों द्व... more »

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एक नन्हा जंगली फूल   डॉ॰ मोनिका शर्मा at परवाज़...शब्दों के पंख 

नन्हा फूल जो चुन लाया चैतन्य बच्चों के मन की संवेदनशीलता और सोच को आँक पाना हम बड़ों के लिए असंभव ही है । आमतौर पर बड़े बच्चों के विषय में सोचते रहते हैं कि उनके लिए क्या लायें....? उन्हें क्या दिलवाएं...? ये बात और है कि ये नन्हें- मुन्हें जो करना चाहते हैं उसके लिए शायद हमारे जितना सोचते नहीं पर हम भी हरदम उनके मन में तो ज़रूर बसते हैं । चैतन्य आज एक नन्हा सा जंगली फूल ले आया । उसे लगता है कि उसकी पसंदीदा एक प्यारी सी कार्टून करेक्टर की तरह माँ भी अपने बालों में फूल लगाये । उसको यह सूझा मुझे इस बात ने चौंकाया तो ज़रूर पर ख़ुशी भी बहुत मिली । आज दो क्षणिकाएँ मेरे आँगन के न... more »

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हैप्पी बर्थड़े ... पापा ... :-)  शिवम् मिश्रा at बुरा भला 

*हैप्पी बर्थड़े ... पापा ... :-)* 

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कवि ने सिर तुड़वाया पर सम्मान नहीं खोया (Ratan singh shekhawat) at ज्ञान दर्पण 

अक्सर लोग चारण कवियों पर आरोप लगा देते है कि वे राजपूत वीरों की अपनी रचनाओं में झूंठी वीरता का बखाण करते थे पर ऐसा नहीं था| राजपूत शासन काल में सिर्फ चारण कवि ही ऐसे होते थे जो निडर होकर अपनी बात अपनी कविता में किसी भी राजा को कह डालते थे| यदि राजा ने कोई गलत निर्णय भी किया होता था तो उसके विरोध में भी चारण कवि राजा को हड़काते हुए अपनी कविता कह डालते थे| ऐसा ही एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है जो साफ जाहिर करता है कि चारण कवि निडर होकर राजाओं को कविता के माध्यम से लताड़ भी दिया करते थे, यही नहीं अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए और अपने सम्मान की रक्षा के लिए वे अपने प्राणों की भी परवा... more » 

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मूठ / मुंशी प्रेमचंद  संगीता स्वरुप ( गीत ) at राजभाषा हिंदी

इस महीने की 31 तारीख को प्रेमचन्द जी का जन्मदिन है और यह पूरा मास हम “राजभाषा हिंदी” ब्लॉग टीम की तरफ़ से प्रेमचन्द जी के व्यक्तित्व और कृतित्व के ऊपर कुछ पोस्ट ला रहे हैं। इसी कड़ी में आज प्रस्तुत है मुंशी प्रेम चंद की कहानी मूठ डॉक्टर जयपाल ने प्रथम श्रेणी की सनद पायी थी, पर इसे भाग्य ही कहिए या व्यावसायिक सिद्धान्तों का अज्ञान कि उन्हें अपने व्यवसाय में कभी उन्नत अवस्था न मिली। उनका घर सँकरी गली में था; पर उनके जी में खुली जगह में घर लेने का विचार तक न उठा। औषधालय की आलमारियाँ, शीशियाँ और डाक्टरी यंत्र आदि भी साफ-सुथरे न थे। मितव्ययिता के सिद्धांत का वह अपनी घरेलू बातों में भ... more »

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विकास हलवाई झूलेवाला   Gyandutt Pandey at मानसिक हलचल - halchal.org 

कल था शिवकुटी का मेला। हर साल श्रावण मास के शुक्लपक्ष की अष्टमी को होता है यह। एक दिन पहले से झूले वाले आ जाते हैं। नगरपालिका के लोग सड़क सफ़ाई, उनके किनारे चूना बिखेरना, सड़क पर रोशनी-पानी की व्यवस्था करना आदि करते हैं। पुलीस वाले अपना एक अस्थाई नियन्त्रण कक्ष बनाते हैं। दो साल [...]

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स्वर्ग मही का भेद प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम् 

स्वर्ग का नाम आते ही उसके अस्तित्व पर प्रश्न खड़े होने लगते हैं, गुण और परिभाषा जानने के पहले ही। यद्यपि सारे धर्मों में यह संकल्पना है, पर उसके विस्तार में न जाते हुये मात्र उन गुणों को छूते हुये निकलने का प्रयास करूँगा, जिनसे उर्वशी और उसकी प्रेम भावनायें प्रभावित हैं। इस प्रेमकथा में स्वर्ग से पूरी तरह से बच पाना कठिन है क्योंकि इसमें प्रेम का आधा आधार नर और नारी के बीच का आकर्षण है, और शेष आधार स्वर्ग और मही के बीच के आकर्षण का। स्वर्ग और मही के आकर्षण की पहेली समझना, प्रेम के उस गुण को समझने जैसा है जिसमें परम्परागत बुद्धि गच्चा खा जाती है। अच्छे कर्म और परिश्रम करने से स्वर्ग... more » 

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 पाखी की बिल्ली   Akshitaa (Pakhi) at पाखी की दुनिया 
(लीजिये पढ़िए संजीव वर्मा 'सलिल' दादा जी का लिखा एक बाल-गीत "पाखी की बिल्ली") पाखी ने बिल्ली पाली. सौंपी घर की रखवाली. फिर पाखी बाज़ार गयी. लाये किताबें नयी-नयी. तनिक देर जागी बिल्ली. हुई तबीयत फिर ढिल्ली. लगी ऊंघने फिर सोयी. सुख सपनों में थी खोयी. मिट्ठू ने अवसर पाया. गेंद उठाकर ले आया. गेंद नचाना मन भाया. निज करतब पर इठलाया. घर में चूहा आया एक. नहीं इरादे उसके नेक. चुरा मिठाई खाऊँगा. ऊधम खूब मचाऊँगा. आहट सुन बिल्ली जागी. चूहे के पीछे भागी. झट चूहे को जा पकड़ा. भागा चूहा दे झटका. बिल्ली खीझी, खिसियाई. मन ही मन में पछताई. अगर न दिन में सो जाती. खो अवसर ना पछताती. ******

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गड़ा खजाना मिला मुझे ------------------- ललित शर्मा   ब्लॉ.ललित शर्मा at ललितडॉटकॉम 

मड फ़ोर्ट का गुगल व्यूधरती के कोने-कोने में प्राचीन सभ्यताओं के अवशेष बिखरे पड़े हैं,छत्तीसगढ भी इससे अछूता नहीं है। यहां पग-पग पर पुरावशेष मिल जाते हैं। धरती की कोख में खजाने गड़े हुए हैं, हम यह किस्से कहानियों में सुनते आए हैं। इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि राजाओं के खजाने सुरक्षित रखने की दृष्टि से धरती में या गिरि कंदराओं में छिपाए जाते थे। पृथ्वी में गड़े पुरावशेष भी किसी गड़े हुए खजाने से कम नहीं है। जब यह खजाना बाहर आता है तो अपने काल के सारे किस्से उगल देते हैं। चौरस मड फ़ोर्ट का गुगल व्यू ऐसा ही एक पुरातात्विक खजाना उगलने को तैयार है 21N05 81E46 अक्षांश-देशांश पर जिला रा... more »

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 आप तो मनुष्य है ना ........................ आज एक कुत्ता अपने बच्चे को जो बार दौड़ कर सड़क पर चला जाता था , उसको मुह से पकड़ कर ले आता था और अगर कोई वाहन आता दिखाई पड़ जाता तो उसकी तरफ जपत उठता मानो कह रहा हो ...जानते नही यह मेरा बच्चा है कोई आदमी का नही जो सालो से कोर्ट इस लिए दौड़ता है कि उसका बाप उसको अपनी औलाद मानने को तैयार नही है ...............खैर हमको पता है आज तक किसी आदमी ने कुत्ते को भूल से भी आदमी नही कहा होगा क्योकि हम अपने से किसी जानवर की तुलना कर भी कैसे सकते है ...............कुत्तो का अनाथलय कही आपको पता है ..पुरे मन से तन से जीते अपने बच्चो के लिए .जब तक रहते है दुन... more »
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आखिर लडकियाँ अपने साथी (प्रेमी या पति) में कौन सी खूबियाँ देखना चाहतीं हैं...  अदा at काव्य मंजूषा -

प्यार, इश्क, मोहब्बत इन शब्दों में, एक अलग सी धनक होती है । कोई, किसी भी उम्र में हो, मन रूमानी ख्यालों से भर उठता है । इश्क का असर कुछ ऐसा होता है, कि दुनिया खूबसूरत हो जाती है। मौसम रंगीन और समा बस सुहाना-सुहाना हो जाता है। प्यार के इस रंगीन एहसास को महसूस करने के लिए जरुरत होती है, एक अदद उस शख्स की, जिसे देख कर दिल बरबस बोल उठता है, यही तो है वो, जिसका मुझे इंतजार था। मुझे नहीं मालूम.......
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आशा है की आपको आज का बुलेटिन पसन्द आया होगा.... कल फ़िर मिलेंगे... तब तक के लिए देव बाबा को इजाजत दीजिए..
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6 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

अत्यन्त प्रभावी सूत्र संग्रह। अभी भी रेलवे की स्थिति सुदृढ़ है।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

भारत की रेलवे और भी महान...
यह महानता ही जानता की बदौलत है !
लिंक्स खोल लिए हैं , जरा पढ़ लूँ

अजय कुमार झा ने कहा…

कमाल की रेलगाडी है हो , आ पोस्ट वाला डिब्बा सबमें टहल के आते हैं आराम से फ़िर टीपेंगे लौटती डाक से

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जय हो देव बाबू ... बढ़िया समावेश किया है आज लिंक्स और मुद्दे का ... जय हो !

अदा ने कहा…

Bharteey railway ka saarthak parichay diya aapne..
Naamcheen posts ke link se saji hai aapki charcha..
Dhanyvaad

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बढिया लिक्स


हां तस्वीर में दोनों चित्र पाकिस्तान रेलवे की है
आपकी बातों से ऐसा लग रहा है कि एक तस्वीर भारतीय रेल की और दूसरी पाकिस्तान की है, जबकि दोनों ही तस्वीर पाकिस्तान रेल की है।

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