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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

आइए कुछ पढते हैं ........




पिछले दो दिनों में उत्तरी ग्रिड फ़ेल होने से हाहाकार सा मच गया है ऐसे में मैं सोच रहा था कि गांव में रहे अपने पांच वर्षों में हमें बिजली के दर्शन ही नहीं हुए तो ग्रिड के फ़ेल या पास होने से कोई फ़र्क ही नहीं पडता था , अब भी नहीं पडता होगा । हां राजधानी दिल्ली समेत जाने कितने ही प्रदेशों और राज्यों में ब्लैक आउट की स्थिति आने से और उस स्थिति में सरकार और प्रशासन की विवशता को देख कर हैरत होती है कि यही देश है जो बात बात में खुद को भविष्य का महाशक्ति बन जाने का दावा करता है , कभी चांद पर पहुंचने तो कभी जाने कौन कौन सी नई प्रौद्योगिकी हासिल करने के लिए खुद की ही पीठ थपथपाता रहता है । आज भी कमोबेश यही स्थिति बनी रही है और यदि आगे भी यही हाल रहा तो ये निश्चित रूप से गंभीर बात होगी । चलिए देखते पढते हैं कि आज मित्र ब्लॉगरों ने क्या कहां लिखा कहा


देर सवेर मानसून ने राजधानी दिल्ली में भी दस्तक दे दी है वर्ना हमारे मित्र ब्लॉगर श्री बी एस पाबला जी अपने फ़ेसबुक स्टेटस में देखिए क्या कहते हैं ,


  • दो हफ्ते हो गए बारिश को. सूरज नहीं देख पाए हैं हम
    इत्ती बारिश, इत्ती बारिश कि हैरान हैं हम इत्ती बारिश है?

और अपने ब्लॉग आरंभ में भाई संजीव तिवारी , विवेक राज सिंह के एक आलेख "मानसून " को प्रस्तुत कर रहे हैं । इसमें विवेक भाई तफ़सील से मानसून के बारे में बता रहे हैं । मानसून का मजा ले ही रहे थे कि भाई महेंद्र मिश्र जी कहने लगे , अच्छा तो हम चलते हैं  ।

हम तो शुरू से ही कहते रहे हैं कि खूब पढा करिए और खूब टीपा करिए ,देखिए आज मनोज भाई ने टीपते टीपते ही कविता रच डाली ,

आज के दौर में

अरुण चंद्र रॉय की कविता ईश्वर पर दी गई टिप्पणी से निकली कविता ...


आज के दौर में 

जिसमें 

बल है 

छल है 

बहाने हैं 

वह ईश्वर है


या फिर ये कहें कि 

जो होता जा रहा है 

निरंकुश 

वह ईश्वर है 

या फिर यह मान लें 

कि 

सुरक्षित है सत्ता 

इसलिए वह अपने को 

ईश्वर 

समझ बैठा है 

सीधा कम 

ज़्यादा ऐंठा है। 

सत्ताधारी ... 

जो लोगों को 

सुख कम 

अधिक बवाल देता है 

एक न एक दिन 

ईश्वर उसकी 

सब कस बल निकाल देता है।"

हिंदी ब्लॉगिंग के लिए एक और सुखद उपलब्धि सरीखी खबर है , राहुल सिंह जी अपने ब्लॉग सिंहावलोकन में इसका खुलासा कुछ इस तरह कर रहे हैं ,"
ये कैसे अपने कि अब तक रू-ब-रू भी न हुए, लेकिन अब तो बहुतेरे अपने जाने-पहचाने नाम, लिखे-उचारे शब्‍दों और चित्र के परोक्ष-यथार्थ से ही 'मूर्तमान' होते हैं। 'ब्‍लागर्स पार्क'' के अंक, ऐसे ही एक परिचित, इस पत्रिका से जुड़े, अश्‍फ़ाक अहमद जी के माध्‍यम से देखने को मिले। भोपाल से प्रकाशित होने वाली पत्रिका का पहला अंक अगस्‍त 2009 में आया था, जिसमें मुख्‍य संपादक की टीप है कि इस पत्रिका को मैगज़ीन के बजाय ब्‍लागज़ीन कहना संगत होगा।
ब्‍लागर्स पार्क के प्रवेशांक का संपादकीय - ताजे अंक का मुखपृष्‍ठ
इस नये शब्‍द 'ब्‍लाग-जीन' का 'ब्‍लाग' भी तो नया शब्‍द ही है। सन 1997 के अंत तक वेब-लॉग web-log बन गया we-blog फिर we छूटा तो बच रहा blog-'ब्‍लॉग' या 'ब्‍लाग'। 'मैगज़ीन' शब्‍द मूलतः संग्रह या भंडार अर्थ देता है सो किताबों को ज्ञान का भंडार मान कर मैगज़ीन कहा जाने लगा, लेकिन वर्तमान मैगज़ीन, उन्‍नीसवीं सदी से सीमित हो कर मात्र पत्रिकाओं के लिए रूढ़ है। इस तरह ब्‍लाग-blog और मैगज़ीन-magzine के मेल से बना, ब्‍लागज़ीन-blogazine। अब ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के मुखपृष्‍ठ पर सबसे ऊपर World's First Blogazine अंकित होता है। सोचना है, ब्‍लागजीन शब्‍द पहले अस्तित्‍व में आया होगा या यह पत्रिका, मुर्गी-अंडा में पहले कौन, जैसा सवाल है।
आगे वे कहते हैं कि ,

"
ब्‍लागर्स पार्क पत्रिका के ताजे जुलाई 2012 के अंक-28 में कुछ लेखकों के परिचय के साथ 'ब्‍लागर' उल्‍लेख भी है और एक लेखक कुणाल मेहता के परिचय में उनके शहर का नाम और 'ब्‍लागर' मात्र है। नाम के साथ अपनी ब्‍लागर पहचान अपनाए हिन्‍दी ब्‍लागिंग में गिनती के, एक हैं 'ब्‍लॉ.' उपाधिधारी ललित शर्मा और दूसरी बिना लाग लपेट के ब्‍लॉग वाली, ''ब्‍लागर रचना''। ब्‍लागर्स पार्क में www.scratchmysoul.com पर किए गए पोस्‍ट में से चयनित सामग्री विषयवार, सुरुचिपूर्ण, स्‍तरीय और सुंदर चित्रों सहित शामिल की जाती है। अश्‍फ़ाक जी से चर्चा में मैंने छत्‍तीसगढ़ से प्रकाशित दैनिक ''भास्‍कर भूमि'' समाचार पत्र और साप्‍ताहिक पत्रिका ''इतवारी अखबार'' का उल्‍लेख किया, जिनमें नियमित रूप से ब्‍लाग की रचनाएं छापी जाती हैं। छत्‍तीसगढ़ की तीन उत्‍कृष्‍ट वेब पत्रिकाएं ''उदंती डाट काम'', ''रविवार'', ''सृजनगाथा डाट काम'' सहित छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लाग एग्रिगेटर ''छत्‍तीसगढ़ ब्‍लागर्स चौपाल'', ''ब्‍लॉगोदय'' और गंभीर हिन्‍दी ब्‍लागरों पर भी बातें हुईं, इन चर्चाओं का सुखद निष्‍कर्ष रहा, उन्‍होंने बताया है कि ब्‍लागर्स पार्क, छत्‍तीसगढ़ की ब्‍लाग गतिविधियों पर खास सामग्री जुटाने, प्रकाशित करने की तैयारी में है।"


जब आप खुशखबरी सुन ही रहे हैं तो लगे हाथ अपने शायर मेज़र साहब , यानि ब्लॉगर गौतम राजरिषी , जी की भी एक खुशी आप तक बांटते चलें , उन्हें एक नादां सा रोग पाले हुए पूरे चार बरस हो चुके हैं और इस मर्ज़ के दीवाने हम तो हम खुद धरती अंबर तक हैं , देखिए वे खुद कहते हैं कि ,

चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ...

अपनी कोई ग़ज़ल सुनाये लंबा अरसा हो गया था....और अभी अपने ब्लौग पे नजर डाला तो मालूम हुआ कि चार साल हो गए आज मेरे इस "पाल ले इक रोग नादां..." को  :-) 

तो अपने ब्लौग की चौथी वर्षगांठ पर, मेरी ये ग़ज़ल झेलिये :- 

धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ 
चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ 

साँझ लुढ़क कर ड्योढ़ी पर आ फिसली है 
आँगन से चौबारे तक सब लाल हुआ 

ज़िक्र छिड़ा है जब भी उनका यारों में
ख़ुशबू-ख़ुशबू सारा ही चौपाल हुआ




















नारी ब्लॉग पर नित नई पोस्टें , नारी से जुडी तमाम समस्याओं , मुद्दों , और घटनाओं पर आती रहती हैं । हाल ही में ब्लॉग की संचाकल रचना जी ने इसे पुन: सामूहिक ब्लॉग बनाते हुए साथी ब्लॉगरों के लिए इस पर पोस्ट डालने/लिखने का रास्ता खोल दिया है । आज पढिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण पत्र जो एक पिता ने अपनी पुत्री को लिखा है , 
"
प्रिय अनु,

तुम्हारे विवाह के बाद ये मेरा पहला पत्र है. यकीं ही नहीं हो रहा अब तक कि हमारी छोटी सी,शरारती,चुलबुली बिटिया अब बड़ी हो गयी और ब्याह कर हमसे दूर हो गयी है(दिल से नहीं.)
बेटियों को विदा करके अकसर मां-बाप थोडा फ़िक्र मंद होते हैं उनके भविष्य को लेकर.हम भी हैं...पत्र तुम्हें इसी आशय से लिख रहा हूँ .
वैसे आमतौर पर माएं ये फ़र्ज़ अदा करतीं हैं मगर बचपन से तुम भावनात्मक तौर पर मुझसे ही ज्यादा करीब रहीं .जब कभी तुम व्यथित होतीं, अपनी भीगीं पलकें पोंछने को मां का आँचल नहीं मेरा कंधा खोजा करती थी.....सो तुम्हारी मां का आग्रह था कि ये पत्र तुम्हे मैं ही लिखूँ.

बेटा मुझे तुम्हारी समझदारी पर कोई शंका नहीं है मगर फिर भी कुछ बातें तुमसे कहना चाहता हूँ....जैसा तुम अकसर कहती हो कि"जल्दी मुद्दे पर आइये " मैं भी शुरु करता हूँ अपनी बात, बिंदुवार....
साथ फेरे के साथ सात वचन  लेकर तुम ब्याहता कहलायीं.अब मेरी ये सात बातें गाँठ बाँध कर सुखी जीवन व्यतीत करो ये कामना है मेरी."

और इसके बाद सात बहुत ही जरूरी बातें , जिन्हें आप पोस्ट पर जरूर पढें ।

 इस खत को पढ ही रहा था कि मेरे हाथ एक और खत लगा , वाह मुद्दतों बाद खतों को इस तरह एक पर एक पा रहा हूं क्या बात है , लगता है खतों का जमाना लौटने को है , लेकिन भाई सतीश सक्सेना इस खत को एक बुरा खत कहते हुए लिखते हैं ,

"बिनी ,   
तेरी भाभी अनुप्रिया नागराजन के बारे में, आज सारे अखबारों में छपीं खबरें, जिनके लिंक दे रहा हूँ, हमारे लिए बहुत मनहूस हैं , मगर पढ़ लो ताकि हमें याद रहे कि भगवान् हमें उतना प्यार नहीं करता जितना हम सोंचते हैं ! 
एक झटके में उसकी क्रूरता ने , हमारे परिवार की  रौनक, हर समय मुस्कराती और भरपूर प्यार करती अनु, को हमसे छीन लिया !
स्ट्रेचर पर खून से लथपथ अनु के चेहरे को, दोनों हाथों में लिए, मैं बार बार रो रो कर, उस मनहूस रात उसे मनाता रहा !
उठ जाओ अनु बच्चा , मैं आ गया मेरा बेटा ...
पर वह रूठ गयी थी ...
हम सब उसे बहुत बहुत प्यार करते थे ...और वह हमें ! 
उसे हमसे छिन लिया गया और तब जब उसके पेट में एक मासूम जान और थी !   
और हम उसे नहीं बचा पाया , न उसे.... न उसके अजन्मे बच्चे को....  
हमें पंहुचने में बहुत देर हो गयी थी ..
उस रात पहली बार मैंने अप्पा जी को फूट फूट कर रोते देखा, लगता है अन्नू उनके दिल में भी, अपनी जगह बना चुकी थी ."


अपने गिरजेश राव जी आजकल एक नई परम्परा स्थापित करने में लगे हैं , जैसे ही अपनी पोस्ट पर वे कहते हैं ,"
मैं चलता हूँ वह लीक पकड़ जिस पर हैं विशाल झंखाड़ बरगद, पाकड़ - अमरबेलों के बलियूप। 
कभी बोये थे रक्तबीज पथिकों ने, जिनके हाथ रिसते थे, जो लिखते भी थे। 

हाँ, मुझे पता है कि हैं कुछ उद्यान, सदियों से परिरक्षित ज्ञान, कहलाते जीवंत!  
जिनमें खेलती हैं नई पीढ़ियाँ, जिनकी बेंचों पर बैठ बूढ़े करते हैं लेखजोख सभ्यताओं की मृत्यु के! 
और युवा नशा पीते हैं, संसार को जीते हैं।
चित्राभार : http://previews.agefotostock.com/previewimage/bajaage/b44450dcfd457e8ef02516a1ed7f9720/IBR-591303.jpg
मैं नहीं वहाँ यायावर अक्सर, नहीं अच्छे लगते वे, साज सँभाल बनाती है शंकालु मुझे, मृत्यु की बातें बनाती हैं दयालु मुझे वहाँ बू आती है - षड़यंत्रों, दुरभिसन्धियों की, समझ सकता हूँ जिन्हें समझा नहीं सकता, सूँघ सकता हूँ सूत्रों में सँजो नहीं सकता -गन्ध सूत्रबद्ध न हुये कभी, न होंगे कभी। 
मैं बता नहीं सकता कि शब्द भिंचे छ्टपटाते छोड़ने पड़ेंगे, मुठ्ठियाँ खोलनी होंगी, होना होगा अकेला निपट - 
मैं अकेले चल नहीं सकता और रुकना मुझे स्वीकार नहीं। मैं हूँ वाहक घनचक्करों की परम्परा का - भाषा है, भाष्य नहीं।

तो उस पर टीपते हुए पाठक कहते हैं ,"

  1. भयंकर टाइप माहौल बनाती कविता; यदि इसे कविता ही कहा जाए तो...
  2. पथ में रथ के पहिये चाहे न घूमें,
    पर धरती फिर भी घूम रही है।
  3. रक्तरंजित हाथों और घायल हृदय से ही होता है उत्कृष्ट लेखन!
    मुट्ठियाँ उतनी ही खोलिए जितनी समय की ज़रूरत और विवेक की अनुमति है..शब्दों का क्या है वे कसमसाते रहते हैं.


किसी दिन का महत्व क्या है ये हमें बखूबी याद दिलाते हैं भाई शिवम मिश्र आज अपनी पोस्ट में वे बताते हैं कि ,

३ महान विभूतियों के नाम है आज का दिन

आज ३१ जुलाई है ... आज का दिन हमारे देश की  ३ महान विभूतियों के नाम है ... 

एक है लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक , दुसरे है अमर शहीद उधम सिंह और तीसरे  है मुंशी प्रेमचंद

पेश है ३  पोस्ट के लिंक्स जो आपको इन विभूतियों के बारे में और भी जानकारियां देंगी !

पोस्ट पर जाकर  देखिए कि वे कौन सी तीन पोस्टें हैं ।

आमिर खान के शो सत्यमेव जयते ने अपना पहला सीज़न खत्म कर लिया । इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय टेलिविज़न के इतिहास के उन धारावाहिकों , जिन्होंने दर्शकों ,समाज और सरकार तक को प्रभावित करने में सफ़लता प्राप्त की , में से एक नि:संदेह ये धारावाहिक भी रहा । अजय ब्रहात्मज अपनी पोस्ट में खुद आमिर की भावनाओं को व्यक्त करते हुए कहते हैं ,

"मैं अकेला क्या कर सकता हूं? एक अरब बीस करोड़ की आबादी में मैं तो बस एक हूं। अगर मैं बदल भी जाता हूं, तो इससे क्या फर्क पड़ेगा? बाकी का क्या होगा? सबको कौन बदलेगा? पहले सबको बदलो, फिर मैं भी बदल जाऊंगा। ये विचार सबसे नकारात्मक विचारों में से हैं। इन सवालों का सबसे सटीक जवाब दशरथ मांझी की कहानी में छिपा है। यह हमें बताती है कि एक अकेला आदमी क्या हासिल कर सकता है? यह हमें एक व्यक्ति की शक्ति से परिचित कराती है। यह हमें बताती है कि आदमी पहाड़ों को हटा सकता है।"


बीते दिनों , हरियाणा के मानेसर में मारुति कंपनी में कार्यरत मजदूरों ने जिस तरह अपना आपा खोते हुए कंपनी के एक अधिकारी की हत्या तक कर डाली उस घटना ने भविष्य के लिए एक दस्तक दे दी है । इसी घटना पर लिखते हुए दिलीप खान कहते हैं ,
"
मानेसर में जब बीते साल मारुति सुज़ुकी के कामगारों ने प्रबंधन प्रायोजित यूनियन की बजाए वास्तविक यूनियन बनाने सहित काम-काज की स्थितियों को दुरुस्त करने और वेतन कटौती के त्रासद नियमों (1 मिनट देरी से आने पर आधे दिन का वेतन और तीन दिन काम पर नहीं आने पर आधे महीने के वेतन में कटौती) में परिवर्तन लाने की मांग की तो प्रबंधन को इसमें विकास-विरोधी नज़रिया दिखा था और कांग्रेसी मुख्यमंत्री भूपिंदर हुड्डा मज़दूरों का पक्ष सुनने के बदले सुज़ुकी कंपनी का भरोसा जीतने टोक्यो पहुंच गए थे। कंपनी में तालाबंदी थी और प्रबंधन इस बात को लेकर मज़दूरों पर लगातार दबाव बना रहा था कि गुड कंडक्ट फॉर्म भरने वाले मज़दूर ही कारखाने के अंदर जा सकते हैं। गुड कंडक्ट फॉर्म का मतलब था- मज़दूरों की बुनियादी मांग की हत्या।"
मानेसर का मारुति-सुज़ुकी प्लांट
आइए अब कुछ रैपिड फ़ायर राउंड पोस्टों को देखा पढा जाए
अब ये खिडकियां बंद रहती हैं :   बरसात की वजह से टाईट हो गई होंगी


नीक दिन भी आइहैं :    मुदा के लईहैं



आओ लॉगिन करें :   बत्ती गुल हो तो कैसे करें


बालों को झडने से रोकने के कुछ ये हैं कुछ खास तरीके :   गंजे होने से पहले फ़ौरन ही सीखें


नकारात्मक सोच क्या वास्तव में गलत है :      पोस्ट पढ कर ही फ़ैसला करें


बिलखती नार :   से रहें हुसियार


अन्ना का अनशन असफ़ल क्यों : सत्ता का भ्रष्टाचार सफ़ल क्यों


वोट बैंक की खातिर :   मंतरी जी हैं हाज़िर


उस एक क्षण में :  क्या न हो जाए


मीरासियों के वारिस :   कौन कौन कौन


सत्ता के विरोध से आगे :  अवाम अब भी क्यों न जागे


मिसफ़िट ब्लॉग को मिला सम्मान :   मुबारक को आपको बहुत सीरीमान


लखनऊ में जुटेंगे ब्लॉगिंग के महारथी : हम भी टिकस बुकिंग कराएं क्या

निंदा करना जरूरी है क्या :   अब आदत हो जाए तो क्या करें 









आज की कविता ,

वृक्ष बोला...

अपना सारा फल देकर
वृक्ष मुस्कुराया
और उमंग में भरकर
उसने कोमल टहनियों को ऊपर उठाया;
जैसे अपने हाथ उठाकर
सिरजनहार को धन्यवाद दे रहा हो,
कृतज्ञता ज्ञापित कर रहा हो
और भार-मुक्त करने के लिए
आभार व्यक्त कर रहा हो !

मैंने पूछा--'हे वृक्ष !
अपना सब कुछ देकर
तुम खुश कैसे होते हो ?
क्या अन्दर-अन्दर रोते हो ?

वृक्ष दृढ़ता से बोला-- 'नहीं,
त्याग से मुझे सुख मिलता है,
संतोष मिलता है
और मुझे अपनी पात्रता का बोध होता है;
मैं तो अपने फल लुटाकर
परितृप्त होता हूँ
और सुख की नींद सोता हूँ !
तुम भी अपने मीठे-कड़वे
कृमी-कीट लगे फल त्यागो --
सुख पाओगे,
संपदा की गठरी बांधे रखोगे,
तो लुट जाओगे !!'
और एक ताज़ा ताज़ा कार्टून गोदियाल जी की कूची से ,

कार्टून कुछ बोलता है - ग्रिड फेल हो गए !


तो चलिए आप इन बेहतरीन पोस्टों को बांचिए , पढिए और टीपीए , और तब तक इज़ाज़त दीजीए अपने इस ब्लॉग खबरी को

शुभ रात्रि , शब्बा खैर , अपना ख्याल रखिए और लिखते पढते रहिए ।
आपका ब्लॉग रिपोर्टर
अजय कुमार झा

8 टिप्पणियाँ:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

ग्रिड फेल होने के बाद भी कितना कुछ लिख डाला आपने, आश्चर्य ही है।

veerubhai ने कहा…

धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ
चाँद उगा फिर अम्बर मालामाल हुआ

साँझ लुढ़क कर ड्योढ़ी पर आ फिसली है
आँगन से चौबारे तक सब लाल हुआ

ज़िक्र छिड़ा है जब भी उनका यारों में
ख़ुशबू-ख़ुशबू सारा ही चौपाल हुआ
प्रवाह लिए है पूरी ब्लॉग बुलेटिन कहीं कविता फल देके संतुष्ट होने वाले वृक्ष का सुख बोध कहीं बाप के ख़त बेटी को सतीश सक्सेना जी का दुःख बोध प्रबोधन और इतनी लाज़वाब गज़ल .छा गई मन भा गई ब्लॉग बुलेटिन .और हाँ पत्रिका ब्लॉग -जीन के प्रकाशन पर बधाई वैकल्पिक नाम ब्लॉग-लिखी /ब्लॉग सन्देश /ब्लॉग सत्ता /ब्लॉग टाइम्स भी हो सकतें हैं .

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत बढिया
यहां आना अच्छा लगा

Vivek Rastogi ने कहा…

लगता है बैटरी ज्यादा चल रही है, सरकार अब बैटरी पर और भी ज्यादा टैक्स लगा सकती है । :)

Suman ने कहा…

nice

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अजय भाई की अजेय बुलेटिन

शिवम् मिश्रा ने कहा…

अजय भाई जब बत्ती न आने पर आप इस तरह से बुलेटिन सजा रहे है फिर तो हम सब को बत्ती का इंतज़ार करना ही नहीं चाहिए ... जय हो !

चलते है सैर पर ... आप जमाये रहिए !

Asha Saxena ने कहा…

बहुत सुन्दर लिंक्स से सजा ब्लॉग बुलेटिन
धूप लुटा कर सूरज जब कंगाल हुआ" रचना बहुत अच्छी लगी
आशा

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बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार