Subscribe:

Ads 468x60px

मंगलवार, 3 जुलाई 2012

भारत का शिक्षा तंत्र : एक घटिया मजाक ... ब्लॉग बुलेटिन

प्रिय ब्लॉगर मित्रो,
प्रणाम
आज मैं एक लम्बे समय  पश्चात् आपके समक्ष अपने विचारो को व्यक्त करने जा रहा  हूँ । ऐसा इसलिए है क्युकि  मैं लम्बे समय से अपनी प्रोध्योगिक परीक्षायों तथा निजी कार्यों में व्यस्त था । अपनी परीक्षायों के काल में मैंने कई अच्छे और कई बुरे अनुभव किये । लेकिन आज मैं इस बुलेटिन मैं सिर्फ भारत के शिक्षा व्यवस्था के विरुद्ध अपनी  प्रतिक्रियाएं व्यक्त करूँगा ।
इन दिनों भारतीय प्रोध्योकी संस्थानों को लेकर खूब हंगामे हो रहे है । हमारे माननीय शिक्षा  मंत्री कपिल सिब्बल चाहते है कि इन संस्थानों में तथा और भी जितने प्रोध्योकी संसथान है उन सभी मैं दाखिला लेने के लिए एक ही परीक्षा ली जाये । पर हमारे होशियार नेताओ को नहीं पता कि ऐसा करने से IIT जैसे संस्थानों के स्तर में कितनी गिरावट आयेगी ।
IIT Delhi तथा IIT Bombay ने इसका पूरी तरह से खंडन किया लेकिन हमारे देश में सरकार के आगे किसकी चली है ? बस ठोंक दिया कपिल सिब्बल ने अपना खूंटा... लेकिन IIT भी कम नहीं है, उसने भी कह दिया कि अब हम 78% नंबर से कम के लोगो को परीक्षा देने ही नहीं देंगे ।
एक ओर ये सब है तो दूसरी ओर सामान्य वर्ग के छात्रों को परेशान करने के लिए आरक्षण कोटा तैयार बैठा है । इस साल IIT की परीक्षा में  जिस सामान्य वर्ग के परीक्षार्थी के 171 अंक आये वो उत्तीर्ण हो गया। OBC वर्ग में जिसके 135 अंक आए वो उतीर्ण हो गया और SC वर्ग के जिसके 85 अंक आये वो उतीर्ण हो गया । मेरा पूछना ये है कि यह क्या तरीका है हमारे देश में उतीर्ण परिक्षर्तियों को निकालने का ? इस वर्ष की  IIT की परीक्षा में मैंने भी नाम लिखाया था । मेरे 151 अंक आये पर मैं उतीर्ण नहीं हो सका क्यूंकि मैं सामान्य वर्ग का छात्र हूँ । सच में भारत का शिक्षा तंत्र एक मजाक बन गया है, एक खेल बन गया है । जिसकी जैसे मर्ज़ी वैसे खेले । इन चोरों को सिर्फ अपने फायदे से मतलब है ।
चलिए ये सब तो ऐसे ही बना रहेगा जब तक ये सब सुधरे तब तक आप के लिए बुलेटिन हाजिर है -

निर्देशक मणिरत्नम की फिल्म ‘रावण’ दो घंटे बीस मिनट चलने वाला एक ड्रामा है, जिसकी कहानी के कुछ हिस्सों से आप परिचित हैं, कुछ नए हैं। लाल माटी वह एरिया है जहां वीरा की सत्ता है। कुछ के लिए वह रॉबिनहुड और कुछ के लिए रावण है। इलाके में जो नया एसपी देव आया है उसकी बीवी का अपहरण उसने किया है। इसका कारण आधी फिल्म के बाद आपको समझ में आता है और नए दौर की इस रामकथा का पन्ने खुलते है। बीरा की मुंहबोली बहन के साथ पुलिस की ज्यादती और उसका प्रतिशोध। क्या रामायण हमें इस नजरिए से पढाई गई कि किसी की बहन के नाक कान काट लेने की परिणति सीता के अपहरण में हुई। असल में बार बार हमें बताया गया कि राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं। 

रो रहा क्यों व्यर्थ रे मन
कौन अपना है यंहा पर .
मिट गयी हस्ती बड़ों की 
है हमारी क्या यंहा पर . 
सबको अपनी ही पड़ी है
चल रहे सब भावना में
स्वप्न सब बिखरे पड़े जब
है कान्हा कुछ कल्पना में . . 




मैक्सिको की खाड़ी में ब्रिटिश पेट्रोलियम की तरफ से हुई तबाही और उस पर सख़्त अमेरिकी रुख़ के बाद कंपनी द्वारा चुस्ती से कार्रवाई करते हुए 20 अरब डॉलर का मुआवज़ा दिए जाने की घटना से भारतीयों के मन में क्षोभ है, गुस्सा है। अमेरिकी भेदभाव का गुस्सा। यूनियन कार्बाइड और डाओ केमिकल की उदासीनता का गुस्सा। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि अभी और भी बहुत से यूनियन कार्बाइड होने बाकी हैं। यह गुस्सा इस बात का प्रमाण है कि भारत अब भी ग़ुलाम मानसिकता के साथ जी रहा है। आंखों में महाशक्ति बनने के सपने के बावजूद हृदय की गहराइयों में हम ग़ुलाम हैं।

मेरी घड़ी है मेरे सेकंड
मेरे मिनट है
60 को 100 करू 200 करू
तुम्हें क्या दिक्कत है
मै चालू अपनी रफ्तार से
है ज़िंदगी मेरी
जो मुर्गा सुबह बांग दे
जब हट जाए मेरी
रात उसे तंदूर पे टांग दे
तुम पुकारो और मै दौड़ आऊ
क्या मै पड़ा हु तुम्हारे प्यार मे
है काम तो लगो कतार मे
मेरे 2 मिनट तुम्हारे 2 सेकंड होंगे
देरी के लिए मुझे न बदनाम करो
ज्यादा जल्दी है तो अपना इंतजाम करो
कुछ न बदलना है
तुम्हारे खून के उबाल से
सरकारी कर्मचारी हु
घड़ी चले है कछुए की चाल से
नकद नारायण चड़ाओगे
तो जाके प्रसाद मिलेगा
नहीं तो अवसाद ले घर जाओगे



मुझे अब कुछ नहीं कहना 
मुझे अब कुछ नहीं करना 
की अब पतवार छूटी है 
नदी के संग है बहना
एक साथी की चाहत ने 
मुझे क्या क्या दिखाया है
मुझे इंसा नहीं छोड़ा इतना तपाया है 
कभी पत्थर बनाया है 
कभी नज़रो गिराया है 
ये दस्तूर दुनिया का 
मुझे न रास आया है
जब उसने आँसू बहाया है 
लोगो ने उसे सीता बताया है 
उसके पाप हुए माफ 
मेरी सजा ये रही 
 मुझे हर दशेहरा जलाया है 


आखिरी बार यशवंत से जंतर मंतर पर टकराना हुआ था। सामने आने पर न उन्‍होंने कभी हमारी उपेक्षा की, न ही मैंने अपनी तबीयत ढीली रखना मुनासिब समझा। कॉमरेड चंद्रशेखर की हत्‍या की साजिश रचने के मामले में शहाबुद्दीन को कोर्ट से मिली राहत के खिलाफ जंतर मंतर पर लोग जुटे थे। मैंने देखा कि यशवंत अपनी बेटी और बेटे के साथ वहीं आवाजाही कर रहे हैं।
जगजाहिर है कि हमारे-यशवंत के रिश्‍ते कभी सामान्‍य नहीं रहे। उन्‍हें जब भी मौका मिला, वार करते रहे। मैंने कभी पलटवार नहीं किया। जब मोहल्‍ला ब्‍लॉग में सब कुछ अनौपचारिक था, हमने उनके खिलाफ एक एफआईआर होने पर जरूर अपनी रंजिश उतारनी चाही। उससे पहले एक महिला ब्‍लॉगर के खिलाफ की गयी उनकी अभद्र टिप्‍पणी पर भी हमने अपना प्रतिरोध दर्ज किया था। इसकी खुन्‍नस उन्‍होंने भड़ास ब्‍लॉग में मेरे और मेरी पत्‍नी के खिलाफ अश्‍लील दर अश्‍लील टिप्‍पणियां करके उतारी थी।

"छोटा मांगे तो भीख; बड़ा मांगे तो चंदा है।"

कोटा. यूआईटी को नहीं पता कि उनके सचिव आरडी मीणा की आय कितनी है। उनके वेतन और भत्ते कितने हैं। सुनने में यह भले ही अजीब भरी लगे, लेकिन इस संबंध में आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना यूआईटी ने देने से इंकार कर दिया। यूआईटी ने अध्यक्ष रवींद्र त्यागी के भत्ते भी नहीं बताए। सूचना मांगने वाले ने जब इस संबंध में अपील की तो उसे चक्कर पर चक्कर कटवाए जा रहे हैं।


महाराष्ट्र के एक पूर्व मुख्यमंत्री एक बड़े और चर्चित घोटाले की जांच के लिए राज्य सरकार द्वारा गठित आयोग के समक्ष शनिवार को पेश हुए। आज शाम यह समाचार सभी चैनेलों पर वीडियो क्‍लिप के साथ आ रहा है। गाड़ी से उतरकर नेता जी बत्तीसो दाँत मुस्करा रहे हैं और अपने समर्थकों और “प्रशंसकों” से हाथ मिलाते हुए ऐसे आगे बढ़ रहे हैं जैसे दिल्‍ली में खाली हुए वित्तमंत्री के पद की शपथ लेने जा रहे हों। चेहरे पर ऐसा आत्मविश्वास सी.डब्ल्यू.जी. और थ्रीजी घोटाले के सरगनाओं  के चेहरे पर भी चस्पा रहता था जब चैनेल वाले उनके जेल से अदालत आने जाने की तस्वीरें दिखाते थे। ऐसा आत्मविश्वास देखकर मुझे पहले तो आश्चर्य होता था लेकिन अब अपनी सोच बदलने की जरूरत महसूस होने लगी है।


एक ज्‍योतिषी के रूप में जब मैं तुम्‍हारे सामने आता हूं तब दैहिक दृष्टिकोण से यह हमारी पहली ही मुलाकात होती है। तुम्‍हें ऐसा लगता होगा कि तुम मुझसे पहली बार मिल रहे हो। मुझे भी कमोबेश पहली मुलाकात में ऐसा ही लगता है। हकीकत इससे कुछ जुदा होती है। हमारे मिलने से कई क्षणों, मिनटों, घंटों, दिनों, हफ्तों, महीनों या कभी कभार सालों पहले तुमसे मिलने की तैयारी शुरू हो चुकी होती है। तुम्‍हारे साथ बिताए पल कुछ इस तरह होते हैं कि तुम मेरे चेहरे और कुण्‍डली के निर्जीव से खानों पर नजर गड़ाए देखते रहते हो और मैं समय के विस्‍तार में खो जाता हूं। जहां सितारों के संकेत पूरी शिद्दत से तुम्‍हारी कहानी कह रहे होते हैं।


अब आज्ञा दीजिये ... फिर मिलेंगे!

सादर आपका

रुद्राक्ष पाठक 

6 टिप्पणियाँ:

रविकर फैजाबादी ने कहा…

nice

वन्दना ने कहा…

सही मुद्दा उठाया है रुद्राक्ष …………आज हम सभी इससे त्रस्त हैं क्योंकि यदि ऐसे ही लोग आगे बढते रहे तो सामान्य वर्ग ही असमान्यों की श्रेणी मे आ जायेगा ………वैसे ऐसे लोगों को उच्च पद मिल रहे है तो देख तो रहे हो देश का हाल …………जब तक जो वास्तव मे डिज़र्व ना करता हो तब तक उसे सीट ना मिले तभी देश के हालात सुधर सकते हैं नही तो देश और भी गर्त मे जायेगा।

Asha Saxena ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन में बहुत अच्छे विचार पढने को मिलते है |आज कल शिक्षा के क्षेत्र में नए नए प्रयोग क्वालिटी की दृष्टि के बहुत बुराइयां पैदा कर रही हैं इससे बच्चों पर बहुत बोझ लादा जा रहा है और नतीजा सिफार |आशा

राजेश उत्‍साही ने कहा…

रुद्राक्ष आप जो मुद्दा उठा रहे हैं, वह आधा अधूरा है। यह आपको भी पता है कि आई आई टी परीक्षा में केवल पास होना भर पर्याप्‍त नहीं होता। प्रवेश रेंक के आधार पर मिलता है। और जो आरक्षित वर्ग के छात्र हैं उन्‍हें भी आरक्षित सीटों पर ही प्रवेश मिलता है, वह भी रेंक के आधार पर। आपने जो अंक बताएं हैं वे न्‍यूनतम अंक हैं परीक्षा उत्‍तीर्ण करने के लिए। कृपया सतही टिप्‍पणी करके इस मुद्दे को सतही न बनाएं।

शिवम् मिश्रा ने कहा…

वापसी पर स्वागत है रुद्राक्ष ... इस रोचक बुलेटिन के लिए बहुत बहुत आभार !

Manu Tyagi ने कहा…

इस बार के सारे लिंक्स बढिया हैं

एक टिप्पणी भेजें

बुलेटिन में हम ब्लॉग जगत की तमाम गतिविधियों ,लिखा पढी , कहा सुनी , कही अनकही , बहस -विमर्श , सब लेकर आए हैं , ये एक सूत्र भर है उन पोस्टों तक आपको पहुंचाने का जो बुलेटिन लगाने वाले की नज़र में आए , यदि ये आपको कमाल की पोस्टों तक ले जाता है तो हमारा श्रम सफ़ल हुआ । आने का शुक्रिया ... एक और बात आजकल गूगल पर कुछ समस्या के चलते आप की टिप्पणीयां कभी कभी तुरंत न छप कर स्पैम मे जा रही है ... तो चिंतित न हो थोड़ी देर से सही पर आप की टिप्पणी छपेगी जरूर!

लेखागार