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गुरुवार, 29 मार्च 2012

एक बहती नदी



आज मेरी कलम की धार पर हंसती बलखाती एक नदी है , नदी जो पूर्णता चाहती है और इस पूर्णता के लिए पूरी निष्ठा से सागर तक जाती है . इस बहती नदी का नाम है वंदना गुप्ता .
ब्लॉग की दुनिया में ये बारी बारी ज़िन्दगीएक खामोश सफ़र 2007 2008 ज़ख्मजो फूलों ने दिये और 2009 एक प्रयास में आईं .
अपने विषय में ये कहती हैं कि -
"मैं एक गृहिणी हूँ। मुझे पढ़ने-लिखने का शौक है । मैं जो भी महसूस करती हूँ, निर्भयता से उसे लिखती हूँ। अपनी प्रशंसा करना मुझे आता नही
इसलिए मुझे अपने बारे में सभी मित्रों की टिप्पणियों पर कोई एतराज भी नही होता है। मेरा ब्लॉग पढ़कर आप नि:संकोच मेरी त्रुटियों को अवश्य बताएँ। मैं
विश्वास दिलाती हूँ कि हरेक ब्लॉगर मित्र के अच्छे स्रजन की अवश्य सराहना करूँगी। ज़ाल-जगतरूपी महासागर की मैं तो मात्र एक अकिंचन बून्द हूँ।
आपके आशीर्वाद की आकांक्षिणी हूँ। दर्द को आवाज़ देती हूँ तब ज़िन्दगी से मिलती हूँ यूँ ज़िन्दगी के खामोश सफ़र को सुलगती चिता पर रख देती हूँ
कुछ ऐसे ज़िन्दगी से मिल लेती हूँ एक बहता हुआ दरिया हूँ एक उडता हुआ ख्वाब हू एक दर्द भरी आवाज़ हूँ एक दर्द भरा साज़ हूँ एक गिरती हुई दीवार
हूँ एक बिना सुर का साज़ हूँ एक खामोशी का पैगाम हूँ जो कभी किसी दिल तक किसी धडकन तक पहुँचा ही नही मै वो अनदेखा ख्वाब हूँ किसी की
पसन्द नही……… तो क्या किसी की चाह नही………… तो क्या देखो ना फिर भी ………सांसें चल रही हैं शब्दो में भी हरारत उतर आती है जब रूह
बीहडों मे कसमसाती है "

ज़िन्दगीएक खामोश सफ़र: वक़्त और जिन्दगी से इन्होंने ब्लॉग की खूबसूरत दुनिया में कदम रखा और यात्रा जारी है .

ज़ख्मजो फूलों ने दिये का आरम्भ अनुभवों के रास्तों का एक दर्शन है , कुछ इस तरह -

" जब ज़िन्दगी में भागते भागते हम थकने लगते हैं तब मन उदास होने लगता है । आत्मा बोझिल होने लगती है । कुच्छ देर कहीं ठहरने को दिल करता
है मगर ज़िन्दगी तो ठहरने का नाम नही न ! और हम एक ठिकाना ढूँढने लगते हैं जहाँ खुद को महसूस कर सकें।कुछ देर खुद को वक़्त के आईने में
देख सकें, क्या खोया, क्या पाया, जान सकें। "

दुविधा तो ज़बरदस्त है , क्योंकि कोई ब्लॉग किसी से कम नहीं ---- परन्तु इनका ब्लॉग एक प्रयास मील का पत्थर हो गई है . निःसंदेह मेरी कलम
मेरे मन की बोलती तस्वीर है , पर मुझे यकीन है कि किसी का मन इससे परे नहीं होगा .
इस ब्लॉग की शुरुआत एक प्रयास: अमर प्रेम से हुई . . अब कैसे नव सृजन हो ?...................100 वीं पोस्ट - एक प्रयास में इनके ह्रदय के
उद्द्वेलित उदगार सामने आए -
" शब्द निराकार हो गए
अर्थ बेकार हो गए
अब कैसे नव सृजन हो ?

चिंतन बिखर गया
आस की ओस
हवा मे ही
खो गयी
निर्विकारता
निर्लेपता का
आधिपत्य हो गया
अब कैसे नव सृजन हो ?

ह्रदय तरु पर
कुंठाओ का पाला
पड गया
संवेदनायें अवगुंठित
हो गयीं
दृश्य अदृश्य हो गया
अब कैसे नव सृजन हो?

शून्यता मे आरुढ
हर आरम्भ और अंत
भेदभाव विरहित
आत्मानंद
सृष्टि का विलोपन
अब कैसे नव सृजन हो?"

और 15 जुलाई 2011 में इन्होंने श्रीमद भागवत के दशम स्कंध में जो भगवान कृष्ण की लीलाएं हैं उनको काव्य के रूप में लिखने की कोशिश की .
"चतुर्थ दिवस की कथा ने कराया
परीक्षित को ज्ञान बोध
कर जोड़ कहने लगे
शुकदेव जी
सूर्य वंशी राजाओं का
उद्भव आपने सुनाया है
जो मेरे मन को भाया है
ज्ञानोदय अब हो गया
मुक्ति का मार्ग दिख गया
कर कृपा अब कुछ
यदुवंशियों का हाल सुनाइए
और मेरे जीवन को सफल बनाइये"
"आहुक राजा के दो पुत्र थे
देवक और उग्रसेन
उग्रसेन महाप्रतापी राजा था
पवन रेखा उसकी भार्या
अति सुन्दरी पतिव्रता थी"......................................
" मैया कहती है
गोपियो क्यों इल्ज़ाम लगाती हो
मेरा लाला तो यहाँ सोया है
जाकर कान्हा को जगाती है
और सबके सामने लाती है
क्यो लाला तुमने ये क्या किया
ये गोपियाँ क्या कहती हैं
तुमने इनके दही माखन के
सब मटका क्यो फ़ोड दिया
तब कान्हा भोली सूरत बना
मैया को सब बतलाते हैं
मैया मैने ना इनका माखन लिया
ना ही मटका फ़ोडा
ये गोपियाँ झूठ बहकाती हैं
तेरे लाला के दर्शन करने को
बहाने बनाती हैं" ...........
"मगर राधा के मन को
मोहन ऐसे भाए हैं
उनके बिना चैन
ना जिया को आये हैं
तीसरे दिन दूध दोहने के बहाने
कान्हा के द्वारे पर आई हैं
और मोहन को आवाज़ लगायी है
राधा प्यारी के शब्दों ने
मोहन की प्रीत बढ़ाई है
मैया से बोल उठे , "मैया
कल मैं यमुना का रास्ता भूल गया था
इक गोपी ने लाकर
घर पर छोड़ा था
अभी वो ही गोपी आवाज़ लगायी है
पर लज्जा के कारण
ना भीतर आई है
तुम ही उसे बुला लो मैया
इतना कह मोहन ने
अपनी माया फैलाई है
और मैया के ह्रदय में
श्यामा की प्रीत बढ़ाई है "

बढ़ता हुआ क्रम मनोहारी रूप में आज ४२ वें भाग में है -

एक प्रयास: .कृष्ण लीला ......भाग 42

"आठवें वर्ष में कन्हैया ने
शुभ मुहूर्त में दान दक्षिणा कर
वन में गौ चराने जाना शुरू किया
मैया ने कान्हा को
बलराम जी और गोपों के
सुपुर्द किया
वन की छटा बड़ी निराली थी
सुन्दर पक्षी चहचहाते थे
हिरन कुलाचें भरते थे
शीतल मंद सुगंध
समीर बहती थी
वृक्ष फल फूलों से लदे खड़े थे
आज मनमोहन को देख
सभी प्रफुल्लित हुए थे
वहाँ कान्हा नई- नई
लीलाएं करते थे
गौ चरने छोड़ देते
और खुद ग्वालों के संग
विविध क्रीडा करते थे

कभी मुरली की मधुर तान छेड़ देते थे
जिसे सुन पशु - पक्षी स्तब्ध रह जाते थे
यमुना का जल स्थिर हो जाता था
कभी मधुर स्वर में संगीत अलापा करते थे
कभी पक्षियों की बोलियाँ निकाला करते थे
कभी मेघ सम गंभीर वाणी से
गौओं को नाम ले पुकारा करते थे
कभी ठुमक- ठुमक कर नाचा करते थे
और मयूर के नृत्य को भी
उपहासास्पद बनाया करते थे
कभी खेलते खेलते थक कर
किसी गोप की गोद में
सो जाया करते थे
कभी ताल ठोंककर
एक दूजे से कुश्ती लड़ते थे
कभी ग्वाल बालों की
कुश्ती कराया करते थे
और दोनों भाई मिल
वाह- वाही दिया करते थे
जो सर्वशक्तिमान सच्चिदानंद
सर्वव्यापक था
वो ग्रामीणों संग ग्रामीण बन खेला करता था
जिसका पार योगी भी
ध्यान में ना पाते थे
वो आज गोपों के संग
बालसुलभ लीलाएं करते थे
फिर किसमे सामर्थ्य है जो
उनकी लीला महिमा का वर्णन करे


इक दिन गौ चराते दोनों भाई
अलग- अलग वन में गए
तब श्रीदामा बलराम से बोल उठा
भाई यहाँ से थोड़ी दूर
इक ताड़ का वन है
जिसमे बहुत मीठे फल लगा करते हैं
वहाँ भांति- भांति के वृक्ष लगे खड़े हैं
पर वहाँ तक हम पहुँच नहीं पाते हैं
धेनुक नामक दैत्य गर्दभ रूप में
वहाँ निवास करता है
जो किसी को भी उसके
मीठे फल ना खाने देता है
ये सुन बलराम जी वहाँ पहुँच गए
और एक वृक्ष को हिला
सारे फल गिरा दिए
जैसे ही फल गिरने की आवाज़ सुनी
दैत्य दौड़ा आया और
बलराम जी पर वार किया
बलराम जी ने उसकी
टांग पकड़ पटक दिया
बलराम जी को दुलत्तियाँ मारने लगा
तब बलराम जी ने उसे वृक्ष पर
मार उसका प्राणांत किया
ये देख उसके दूसरे साथी दौड़े आये
पर बलराम जी के आगे
कोई ना टिक पाए
ये देख देवताओं ने
पुष्प बरसाए


जब मोहन बलराम और ग्वालों संग
गोधुली वेला में वापस आते हैं
ये मधुर वेश कान्हा के
हर दिल को भाते हैं
संध्या समय ब्रज में प्रवेश करते हैं
घुंघराली अलकों पर धूल पड़ी होती है
सिर पर मोर पंख का
मुकुट शोभा देता है
बालों में सुन्दर सुन्दर
जंगली पुष्प लगे हैं
जो मोहन की सुन्दरता से
शोभित होते हैं
मधुर नेत्रों की चितवन
मुख पर मुस्कान ओढ़े
अधरों पर बंसी सुशोभित होती
मंद मंद गति से
मुरली बजाते जब
श्याम ब्रज में प्रवेश करते हैं
तब दिन भर विरह अगन से
तप्त गोपियों के ह्रदयो को
मधुर मतवारी चितवन से
तृप्त करते हैं
गोपियाँ अपने नेत्र रुपी
भ्रमरों से
प्रभु के मुखारविंद के
मकरंद रस का पान कर
जीवन सफल बनाती हैं
और प्रभु के ध्यान में
चित्र लिखी सी खडी रह जाती हैं
यशोदा रोहिणी तेल उबटन लगा
उन्हें स्नान करती हैं
फिर भांति भांति के भोज करा
सुन्दर शैया पर सुलाती हैं
इसी प्रकार कान्हा
रोज दिव्य लीलाएं करते हैं
ग्वाल बाल गोपियों और ब्रजवासियों को
जो वैकुण्ठ में भी सुलभ नहीं
वो सुख देते हैं "

क्रमशः .........इस मोहकता से खुद को वंचित रखना उचित नहीं तो क्रम से इस लीला को महसूस करने के लिए
http://ekprayas-vandana.blogspot.com/ पर अवश्य आएँ
और गोकुळ के सौन्दर्य प्रेम सागर में आकंठ डूब जाएँ ....

25 टिप्पणियाँ:

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
dheerendra ने कहा…

वाह ! ! ! ! ! बहुत खूब,वन्दना जी,का फैन तो पहले से हूँ किन्तु
आज पढकर मुझे बहुत अच्छा लगा,....रश्मी जी बधाई

MY RECENT POST...काव्यान्जलि ...: तुम्हारा चेहरा,

ऋता शेखर मधु ने कहा…

उनकी रचनाएँ पढ़ती रहती हूँ...सब बहुत पसंद आती हैं.उन्हें जानना बहुत अच्छा लगा,परिचय के लिए आभार!

expression ने कहा…

वंदना जी को ढेरों शुभकामनाएँ.

शुक्रिया दी.
सादर.

shikha varshney ने कहा…

वाह बढ़िया ..बहुत बढ़िया.

शिवम् मिश्रा ने कहा…

वाह रश्मि दी वाह ... क्या खूब मिलवाया है आज आपने वंदना जी से ... यह मुलाक़ात याद रहेगी !
आपको और वंदना जी को मेरा प्रणाम !

Anupama Tripathi ने कहा…

आज कि प्रस्तुति जबरदस्त है ...!वैसे तो वंदना जी के ब्लॉग पर नियमित जाना होता है पर ''एक प्रयास'' के विषय में आज ही पता चला ...!बहुत अच्छा लगा वंदना जी के विषय में और जानना ...!शुभकामनायें वंदना जी ...!
आभार रश्मि दी ...!!

RITU ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति ..
kalamdaan.blogspot.in

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

वंदना जी के ब्लोग्स की नियमित पाठिका हूँ .... आपकी कलम से परिचय अच्छा लगा ...

संजय भास्कर ने कहा…

मै वन्दना जी का फैन हूँ उनकी रचनाएँ बहुत पसंद आती हैं वंदना जी को ढेरों शुभकामनाएँ.....बहुत बेहतरीन प्रस्‍तुति...!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

वन्दनाजी की सृजनात्मकता से सतत सम्बन्ध रहता है।

Maheshwari kaneri ने कहा…

मैं वंदना जी की नियमित पाठिका हूँ उनका एक अलग सा अंदाज है जो मुझे अच्छा लगता है.. आपकी कलम ने और चार चाँद लगा दिए..

वन्दना ने कहा…

रश्मि जी आपने तो मुझे मुझसे मिलवा दिया आपका किन शब्दो मे आभार प्रकट करूँ …………सभी दोस्तों की शुक्रगुज़ार हूँ जो उनका अनमोल स्नेह मुझे मिलता रहता है और मेरे भावों मे उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है…………रश्मि जी हार्दिक आभार………जो किसी लायक नही हूँ फिर भी आप उसे लायक बना देती हैं और उनमे से एक मै भी हूँ।

amrendra "amar" ने कहा…

adreniya Rashmi Prabha ji aapki kalam se Vandna ji ka parichay bahut acha lga...........mai niymit pathak hu unki racnao ka ....bahut sunder likhti hai Vandna ji .......aabhar

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

bahut badhiya raha yah ,,

वन्दना ने कहा…

अरे रश्मि जी मेरा कमेंट कहाँ गया? दोबारा करती हूँ ……

रश्मि जी आपने तो मुझे मुझसे मिलवा दिया आपका किन शब्दो मे आभार प्रकट करूँ …………सभी दोस्तों की शुक्रगुज़ार हूँ जो उनका अनमोल स्नेह मुझे मिलता रहता है और मेरे भावों मे उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहती है…………रश्मि जी हार्दिक आभार………जो किसी लायक नही हूँ फिर भी आप उसे लायक बना देती हैं और उनमे से एक मै भी हूँ।

Sadhana Vaid ने कहा…

आपकी कलम से वन्दना जी का परिचय बहुत अच्छा लगा ! वे बहुत ही उत्कृष्ट रचनाकार हैं यह तो सर्वविदित है ही ! 'एक प्रयास' की उनकी रचनाओं को पढ़ कर अभिभूत हूँ ! वंदनाजी के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं एवं आपका आभार 'एक प्रयास' तक पहुँचाने के लिए !

Saras ने कहा…

रश्मिजी ...इस दुनिया से जुड़े अभी दो ही महीने हुए हैं ...इसके पेहले बहुत छटपटाहट थी , किसी ऐसे मंच से जुड़ने की जहाँ अपनी बात कह सकूं ..दूसरों की सुन सकूं....और खोजती रही एक ऐसा निकास,..एक अभिव्यक्ति का जरिया . जब आप सबसे रूबरू हुई ...तो लगा मेरी खोज अब जाकर ख़त्म हुई ...इसी कड़ी में आप सबके बारे में जानने की ललक भी जुड़ गयी ....आज आपके मार्फ़त वंदनाजी के बारे में जानकार बहुत ख़ुशी हुई ...इस क्रम को ज़ारी रखियेगा ...साभार !

दर्शन कौर 'दर्शी' ने कहा…

वंदनाजी का अंदाजे बयां ही कुछ और हैं ..कहते हैं -- "जो बात तुझ में हैं किसी और में नहीं "

अरूण साथी ने कहा…

पसंद अपनी ख्याल अपना ....
neek baat...

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Vandana jee.. ek naaare ke kitne roop.... bahumukhi !! har vishay pe inki pakar ka jabab nahi...!! inke aaaj ka post to aisa hi kuchh kahta hai!!

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

Vandana jee.. ek naaareee ke kitne roop.... bahumukhi pratibha ki dhani!! har vishay pe inki pakar ka jabab nahi...!! aisa hi kuchh aaj ka post bhi hai, jo batata hai ki kaise ye ek tarah krishna leela pe likh sakti hain to dusre taraf sex-sambandho pe bhi apni soch ko rakh sakti hain...

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

बधाई

परमजीत सिहँ बाली ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति ..

Harsh Rajput ने कहा…

didi apka lekhan bahut uchch stariya hai, mein to apka fan ho gaya

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