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शनिवार, 4 फ़रवरी 2012

संघर्ष !!! - ब्लॉग बुलेटिन



संघर्ष ? संघर्ष क्या है ? क्या इसे अक्षरशः बताया जा सकता है ? क्या असफलता से सफलता की ओर जाना ही संघर्ष है ? या एक स्थिति पर ठहरे रहने की कशमकश भी संघर्ष है ? बहुत सारे प्रश्न जेहन में उठे और प्रश्नवाचक मुद्रा में ही लिखने बैठी हूँ ...
एक खूबसूरत बगीचे में टहलने का आनंद लेते समय अचानक सांप आ जाए तो उससे बचना भी संघर्ष है . सांप के कोटर के पास ही घर बनाकर रहते हुए उससे बचना भी संघर्ष है . घोंसले के पास सांप को खड़ा करने का विश्वास लेना - देना भी संघर्ष है. सांप ना मरे और लाठी के साथ हम सुरक्षित रह जाएँ , यह भी एक संघर्ष की पीड़ा है . लिखना भी एक संघर्ष है , मन की स्थिति , शरीर की स्थिति , समाज की स्थिति ..... किसी भी स्थिति को परोक्ष रूप से लिखकर ( वह भी संतुलन बनाये हुए ) हम शांत होने के लिए संघर्ष करते हैं .
बहुत क्लिष्ट , भारी भरकम लग रहा होगा मेरा कहना - पर बिना गीता पर हाथ रखे , खुद की रूह को ही साक्षी मानकर कहिये , क्या कुछ गलत कहा ?
ज़िन्दगी कभी एक सी नहीं चलती - न पैसेवालों की , न बिना पैसेवालों की . जन्म संघर्ष , मृत्यु संघर्ष ... पूरी जिंदगी संघर्ष में गुजर जाती है . एक छोटे से बच्चे का संघर्ष है - चौकलेट , बड़े का संघर्ष - रोटी ! लेकिन रोटी हलक तक आए और कोई छीन ले ... ऐसे में अपनी भूख पर काबू पाने के लिए संघर्ष ! सुनने में अटपटा लगेगा ... पर अटपटा लगने से सत्य कहाँ बदलता है . ............ सबकुछ गंवाकर खुद्दारी दिखाना भी संघर्ष है . ऐसे में , किस दिन को कलम से पकडूँ ? फिर यकीन दिलाऊं ...
कितनों के जीवन अग्नि के मध्य रहते हैं , पर वे अपने चेहरे पर बसंत लेकर जीते हैं , यह उपलब्धि ही उनकी जीत है . पीछे की अग्नि जब दिखाई ही न दे , उसकी लपटें छू न जाएँ - तो बताना क्या . हाँ , खंडहर से ईमारत बनने में संघर्ष के मायने मिलते हैं , पर ईमारत से खंडहर होने में और कम से कम एक मकान होने की जद्दोजहद संघर्ष से कहीं ऊपर होती है !

तो एक यात्रा संघर्ष को दर्शाते लिंक्स की -
रश्मि रविज़ा की कहानियाँ मात्र कहानियाँ नहीं होतीं , पास से गुजरे सच की बयानगी होती है , और सच वही बयां कर पाता है , जो उसे जीता है . नाम बदल दिये जाते हैं , तथ्य नहीं , तो एक नज़र नहीं पूरी नज़र इसपर डालिए ( ज़रूरी है )



अमृता तन्मय प्रबुद्ध शब्दों में ' मैं ' को बांधकर कईयों के मन को व्यक्त कर जाती हैं . यह सोच भी एक संघर्ष है , खुद को खुद से भुलाने का -




कैलाश शर्मा जी ने आए दिन की सूक्तियों का , गली गली में होते भाषणों का विरोध किया है रोटी के संघर्ष को प्रस्तुत करके ... शिक्षा ज़रूरी है , पर उससे पहले पेट की ज्वाला तो शांत हो

रोटी या किताब ? सच्चे मन से जब हम जवाब देंगे तो एक ही जवाब होगा - रोटी !


व्यक्तियों का समूह समाज और एक मुनिया - इस संघर्ष की भयानकता सब जानते , पर मुनिया को चुप रहना है . मुनिया की व्यथा व्यथा नहीं , नियति है !
मुक्ता दत्त ने मुनियाओं का ह्रदय विदारक संघर्ष ही तो लिखा है .... चीख से ख़ामोशी फिर मौत !






रूह के संघर्ष से उपजा प्रश्न - सतीश पंचम जी की कल्पना कहें या एक रूह की आवाज़ , जिसे kavi ने कलमबद्ध कर दिया

खुली आँखों , एक एक लम्हें के बिखरे संघर्ष को संगीता जी ने पिरोया है , जहाँ न पहुँचे आम सोच , वहाँ पहुँचे कवि




आखिर में ' बेटी परायी होती है ' के साए में लिपटी एक आह ! किसे खुश रखना है के गणित में अपना मन यूँ हीं बिलखता रह जाता है - यह भी मन से मन का एक संघर्ष है , विभा रानी श्रीवास्तव का यह अतीत वर्तमान में भी मन के अन्दर संघर्षरत है . इसे लिखकर उन्होंने टिप्पणी की नहीं , मरहम की ख्वाहिश की है -


होने और स्थापित होने में बहुत फासला है . कुछ लोग नहीं होकर भी स्थापित होते हैं ! कुछ लोग होकर भी खुद को तलाशते हैं !
आखिर में एक संघर्षरत दर्द मेरी कलम से - अपवादित सच ! और अद्भुत शिक्षा !

21 टिप्पणियाँ:

DR. ANWER JAMAL ने कहा…

रश्मि रविजा का लेखन दिल को छू लेता है।
संघर्ष की बात चली तो वे याद आ गए जो कैंसर से या किसी भी बीमारी से संघर्ष कर रहे हैं।
यह जानकारी उन सभी तक पहुंचनी चाहिए।
कैंसर का इलाज आसान है
कैंसर का शुमार आज भी लाइलाज बीमारियों में होता है तो इसके पीछे सिर्फ़ पैसे की हवस है।
पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने फ़रमाया है कि ‘अल्लाह ने जितनी भी बीमारियां पैदा की हैं उनकी शिफ़ा भी रखी है।‘ (भावार्थ हदीस)
यह बात कैंसर के बारे में भी सही है।
डा. हल्डा रेगर क्लार्क एक नेचुरोपैथ हैं।
उनकी किताब ‘द क्योर फ़ॉर ऑल डिज़ीज़िज़‘ दुनिया भर में बहुत पसंद की गई।
डा. हल्डा ने पैरासाइट्स को बीमारी के लिए ज़िम्मेदार माना है और बैटरी से चलने वाले एक ज़ैपर के द्वारा उन्हें ख़त्म करने का तरीक़ा भी उन्होंने बताया है।
उन्होंने जीवन भर रिसर्च की है और 100 से ज़्यादा कैंसर के पेशेंट्स को ठीक करने के बाद एक किताब लिखी है-
‘द क्योर फ़ॉर ऑल कैंसर्स‘
इसके बाद उन्होंने एक किताब और लिखी है-
‘द क्योर फ़ॉर ऑल एडवांस्ड कैंसर्स‘
ये दोनों किताबें भारत में भी प्रकाशित की जा चुकी हैं। इन्हें आप दिल्ली के बी. जैन पब्लिशर्स से मंगा सकते हैं।
नेट पर भी आप ये दोनों किताबें कहीं न कहीं पढ़ ही लेंगे।
डा. हल्डा र. क्लार्क का नाम नेचुरोपैथ की दुनिया में बहुत मशहूर है लेकिन दुख की बात यह है कि भारत के पत्र पत्रिकाओं में उनकी खोज के बारे में जानकारी नहीं दी जाती।
उन्होंने एक यंत्र का अविष्कार भी किया है, जिसके द्वारा हरेक बीमारी के इलाज में मदद मिलती है और जिस तरह वह नज़ला खांसी में मदद देता है, ठीक वैसे ही वह कैंसर को भी बढ़ने से तुरंत ही रोक देता है।
उसका सर्किट भी उन्होंने अपनी किताब में दे रखा है जिसे आप अपने शहर के किसी इलैक्ट्रॉनिक्स के जानकार से बहुत कम क़ीमत में तैयार करवा सकते हैं या फिर डा. हल्डा की पैथी के प्रचार केंद्रों से तैयारशुदा मंगा सकते हैं।
उनका तरीक़ा निहायत सादा और कम ख़र्चीला है।
उनके तरीक़े में अंग्रेज़ी दवाओं की ज़रूरत नहीं पड़ती है और यही बात अंग्रेज़ी दवा विक्रेताओं को पसंद नहीं है। उन्होंने डा. हल्डा के खि़लाफ़ तरह तरह से दुष्प्रचार किया लेकिन वह लगातार अपनी सेवाएं दे रही हैं और बता रही हैं कि हम अपनी ग़लतियों के नतीजे में बीमारियों के शिकार हो जाते हैं और उन ग़लतियों को दूर करके सभी बीमारियों का इलाज मुमकिन है।
पूंजीपतियों का लालच आड़े न आ जाता तो उनकी पैथी आज दुनिया भर में फैल चुकी होती और जो लोग बीमारी का दुख झेल रहे हैं और महंगे इलाज कराकर बर्बाद हो रहे हैं, वे उस दुख और बर्बादी से बच सकते थे।
बहरहाल यह भारत है और इसकी ख़ासियत यह है कि यहां बीमार हरेक तरीक़ा ए इलाज को आज़मा सकता है।
देखिए आप कि यहां कौन डा. हल्डा र. क्लार्क के तरीक़े से इलाज कर रहा है ?
और इसकी जानकारी आप हमें भी दें ताकि हम दूसरों को भी वहां भेज सकें।
इस जानकारी को ज़्यादा से ज़्यादा आम कीजिए ताकि मायूस मरीज़ों के दिल में उम्मीद की शमा जल सके और वे सेहतयाब हो सकें,
मालिक सभी बीमारों को शिफ़ा अता फ़रमाए,
आमीन !
See
http://hbfint.blogspot.in/2012/02/cure-for-cancer.html

चला बिहारी ब्लॉगर बनने ने कहा…

संतुलित बुलेटिन!!

अनुपमा पाठक ने कहा…

संघर्ष की दास्तान...
पढ़ने के लिए कोई संघर्ष नहीं करना पड़ेगा...!
आपने इतनी सुन्दरता से बुलेटिन जो सजाया है!

Maheshwari kaneri ने कहा…

जीवन एक संघर्ष ही तो है....सटीक और संतुलित ब्लॉग बुलेटिन

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर लिंक्स सहेजे हैं।

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

अपनेपन का खजाना समेट कर सहेजने का संघर्ष(उस अनुपात का तिजोरी नहीं मिल रहा.... :))अभी कर ही रही थी ,कि आपका स्नेह और आगया.... :):) कर्जदार हूँ लेकिन चुका नहीं सकती.... :) आखें आँसू से भरे है.... :):)

dheerendra ने कहा…

सुंदर प्रस्तुति..

NEW POST..फुहार..कितने हसीन है आप...

vidya ने कहा…

सुन्दर प्रस्तुति रश्मि दी..
सच है संघर्ष के बिना जीवन शायद संभव ही नहीं..बस मन में शक्ति हो..वरना हम टूट ही ना जाएँगे ?

आभार...

सदा ने कहा…

बिल्‍कुल सच जिन्‍दगी कभी एक सी नहीं चलती ... और शायद ही ऐसी कोई जिन्‍दगी हो जिसे संघर्ष ने छुआ न हो ...सार्थक व सटीक बात कही है आपने ..आभार ।

Mukta Dutt ने कहा…

Aapka aabhar :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रश्मि जी ,
आप कभी कभी सुखद आश्चर्य में डाल देती हैं ...
सच कहा है कि जीवन में संघर्ष तो हर पल चलता है .. ज़रुरी नहीं है कि सबको कोई बड़े संघर्ष करने पड़ें हों .. पर जो पल बीता वो भी संघर्ष के बाद ही बीतता है ..
आपने मेरी रचना .."ज़िम्मेदारी' को यहाँ लिया है ..आभारी हूँ .. यह किसी के जीवन की सच्चाई पर ही आधारित है .. और यह सच्चाई न जाने कितनों की होगी ..
आपका यह प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा लगा ..

Anju ने कहा…

बहुत सुंदर ....विभा जी संघर्ष को बखूबी अभिव्यक्त किया है .....

Shah Nawaz ने कहा…

ब्लॉग बुलेटिन का यह अंदाज़ ही मुझे सबसे अधिक पसंद है कि यहाँ हर बार अलग-अलग अंदाज़ में ब्लॉग जगत की हलचलों से रूबरू कराया जाता है... और ठीक इसी अंदाज़ में यह बुलेटिन भी अपनी छाप छोड़ गया... बेहतरीन!

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत सुंदर प्रस्तुति..बहुत सच कहा है कि जीवन एक संघर्ष है चाहे गरीब का या पैसे वाले का..आभार

Atul Shrivastava ने कहा…

बेहतरीन विचार के साथ अच्‍छे लिंक्‍स।
आभार।

rashmi ravija ने कहा…

बढ़िया लिंक्स सहेजे हैं..
मेरी पोस्ट की चर्चा का शुक्रिया

अरूण साथी ने कहा…

nice links..thanks for this..

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर लिंक्स

शिवम् मिश्रा ने कहा…

जीवन एक संघर्ष ही तो है...सुन्दर प्रस्तुति रश्मि दी..आभार !

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

संघर्ष सतत चलता रहता है, यदि बाहर से नहीं तो मन से ही।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi ने कहा…

भाई हम तो इन दिनों घुटने के बंध की चोट से संघर्ष कर रहे हैं।

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