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शनिवार, 21 जनवरी 2012

मेरा देश महान..... ब्लॉग बुलेटिन.

बुलेटिन के इस नए अंक में देव बाबा की राम राम...

आज के इस बुलेटिन में हिन्दुस्तान की बात की जाए... मेरे एक मित्र पिछले दिनों विदेश यात्रा से वापस आए थे और अपने चित्र दिखा रहे थे... यह देखो वहां की सडकें, वहां की इमारतें... भारत की जी भर बुराई कर रहे थे... भारत में भ्रष्टाचार है, राजनीतिक अव्यवस्था है... ना चलनें के लिए सडकें हैं... फ़लां फ़लां....  ह्म्म उनकी इस प्रकार की धारणा देखकर मन विचलित हो गया... आखिर हिन्दुस्तानी ही इस प्रकार की बात कहेंगे तो फ़िर विदेशी क्या कहेंगे.... शायद बहुत से लोग होंगे जो इस प्रकार की मानसिकता से ग्रसित होंगे... चलिए कोई बात नहीं....  ऐसे लोगों को हिन्दुस्तान की चमक दिखलाई जाए...  दुनियां का सबसे बडा लोकतंत्र, एक अरब से अधिक आबादी, मुद्रा स्थानांतरण की दर से भारत की अर्थव्यवस्था विश्व में दसवें और क्रयशक्ति के अनुसार चौथा स्थान,   ३०० से अधिक भाषाएं, २८ राज्य, दुनियां का पहला राष्ट्र... जी हां क्योंकि यह मानव-सभ्यता का पहला राष्ट्र था। श्रीमद्भागवत के पञ्चम स्कन्ध में भारत राष्ट्र की स्थापना का वर्णन आता है। जब पश्चिम खून खराबे और मार काट कर एक दूसरे का खून बहा रहा था, भारत में एक सभ्यता विकसित हो चुकी थी....

भारत अनोखा है.... सरल है....  शान्ति प्रिय है... विविध है... अनेक रंग बिखरे हैं..... फ़िर भी हम एक हैं....


यूनानो-मिस्रो-रोमाँ सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-ज़माँ हमारा

क्यों सही कहा न.... कुछ तो बात है हमारी सभ्यता में....     आज गर्व से कहते हैं की हम एक हैं..... कुछ दिक्कते हैं, लेकिन दिक्कते कहां नहीं होती....

भारत ही बीजगणित, त्रिकोणमिति, अंक शास्त्र, शून्य का जनक है......  शतरंज, सांप सीढी जैसे खेल भी हिन्दुस्तान की ही देन है.. दुनियां में सबसे अधिक पत्र पत्रिकाएं भारत में ही छपती हैं, पढी जाती हैं, सबसे अधिक पोस्ट आफ़िस, दुनियां के सबसे बडे रेल नेटवर्क में से एक.....  भारत से दुनियां के ९० देशों मे साफ़्टवेयर निर्यात होते हैं... फ़ेसबुक और गूगल के सबसे अधिक यूज़र्स हिन्दुस्तानी हैं...   एक नहीं कई और तथ्य हैं जो रखे जा सकते हैं.....

आज हमारे पास सबसे अधिक युवाओं की एक ताकत है, जो योग्य है कुछ भी कर गुजरनें के लिए... देश को एक नई दिशा देने के लिए... मैं हमेशा कहता हूं अगर घूमनें ही जाना है तो फ़िर अपने देश को ही देखो न..... अतुलनीय भारत में एसा क्या नहीं है जो दुनिया के किसी और मुल्क के पास हो...... 


हिन्दुस्तानी अचार की क्या बात है भाई......



जय बनारस


दुर्गा पूजा

हमारी कला

हमारी भीड....

प्रेम का संदेश.......
बस भाई..... हिन्दुस्तान में सब कुछ है..... हिन्दुस्तान जितना विविध कोई नहीं.... विविधता में एकता यही है हमारी विशेषता.... 

जय हिन्द के नारे के साथ आईए अपनें बुलेटिन को आगे बढाते हैं..... 

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कई शरीर जिंदा होते हैं ! ...  by रश्मि प्रभा... at मेरी भावनायें...

साँसों के जिंदा होने का सुकून बहुत बड़ा होता है यूँ जीना तो बस एक मुहर है - वो भी नकली ! आत्महत्या आसान नहीं गुनाह भी है तो जबरदस्ती जीना - क्या गुनाह नहीं ? जाने कितने लोग गुनहगार बन कतरा कतरा साँसें ले रहे ... और इनायत यह कि पूछते हैं लोग उनसे - ज़िन्दगी क्या है ? परिस्थितियाँ कौन देखता है कौन जानता है - कि दिल को बचाता हुआ डॉक्टर ऑपरेशन की सफलता के बीच दिल पर हाथ धरे घुट घुट कर साँसें लेता है डॉक्टर तो भगवान् होता है उसके लिए तो आत्महत्या बहुत बड़ा पाप है ... शरीर से लाचार कराहते लोगों को समय से पहले मौत देना स्वीकार नहीं मोह से बंधे लोग उनकी तकलीफ से अधिक अपने मोह को ... more » 
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भ्रष्ट है, पर अपना है by प्रवीण पाण्डेय at न दैन्यं न पलायनम्

ठंड और धुंध ने पूरा कब्जा जमाया हुआ है, हवाई जहाज को सूझता नहीं कि कहाँ उतरें, ट्रेनों को अपने सिग्नल उसके नीचे ही आकर दिखते हैं, कार ट्रक के नीचे घुस जाती है, लोग कुछ बोलते हैं तो मुँह से धुँआ धौंकने लगता है। सारा देश रेंग रहा है, कुछ वैसा ही जैसा भ्रष्टाचार ने बना रखा है, लोगों की वेदना है कि कहीं कोई कार्य होता ही नहीं है। मेरे कई परिचित इस धुंधीय सिद्धान्त को नहीं मानते हैं, वे आइंस्टीन के उपासक हैं, ऊर्जा और भार के सम्बन्ध वाले सिद्धान्त के। उनका कहना है कि जितनी गति से कार्य अपने देश में होता है उतनी गति से कहीं हो ही नहीं सकता है, प्रकाश की गति से, उस गति में धन और ऊर्जा में...  
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वीरों का हो कैसा बसंत … ( सुभद्रा कुमारी चौहान ) by संगीता स्वरुप ( गीत ) at राजभाषा हिंदी 

जन्म –१९०४ निधन -१९४८ आ रही हिमालय से पुकार है उदधि गरजता बार बार प्राची पश्चिम भू नभ अपार; सब पूछ रहें हैं दिग-दिगन्त वीरों का हो कैसा बसंत फूली सरसों ने दिया रंग मधु लेकर आ पहुंचा अनंग वधु वसुधा पुलकित अंग अंग; है वीर देश में किन्तु कंत वीरों का हो कैसा बसंत भर रही कोकिला इधर तान मारू बाजे पर उधर गान है रंग और रण का विधान; मिलने को आए आदि अंत वीरों का हो कैसा बसंत गलबाहें हों या कृपाण चलचितवन हो या धनुषबाण हो रसविलास या दलितत्राण; अब यही समस्या है दुरंत वीरों का हो कैसा बसंत कह दे अतीत अब मौन त्याग लंके तुझमें क्यों लगी आग ऐ कुरुक्षेत्र अब जाग जाग; बतला.... 


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क्या कहूँ...आज के दिन का वाकई कुछ याद नहीं है...सिवाए इसके कि जितनी तुमने बाँहें खोली थीं उनमें पूरा आसमान आ जाता... रिश्ते पर जाती हूँ तो बस इतना है कि मैं बहुत खुश थी...और तुम भी. बस. बहुत देर से कोरा पन्ना खुला हुआ है...जानती हूँ कि कुछ नहीं लिख सकूंगी...कुछ भी नहीं...तुम्हें इतने सालों बाद देखना...तुम्हें छूना...तुम्हारे गले लगना... बस...आने वाले कई सालों के लिए इसे यहाँ सहेज के रख रही हूँ...कि आज इक्कीस जनवरी २०१२ की रात मेरे चेहरे पर एक मुस्कान थी...तुम्हारे कारण...दिल में धूप उतरी थी...सब कुछ अच्छा था...कहीं कोई दर्द नहीं था...एक लम्हा...सुकून था...
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यह हल बिल्‍कुल ठीक नहीं है कि हम तकनीक के खतरों से डर कर उस पर सरकारी प्रतिबंध ही लगा दें। अपितु इसके लिए ऐसी स्‍वस्‍थ नीतियों और अनुकूल नियमों को लागू करें जिससे इसमें शामिल होने वालों को सुरक्षा का अहसास हो सके। इससे उन फर्जी खातों में भी कुछ सीमा तक कमी आएगी जो आतंक फैलाने के लिए इन माध्‍यमों पूरा पढ़ने के लिए क्लिक कीजिए...... 
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कैसी शय है यार मोहब्बत, बारिश सूखी लगती है... धूप ज़रा ठंडी लगती है, सर्दी गर्मी लगती है... कैसे कह दूं नाम तुम्हारा, और किसी से वाह सुनू... कुछ ग़ज़लें तो बस सीने मे, उलझी अच्छी लगती हैं... कहाँ मोहब्बत के जज़्बे को, इन आँखों से तोले हम... कभी कभी सौ फूल नही, इक पत्ती अच्छी लगती है... उनके लब की खामोशी का, दर्द कहाँ तक सह पाते... हमें आज उनकी होठों से, गाली अच्छी लगती है... बड़े करिश्मे हैं दुनिया मे, इससे बेहतर क्या होगा... माँ के हाथों से रूखी, रोटी भी अच्छी लगती है... तुम कहते हो हम सुनते हैं, 'अभीऔरहैजहाँ' 'सनम'... कुछ बातें तो बस कहने सुनने मे अच्छी लगती हैं... 

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प्रिय मित्रो सादर ब्लॉगस्ते! साथियो आप सभी को याद होगा कि बचपन में कार्टून फिल्मों के आप और हम कितने दीवाने थे और कार्टून फिल्म देखना हमारे जीवन की दिनचर्या थी. बिल्लू, पिंकी, साबू और चाचा चौधरी जैसे कार्टूनी अवतारों की कॉमिक्स कितना आनंद देती थीं उन दिनों. आज आपसे मिलवाने जा रहा हूँ अपने कार्टूनों से सबको हँसाने वाले कार्टूनिस्ट सुरेश शर्मा जी से. सुरेश शर्मा जी का जन्म बिहार राज्य के मुंगेर नामक स्थान पर हुआ. इन्होंने बहुत छोटी उम्र से ही कार्टून बनाना आरंभ कर दिया था. जब यह पढ-लिख गए तो इनके माता-पिता से इनकी आज़ादी बर्दाश्त न हुई और .....

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कई बार हँसा हूँ कई बार रोया हूँ कई बार जला हूँ कई बार बुझा हूँ चोट खाता रहा हूँ सहता रहा हूँ फिर भी जीता रहा हूँ किस्मत से लड़ता रहा हूँ टूटा हूँ मगर थका नहीं हूँ नाउम्मीद अब भी नहीं हूँ अब भी नए लोगों से मिलता हूँ नए दोस्त बनाता हूँ.... 
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*कल जब मैं बस से जा रही थी कौलेज* *तब बस पर आया , तोंदू बच्चा एक * *बिलकुल मटके जैसा था , उसका पेट * *दिखाकर जिसको , उसने माँगा रुपया एक * *मैंने कहा " दर्द और व्यंग्य " से * *तुम्हें दिया यह किसने , काम नेक * *गिड़गिडाकर बोला " माई " * *बाप नहीं घर में , मेहताई है भूखे पेट !* *लगा जैसे वह , किसी शिकारी का रट्टू तोता हो एक !* *दांत थे उसके गुटखे से सने हुए ,* *देख जिन्हें मैंने कहा * *गुटखा खाते हो !* *नहीं दूँगी तुम्हें , रुपया एक * *पर गिड़ गिड़ाहट से अपनी * *उसने जगाया , ह्रदय में तीव्र करुण भाव * *और * *जाने -अनजाने में * *मैंने दिए उसे, रूपए दो ,* *और जाते-जाते वह मुझे * *दे गया प्रश्न... 
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तीन साल का लेखा जोखा (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’) by डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) at उच्चारण 

*तीन साल का लेखा जोखा (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री **‘**मयंक**’**)*** *मित्रों!*** * आज से ठीक 3 साल पहले 21 जनवरी, 2009 को हिन्दी ब्लॉगिंग की दुनिया में मैंने अपना कदम बढ़ाया था। ये तीन साल न जाने कैसे गुज़र गये मुझे पता ही न लगा। ऐसा लगता है कि यह कल ही की बात है। उस समय मेरी रचनाओं ने 100 का आँकड़ा भी पार नहीं किया था। लेकिन दिन गुजरते गये और रचनाएँ बढ़ती गईं। जिनकी संख्या बढ़कर अब 2000 के आस-पास पहुँच गई हैं। मैं यह तो नहीं कहूँगा कि यह मेरी लगन और निष्ठा का परिणाम है। लेकिन इतना जरूर है कि मैं जिस किसी काम को हाथ में लेता हूँ उसमें तन-मन-धन से लग जाता हूँ। ......... 
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चलिए आज की बुलेटिन यहीं तक..... अंत में अपनी भी सुनाता चलूं की तर्ज़ पर लीजिए.... शनिवार की सुबह.... देव बाबा की कविता.... 

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11 टिप्पणियाँ:

shikha varshney ने कहा…

अतीत को छोड़ भी दें.तो भी बहुत कुछ है भारत में, जिस पर गर्व किया जा सकता है.बस जरुरत है उसकी कदर करने की.
बढ़िया बुलेटिन.

शिवम् मिश्रा ने कहा…

"यूनानो-मिस्रो-रोमाँ सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-ज़माँ हमारा"

जय हिंद ... जय हिंद की सेना !

रश्मि प्रभा... ने कहा…

अपना भारत .... अपना देश ... सबसे सुन्दर , सबसे ख़ास ! शक्ति यहीं भक्ति यहीं .अंचार देखते मुंह में पानी आ गया .........

Vibha Rani Shrivastava ने कहा…

हिन्दुस्तान में सब कुछ है..... हिन्दुस्तान जितना विविध कोई नहीं.... विविधता में एकता यही है हमारी विशेषता....
सच्चे देशभक्त की निशानी , अपने देश की सुनाई कहानी....
अच्छे लिंक्स की अच्छी प्रस्तुति.... :)

अविनाश वाचस्पति ने कहा…

लगता है 26 जनवरी की परेड का पूर्वावलोकन देख रहा हूं
आजकल दिमाग में गणतंत्र दिवस की परेड ही घूम रही है
सोच रहा हूं कि ढका हुआ हाथी कैसे चलेगा
फिर सोचता हूं जब ढका हुआ देश दौड़ रहा है
तो ढका हुआ हाथी क्‍या वोटर भी खूब दौड़ेगा
जब आगे आगे नीले लाल नोट और लालपरी देखेगा
वोट को थमा देगा राहुल के गुण्‍डों के हाथों
और अपनी शराफत में सब्र करेगा।

श्रीकान्त मिश्र ’कान्त’ ने कहा…

ब्लाग बुलेटिन का स्वागत है .. इसके आवरण के पश्चात पोस्ट की निरन्तरता और नवीनता हेतु शुभकामना

सुमित प्रताप सिंह ने कहा…

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
और मिटने भी नहीं देंगे हम....
सार्थक पोस्ट...

RITU ने कहा…

बढ़िया बुलेटिन ..
kalamdaan.blogspot.com

जयदीप शेखर ने कहा…

"यूनानो-मिस्रो-रोमाँ सब मिट गए जहाँ से
अब तक मगर है बाक़ी, नामो-निशाँ हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन, दौरे-ज़माँ हमारा"

उत्थान-पतन का दौर तो चलते रहता है... सुनते हैं कि भारत के "उत्थान" का समय फिर से नजदीक आ रहा है, आपकी क्या राय है?

देवांशु निगम ने कहा…

बढ़िया लगा बुलेटिन, सरे लिंक पढ़ आया , शनिवार कि छुट्टी बढ़िया बीती...शुक्रिया!!!!

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

विविधता तो घोड़ों में ही पायी जाती है, कुछ कमजोरियाँ है, देर सबेर सुलटा लेंगें...

प्रभावशाली लिंक..

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