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रविवार, 18 दिसंबर 2011

प्रतिभाओं की कमी नहीं - अवलोकन २०११ (9) - ब्लॉग बुलेटिन



कई भागो में छपने वाली इस ख़ास बुलेटिन के अंतर्गत आपको सन २०११ की कुछ चुनिन्दा पोस्टो को दोबारा पढने का मौका मिलेगा !

तो लीजिये पेश है अवलोकन २०११ का नौवां भाग ...
 

पैसे से रोटी, कपड़ा , मकान यानि एक छत की बात समझ में आती है , पर करोड़ों की जायदाद विरासत बन जाए तो गुमराह होने में वक़्त नहीं लगता ! कई घरों के भावी कर्णधार डगमगाने लगते हैं सिगरेट के धुओं के छल्ले के साथ और कुर्बान जाऊँ उन अभिवावकों पर जो फख्र से कहते हैं - भगवान् ने दिया है तो अपनी ज़िन्दगी जी रहे हैं what goes of your father ! न बाबा , हमारा , हमारे पिता का कुछ नहीं जायेगा , जो जायेगा वो तो आप देखते जाइये ....
विरासत कुछ ऐसी हो तो क्या कहने ... सदियों तक यह गुमान बनकर बातों में चलता है ...
जी गौर कीजिये लावण्या शाह जी की http://www.lavanyashah.com/2011/07/blog-post_29.html इस विरासत पर ,
"ये कहानी मेरे नाती नोआ के लिए और हर उमर के बच्चों के लिए समर्पित है " नोवा , तुम्हीं बोलो , इससे बेहतरीन कोई उपहार होगा ? कम उम्र में इसकी अहमियत शायद समझ में न आए , पर बढ़ती उम्र के साथ - यह खजाना बन जायेगा , जिसे तुम अपने नाती-पोतों को दिखाओगे ...

बहुत कम लोग आस पास के पात्रों से कुछ सीखते हैं , उनकी पूरी गतिविधियों से जुड़ते हैं .
रश्मि रविजा http://rashmiravija.blogspot.com/2011/11/blog-post_16.html में बताती हैं -
"औसत कद के दुबले-पतले पर स्फूर्तिवान काका सुबह साढ़े छः बजे ऑटो के इंतज़ार में खड़े मिलते हैं. रोज, सुबह की चाय पी वे ऑटो ले लाइब्रेरी जाते हैं. सीनियर सिटिज़न की लाइब्रेरी की चाबी उनके पास ही रहती है. लाइब्रेरी में छः अखबार आते हैं...उनपर स्टैम्प लगाते हैं. पत्रिकाओं को करीने से रखते हैं. लोगो से मिलजुलकर वे घर लौटते हैं. नाश्ता कर, लेखन कार्य करते हैं. फिर खाना खाकर थोड़ा आराम और दो बजे से वे बच्चों को मराठी पढ़ाने के लिए निकल पड़ते हैं."... कुछ लोगों की दिनचर्या , जीवन के प्रति उनका उत्साह ... बरबस मन कह उठता है , हम भी तो इस नियम से बहुत कुछ कर सकते हैं . ऐसे लोगों से बात कीजिये तो उनके व्यक्तित्व के आगे झुक जाने को मन करता है और भागती ज़िन्दगी कोई अर्थ दे जाने का मन होता है ...

बचपन अपना अपना होता है, सबकी अपनी एक ख़ास जमापूंजी होती है ... शब्दों में क्या बताऊँ ! समझ लो एक गुल्लक - जिसमें कुछ शरारतें, कुछ टिमटिमाती हसरतें , कुछ लम्बी सी खिलखिलाहट , कुछ गोलंबर के खेल, कुछ शीशे की गोलियां ..... बहुत बड़ा गुल्लक , जिसे फोड़ना नहीं पड़ता , हाथ में लो और यादें बाहर ...
" सच कहूं तो बचपन खुद ही यादों का टोकरा होता है , कमाल की बात ये है कि बचपन न सिर्फ़ हमारे लिए बल्कि हमारे अपनों के लिए भी हमारा बचपन उनकी यादों का टोकरा ही होता है । एक ऐसा टोकरा , जो समय के साथ और भी भरता जाता है , नई यादें जुडती जाती हैं लेकिन फ़िर भी बचपन की यादों का तो जैसे एक अलग ही सैक्शन होता है । और बचपन की बातें जब आप बडे होकर याद करते हैं , तो बहुत सी मीठी खट्टी यादें आपके आसपास तैरने लगती हैं । " अलादीन के चिराग सा होता है ये बचपन ... बल्कि उससे भी ज्यादा कीमती - धीरे से छुते - एक नहीं कई जिन्न निकल आते हैं और कहानियों का , शैतानियों और सबक का अम्बार लग जाता है ,
" छोटी छोटी ख़ुशी छोटे छोटे वो ग़म , हाय क्या दिन थे वो भी क्या दिन थे ! "

छुप्पा छुप्पी खेलते हैं और पकड़ते हैं कुछ और ब्लॉगर - अगली पारी के लिए - तो फिर मिलते हैं न...

एक सुचना और देनी थी आप सब को :- 
२०११ के इस अवलोकन को मैं पुस्तक का रूप दूंगी , लिंकवाली पूरी रचना होगी ... यदि आपको आपत्ति हो तो स्पष्ट कर दें ... और हाँ किसी को यह पुस्तक उपहार स्वरुप नहीं दी जाएगी ....अतः इस आधार पर निर्णय लें ...


रश्मि प्रभा

19 टिप्पणियाँ:

वन्दना अवस्थी दुबे ने कहा…

badhiya hai badhiya hai. padh rahee hoon lagaatar.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चुनिन्दा पोस्ट और इस बुलेटिन का इंतज़ार रहता है ... आभार

वन्दना ने कहा…

बहुत सुन्दर व रोचक लग रहा है पुन: अवलोकन्।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

कुछ अच्छी पोस्ट का बेहतरीन संकलन इकठ्ठा होता जा रहा है ....

POOJA... ने कहा…

waah... Ham bhi is lukka chhupi mei shamil ho gae...
Agle ka intzaar...

गिरीश"मुकुल" ने कहा…

जारी रखिये जी बधाईयां

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत सुन्दर व रोचक !

निरामिष ने कहा…

सुन्दर शुभंकर श्रम

Gunjan ने कहा…

क्या कहूँ .. कई अखबारों को जांचा है मैंने .. कई पर घूम कर भी आई.. पर निश्चय ही आपका अखबार सबसे अलग है ..
इक ही विषय पर सबका अपना अलग नज़रिया .. वह्ह्ह ..
ये चक्र यूँ ही यथावत चलता रहेगा .. आशा है
शुभकामनाओं के साथ ..

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत बढ़िया सूत्र दी....
सादर आभार...

Kailash Sharma ने कहा…

बहुत रोचक...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

बहुत अच्छा लगा लिंक्स को पढ़ कर।


सादर

Sadhana Vaid ने कहा…

अत्यंत सराहनीय प्रस्तुति है रश्मि जी ! अब तो इसकी आतुरता से प्रतीक्षा रहती है !

राजेश उत्‍साही ने कहा…

निश्चिंत रहिए। किताब हम खरीदकर ही पढेंगे।

डॉ. जेन्नी शबनम ने कहा…

saraahniye kaarya. pustak awashya khareedenge.

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

bahut sunder

Atul Shrivastava ने कहा…

बहुत अच्‍छा बुलेटिन।
बधाई और शुभकामनाएं.......

Mukesh Kumar Sinha ने कहा…

aaaj ki taja khabar:)))
fir se achchhi lagi!!

सदा ने कहा…

चयनित सभी रचनाएं बहुत ही अच्‍छी हैं ... आभार सहित शुभकामनाएं ।

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